वो एक खिलौना भर है...टूट जाना उसकी नीयति है..। वो टूट ही जाएगा...। फिर क्यों हम करें उसकी उम्मीद...।
दूर एक धुंधला सा लैंप पोस्ट दिखता है।...उस जगह जाकर हमें बिछड़ जाना है।...लैंप पोस्ट मुझे किसी ड्रैकुला सरीखा दिखता है..। उस पीली सी धुंधली रोशनी देखकर डरता रहता हूं।... क्या मैं उस निश्चित बिंदु पर उसे त्याग दूंगा।... क्या कहूंगा उस वक्त मैं उसे...? इस वक्त मुझे भगवान राम याद आ रहे हैं।...उन्होंने सीता को त्याग दिया था..। लक्ष्मण को त्याग दिया था...। अचानक.....
त्याग देना सबसे कठोर शब्द लग रहा है मुझे।
अचानक एक खरगोश दिखता है। चंचल सा खरगोश...डरा हुआ..। बिल्कुल मेरे मन जैसा...। खरगोश कठोर नहीं होता है। इसलिए ये मुझे सबसे ज्यादा प्रिय है। मुझे हाथी भी बहुत प्रिय है, क्योंकि मैं हाथी जितना कठोर होना चाहता हूं।...मुझे कबूतर इसलिए अच्छे लगते हैं, क्योंकि, एक दफे मैंने उसे अपनी कहानी सुनाई थी।...और फिर उसने मुझे कहा था...मुझे तुम्हारे जैसा इंसान बनना है। फिर उसने मुझे त्याग दिया था..। वापस नहीं आया...।
मैं कभी-कभी सोचता हूं...भगवान को आधा इंसान होना चाहिए था।... कम से कम उन्हें दिखना चाहिए था...। हालांकि, फिर भी मैं उनसे सवाल नहीं पूछता...मगर, मैं उनकी बेबसी देखकर मुस्कुराने का मौका नहीं चूकता।...और मैं चाहता...कि जब मैं उनकी बेबसी पर मुस्कुराता...तो वो मुझे देखते..। मुझपर कोफ्त करते...। फिर मैं जोर-जोर से हंसता...। राम की बेबसी पर मैं खामोश हो जाता हूं। मैं रोने लगता हूं, जब देखता हूं, कि सीता रथ में बैठकर जंगल जा रही हैं। मैं रोने लगता हूं, लक्ष्मण को देखकर जब उन्हें राम कहते हैं...जाओ मैंने तुम्हें त्याग दिया है।...
कितनी उदास कहानी मैं लिख रहा हूं।... पर इससे ज्यादा खूबसूरत और क्या होगा ? डूबते साहिल को आवाज देकर कहता हूं....हाथ बढ़ाकर संभाल लो मुझे।...
दूर एक धुंधला सा लैंप पोस्ट दिखता है।...उस जगह जाकर हमें बिछड़ जाना है।...लैंप पोस्ट मुझे किसी ड्रैकुला सरीखा दिखता है..। उस पीली सी धुंधली रोशनी देखकर डरता रहता हूं।... क्या मैं उस निश्चित बिंदु पर उसे त्याग दूंगा।... क्या कहूंगा उस वक्त मैं उसे...? इस वक्त मुझे भगवान राम याद आ रहे हैं।...उन्होंने सीता को त्याग दिया था..। लक्ष्मण को त्याग दिया था...। अचानक.....
त्याग देना सबसे कठोर शब्द लग रहा है मुझे।
अचानक एक खरगोश दिखता है। चंचल सा खरगोश...डरा हुआ..। बिल्कुल मेरे मन जैसा...। खरगोश कठोर नहीं होता है। इसलिए ये मुझे सबसे ज्यादा प्रिय है। मुझे हाथी भी बहुत प्रिय है, क्योंकि मैं हाथी जितना कठोर होना चाहता हूं।...मुझे कबूतर इसलिए अच्छे लगते हैं, क्योंकि, एक दफे मैंने उसे अपनी कहानी सुनाई थी।...और फिर उसने मुझे कहा था...मुझे तुम्हारे जैसा इंसान बनना है। फिर उसने मुझे त्याग दिया था..। वापस नहीं आया...।
मैं कभी-कभी सोचता हूं...भगवान को आधा इंसान होना चाहिए था।... कम से कम उन्हें दिखना चाहिए था...। हालांकि, फिर भी मैं उनसे सवाल नहीं पूछता...मगर, मैं उनकी बेबसी देखकर मुस्कुराने का मौका नहीं चूकता।...और मैं चाहता...कि जब मैं उनकी बेबसी पर मुस्कुराता...तो वो मुझे देखते..। मुझपर कोफ्त करते...। फिर मैं जोर-जोर से हंसता...। राम की बेबसी पर मैं खामोश हो जाता हूं। मैं रोने लगता हूं, जब देखता हूं, कि सीता रथ में बैठकर जंगल जा रही हैं। मैं रोने लगता हूं, लक्ष्मण को देखकर जब उन्हें राम कहते हैं...जाओ मैंने तुम्हें त्याग दिया है।...
कितनी उदास कहानी मैं लिख रहा हूं।... पर इससे ज्यादा खूबसूरत और क्या होगा ? डूबते साहिल को आवाज देकर कहता हूं....हाथ बढ़ाकर संभाल लो मुझे।...
No comments:
Post a Comment