हम छोटे होते हैं, और जीवन हमारे सामने शतरंज बिछा देता है. उस वक्त हम पहली गलती करते हैं... मस्ती के लिए एक प्यादे की चाल चल देते हैं. बस यहीं से हम खेल में चुन लिए जाते हैं. हम काले और सफेद खानों के बीच बांट दिए जाते हैं. नियम इतने सख्त होते हैं, कि ना खेल छोड़ सकते हैं, और ना ही पाला बदल सकते हैं.
हमें अपने जीवन का राजा बना दिया जाता है, जिसके हाथ में कुछ नहीं रहता. इस खेल में हम सालों बने रहते हैं. हर दिन सुबह उठकर देखते हैं, कि जीवन ने कौन सी चाल चली है. जीवन भी कभी तेज चलता है, तो कभी शांत देखता रहता है. हम इस बीच छोटे बड़े कंप्रोमाइज करते रहते हैं. हम समय से समय मांगते हैं. चिल्लाकर कहना चाहते हैं, सुनो... मैं ना काले में हूं, और ना ही सफेद में. फिर हम चुपचाप खेल में शामिल हो जाते हैं. अंत तो आना ही है.. कभी पहले तो कभी देर से... इसलिए बाजी पर पकड़ मजबूत करना चाहते हैं. मगर होता क्या है... हम जीतते कभी नहीं हैं... बस हार को टालने की कोशिश में खेल से हमें बाहर कर दिया जाता है....
