यादों की कुंडली में सेंधमारी करके उन्हें तोड़ देने की कला अभी तक नहीं सीख पाया। कच्ची शराब देर तक पीता रहा...सुबह खुद का मुंह आईने में देख लिया। मैं काला दिख रहा था। अपने चेहरे को देखकर मैं खुश हो गया। कालापन मुझे पसंद था। उसकी आंखें भी इसी तरह काली थीं। बड़ी-बड़ी। मुझे हंसी आने लगी। मैं कुछ-कुछ उससा दिखने लगा था। पर खुद को मैं ऐसा देखना नहीं चाहता था। बाथरूम में खुद का चेहरा साफ करने लगा। साबुन से धोया...पर कालापन नहीं गया। फिर आईने के सामने था। मन ने कहा...चेहरा सूख गया है। मैं फिर से नल की तरफ बढ़ने लगा। पर फिसल गया। पैरों में चोट लगी। मुंह से आह निकली...पर चीख कहीं विलिन हो गई। मैं पैर पकड़कर बैठ गया। काफी देर तक बैठा रहा। फिर हंसने लगा। वापस बिस्तर पर आ गया। मोबाइल उठाया....पर वो बंद हो चुका था। मुझे लगा, इस दर्द को लिख लेना चाहिए। कभी-कभी दर्द हमारी जिंदगी में बेहद उपयोगी हो जाते हैं। ऐसे दर्द को लिख लेने से वो सुरक्षित भी हो जाते हैं। हमने दर्द को सुरक्षित करने की सोची....पर अपना चेहरा बार-बार अपनी ही आंखों के सामने आ रहा था। मुझे लग रहा था, किसी ने फरेब की कालिख मेरे मुंह पर पोत दिया हो। पर, मेरे ऊपर इसका कोई असर नहीं हो रहा था। उसने कहा था...तुम गिर चुके हो। मैंने माफी मांग ली। उसने कुछ शाप दिए। मैं मुस्कुराता रहा। मुझे लगा...शायद, उसके चश्मे से शाप निकलकर मेरे मुंह पर फैल गया है। पर इस कालेपन से अचानक मैं प्यार करने लगा था। मैंने उससे भी प्यार किया था...पर ये प्यार उसे तोड़ गया। मैंने उसे तोड़ दिया।
हाहाहाहा...पता नहीं मैं अब भी किस बात पर हंस रहा था। ऐसा होता है...रेगिस्तान के रेत के नीचे की नमी दिखती नहीं। दिल तो रोता रहता है...पर आंसू दिखते नहीं। तुमने अच्छा ही किया मुझसे नाता तोड़ के...कि मेरे पास नहीं था फेवीकॉल..तुम्हारें टूटे दिल को दुरूस्त करने के लिए।
हाहाहाहा...पता नहीं मैं अब भी किस बात पर हंस रहा था। ऐसा होता है...रेगिस्तान के रेत के नीचे की नमी दिखती नहीं। दिल तो रोता रहता है...पर आंसू दिखते नहीं। तुमने अच्छा ही किया मुझसे नाता तोड़ के...कि मेरे पास नहीं था फेवीकॉल..तुम्हारें टूटे दिल को दुरूस्त करने के लिए।