Wednesday, 27 December 2017

शुभसंकेत

उसका बार-बार सपनों में आ जाना एक सितम ही है। दोपहर में बेवक्त सोना...मतलब सपनों में उसे बुलाने का न्योता है। वो फिर से लाल स्कॉर्फ लगाए सपनों में थी। दूर से मुस्कुराकर मुझे देखती हुई। मैं बस उसे देख रहा था। वो मुस्कुराकर पहाड़ की एक चोटी पर बैठ गई। मैं उसके पास...उसके बगल में बैठना चाहता था। पर मैं उसका नाम नहीं जानता था। इसलिए सोचा, इसे कोई नाम नहीं दूंगा। हां, बस ये होने लगा...कि जब-जब वो सपनों में आती थी, मुझे एक नई कहानी मिल जाती थी। लिहाजा, मैंने उसका नाम 'शुभसंकेत' रख दिया। मैं अब उसके पास...उसके बगल में बैठा था। मैंने सोचा...काश, इसका लाल स्कॉर्फ मेरे गालों को छू जाए, तो क्या होगा ? अगर मैं इसका नाम जान जाऊं, तो क्या होगा ? अगर, मैंने इसे साफ-साफ कह दिया...कि तुम आती हो, तो एक टीस उठने लगती है, तो क्या होगा ? मैंने उसे कहा- सुनो....तुम बहुत सुंदर हो....सबसे सुंदर । और तुम मुझे प्रिय भी हो। मेरा इतना कहते ही...वो वहां से उठ गई। वो डर चुकी थी।..वो वहां से भागने लगी...। मैंने कहा...रूको... सुनो...ठहरो...। भागो मत...।....मैं तुम्हारे बारे में बात करना चाहता हूं। सपनों के बारे में बात करना चाहता हूं। हमारे बारे में बात करना चाहता हूं। पर वो नहीं रूकी।...
मैंने देखा...वो एक चिड़िया बन गई है।...और पहाड़ की चोटियों के बीच उड़ रही है।...उसकी चोंच लाल स्कॉर्फ जैसे थे...और उसके ऊपर एक लाल मुकुट लगा हुआ था।...लंबी पूंछ वाली वो चिड़िया उड़कर पहाड़ की चोटियों में कहीं गायब हो चुकी थी।...अचानक, मेरा पैर एक पहाड़ की चोटी से पिसल गया...। मैं पहाड़ से गिरने लगा...। मुझे लगा...अब मेरा अंत नजदीक है।...मैं गिरते-गिरते धम्म से बिछावन पर गिरा।... अलार्म जोर-जोर से बज रहा था। और मैं सपने से जग चुका था।....

Tuesday, 22 August 2017

पहाड़

वो मुझे कबूतर की तरह लगने लगी। कुछ नखरे ही थे उसके ऐसे। गर्दन स्थिर ही नहीं रहता। कभी इधर मुड़ के देखना...कभी उधर। आंखों में मानो करंट दौड़ती रहती है।

-क्या मैं तुम्हें कबूतर कहूं ?
- कबूतर...? हीहीही...कबूतर क्यों ? मैं कबूतर जैसी लगती हूं क्या ?
- हां, बिल्कुल कबूतर जैसी ही। बस मुंडेर पर नहीं बैठती।
- अच्छा....तो तुम मुझे कबूतर कहोगे
- नहीं, मैं तुम्हें खरगोश कहूंगा
- खरगोश क्यों ?
- क्योंकि...खरगोश पहाड़ो में रहते हैं। और पहाड़ मुझे बेहद पसंद हैं।
- अच्छा, तो मैं जा रही हूं।
- कहां ?
- पहाड़ों में
- क्यों ?
- पहाड़ पर चढ़कर मैं चिल्लाना चाहती हूं। जोर-जोर से। खुद को पुकारना चाहती हूं। मुझे लगता है, मैं पहाड़ों में कहीं खो गई हूं। शायद किसी चोटी पर मौजूद देवदार के पीछे।
-  मैंने थोड़ा सा मुस्कुरा दिया। फिर कहा- सुनो, पिछले साल उस देवदार के पीछे मैं खुद को छोड़कर आया था। वहां चोटी से पानी की एक धारा बहती है। वहां मैं काफी देर तक बैठा रहा था। फिर पानी गायब हो गया। और खड़ा देवदार सूख गया। मैं देवदार से गले लगकर काफी देर तक रोता रहा। फिर खुद को देवदार की जगह छोड़ दिया। अब वहां देवदार नहीं है।

वो पहाड़ों की तरफ बढ़ गई। मैंने कहा, रूको...ठहरो...। सुनो।
पर वो नहीं रूकी। पहाड़ों में चली गई। मैं वहीं खड़ा रह गया।

मेरा सपना टूट गया था। सुबह के पांच बज रहे थे। मैं कमरे से निकलकर खिड़की के पास आ गया। आसमान में बादल छाए हुए थे। मैं बारिश होने का इंतजार करने लगा।









Wednesday, 16 August 2017

अधूरी कहानी

क्या तुम्हारे पास बची है थोड़ी सी शराब या सिगरेट का आखिरी कश...थोड़ा दर्द या थोड़ी सी जिंदगी ? या जो तुम नहीं जानते, उसपर यकीन करने की हिम्मत है ? अगर तुम्हारा जवाब हां है, तो सुनो प्रेम की एक बेमिसाल रचना।

उंगलियों में सिगरेट फंसाए एक खाली पार्क में बेंच पर सर झुकाकर बैठा वो एक कहानी लिख रहा था। अंधेरी रात में सिर्फ आधे चांद की रोशनी बिखरी थी। वक्त के पास सिवाय खालीपन के कुछ नहीं था। वो महसूस रहा था, कि कहानी का एक टुकड़ा बेंच के खाली हिस्से पर पड़ा है, मगर वो उसे पढ़ नहीं सकता। बस, देख सकता है। उस कहानी का कोई शक्ल नहीं था, बस कुछ बिखड़े अक्षर थे, बेवजह के शब्द थे...और कोई उसे सिगरेट पीता हुआ देख रही थी। वो उन अक्षरों को...उन शब्दों को समेट कर अपने लैपटॉप में एक शक्ल उतार लेना चाहता था, जो उसे सिगरेट पीता हुआ देख रही थी।
क्या मैं भी तुम्हारे साथ सिगरेट पी सकती हूं?
एक लड़की काली साड़ी पहने उसके सामने खडी थी। उसके माथे पर एक लाल टीके की रेखा थी। और चेहरे पर चांदनी पसरी हुई थी। वो काफी ज्यादा लंबी थी। करीब 10 फीट लंबी। 
वो आधी रात में एक अनजान एक हद से ज्यादा लंबी लड़की को देख हड़बड़ा सा गया। और फिर खुद को संभालते हुए पूछा ....
तुम कौन हो ? इतनी रात गये यहां इस खाली पार्क में क्या कर रही हो ?
मैं रात की देवी हूं। मैं रात होते ही जमीन पर उतर आती हूं। तुम यहां क्या कर रहे हो ? इससे पहले तो यहां कभी नहीं देखा ?
-मैं एक कहानी लिख रहा हूं। एक भष्मासुर की कहानी । 
-अच्छा। सिगरेट है तुम्हारे पास
- हां, ये लो
- तुम रात की देवी हो। देवी तो सिगरेट नहीं पीती। 
- मुझे अपने लोगों ने त्याग दिया है। इसलिए हर रात जमीन पर भटकती रहती हूं। मुझे वही देख सकता, जिसे मैं चाहूंगी। तुम अकेले हो अभी, इसलिए तुम्हारे पास आई हूं। 
कुछ देर खामोशी पसरी रही। फिर वो बोली......पहली बार सिगरेट पी रही हूं।
-क्या, त्याग दिया है...? मैं कुछ समझा नहीं। किसने त्यागा है ? कौन हो तुम ?
- दुनिया में कई ऐसे रहस्य हैं, जिसे हम नहीं जानते हैं। और जिसे हम नहीं जानते उसे हम झूठ मानकर नकार देते हैं। बकवास ठहरा देते हैं।
- देखो, मुझे डर लग रहा है। मैं तुम्हारी बातें नहीं समझ रहा हूं। देखो, मेरे रोएं...मेरे कान गर्म हो चुके हैं।
- डरो मत, मैं बुरी नहीं हूं। कुछ गलत नहीं होगा तुम्हारे साथ।
- तो तुम्हारी कहानी क्या है ? किसने त्यागा है तुम्हें ?
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- हमारी एक अलग दुनिया है। रात की दुनिया। हमारी दुनिया के लोग... तुम लोगों से काफी लंबे होते हैं। तुम मेरी लंबाई देख ही रहे हो।
-हां देख रहा हूं। काफी ज्यादा लंबी हो तुम। कहां है तुम्हारी दुनिया ?
- यहीं। धरती पर। हम अदृश्य रहते हैं। 
















हमशक्ल

कई बार हम मगन हो चलते रहते हैं, कि अचानक कोई हमें आवाज देकर रोकता है. शक्ल निहारता है. गौर से देखता है. और फिर हमें कहता है, आपको पहले कहीं देखा है. आपका नाम कहीं वो तो नहीं. ? हम मुस्कुराते हैं और कहते हैं, जी नहीं. मेरा नाम ये है. 
ये वाकया अकसर मेरे साथ होता है. कई मित्र अलग अलग शक्लों में मुझे मिला चुके हैं. कुछ मित्र लोकल रणवीर कपूर तो एक मित्र ने यहां तक कह दिया, कि अगर तुम्हारा गाल भर जाए तो सुधीर चौधरी का हमशक्ल लगोगे तुम. मैं मुस्कुरा कर रह जाता हूं.
कार वाला रूका और मुझे रोकते हुए कहा... भाई आप बिल्कुल मेरे एक दोस्त की तरह दिखते हैं. उसने अपने दोस्त की तस्वीर मुझे दिखाई. थोड़ा बहुत चेहरा वाकई मिलता था. वो हाथ मिलाकर, मुस्कुराकर चले गये. ऐसी घटना मेरे साथ कई बार हो चुकी है.
वाकई, हम कई शक्लों से मिलकर बने होते हैं.

नफरत

एक अदृश्य व्यूह है, जो इंसान को नफरती बना रहा है. शायद "अंधेरा कायम रहे" बोलने वाला तमराज किलविश इसके लिए जिम्मेदार है. वो नहीं चाहता की सबकुछ ठीक रहे. वो लड़ाई चाहता है, नफरत चाहता है और उसने बहुत से लोगों को अपने मकसद के लिए चुन रखा है. कोई हथियार बनाए जा रहा है, कोई उन हथियारों से हत्याएं किए जा रहा है. कुछ हैं जो इन्हें हवा दिए जा रहे हैं. कुल मिलाकर किलविश शांति नहीं चाहता है. शांति में वो बेचैन हो जाता है.
एक दिन अंधेरे का राज होगा. 
मैं शांति चाहता हूं, और शांति के लिए किलविश का वध भी करना चाहता हूं. पर दिक्कत ये है, कि किलविश अदृश्य है. वो दिखता नहीं है. वो अपने चुने हुए लोगों के ठीक पीछे खड़ा रहता है. जो गलत कर रहे हैं, वो गुनहगार हैं नहीं, तो उन्हें खत्म नहीं किया जाना चाहिए. क्योंकि वो समझ नहीं पा रहे हैं, कि किलविश ने उन्हें अपना गुलाम बना रखा है.
उपाय क्या है?
एक चश्मे का इजाद होना चाहिए. शायद लेजर वाला या फिर ऐसे लेंस वाला, जिसके सहारे हम किलविश को देख लें, और फिर किलविश को कैद कर उसे दंड दे सकें.
फिलहाल?
अंधेरा कायम करने की कोशिश जारी है. अंधेरा फैल रहा है. किलविश और मजबूत हो रहा है.
हमें एक शक्तिमान की जरूरत है.

चमत्कार क्या है, बड़ी बात क्या है?

चमत्कार क्या है, बड़ी बात क्या है?
धरती पर दो ही चीज शाश्वत सत्य है, जन्म और मरण. जीवन में इनके अलावा एक और चीज को मैं महत्वपूर्ण मानता हूं, वो है किसी की जिंदगी बचा लेना. जैसे किसी घायल को या बीमार को वक्त रहते अस्पताल पहुंचा देना. इनके अलावा इंसानी जिंदगी में हर चीज क्षणभंगुर है. रुपया-पैसा, एश-ओ-आराम, किसी भी चीज की कोई अहमियत नहीं है. कोई बात बड़ी नहीं है. रुपया नहीं कमा पाए ना, कोई बात नहीं. गाड़ी छूट गई, कोई बात नहीं..अरे जीवन है ना, बस वही चमत्कार है, बड़ी बात है.
रायबरेली में एक दुकान पर हम और अंबेश बैठे बात कर रहे थे. अंबेश के कुछ दोस्त भी साथ में थे. जाते वक्त एक दोस्त बाइक पर बैठा, और बाइक रिवर्स करने लगा. तभी पीछे से एक तेज रफ्तार दूसरी बाइक आई, और इस बाइक से बुरी तरह टकराई. अंबेश का दोस्त वहीं गिर गया. मगर दूसरा बाइक वाला बाइक समेत कुछ फीट उछलता हुआ, कई फीट आगे जा गिरा. सामने से तेज रफ्तार ट्रक मौत बनकर बाइक वाले की तरफ बढ़ रही थी. ये पूरा वाकया हम लोगों के सामने इतनी तेजी से घट रहा था, कि हमारा मुंह खुल चुका था. दोनों हाथ माथे पर जा चुका था. तभी ट्रक वाले ने किसी तरह ब्रेक लगाया और बाइक वाले के पास जाकर ट्रक रूक गया. बाइक वाले की किस्मत अच्छी थी. वो बच गया. लोग दौरे. दोनों बाइक सवारों को उठाया. दोनों में किसी को चोट नहीं लगी, ये भी हमारे लिए एक शुभ चमत्कार ही था.
ऐसे हादसे होते रहते हैं. लोग जाते रहते हैं... तो फिर बड़ी बात क्या है...? बड़ी बात बस एक है, जिम्मेदारी निभाना. हम जैसे इंसान जो जिम्मेदारियों से भागते रहते हैं, उनके लिए ऐसी घटना सबक होती है, कि वो अपनी जिम्मेदारी निभाएं. चाहने वालों को खुश रखे..बाकी बड़ी बात कुछ नहीं है.

बॉस

उसके बॉस ने ((मेरे एक IT में काम करने वाले मित्र को)) नामालूम क्यों उसे जमकर फटकार लगाई थी. उसे सबके सामने बुरी तरह जलील किया था. वो चुपचाप फटकार सुनता रहा, गर्दन झुकाए...बिना जवाब दिए. डांट-फटकार सुनने के बाद वो वापस अपने काम में लग गया. 
आज मैंने उसकी एक तस्वीर देखी. वो अपनी बीवी और बेटी के साथ किसी मॉल में था. वो बेहद खुश लग रहा था. मैं समझ गया, कि बस इसी खुशी की खातिर वो उतनी डांट झेल गया. वरना वो अपने बॉस का दांत तोड़ सकता था. बाल पकड़कर अपने बॉस को घसीट सकता था.
मेरा मानना है, कि कभी भी किसी को किसी भी बात के लिए डांटना नहीं चाहिए या किसी पर भी गुस्सा नहीं करना चाहिए. क्षणिक गुस्सा हो सकता है, मगर उसके लिए जलील करना जरूरी नहीं है. हर कोई अपने स्तर तक समझदार होता है. और किसी को इस भ्रम में भी नहीं रहना चाहिए कि उसके अंदर आइंस्टीन वाला दिमाग फिट है. हां, अगर कुछ गलतियां हो रही हैं तो प्यार से समझाया जा सकता है.
और इंसान को इतना तो याद रखना ही चाहिए... कि जब अकबर धूल में मिल गया.. अलेक्जेंडर को शिकस्त का सामना करना पड़ा, राणा प्रताप को घास चबानी पड़ी, तो हम भी कोई तुर्रम खां तो हैं नहीं...
इसलिए...सभी इंसान को प्रेम से पेश आना चाहिए... ताकि आपके अवसान के वक्त भी वो आपसे प्रेम से पेश आए...

अतीत

अतीत मधुमक्खियों की तरह होती हैं. जब तक आप चल रहे होते हैं, वो आपके पीछे पड़ी रहती हैं, लेकिन जैसे ही आप कहीं ठहरते हैं, मधुमक्खियां आपको दबोच लेती हैं. रात एक ठहराव है. इसलिए मैं देर रात तक जागता रहता हूं. एक तरह से मैं मधुमक्खियों को झांसा देने की कोशिश करता रहता हूं. झूठ बोलकर मधुमक्खियों से पीछा छुड़ाने के क्रम में कहानियां लिखना शुरू कर देता हूं. मुझे प्रेम की झूठी कहानियां लिखना बेहद पसंद हैं. कहानी के नायक से देर तक संवाद चलता रहता है, और फिर अंत में मैं तरस खाकर नायक को नायिका से मिला देता हूं. 
असल जीवन में मेरी कहानी को बस एक झूठ या फरेब ही कहा जा सकता है.

राधा और कान्हा

राधा और कान्हा यमुना तट पर बैठे बात कर रहे थे। राधा जाने को थी, लेकिन कान्हा उन्हें रोक रहे थे। और कल फिर से मिलने की जिद कर रहे थे। कान्हा ने कहा... जब मैं मुरली बजाऊं, तो समझ लेना राधा, कि मैं नदी तट पर तुम्हारी राह देख रहा हूं।
राधा- ना ना..मैं हाथ जोड़ती हूं...मुरली ना बजाना
कान्हा ने कहा- क्यों, मुरली क्यों ना बजाऊं ?
राधा- ना जाने तुम्हारी मुरली की सुरों में क्या जादू है। दोपहर के समय मुरली सुनते ही मेरी सखियां जाग जाती हैं। जब मैं तुमसे मिलने आती हूं, तो झरोखों से वो मुझे देखने लगती हैं। फिर सबको पता चल जाता है, कि तुम गांव के बाहर आ गये हो। घर-घर में मेरी और तुम्हारी चर्चा होने लगी है। तू नहीं जानता कान्हा, तेरे लिए मुझे कितनी निंदा सहनी पड़ती है।
राधा के बेबस नयनों को देखते हुए कान्हा कहते हैं- देखो राधा, जो निंदा से डरे, उसे प्रेम की डगर पर नहीं चलना चाहिए। इसलिए, जब मैं मुरली बजाया करूं, तो तुम घर से मत निकला करो।
राधा शिकायत करते हुए कहती हैं- परंतु ये पापिन, मुरली ही तो सारे दुखों की जड़ है. इसे सुनकर आये बिना रहा भी नहीं जाता मुझसे। इस सौतन के सुर तो जैसे पाश में बांधकर ले आते हैं मुझे। इसलिए कहती हूं, मुझपे दया करो
कान्हा- फिर तो प्रेम करना छोड़ दो राधा
राधा- ये भी तो संभव नहीं है
कान्हा- फिर ये भी संभव नहीं, कि मैं आना छोड़ दूं। देखो राधा, मुझे किसी निंदा की डर नहीं। इसलिए, मैं तो आया करूंगा
राधा- अगर मैं नहीं आऊंगी, तो तुम क्या करोगे
कान्हा- तो मैं...तुम्हारे चरणचिन्हों को ही मुरली सुनाकर लौट जाऊंगा
राधा—मेरे चरणचिन्हों को ?
कान्हा- हां...तुम प्रात: सखियों के संग जल भरने नदी तट पर जाती हो ना, तो वहां सबके चरणचिन्ह होते हैं। मैं उनमें से तुम्हारे चरणचिन्हों को पहचान सकता हूं। बस... मैं उन्हीं को प्रेम कर लौट जाऊंगा।
राधा की आंखों से आंसू बहने लगते हैं।
तभी राधा की मां की आवाज यमुना तट पर सुनाई देने लगती हैं। राधा जल्दी से जाने के लिए उठती है। कान्हा कहते हैं- राधा तो तुम आओगी ना?
राधा मुंह बनाकर कहती हैं- हूं, आऊंगी। ऐसा हो सकता है, कि तू मुरली बजाए कान्हा...और मैं ना आऊं।
इस तरह कान्हा ने राधा से फिर मिलने का वचन ले ही लिया। कितने छलिया हैं हमारे कान्हा भी....

कबूतर कहानी नहीं लिखते

कबूतर कहानी नहीं लिखते
कबूतरों की एक अलग कहानी होती है
कोने में बहुत देर से एक कबूतर बैठा हुआ था. मैं उसे निहारे जा रहा था. उसकी अनगढ़ जिंदगी के बारे में सोच रहा था. मैंने गौर किया कि ये कबूतर काफी वक्त से गुटरगूं नहीं कर रहा है. मैं खिड़की खोल कर कमरे के बाहर दीवारों पर बैठे कबूतरों को देखने लगा. वो सब भी बेहद खामोश थे. उनकी खामोशी अब मुझे अखरने लगी थी. चारों तरफ सिर्फ गाड़ियों की कर्कश आवाज, पर नीम खामोशी. मैंने चिल्लाकर कहा... अरे भाई लोग, कुछ बोलते क्यों नहीं? इतने चुप क्यों हो ? हल्ला करो...शोर मचाओ. पर सब शांत रहे. मैंने खिड़की बंद कर दिया. कोने में बैठे कबूतर के सामने कुछ चावल के दाने और एक कटोरा पानी रख दिया. पर उसने खाने को बड़ी ही हिकारत की नजर देखा. मुझे उसका रूखापन अखरने लगा. मैंने कबूतर को अपने हाथों से उठा लिया... उसे हाथों से पुचकारने लगा.
मैंने महसूस किया... कि दिल्ली के कबूतर अब गुटरगूं नहीं करते हैं. आप सिर्फ उनके पंखों की फड़फड़ाने की आवाज ही सुन पाएंगे. गांवों के कबूतर बहुत शोर मचाते हैं, खेलते हैं गंदगी भी बहुत फैलाते हैं. पर दिल्ली के कबूतरों की वेग की धाराएं स्थिर हो गईं हैं. उनकी स्थिरता में शायद एक प्रश्न होता है या फिर उनके खालीपन और मौन को अभी पढ़ा जाना शेष है.
कभी कभी मुझे लगता है कि ये दुखी कबूतर हैं. इन्होंने शायद प्रेम का त्याग कर दिया है. ये बस जिंदा रहते हैं, जिंदगी के होने के मतलब से इनका कोई मतलब नहीं रह गया है. कुछ देर बाद मैंने घर के मुंडेर पर कबूतर को छोड़ दिया. पर आश्चर्य वो उड़ा नहीं. वो वहीं बैठा रहा... बहुत देर तक.
मैं वापस कमरे में था... खिड़की से बाहर देखते हुए... किसी प्रेम से भरे कबूतर के इंतजार में.....

मन बावर्ची

मन बावर्ची सा हो गया है इन दिनों. खयाली पलाव पकाता रहता है. मैं रोकता हूं, तो जायका खराब होने का डर सताने लगता है. कुछ लिखने बैठ जाता हूं. काफी देर कोरे कागज को ताकने के बाद भी कुछ लिख नहीं पाता. प्रेम पर मैं लंबे दृश्य रच सकता हूं, लंबे संवाद लिख सकता हूं, मगर आज प्रेम पर लिखने का जी नहीं किया, सो लिखने का प्लान स्थगित हो गया है.
फिल्में देखना शुरू कर देता हूं, मगर कौन सा फिल्म देखूं ये तय करने में घंटा भर वक्त निकल जाता है. हारकर कंप्यूटर बंद कर देता हूं. अब बस सन्नाटे में देखना ही काम बचा है. पूरी रात गुजरने के बाद बस एक ही लाइन लिख पाया...
'जीवन में परफेक्ट प्लान जैसा कुछ नहीं होता है. हमें चलते चलते एडजस्ट करना पड़ता है'

आधी रात

वो देर रात तक कुछ लिख रहा था. फिर बारिश होने की आवाजें सुनाई देने लगी. उसने लिखना बंद कर दिया, और खिड़की के पास आ गया. बारिश होते वक्त कोई शहर कितना अजीब लगने लगता है. वो खिड़की से स्ट्रीट लाइट देख रहा था. रास्ते पर पीला प्रकाश फैला हुआ था. ऐसा लग रहा था कि किसी पेंटर ने काले रंग के ऊपर बहुत सा उदास पीला रंग फेंक दिया हो. उदास पीला रंग सोचते ही अचानक उसे अपनी लिखी कहानी बेईमानी लगने लगी. वो प्रेम पर लिख रहा था, जबकि ठीक इस वक्त वो उदासी पर लिखना चाह रहा है. जो लड़की उसकी कहानी में खिलखिला रही थी, असल में उसे उदास होना चाहिए था. वो वापस कमरे में आ गया. कहानी के पांच पन्नों को उसने फाड़ दिया और रास्ते पर फैली पीली उदासी में उसने अपनी कहानी को प्रवाहित कर दिया.
प्रेम को किसी गुस्सैल साधू ने दिया है श्राप
या प्रेम है उस गुस्सैल के कमंडल से निकला पानी
जो गिरने के साथ ही इंसान को कर देता दुखी
ना ना, प्रेम एक अलग किस्म का हीरा है
जिसे पाते ही प्रेमी लगा लेते हैं होठों से
चुमती हैं प्रेमिकाएं
और हो जाते हैं निढ़ाल, अचेत, या जाती है जान
असल में प्रेम ना चूमने की चीज है, ना होठों से लगाने की
वो बस एक सजावट का सामान भर है
बारिश की बूंदों के बीच उसकी कहानी उदासी के पीले रंग में समा चुकी थी और वो आंख बंद किए नींद का इंतजार कर रहा था.

आइंस्टीन से असफल संवाद

इन दिनों मौसम कुछ ऐसा है कि अल-सुबह तक नींद नहीं आती. आंखों के अरण्य में झितिज तक खामोशी फैली रहती है. मैं करवटें ले-लेकर नींद की देवी को झांसा देने की कोशिश हर रात करता हूं, लेकिन मेरी बेईमानी पकड़ी जाती है. 
इन दिनों आइंस्टीन को पढ़ रहा हूं. आइंस्टीन को पढ़ना कौतूहल को और बढ़ाना है. हर नये पेज पर एक नये चमत्कार को बनता देखता हूं और नाउम्मीदी हर पृष्ट पर दम तोड़ती नजर आती है. कुछ देर उन्हें पढ़ने के बाद मैं जादू की दुनिया में चला जाता हूं. किताब को बस देखता रहता हूं, आइंस्टीन आंखों के सामने होते हैं. मैं उनसे कुछ सवाल करना चाहता हूं, उनसे बातें करना चाहता हूं, पर वो मेरे सवालों का जवाब नहीं देते. बस मुझे देखकर मुस्कुराते रहते हैं. मैं भी उन्हें देखकर मुस्कुराने का अभिनय करता हूं. देखने और मुस्कुराने की इस प्रक्रिया के बीच फिर से सुबह होने को है. कल मैं उन्हें किसी तरह से बात करने के लिए राजी कर लूंगा, ऐसा विचार कर मैंने किताब को बंद कर सिरहाने में रख दिया है. अब कल रात आइंस्टीन से क्या संवाद होंगे इसे लेकर बेहद उत्सुक हूं....

आधा घंटा

दफ्तर से देर रात आने के बाद दिल बड़ी देर तक किंकर्तब्यविमूढ़ की स्थिति में रहता है. इस वक्त कोई काम नहीं होता है. घर पहुंचते ही मैं अपने कमरे में लेट जाता हूं. कुछ देर आंखें बंद रहती है. मगर अंदर कोई ख्याल नहीं रहता. दिन भर चलायमान होने के बाद अचानक रूक जाना भी बेहद अजीब होता है. फिर मैं आहिस्ता आहिस्ता आंखे खोलता हूं, और कमरे को निहारने लगता हूं. जैसा इसे छोड़कर गया था, ये वैसा ही है ना, उसे मुआयना करने की कोशिश करने लगता हूं. कमरे के कोनों में पसरी खामोशियों में एक आवाज खोजने की कोशिश करता हूं. जब बड़ी देर तक कोई आवाज नहीं आती, तो फ्रिज देखने लगता हूं. फ्रिज खोलकर अंदर से सुख निकालने की कोशिश करता हूं, मगर दो घूंट पानी पीकर वापस बिस्तर पर आ जाता हूं.
इन तमाम प्रक्रियाओं के दरम्यां ना कोई उम्मीद होती है, ना सपना.. ना दर्द, ना चैन... ना स्मृति ना कोई खोज. इस वक्त छत पर मकड़ी के जाले को देखता मैं कौन होता हूं, पता ही नहीं चलता.
ना उमंग, ना उत्साह, ना नींद
पेशानी पर पसरा पसीना
ना सोने की इच्छा, ना जागने की ख्वाहिश
हाथ के नाखून से पैरों के नाखून को साफ करना
ऊंगलियों से दिवाल छूना, सहलाना
इस आधे घंटे में ये सब शामिल होता है
करीब आधे बाद मेरी ही शक्ल का एक आदमी मुझे मेरे सामने खड़ा दिखाई देता है. मैंने उसे 'दया' नाम दिया है. वो इंगलिश हैट पहना हुआ होता है. उसकी ऊंगलियों में सिगरेट सुलग रहा होता है. कोट पैंट और टाय पहना हुआ वो किसी सिक्रेट एजेंट सा दिखता है. दया मुझे बेबस निढ़ाल बिस्तर पर पड़ा देख रहा होता है. मैं उससे नजर मिलाता हूं पर उसकी आंखों में मेरे लिए करूणा दिखती है. करूणा दिखते ही मैं झट से खड़ा हो जाता हूं. मैं भला किसी की आंखों में खुद को बेबस कैसे देख सकता, इसलिए फौरन फ्रेश हो जाता हूं. बेबसी में बेरूखी शामिल होता है, इसलिए मैं खुद को बेबस नहीं देखना चाहता. मेरी शक्ल का आदमी अब गायब हो चुका होता है. इसलिए कॉपी कलम निकालकर मैं कुछ लिखने बैठ जाता हूं.

अकेलापन

अकेलेपन की स्थिति में मन सबसे बड़ा चुगलखोर होता है. अकेलापन नियती नहीं होता, इंडिया में हम अकेलापन चुनते हैं. बाध्य नहीं होते. हम अकेलापन क्यों चुनने लगे हैं. इसका ठीक ठीक पता नहीं चलता. हां कुछ जवाब जरूर मिलते हैं, जैसे क्या हम डरपोक होते जा रहे हैं ? क्या परिस्थितियों या जिम्मेदारियों से भागने लगे हैं? या फिर किसी चित्र या शक्ल की खोज के अरण्य में भटक रहे हैं? उस चित्र का रहस्य समझ लें या उस शक्ल को पढ़ लें तो अकेलापन चुनने की जरूरत नहीं होगी. मेरे लिए सारी वजहें सोचने के बाद भी हर वजह कम पड़ जाती हैं.
रात के 2 बजे रहे हैं. मैं कैब बुक कर घर से निकल गया. खिड़की से दिल्ली के रास्तों को भागते देख रहा हूं. एक जगह मैंने ड्राइवर को रूकने के लिए कहा. देखा, कि एक लड़की एक रिक्शे वाले से तेज आवाज में बातें कर रही है. मैं कार से नीचे उतर गया. ड्राइवर बोला, सर...वो दूसरे टाइप की लड़की है. तभी लड़की की नजर मेरी आंखों से टकरा गई. वो झेंप गई. उसकी आंखों में शर्म दिखने लगा था. शायद वो नई थी. और संभवत: पैसों को लेकर अपने ग्राहक से बहस कर रही थी. मुझे देखते ही उसका स्वर कमजोर होने लगा. फिर वो बहस छोड़ वहां से चली गई. नजर मिलने की वजह से मुझे गिल्ट फील होने लगा. मैं उस लड़की से सॉरी कहना चाहता था. पर ड्राइवर ने कहा- सर, यहां से चलिए. मैं वापिस कार में था. हम अभी इंडिया गेट के आस पास कहीं थे. कुछ देर बाद मैं कनॉट प्लेस में घूम रहा था. दिल्ली की रातें तनहा होतीं हैं. कुछ पुलिसवालों के अलावा रास्ते अमूमन खाली ही रहते हैं. अभी रात के 3 बज चुके हैं और मैं आईसक्रीम खा रहा हूं. रबड़ी आईसक्रीम का टेस्ट मुझे सबसे ज्यादा पसंद है.
आज की रात अकेलेपन को मैंने संपूर्णता के साथ जीया है. अब मैं वापस घर लौट रहा हूं.

भष्मासुर

बहुत लंबे अर्से से उपन्यास वहीं पर पड़ा है. कंप्लीट नहीं कर पाने की गिल्ट हमेशा मेरे चेहरे पर चिपका रहता है. 100 पेज के करीब लिख देने के बाद उसे फाड़ कर फेंक देने की हिम्मत मैं कर चुका हूं. जबकि शो बनाते वक्त अपना लिखा एक लाइन भी डिलिट करना मेरे लिए बहुत भारी होता है. ना जाने कितने ही शो के लिए मुझे डांट पड़ चुकी है, कि इतने ड्यूरेशन का शो क्यों बनाए हो. तो फिर मैंने सौ पेज कैसे रद्दी में फेंक डाला, अब भी सोचता हूं, तो अचरज होता है. फिर सोचता हूं, उपन्यास लिखना शायद किसी किस्म का उन्माद है. और उस उन्माद से मैं अभी दूर हूं.
मेरा मानना है, जो आप सोचते हो, वो असल जिंदगी में भले ही नामुमकिन हो, मगर उसे पर्दे पर जरूर उतारा जा सकता है. जो किताब मैं एक लंबे अर्से से लिख रहा हूं, उसमें बहुत कुछ असंभव बातें हैं. मैंने एक किरदार रचा है, जो मेरे लिए ही भष्मासुर बन बैठा है. उस किरदार को मैं खुद बहुत नापसंद करता हूं, लेकिन उस किरदार के संवाद और उसकी सनक ने मुझे उसे जिंदा रखने को मजबूर कर रखा है. और उपन्यास कंप्लीट ना कर पाने की सबसे बड़ी वजह यही है. सबसे बड़ी दिक्कत है क्लाइमेक्स. मैंने उस किरदार को इतना मजबूत बना दिया है, उसके हाथों में इतनी शक्ति दे दी है, कि मैं खुद उसका विनाश नहीं कर पा रहा हूं.
इस भष्मासुर के लिए मुझे एक विष्णु की तलाश है...

संबंध

रात के 11 बज रहे थे. मैं और श्वेता जी कैंटीन में खाना खा रहे थे. तभी ज़ी हिंदुस्तान के पॉलिटिकल एडिटर असित कुणाल सर वहां आ गये. बातें होने लगी. श्वेता जी ने उनसे कहा - सर, आपका बेटा बहुत क्यूट है. एकदम नटखट प्यारा सा. सर ने कहा-- अरे वो इतना बदमाश हो गया है कि क्या बताएं. सिर्फ 10 महीने का है वो मगर इतनी शैतानियां करता है, कि हम परेशान हो जाते हैं. इतना छोटा होकर भी तरह तरह के मुंह बनाता है. सर ने अपने 10 महीने के बेटे अचिंत्य की कुछ तस्वीरें हमें दिखाई. वो सच में अलग अलग अंदाज में मुंह बना रहा था. मैंने कहा- सर, वो आगे जाकर जरूर क्रिएटिव होगा. सर ने कहा- हर संडे मैं उसे शॉवर में नहलाता हूं. और अब किसी की मजाल है कि सनडे को उसे कोई और नहला दे. वो मेरे साथ ही कंधे पर बैठकर नहाएगा.
सर से बात करते करते मुझे बचपन की मेरी कहानी याद आ गई. मुझे देर रात जगने की आदत बचपन से ही थी. पापा कभी किस्सा सुनाते हुए कहते हैं, कि मुझे आईने में खुद को देखना बहुत अच्छा लगता था. ((अभी भी लगता है)) पापा मुझे घंटों तक आईने के सामने गोद में लिए खड़े रहते थे. मैं आईने में खुद को देखते जाता और बिलग बिलग की आवाज निकालता रहता था. पता नहीं मैं उस वक्त क्या सोचता होऊंगा. लेकिन अभी मुझे लगता है, कि एक पिता अपने बच्चों की शैतानियां किस किस तरह से नहीं सहता. वो धैर्य के साथ घंटों आईने के सामने मुझे लिए खड़े रहते थे. और मैं मुंह में हाथ लिए वो एक खास तरह की आवाज निकालते रहता था.अब मैं सोचता हूं, मेरे जैसे आलसी इंसान के लिए ऐसा करना नामुमकिन के बराबर है.
रौशन और मैं किसी काम से मेट्रो से कहीं जा रहे थे. और उस वक्त रौशन को मैंने अपने बचपन की ये कहानी बताई. उसने मुझसे पूछा, अगर तुम्हारा बेटा भी ऐसा करे तो ? हालांकि अभी तक मैं इन तमाम झंझटों से काफी दूर हूं, मगर फिर भी मैंने कहा- मैं पूरे घर में शीशा लगवा दूंगा. फ्लोर भी शीशा का ही रहेगा. ताकि उसे मुझे घंटों गोदी में लिए खड़ा ना रहना पड़े. ये तो खैर मजाक में मैंने कह दिया था. लेकिन मुंबई की वो महिला मुझे याद आ गई, जो घर में कंकाल बनकर रह गई, लेकिन उसका बेटा अमेरिका से नहीं आया. जब आया तो उसकी मां की मौत के कई महीने बीत चुके थे और उनकी हड्डियों का ढांचा घर में पड़ा था. अपने बेटे से प्यार करने की ये सजा उस महिला ने पाई थी. मुझे लगता है, हमारा देश वाकई बदल रहा है. यहां मानवीय संवेदनाएं वाकई खत्म होती जा रही हैं. रिश्ते और रिश्तों की गर्माहट सिर्फ ढांचा बनकर रह गई है जहां एक मां बाप अपने बच्चों की शैतानियां सहता रहता है वहां बदले में बेटा उसे हड्डियों का ढांचा बना देता है.

अधूरा पोस्ट--

मेरे पास दो चांद कभी ना रहा और ना ही दो दिल. ना तो दो रास्ता रहा और ना ही दो मन. मैं एक पत्ता बना रहा. जब तक शाख से जुड़ा था, डाल से लटका रहा. जब हवा में था, तो हवा के साथ उड़ता रहा और जब जमीन पर आया तो धूल में सना रहा. मैं कब कहां रहा, इसकी स्मृति और भविष्य कुछ भी नहीं.
जब डाल से निकला तो प्रेम में था. जब डाल से टूटा तो प्रेम में था. जब हवा के सानिध्य में आया तो प्रेम में था और जब जमीन पर आया तब भी प्रेम में था. बुहारकर धूल में मिला देने पर भी प्रेम में रहूंगा. ये मेरी अवस्थाएं हैं. इस वक्त जब एक शो के लिए स्क्रिप्ट लिख रहा हूं, तब मुझे अपनी लिखी एक अधूरी पोस्ट याद आ गई. लो अब सुनो आगे की बात...
स्त्री के परिधान पहनकर मैं रंगमंच पर खड़ा था
साड़ी, चूड़ी, बाली, कंगन से मुझे सजाया गया था
सामने कुछ दर्शक थे, और मेरा अभिनय जारी था
मैं एक शापित देवता की प्रेयसी की भूमिका में था
जिनका मिलन संभव ना था, उसे जाना था अपने लोक
देवता रो रहा था, दर्शकों की आंखों में सहानुभूती थी
पर मुझे अंत पता था, इसलिए मैं प्रेम में ही रहा
डायरेक्टर ने कहा था, तुम्हारा प्रेम आत्मा वाला है
इसलिए तुम खुश होकर देवता को विदा करो
मैंने खुश होकर देवता को विदा किया, वो मुक्त हो गया
फिर मैं पत्ता बन गया, डाल से गिरा, धूल में मिला, पर प्रेम में रहा...

Tuesday, 25 July 2017

प्रेम को किसी गुस्सैल साधू ने दिया है श्राप

वो देर रात तक कुछ लिख रहा था. फिर बारिश होने की आवाजें सुनाई देने लगी. उसने लिखना बंद कर दिया, और खिड़की के पास आ गया. बारिश होते वक्त कोई शहर कितना अजीब लगने लगता है. वो खिड़की से स्ट्रीट लाइट देख रहा था. रास्ते पर पीला प्रकाश फैला हुआ था. ऐसा लग रहा था कि किसी पेंटर ने काले रंग के ऊपर बहुत सा उदास पीला रंग फेंक दिया हो. उदास पीला रंग सोचते ही अचानक उसे अपनी लिखी कहानी बेईमानी लगने लगी. वो प्रेम पर लिख रहा था, जबकि ठीक इस वक्त वो उदासी पर लिखना चाह रहा है. जो लड़की उसकी कहानी में खिलखिला रही थी, असल में उसे उदास होना चाहिए था. वो वापस कमरे में आ गया. कहानी के पांच पन्नों को उसने फाड़ दिया और रास्ते पर फैली पीली उदासी में उसने अपनी कहानी को प्रवाहित कर दिया.
प्रेम को किसी गुस्सैल साधू ने दिया है श्राप
या प्रेम है उस गुस्सैल के कमंडल से निकला पानी
जो गिरने के साथ ही इंसान को कर देता दुखी
ना ना, प्रेम एक अलग किस्म का हीरा है
जिसे पाते ही प्रेमी लगा लेते हैं होठों से
चुमती हैं प्रेमिकाएं
और हो जाते हैं निढ़ाल, अचेत, या जाती है जान
असल में प्रेम ना चूमने की चीज है, ना होठों से लगाने की
वो बस एक सजावट का सामान भर है

बारिश की बूंदों के बीच उसकी कहानी उदासी के पीले रंग में समा चुकी थी और वो आंख बंद किए नींद का इंतजार कर रहा था.

Wednesday, 28 June 2017

मैं रेस हार चुका था...

हमारी गलती ये होती है कि हर सुबह उठकर हम सुबह को चमत्कार मानना भूल जाते हैं. रात में जो सपना देखा था, उसे कुल्ला कर देते हैं, और फिर एक रेस में लग जाते हैं. जो काम हम करते हैं, या जो हमारा लक्ष्य होता है, उसमें तो हम रेस लगाते ही हैं, इसके विपरीत भी हम कभी कभार अनजाने में ही रेस लगा बैठते हैं.
सामने ई-रिक्शा खड़ी थी. चार लोग उसपर बैठे थे. एक सीट खाली था. मैं ई-रिक्शा पर बैठने के लिए आगे बढ़ रहा था, और दूसरी तरह से एक लड़की भी बैठने के लिए आ रही थी. अभी हमने एक दूसरे को नहीं देखा था, दोनों जल्दबाजी में थे. ई-रिक्शा बीच में खड़ी थी. कुछ 8/10 कदम जब बचे होंगे तो हमारी नजरें अचानक मिलीं. हमने सीट की तरफ देखा. हम जान गये थे, सीट बस एक है, और कोई एक ही बैठ सकता है. अब अचानक से एक रेस शुरू हो गई थी. दोनों के कदम थोड़ा तेज चलने लगे. दोनों एक साथ सीट के पास पहुंचे, पर कुछ सेकेंड्स से उसने मुझे हरा दिया. वो ई-रिक्शा पर बैठ चुकी थी. मैं मुस्कुराकर रह गया. फिर दूसरे रिक्शे पर बैठा. 
अनजाने में ही सही मैं सुबह सुबह एक रेस हार चुका था. 

Tuesday, 13 June 2017

आंसूं आंखों में ना आने पाए

एक जूनियर लड़की ने कभी मुझसे पूछा था, कि सर.. वो फलां सर मुझे परेशान करते हैं, मुझे क्या करना चाहिए. मैंने कहा- किस तरह का परेशान? 
वो बोली- मेंटली. 
मैंने कहा- सरेआम थप्पड़ मार दो. 
ये कई साल पुरानी बात है. नारीवाद पर मैं कभी लिखना नहीं चाहता और मेरा मन भी नहीं करता. पर थप्पड़ मारने वाली बात पर मैं अभी भी कायम हूं और शायद आगे भी रहूंगा.
कुछ परिस्थितिवश आज लिख रहा हूं. सच तो ये है, कि एक लड़की को किसी भी परिस्थिति में कुछ भी बर्दाश्त नहीं करना चाहिए. उसे लड़ पड़ना चाहिए, मारपीट कर लेनी चाहिए, पर आंसू नहीं बहाना चाहिए. 
मैं यहां परिस्थिति का जिक्र नहीं करूंगा.
कुछ साल पहले एक शो बनाते वक्त पैकेजिंग करवा रही एक लड़की ने अनजाने में बड़ी गलती कर दी. गुस्से में आकर मैं उसे डांट गया. बाद में मैंने उस लड़की की आंखों में आंसू देखा. मुझे बहुत खराब लग रहा था. 
बाद में ये बात मैंने नेहा को बताई. उसने लड़कियों के आगे बढ़ने के दौरान होने वाली परेशानियों का जब जिक्र किया तो मैं उसे जानकर शॉक रह गया था. उसने तो मुझे यहां तक कहा -- " एक लड़की का अगर कोई सबसे बड़ा दुश्मन होता है, तो वो उसकी अपनी मां होती है, बाद में कोई और". खैर, मैंने उस लड़की से माफी मांग ली थी. और उस दिन के बाद से लड़कियों पर गुस्सा ना होने का संकल्प मैंने ले लिया. 
रिश्तों के बंधन में बंधी लड़कियां अकसर बहुत कमजोर हो जाती हैं. चाहे वो रिश्ता भाई का हो या पति का. अपनी मर्जी का करना वो भूलने लगती हैं. बात बात पर भाई की तरफ देखना या पति की तरफ देखना. हर बात के लिए इजाजत लेना. कंप्रोमाइज करना. चुप रह जाना. ये बातें कोई नई नहीं हैं, पर अभी भी हैं. 
मैं कुछ नया नहीं कह रहा... पर तुमसे कह रहा हूं, बर्दाश्त मत करो. चुप मत रहो. आवाज उठाओ. लड़ो.. झगड़ो.... मारपीट करो... स्वाभिमानी बनो... मुंह ताकना बंद करो. रिश्ते में रहो लेकिन स्वाभिमान के साथ. प्रेम करो लेकिन इज्जत के साथ. अपने मन की करो...मनमर्जी करो.. खुश रहो और ध्यान रहे... आंसूं आंखों में ना आने पाए........

Saturday, 27 May 2017

शतरंज, जीवन और हम..

हम छोटे होते हैं, और जीवन हमारे सामने शतरंज बिछा देता है. उस वक्त हम पहली गलती करते हैं... मस्ती के लिए एक प्यादे की चाल चल देते हैं. बस यहीं से हम खेल में चुन लिए जाते हैं. हम काले और सफेद खानों के बीच बांट दिए जाते हैं. नियम इतने सख्त होते हैं, कि ना खेल छोड़ सकते हैं, और ना ही पाला बदल सकते हैं.
हमें अपने जीवन का राजा बना दिया जाता है, जिसके हाथ में कुछ नहीं रहता. इस खेल में हम सालों बने रहते हैं. हर दिन सुबह उठकर देखते हैं, कि जीवन ने कौन सी चाल चली है. जीवन भी कभी तेज चलता है, तो कभी शांत देखता रहता है. हम इस बीच छोटे बड़े कंप्रोमाइज करते रहते हैं. हम समय से समय मांगते हैं. चिल्लाकर कहना चाहते हैं, सुनो... मैं ना काले में हूं, और ना ही सफेद में. फिर हम चुपचाप खेल में शामिल हो जाते हैं. अंत तो आना ही है.. कभी पहले तो कभी देर से... इसलिए बाजी पर पकड़ मजबूत करना चाहते हैं. मगर होता क्या है... हम जीतते कभी नहीं हैं... बस हार को टालने की कोशिश में खेल से हमें बाहर कर दिया जाता है....

धर्म को मानने वाले लोगों का दिल बड़ा क्यों नहीं होता?

मैं बहुत से ऐसे लोगों से मिला हूं, जो बेहद धार्मिक होने का दावा करते हैं, लेकिन कुछ वक्त बात मैं महसूस करता हूं, कि उनका दिल छोटा रह गया है. छोटी छोटी बातों को वो बड़ा कर देते हैं. और ऐसे वक्त मुझे काफी आश्चर्य होता है, कि इन्होंने भगवान के बारे में पढ़कर क्या सीखा है ? पता नहीं क्या समझा है? और कभी कभी मैं इस नतीजे पर पहुंच जाता हूं, कि ये धर्म को धोखा दे रहे हैं. एक बाह्य आवरण में ये छलावे से कम नहीं है.
ऐसे लोगों से अच्छा तो मैं हूं, जो बड़ी बड़ी बातों को भी इसलिए इग्नोर कर देता हूं, कि छोड़ो ना, सब मोह माया है...
अब ये धर्म क्या सिखाता है... कि नेक काम करो, एक दिन जाना ही होगा...
अब मान लीजिए आप पांच लाख रुपया हर महीना कमाते हैं, तो क्या हो गया? हां आप बेहतर जिंदगी जी सकते हैं, मगर फिर आपके धार्मिक होने के दिखावे से क्या फायदा.
सिंपल सा मैं सोचता हूं, दिल बड़ा रखिए...

निर्मोही दुनिया

क्राइम स्टोरीज लिखने के दौरान पिछले साल दो साल में मैंने देखा है, कि अवैध संबंध की वजह से सबसे ज्यादा हत्याएं हो रही हैं. और उनमें भी बहुत सारी हत्याओं के पीछे महिलाओं/पत्नियों का हाथ रहा है.
ऐसे कंडीशन में तलाक लेना या देना ज्यादा बेहतर है, कि आप किसी का कत्ल कर दें या करवा दें. 
वाट्सएप पर पनपे प्यार भी बहुत हत्याएं करवा रहा है.
बहुत निर्मोही हो रही है ये दुनिया....

कल रात खत्म हुई फिल्म the Walk से...

उसे पता था कि उसकी मौत होने वाली है. वो ये भी जानता था, कि वो मौत के रास्ते पर चल रहा है, मगर मंजिल उसे मौत से ज्यादा हसीन लग रही थी. अमेरिका के ट्विन टावर पर तनी रस्सियों पर चलना, वो भी बगैर किसी सुरक्षा के, मौत के रास्ते पर ही तो चलना है. फिल्म देखते वक्त फिलिप पेट्टी को मैं कई बार पागल कह बैठा. कई बार मुझे लगा कि कहीं मेरा ही हार्ट फेल ना हो जाए.. लेकिन जुनून जिंदगी से बढ़कर हो तभी असंभव पर विजय पाया जा सकता है.
कहानी असली थी. ऐसा सच में हुआ था. फ्रांस के कलाकार फिलिप पेट्टी की जिद थी ट्विन टावर रस्सी के सहारे पार करने की. जमीन से सैकड़ों फीट ऊपर रस्सी पर खड़ा हीरो कहता है, 'ऐसा लग रहा है, कि ये टावर्स मेरा साथ दे रहे हैं, ये हवाएं मेरा साथ देने के लिए बह रहीं हैं. ये तार मेरे पैरों को सहारा दे रहा है'.
जिंदगी, जिद, पीड़ा, जख्म, नाम, साहस, पागलपन, मौत.....जीत.
नीचे जमीन पर सैकड़ों लोगों की भीड़ उस अविश्वसनीय दृश्य को साक्षात देख रही थी. सब खामोश...नि:शब्द. पसीना जब माथे का मुकुट बन जाए तभी तो दुनिया मानती है, कि हां...तुम कुछ हो.. मगर वो दुनिया को कुछ दिखाना या साबित करना नहीं चाह रहा था, वो तो बस एक सीख दे रहा था, असंभव कुछ नहीं है, बस चाहत होनी चाहिए..

पैटर्न .....और फिर हम फंस गये.

आजकल इतनी गर्मी रहती है कि ज्यादा चाय पीने का मन नहीं करता, इसलिए सारा जोर कोल्ड ड्रिंक पर रहता है. कोल्ड ड्रिंक के साथ आजकल मैं अपना मोस्ट फेवरेट सॉंग सुनता रहता हूं. Chris isaak की Cant fall in love with you. इस गाने का हर लाइन मुझे बहुत प्यारा लगता है. लेकिन ये गाना सुनने से पहले Somewhere over the Rainbow सुनता हूं. ये गाना अच्छा है, मगर उतना पसंद नहीं. लेकिन पहले यही गाना सुनने का एक पैटर्न बन चुका है. अगर cant fall in love with you पहले प्ले हो गया, तो मैं रोक देता हूं, और somewhere over.. पहले प्ले कर देता हूं. ये कुछ इस तरह से है, जैसे सुबह चाय पीने से पहले ब्रश करना या रात में खाना खाने के बाद ही सोना. इसे मैं स्किप नहीं कर पाता.
जीवन में हम पहली बार गलती से एक गलती करते हैं, और हम एक पैटर्न में बंध से जाते हैं. उस पैटर्न से निकलना मुश्किल नहीं होता, पर निकलने की जहमत कौन उठाए, ये सोचकर हम उसमें फंसे से रह जाते हैं. खरगोश और हाथी, जिसे हमने बचपन में कभी कहानी पढ़ते वक्त अपना साथी बना लिया होता है, वो हमारा साथ छोड़ जाते हैं, फिर हम एक जंगली कबूतर को अपना साथी कहना शुरू कर देते हैं. ये वाला हमारा नया साथी हमें अकसर छोड़कर उड़ जाता है और हम फिर किसी नये साथी की तलाश में उस बने बनाए पैटर्न में पिसते रहते हैं. जैसे अभी कुछ दिनों पहले तक चाय के बिना मैं रह नहीं पाता था, सोचता था मैं चाय नहीं पीयूंगा, तो शायद सुबह गीत नहीं गाएगी या सूरज को गुस्सा आ जाएगा. पर चाय की जगह अब कोल्ड ड्रिंक ने ले लिया और अब एक नया सा पैटर्न मुझे अपने में फांस चुका है. अब हर दिन कोल्ड ड्रिंक मुझे चाहिए होता है, और मैं उसे पीने से इनकार नहीं कर पाता.

बेचैनी

कभी-कभी स्क्रिप्ट लिखते वक्त दिमाग में कुछ नहीं आता है, कि कैसे शुरूआत करें या कैसे आगे बढ़ा जाए. तब ऐसा लगता है, जैसे कोई भंवरा दिमाग के अंदर बंद हो गया हो, और बाहर निकलने के लिए बार-बार उड़ता हो, लेकिन दिमाग की जाली से टकराकर गिर जाता हो।...इस समय अंदर की बेचैनी और उथलपुथल से पार पाने के लिए मन हो रहा है, कि किसी रिंच या किसी औजार से दिमाग के दरवाजे को खोल दिया जाए, और भंवरे को मुक्त कर बेचैनी से निजात पाई जाए।...

सम्मोहन

पंखे की शोर सन्नाटे को भेद रही थी और करवटों के बीच गोपी बोल पड़ी- सम्मोहन देसी शराब की तरह होता है क्या?
- नहीं, सम्मोहन इत्र है, कुछ देर की खुशबू फिर महक की जगह गंध रह जाता है.
- हूं, लेकिन एक दफे भांग खाने के बाद मैं सिर्फ हंस रही थी. फिर पता नहीं चला कि कैसे किसी की हथेली पर मैं सिर रखके सो गई थी, दो ऊंगलियों को मैंने अपनी ऊंगलियों से पकड़ रखा था.
- ये क्या सवाल है ? सम्मोहन, देसी शराब, इत्र, भांग.. इनकी आदत व्यसन कहलाती है. और व्यसन बुरी चीज है. इन चीजों से भला सम्मोहन का क्या तालमेल? तुम्हारी ऊंगलियों से जरूर कोई धागा उलझ गया होगा.
- हूं, शायद...तो सम्मोहन फिर एक धागा है. जिसके दोनों सिरे हमारी ऊंगलियों से ही उलझे रहते हैं. फिर हम उन्हें निर्ममता से तोड़ कर किसी कचरे के पात्र में या किसी खाली स्थान पर फेंक देते हैं.
-- शायद तुम ठीक कह रही हो, सम्मोहन एक धागा ही है.
-- हूं, फिर इसका मतलब मौत सिर्फ सजीवों को ही नहीं आती है. मरना निर्जीवों को भी पड़ता है.
पंखे की शोर अब भी सन्नाटे को भेद रही थी पर करवटों पर अब किसी ने भारी पत्थर रख दिया था.

Monday, 27 March 2017

चाय....

चाय बनाना मेरे लिए एक सुखद अहसास होता है. इसमें हमें किसी तरह के नियम में फंसना नहीं पड़ता. दूध, पानी और शक्कर का सरल समीकरण.. बस. और कुछ नहीं. मन है तो अदरक डाल दीजिए या इलायची. नहीं डालने का मन है, तो कोई बात नहीं. चाय फिर भी अच्छी बनेगी.
नियम के बगैर जो काम होता है, वो अच्छा लगता है मुझे. 
अब मैं लाल पेन से कोई फॉर्म क्यों नहीं भर सकता ? परीक्षा में लाल पेन का इस्तेमाल क्यों नहीं कर सकता ? इस नियम की जरूरत क्यों है ? दस्तखत मैं लाल पेन से क्यों नहीं कर सकता ? इंटरव्यू देते वक्त हंसने तक पर भी नियम क्यों लागू है. सब कुछ सरल क्यों नहीं है ? 
नियम निरर्थक होते हैं
चाय पीना सार्थक है...

मैं चिल्लाना चाहता हूं...

सुबह जब दफ्तर के लिये निकलता हूं, तो लोग कितने हरे भरे दिखते हैं. सब बने ठने रहते हैं. हर किसी के चेहरे पर ताजगी, एनर्जी.. हर चेहरे पर वो वाली बात होती है..| वहीं लौटते वक्त हर चेहरा मुरझाया सा दिखता है. हरारत, थकन और नीची झुकी गर्दनें..
मेट्रो में हर तरह के चेहरे दिखते हैं और हर चेहरे की अलग अलग कहानी होती है. कोई मोबाइल में झांकता दिखता है, तो कोई अपनी आंखे बंद किए घर पहुंचने के इंतजार में रहता है. मैं भी इन्हीं चेहरों में एक चेहरा बना रहता हूं. मेट्रो के अंदर एक मां दिखती है अपने बेटे के साथ. वो अपने बेटे को कहती है, मन लगाकर पढ़ोगे तो बड़ा आदमी बनोगे. हिंदुस्तान में करीब हर मां अपने बच्चों को यही कहती है. मैं उस मां की बात सुनकर मुस्कुरा देता हूं.. वो बच्चा भी मेरी तरह ही मुस्कुरा रहा होता है. पहले मैं बड़ा आदमी मतलब लंबा आदमी समझता था. मैं बड़ा आदमी बनने का मतलब आज तक नहीं जान पाया हूं. बड़ा आदमी बनकर मैं क्या करूंगा ? बड़ा आदमी कैसे बना जाता है, समझ नहीं पाता हूं. पैसा कमाने में मुझे कुछ खास दिलचस्पी है नहीं. क्यों नहीं है, कभी जानने की कोशिश नहीं की.
मेट्रो के अंदर हर शाम एक चुप्पी पसरी रहती है... और उस चुप्पी में सब खोए रहते हैं. किसी के पास बोलने के लिए कुछ नहीं होता. हर शाम मुझे वो चुप्पी अखड़ने लगती है. मैं उस सन्नाटे को चिल्लाकर भेद देना चाहता हूं. मैं चिल्लाकर कहना चाहता हूं, भाईयों तुम लोग चुप क्यों हो? तुम्हें ये खामोशी इतनी प्यारी क्यों लगने लगी है. आओ, और मेरे साथ तुम लेग भी चिल्लाओ...! लेकिन ना तो मैंने कभी चिल्लाने की कोशिश की और ना ही उस चुप्पी को भेदा जा सका है.

मुझे शांत दुनिया चाहिए....

बचपन से ही मुझे टीवी देखने का बहुत शौक रहा है. मां कहती है, जब मैं साल भर का था, तभी से टीवी के सामने टकटकी लगाए बैठा रहता था. कुछ 3/4 साल की उम्र होने के बाद टीवी को लेकर मेरा आकर्षण काफी बढ़ गया. हालांकि मैं कुछ समझता नहीं था, लेकिन टीवी की दुनिया में हो रहे एक्शन मुझे काफी पसंद आते थे.
जब पर्दे पर हीरो चलता था तो बूट से एक टन-टन की आवाज आती थी. मुझे वो आवाज काफी पसंद थी. मुझे लगता था, कि फर्श पर टीन की चादर बिछा दी गई है और उस पर चलने से ये आवाज निकलती है. मैं पापा से जिद करता था, कि पूरे आंगन और घर में टीन की चादर बिछवा दीजिए. ताकि मैं चलूं तो वैसी ही आवाज निकलनी चाहिए. पापा हर बार अगली तारीख दे देते थे. मैं अब भी गांव जाता हूं, तो आंगन में टीन की चादर तलाशता हूं. मुझे मारधार वाले दृश्य बिल्कुल पसंद नहीं आते थे. रोमांस को मैं बचपन से ही पसंद करने लगा था. क्राइम फिल्में मेरी आखिरी च्वाइस होती थी. मीडिया फिल्ड में आने के बाद मुझे क्राइम शो बनाने का ही अवसर मिला. 8 साल के कैरियर में मैंने करीब पांच साल तक क्राइम शो ही प्रोड्यूस किया. मुझे मारपीट वाली नही. मुझे एक शांत दुनिया चाहिए थी. लेकिन मेरी यह ख्वाहिश टीन की चादर की तरह ही अभी तक अधूरा है...

Monday, 20 March 2017

सूखा इंसान

आज एक बेहद अजीब वाकया हुआ मेरे साथ। शाम में सोकर उठने के बाद मैं चाय बनाने लगा। घर में चूहों के करतबों को देखकर मैं मुस्कुरा रहा था कि मेरे रूम ऑनर किराया लेने के लिए आ गये। किराया देने के बाद मैंने उन्हें चाय पी लेने का आग्रह किया और वो चाय पीने के लिए तैयार हो गये। चाय बनाते-बनाते मैंने उनसे पूछा- कैसे हैं भैया...? कुछ पल चुप रहने के बाद उन्होंने कहा- ठीक नहीं हूं। मैंने पूछा क्या हो गया ? उन्होंने बेहद चुप खामोशी के साथ कहा- पता नहीं क्यों रोने का मन करता रहता है।
वो कमरे में इधर-ऊधर देखने लगे। मैं उनकी तरफ देख रहा था। लंबी चुप्पी के बाद उन्होंने कहा...अभी दुकान पर बैठा था, और रोने का मन करने लगा, तो इधर आ गया। घर में किसी चीज की कमी नहीं है। दोनों बेटों ने दो दुकानों को संभाल लिया है। घर में काफी पैसा आता है। पत्नी भी काफी अच्छी है, लेकिन मेरा हर वक्त छुप कर रोने का मन करता रहता है। हर पल गुस्से में भरा रहता हूं।
मैं उनका मर्ज समझ गया था। मैंने मुस्कुराते हुए उनसे पूछा- आप पूजा करते हैं? उन्होंने कहा- मेरी पत्नी करती है। मैंने कहा- आप खुद करते हैं ? उन्होंने कहा- नहीं। मैं समझ गया कि ये पैसा कमाते-कमाते अंदर तक सूख चुके हैं। इनके अंदर कुछ बचा नहीं है। मैंने कहा- मेरी एक बात मानेंगे ? उन्होंने कहा- हां बोलो... मैंने कहा- आप हर दिन श्रीमद् भागवत जी पढ़ा करिए। आप आत्मा से दूर हो गये हैं। अगर अब रोने का मन करे तो मेरे पास आ जाया करिए, मैं आपको श्रीमद् भागवत जी सुना दिया करूंगा, और मुझे यकीन है कुछ ही दिनों में आप बिल्कुल ठीक हो जाएंगे। उन्होंने कहा- पक्का...। मैंने उन्होंने विश्वास दिलाते हुए कहा- हां पक्का। भैया चले गये।
मैं अकसर प्रेम की बात करता हूं। दरअसल वो आत्मा वाला प्रेम है। ईश्वर से प्रेम करने की बात मैं करता हूं। अपने आत्मा से प्रेम करने की बात करता हूं। हम भौतिकता में इतना लिप्त हो चुके हैं, कि खुद को पूरी तरह से सुखा चुके हैं। हमें प्रेम की जरूरत है। हमें आत्मा से साक्षात्कार की जरूरत है। मैं कन्हैया को अपना सखा मानता हूं। और अपनी सारी बातें उन्हें बताता रहता हूं। इसलिए मेरे दोस्तों, अगर आप प्रेम से दूर हैं, तो अपने आराध्य के नजदीक जाईये। आत्मा से प्रेम करिए, फिर देखिए....आप सूखेपन से सदैव मुक्त हो जाएंगे।

योगी के मुख्यमंत्री बनने पर

आज मेरे एक मुस्लिम दोस्त ने मुझसे कहा, अभिजात भाई बहुत गलत हो रहा है. पता नहीं क्या होगा योगी के सीएम बनने के बाद.? उस मित्र की निगाहों में मैंने चिंता की रखाएं देखी. मैंने उनसे कहा कि आपको मुझपर यकीन है? उन्होंने हां कहा. मैंने कहा, कि मेरे जैसे लाखों हिंदू जो मोदी के कट्टर से कट्टर समर्थक भी हैं, यकीन मानिए वो कुछ नहीं होने देंगे. वो हर गलत कदम का विरोध करेंगे. उनके चेहरे पर तसल्ली आई.
दरअसल हमारे देश को विकास से पहले विश्वास की जरूरत है. और मुझे लगता है, इस देश में हिंदू और मुस्लिमों के बीच विश्वास बढ़ाने का ये स्वर्णिम काल है. केन्द्र में कट्टर हिंदू माने जाने वाले मोदी जी और सबसे बड़े प्रांत में उनके जैसा ही कट्टर योगी जी. मोदी जी को तीन साल होने वाले हैं पीएम बने हुए, लेकिन एक भी दंगा नहीं हुआ. मुस्लिमों के खिलाफ एक भी कदम नहीं उठाया गया, दरअसल ये हमारे लोकतंत्र के लिए सुखद संकेत हैं.
मुस्लिमों के दिल में नेताओं ने इस कदर डर भर दिया है, कि वो आज आतंकित होने पर मजबूर हैं, जबकि मुझे यकीन है मोदी और योगी आदित्यनाथ कोई भी गलत कदम नहीं उठाने वाले और ना ही देश के हिंदू उन्हें उठाने देंगे.
ये वक्त है डराने वालों को जवाब देने का. ये वक्त है विश्वास बढाने का. ये वक्त है दिल से दिल को मिलाने का और तभी इंडिया विश्व का महान राष्ट्र बन सकेगा.
अगले लोकसभा चुनाव तक मुझे यकीन है, बीजेपी के ऊपर से सांप्रदायिक होने का दाग धुल जाएगा और मुस्लिम समुदाय बीजेपी को दिल खोलकर वोट करेंगे वो भी विकास के नाम पर और बीजेपी भी दिल खोलकर मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देकर सत्ता में भागीदार बनाएगी.

Sunday, 12 March 2017

तुम्हारी आवाज

गुनगुनी सी रात की ये बात है
जब चिराग़ ने खोली थी अपनी लाल मद्धम सी आंखे
उस वक्त मैं शब्दों को प्रेम करना सिखा रहा था
तभी फिसल कर गिरी थी सिरहाने में तुम्हारी आवाज
और मैंने डिब्बे में भर कर तुम्हारी आवाज को रख लिया था
अक़सर गाहे बगाहे मैं डिब्बे से निकालकर
तुम्हारी आवाज की छोटी सी डली चख लिया करता था
आज फिर गुनगुनी सी शाम थी
और मुझे तलब लगी थी तुम्हारी आवाज चखने की
मैेने आलमारी से डिब्बा निकाला, उसे खोला
मगर वो खाली मिला...
..............................................
हर चीज की एक मियाद होती है, हर चीज खत्म हो जाता है
तुम्हारी आवाज भी खत्म हो गई
लेकिन ये तलब है, और मैंने देखा है अक़सर
तलब हो या व्यसन...
बढ़ता जाता है, बढ़ता जाता है, बढ़ता जाता है...

Sunday, 5 March 2017

बीमार जैसा कुछ

मैं जब बीमार नहीं होता हूं, तब सोचता हूं कि बीमार आदमी असहाय नहीं होते, वो असहाय होने का सिर्फ अभिनय करते रहते हैं. अभी मैं बीमार हूं, हालांकि, मैं दिनचर्या के तमाम काम कर रहा हूं, दफ्तर भी जा रहा हूं, लेकिन 'असहाय होने का अभिनय' अब इस बात पर मुझे हंसी आने लगी है. दवा खाकर काम करना भी आसान नहीं होता.
इस वक्त मैं एक कहानी लिख रहा था. नेहा नाम की लड़की की कहानी, जो समुंदर हो जाना चाहती है. हर एक जज्बात को अपने दायरे में समेटकर रखना चाहती है. लेकिन मुझे उसका दरिया होना ज्यादा पसंद है. उसका बहना ज्यादा पसंद है. इसलिए मैंने कहानी को अधूरा छोड़ दिया है. मैं किरदार की मर्जी से कहानी नहीं लिख सकता.
पिछले हफ्ते मेरा साथी ((कबूतर)) वापस मेरे पास आ गया. उसे देखकर मुझे बहुत खुशी हुई. लेकिन वो घायल था. शायद किसी ने उसे पत्थर से निशाना बनाया था. मैंने उसे बचाने की कोशिश की, लेकिन नहीं बचा पाया. मैं बहुत निराश हो गया. वो जाते वक्त किसी नये साथी के पास जाने की बात कहकर गया था, लेकिन आखिरी वक्त मेरे पास लौट आया, इस बात की संतुष्टि है मुझे.
वो मायाजाल से मुक्त हो चुका है. अब मैं चाय बनाऊंगा. और अपने कहानी के किरदार से फिर बात करूंगा, शायद अब वो दरिया बनकर रहने को राजी हो जाए...

Wednesday, 1 March 2017

Missing you.

नहीं कोई कहानी नहीं है। ये असल में कहानी की कतरनें हैं....जो छूट रही हैं। इन कहानी की कतरनों से भी कहानियां बन रही हैं, जिसे सिर्फ वो दोनों ही सिर्फ सुन रहे हैं। दिल में एक टीस उठती है उसका क्या करना है, एक कोना है, जहां लौ सी जल जाती है उसे कैसे नोचना है, उसकी उपाय करने की कोशिश वो करती है, लेकिन एक उपाय करने जाती है, तो अपने ही जालों में उलझ कर रह जाती है... 
आजकल लड़की को मूक संवाद करने की आदत हो गई है। इंतजार के अमावस में वो फंस सी गई है। वो लड़के को मिस कर रही थी, बेहद से भी बेहद...लेकिन वो ये बात कह भी नहीं सकती है। छाती से निकलती चीख गले में कहीं फंस जा रही है। वो गले लगना चाहती है...चूमना चाहती है, सीने से चिपकना चाहती है, वो ये बात लड़के के हाथों पर अपना सिर रखकर बताना चाहती है। लेकिन उसे तमाम तमन्नाएं कमरे के कोने में नोंच कर फेंक देनी पड़ रही है।
हम सब परिस्थिती नाम के डिब्बे में कैद कर लिए गये हैं। डिब्बे में एक छेद किया गया है, जिसके जरिए रोशनी की एक रेखा सी आती है। हम उसे रेखा के जरिए डिब्बे की कैद से बाहर निकल जाना चाहते है, छूट जाना चाहते हैं। लड़की भी डिब्बे में कैद है इस वक्त। डिब्बे के बाहर एक पहरेदार बैठा है। कड़क। मूंछों वाला। पैनी नजर जमाए। लड़की उसकी आंखों से ओझल होना चाहती है, लेकिन नहीं हो रही है। पहरेदार उस लड़की को कुछ देर के लिए डिब्बे से बाहर लड़की को निकालता है, और लड़की को वापस छटपटाने के बाद उस डिब्बे में फिर से कैद होना पड़ता है। ये बेहद अजीब परिस्थिति है।
क्या हम उस परिस्थिति नाम के डिब्बे को तोड़ सकते हैं? क्या हम पहरेदार को चकमा देकर भाग सकते हैं? क्या हम अपनी कमजोरी से पार पा सकते हैं। बहुत मुमकिन है पार पा लेना....बहुत मुमकिन है पहरेदार की नजरों से बचकर निकल जाना...लेकिन कहानी में सवाल पूछना और असल जिंदगी में उसपर यकीन करना....दोनों एक दूसरे से बेहद अलग होते हैं। ये कहानी भी अलग परिस्थिति की ही है।...लड़की को अभी डिब्ब में कैद रहना होगा। तड़पना होगा........और रोशनी की एक रेखा के सहारे जीवन का चित्र तैयार करना होगा।

Tuesday, 28 February 2017

भष्मासुर

मैं चाह रहा था कि सबसे परे कभी मैं अपनी व्यस्तता के बारे में लिखूं। लेकिन रूटीन का काम करना मुझे अच्छा नहीं लगता । फिर भी तमाम अपेक्षाओं का गला घोंट मैं रूटीन का काम ही करता हूं। एक किताब लिख रहा हूं एक लंबे अर्से से, कई दिनों बाद उसमें चंद पन्ने जोड़ देता हूं, हालांकि अपनी किताब के किरदारों से मेरी बात अकसर होती रहती है लेकिन उन्हें शब्दों का रूप देने से मैं ज्यादातर वक्त कतराता हूं। उन्हें मैं अंदर ही रखने की कोशिश करता हूं, और कहानी के रोमांच को खुद में महसूस करता हूं।
एक डर सा लगा रहता है उन किरदारों को पन्ने पर कुरेदने से। उनके सामने आने का डर लगा रहता है। सामने आने पर मैं उनसे क्या बातें करूंगा, उनके सवालों का क्या जवाब दूंगा। वो मुझसे पूछ सकते हैं, कि मेरा क्या कसूर था, मुझे क्यों रचा, इसमें तुम्हारा क्या फायदा है.... इन सवालों का कोई जवाब नहीं होता मेरे पास और मैं किरदारों से मन में ही बात करता रहता हूं।
मेरी किताब का एक किरदार बेहद निर्दयी है, वो बेहद क्रूर भी है। ये दोनों शब्द एक हैं लेकिन उसके ऊपर दोनों सही मालूम होते हैं। वो पता नहीं क्यों लेकिन अपनी क्रूरता से मुझे गुस्सा दिला देता है। मैं उसे डांटने की कोशिश करता हूं, उससे नफरत तक करने लगता हूं, लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। वो अट्टहास करता है। उसके हाथों में एक अजीब सी शक्ति है, और उस शक्ति का नाजायज, गलत इस्तेमाल करने में उसे मजा आता है। मैं उसका अंत कैसे करूं, ये मुझे समझ नहीं आ रहा। कभी-कभी मैं सोचता हूं, कि कहीं मेरी हालत शिवजी जैसी तो नहीं हूई...क्या मैंने अपने पीछे किसी भष्मासुर को लगा लिया है ? क्या मुझे किसी विष्णु की जरूरत है। फिर मैं सोचने लगता हूं, कि अगर मैंने भष्मासुर पैदा किया है, तो मुझे एक विष्णु का भी निर्माण करना चाहिए। वो विष्णु जो इस भष्मासुर का अंत कर सके और मैं सुकून से सांस ले सकूं।

Sunday, 26 February 2017

आम का पेड़

मुझे गांव में सुबह होते देखना अच्छा लगता है। गांव में मुझे दरवाजे पर बैठ कर अतीत को सोचना अच्छा लगता है। गांव की सुबह शहरों की तरह कुम्हलाई नहीं होती है। बिना किसी दाग के होती है। साफ...स्वच्छ, धुली हुई। मैं दालान पर बैठा हुआ हूं। सामने गिलहरियां खेल रही हैं। गिलहरियों ने तो आपस में होड़ लगा रखा है, पेड़ पर चढ़ने-उतरने का। कभी एक जीतती है, और मुंह बनाकर दूसरे को चिढ़ाने लगती है और फिर से रेस शुरू। मैं गिलहरियों को पेड़ पर चढ़ते देखता हूं, मुस्कुराता हूं स्थिर नजरों से। कितना शांत है सब कुछ। इतना शांत कि हवा की खामोशियां भी कानों में गुंज रही हैं। ऐसे ही दिन हुआ करते थे, जब मैं दालान से चिपकी सीढ़ियों से कभी तेज...तो कभी धीमें उतरता था, पौधों को पानी देने के लिए। मुझे पेड़ लगाना बेहद पसंद था। मुझे पौधों को बढ़ते हुए देखना अच्छा लगता था। मैं हर दिन पौधों की लंबाई नापता था और उस दिन खुशी से चिल्ला पड़ता था, जब उनकी लंबाई थोड़ी बढ़ जाती थी। मैं पूरे घर में कोहराम मचा देता था। दादाजी को खींचकर ले जाता था पौधे की बढ़ृी लंबाई दिखाने। और जब वो मेरे साथी हामी में सिर हिलाते और मुझे देखकर हंसने लगते तो मैं भी उनके साथ हंसने लगता था। मैं दादाजी से पूछने लगता था, कि हम पौधों जैसे क्यों नहीं बढ़ते हैं। हम अपनी लंबाई को बढ़ते हुए कब देखेंगे? दादाजी मुस्कुराते हुए हर बार अलग-अलग जवाब देते थे, और मै उनके जवाब को सत्य मानकर पूरे गांव का चक्कर लगा आता था।
वो पौधा जिसे मैंने दादाजी के साथ मिलकर लगाया था, वो अब आम का पेड़ बन चुका है। दादाजी जब दुनिया से जा रहे थे तो आखिरी बार उन्हें उसी पेड़ के नीचे रखा गया था। मैं उस वक्त तक गांव से दूर हो चुका था। और जब दादाजी के जाने के बाद गांव आया तो देखा कि दादाजी आम के पेड़ के साये में सोए हुए हैं। कितना बड़ा हो चुका था ये पेड़। एक रिश्ते की ही तो ये कहानी है। मैं, मेरे दादाजी और मेरा आम का पेड़। हमारे साथ पला, हमारे साथ बढ़ा। दादाजी के जाने के बाद मैं अकसर आम के पेड़ को हाथों में कसकर पकड़ लेता था। मुझे लगता था कि मैं दादाजी के सीने से सिमटा हुआ हूं। आम के पेड़ के साथ मेरे संबंध और गहरे हो गये। अब मैं अपनी निजी तकलीफें उसे सुनाने लगा। आम का पेड़ मेरे लिए एक गुप्त कोना बन गया।
धीरे-धीरे मुझे समझ में आने लगा कि इंसानी रिश्ते और पेड़-पौधें आपस में जुड़े होते हैं। हमें खुशी देखकर पेड़ अपने तनों को प्रसन्न होकर हिलाने लगता है। हमें दुखी देखकर तने कुम्हला जाते हैं, स्थिर हो जाते हैं। इस रिश्ते में इंसानी रिश्तों की तरह बेमानी नहीं होता। हम अपने रिश्ते में कितना बेमानी करते हैं। दरअसल, हम नाटक कर रहे होते हैं रिश्तों को निभाने की। हम अलग-अलग किरदारों में खुद को बांट लेते हैं और किरदार अपनी-अपनी भूमिका निभाने लगता है।
कुछ दिनों पहले मैं एक प्रेमी के किरदार में था। एक लड़की मेरी प्रेमिका की भूमिका में थी। हम दोनों अपने-अपने रिश्ते को निभाने का वादा करते थे। कभी-कभी ये वादा, दावा भी बन जाता था। हम दोनों एक दूसरे के साथ खुश होने का अभिनय करने लगे। कई महीनों तक ये अभिनय चलता रहा। मैं अपने किरदार के प्रति समर्पित था। हर सुबह उसे बाइक से उसके दफ्तर छोड़ने जाना और तय वक्त पर उसे वापस घर छो़ड़ना इस नाटक का हिस्सा था। ये सिलसिला महीनों चलता रहा। एक दिन उसने नाटक से अपना हिस्सा खत्म करने की बात कह दी। अब इस नाटक में अकेला मेरा किरदार बचा। मेरे किरदार ने अपनी भूमिका बदल ली। दुखी होने का, सदमें में रहने का अभिनय करने लगा। वो शराब पीने लगा। चंद महीनों में शराब पर लाख रुपये से ज्यादा खर्च करने के बाद मैं अपने किरदार का गला घोंटने में सफल रहा। और वो नाटक पूरी तरह से खत्म हो गई। जब मैं आम के पेड़ से बात कर रहा था, तो मुझे लगा कि शायद पेड़-पौधों के पास एक अलग तरह की आत्मा होती है। इंसानों से बिल्कुल अलग। मैंने आम के पेड़ को अपनी निजी कहानी सुनाई। उसने अपने अंक में मुझे भर लिया। मैं अब राहत महसूस कर रहा था। और आम का पेड़ हवा के झोंकों के साथ लहरा रहा था। 

रचना और मेरा गुस्सा

मैं हंस रहा था. मैं खुश था. मैं बातचीत कर रहा था. मुझे भूख लग रही थी और काम खत्म करने के साथ ही मैं खाना खाने के लिए कैंटीन चल गया। लेकिन कैंटीन में बने खाने को देखते ही मैं बुरी तरह अंदर ही अंदर झल्ला उठा। आलू की अजीबोगरीब सब्जी, काली दाल, और अजीब तरह के दिख रहे पनीर को देखकर मैंने खाने की इच्छा का त्याग कर दिया। दफ्तर से बाहर निकलकर एक प्याली चाय पी, मगर चाय भी ठीक से नहीं पी पा रहा था। पहले मैं गुस्से से भरा था, फिर निराशा से भर गया। अचानक कुछ ही पलों में हर चीज में मुझे निराशा दिखाई देने लगी। मुझे अपने लिखने से निराशा होने लगी है। काम से मन उचट गया और अब मैं बेहद अकेला रहना चाहता हूं, मगर दफ्तर में शोर पसरा हुआ है और ये शोर मुझे चीरने लगी है। मैं हर चीज को तोड़ देना चाहता हूं, फोड़ देना चाहता हूं और इतने सारे मूड स्विंग्स के बीच मैंने लिखना शुरू कर दिया है।

लिखना मुझे अच्छा लगता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कैसे लिखता हूं, क्या लिखता हूं , मेरे पास अकसर लिखने को कुछ होता भी नहीं है और उन पलों में मैं खोया रहता हूं, लिखने के लिए कुछ तलाशता रहता हूं। दोस्तों के साथ होते हुए भी मैं खुद को अकेला कर लेता हूं। मुझे लगता है, शायद अकेलेपन की स्थिति में मैं कोई कहानी लिख दूं, कोई कविता गढ़ दूं, कोई लेख लिख दूं, या कोई शायरी ही मेरे दिमाग में आ जाए...लेकिन अकसर ऐसा नहीं होता...खामोशी का अंधेरा विराना ही रहता है और मैं खोया हुआ बोलता हूं, खाता हूं, पीता हूं...। लिखना मुझे क्यों सुकून देता है इसे मैं समझने की कोशिश करता हूं, लेकिन आज तक समझ नहीं पाया। लिखने से मुझे क्या हासिल होता है, पता नहीं। फिर मैं कुछ लिखना क्यों चाहता हूं।

अभी अचानक लिखने के दौरान मुझे लगा, कि क्या रचना करने से मुझे खुशी होती मिलती है। क्या कुछ रचकर मैं अपने अंदर पसरे खालीपन को भर लेता हूं। रचना...अचानक ये शब्द मुझे अच्छा लगने लगा है। मैं चारों तरफ एक बार नजर घुमाता हूं, और फिर इस शब्द को देखने लगता हूं। मैं महसूस कर रहा हूं, कि अंदर से मुझे कुछ अच्छा लगने लगा है, हालांकि मेरा मुंह अभी जोे देख ले वो यही कहेगा, कि इसका चेहरा शुतुरमुर्ग की तरह क्यों है ? और मुझे खुद ऐसा लगा रहा है, कि मेरा चेहरा इस वक्त बेहद खराब लग रहा है। मगर, खामोशी की चादर पर पड़ी सिलवटें अब साफ दिखने लगी है। मेरा गुस्सा बेहद कम हो चुका है। ये जो अभी मैं लिख रहा हूं, ये मेरे शब्द हैं, ये मेरी रचना है। घर जाने के बाद अपनी इस रचना के साथ मैं खाना बना सकता हूं, मुस्कुराते हुए खा सकता हूं। इसे अपने सीने से लगाए आज की रात सो सकता हूं।

Thursday, 23 February 2017

पैटर्न का बहिष्कार

हम अकसर जीवन को सांस लेते देखते हैं और हम पाते हैं एक पैटर्न है, जिसपर हम रेंगते रहते हैं. मैंने एक फिल्म देखी A beautiful mind. एक बने बनाए पैटर्न को चुनौती देने वाली एक सच्ची कहानी, जिसमें नायक पागल ठहरा दिया जाता है, लेकिन वो बने बनाए पैटर्न पर लौटने से इनकार कर देता है. साइंटिस्ट जॉन नेश शुरू से ही मेरे आदर्श रहे हैं. बहुत कम ही लोग मेरे आदर्श हैं, या बहुत कम लोग हैं जिन्हें मैं पैटर्न का बहिष्कार करते हुए देखता हूं.
एक मूर्तिकार पहले गीली मिट्टी से खेलता है, और फिर चाक पर गिली मिट्टी को जोर-जोर से घुमाना शुरू कर देता है. धीरे धीरे एक संरचना, एक आकार का दिखना शुरू हो जाता है. मैं अकसर उस आकार को देखता हूं और धीरे से मुस्कुराता हूं. मैं मूर्तिकार नहीं हूं. लेकिन संरचना का बनना मुझे अच्छा लगता है, मुझे चाक भी पसंद नहीं है, मैं हाथों से संरचना गढ़ना चाहता हूं. मैं पैटर्न का हिस्सा नहीं बनना चाहता. खामोशी से उस पैटर्न का बहिष्कार कर रहा हूं. एक नई संरचना गढ़ना चाहता हूं. इसमें मुझे सुख मिलता है. मैं बच्चा हो जाता हूं. बच्चा बनने का अभिनय कर भी मैं खुश होता हूं. एक गहरी सांस लेता हूं और कमरे में पसरे सन्नाटे में खुद को देखने लगता हूं.

Saturday, 18 February 2017

हसीन दुश्मन-- ((आखिरी हिस्सा))

फांसी का फंदा गले में डाले हर्ष ने अपनी जिंदगी का आखिरी फैसला कर लिया था। वो स्टूल को गिराने ही वाला था, कि अचानक बजी फोन की घंटी ने हर्ष का ध्यान तोड़ दिया। फंदे को गले से निकालकर उसने बिस्तर पर पड़े फोन को हाथों में उठाया। स्क्रीन पर उसकी छोटी बहन का नंबर उभर रहा था।
--हलो, सुनो बिग-बी, मुझे काले रंग का सूट चाहिए। मैंने फोटो भेज दिया है। अभी ऑर्डर कर दो। मुझे ये सूट हर हाल में चाहिए।

फोन पर उसकी छोटी बहन कड़कती आवाज में उससे सूट दिलवाने की फरमाईश कर रही थी। किसी तरह फोन पर अपनी बहन को सूट दिलवा देने की बात कहने के बाद हर्ष ने मोबाइल डिस्कनेक्ट किया, और फफक-फकर...किसी बच्चे की तरह रोने लगा। कुछ पल पहले तक आत्महत्या करने का ख्याल करने वाले हर्ष के दिमाग में, अब मां पापा और छोटी बहन की तस्वीर, किसी बिजली की तरह कौंधने लगी थी।

--वो किसके लिए अपनी जिंदगी खत्म कर रहा था। उसके लिए, जिसने उसे उस वक्त भी देखना जरूरी नहीं समझा, जब हो एक्सीडेंट के बाद हॉस्पीटल में पड़ा था। तमाम दोस्त आये, और खबर मिलने के बाद भी रागिनी नहीं आई।
--अब हर्ष ने आत्महत्या करने का ख्याल अपने जेहन से निकाल दिया था। बहन हर्ष की जिंदगी में फरिश्ता बनकर आई थी।
--अगले दिन जब हर्ष दफ्तर पहुंचा, तो दफ्तर में सब उसे बदले नजर आये। कोई उससे सही तरीके से बात भी नहीं कर रहा था। उसे पता चला, कि रागिनी ने पूरे दफ्तर वालों से कहा है, कि हर्ष उसके पीछे पड़ा है। उसे धमकियां दे रहा है। साथ काम करने वाले जो लोग कल तक उससे बात करने से भी हिचकिचाते थे, वो उसे नफरत भरी निगाहों से देख रहे हैं। मीटिंग में बॉस ने हर्ष से स्पेशल शो भी ले लिया। दफ्तर में अब उसे करने के लिए कुछ नहीं बचा था।
-- अपमान का घूंट पीते हुए भी हर्ष दफ्तर में काम करने के लिए मजबूर था, क्योंकि, घर की जिम्मेदारी उसके ऊपर थी। वो बदनाम किया जा चुका था। हर्ष अब सिर्फ अपने काम से मतलब रखने लगा था।
--कुछ महीने इसी तरह बीत गये। अचानक एक दिन शाम के वक्त हर्ष के मोबाइल पर रागिनी का मैसेज आया। ‘’ हर्ष मुझे रूम चेंज करना है, और मुझसे अकेले हो नहीं रहा है, क्या तुम हेल्प कर दोगे।
--हां, मैं आ जाता हूं-
--नहीं, तुम मत आओ, किसी हेल्पर को भेज दो, मेरे साथ मेरे पापा हैं
--हर्ष ने एक हेल्पर का नंबर रागिनी के मोबाइल पर मैसेज कर दिया. रागिनी का मैसेज फिर से मिलने के बाद हर्ष जिस प्यार के दर्द को अब बर्दाश्त करना करना सीख रहा था, वो प्यार फिर से जग उठा। उसे लगा, कि शायद रागिनी अब मान जाएगी। हर्ष ने आखिरी बार रागिनी को अपनी जिंदगी में लाने की सोची। और रागिनी के नंबर पर लौट आने की मनुहार की। रागिनी ने मैसेज का उत्तर देते हुए कहा—देखते हैं। रागिनी ने वाट्सएप पर भी हर्ष को अनब्लॉक कर दिया था।
-- दो दिन गुजर गये
--दो दिन बाद हर्ष को ऑफिस में किसी ने बताया, कि रागिनी ने दफ्तर से इस्तीफा दे दिया है। उसे किसी बड़े चैनल में नई जॉब मिली है। हर्ष मन ही मन मुस्कुराने लगा। वो समझ गया, कि रागिनी ने उसका इस्तेमाल किया है। उसने रागिनी को मैसेज में नई जॉब मिलने की बधाई दे दी। बदले में कोई जवाब नहीं आया। रागिनी दफ्तर से जा चुकी थी। और दफ्तर से जाने के साथ ही फिर से हर्ष को वाट्सएप पर ब्लॉक कर चुकी थी।

--वक्त के मरहम ने हर्ष के जख्मों पर लेप लगाया, तो धीरे-धीरे हर्ष की जिंदगी भी रास्ते पर लौटने लगी।
--6 महीने बीत चुके था। हर्ष को भी नई नौकरी मिल चुकी थी। दोनों अपने-अपने रास्ते पर... अपने-अपने काम में मग्न हो गये। हर्ष नये जोश के साथ नये दफ्तर में काम कर रहा था, क्योंकि उसे पैसे इकट्ठे करने थे, अपनी छोटी बहन की शादी के लिए। सैलरी बढ़ाने के लिए वो एक बार फिर चैनल बदलना चाहता था।
--एक दिन हर्ष को पता चला, कि उस चैनल में जॉब के लिए वेकेंसी निकली है, जहां रागिनी काम कर रही है। कुछ देर सोचने के बाद हर्ष इंटरव्यू देने पहुंच गया। अपनी हाजिरजवाबी और काम में निपुण हर्ष इंटरव्यू क्वालीफाई कर चुका था। अब उसे फाइनल इंटरव्यू देने के लिए जाना था। फाइनल इटरव्यू की तारीख और वक्त तय हो चुका था। फाइनल इंटरव्यू वाले दिन जब वो तैयार होकर घर से निकलने वाला था, कि नये दफ्तर के एचआर की तरफ से उसे फोन पर बताया गया, कि उसका इंटरव्यू कैंसिल हो चुका है। हर्ष स्तब्ध था। सलेक्शन होने के बाद उसे फाइनल इंटरव्यू से पहले खारिज कर दिया गया था।
कुछ दिनों बाद हर्ष को पता चला, कि रगिनी उसे इंटरव्यू वाले दिन देख चुकी थी। और ऑफिस में शिकायत कर दी, कि हर्ष का कैरेक्टर काफी खराब है। इसलिए उसे नौकरी पर नहीं रखा जाए। रागिनी के कंप्लेन के बाद हर्ष को नौकरी नहीं देने का फैसला किया गया था।
--हर्ष एक बार फिर से बेचैन हो चुका था। वो तय नहीं कर पा रहा था, कि जिस रागिनी को वो भूलने की कोशिश कर रहा है, वो उसकी जिंदगी में फिर से भूचाल क्यों लाना चाहती है। कोई दुश्मन भी किसी के पेट पर लात नहीं मारता। रागिनी ने तो उससे उसकी नौकरी ही छीन ली थी।
कई दिनों तक बेचैन रहने के बाद हर्ष ने फैसला किया, कि वो रागिनी को कुछ नहीं कहेगा। अपने कैरेक्टर पर दाग लगने के बाद भी हर्ष ने फैसला किया, कि वो रागिनी को पता नहीं चलने देगा, कि उसे सारी बातें पता चल चुकी हैं। हर्ष अब रागिनी को हसीन दुश्मन मानने लगा था।

अब हर्ष ने एक फैसला लिया है...जिंदगी में इतना आगे निकल जाने का फैसला...जहां तक रागिनी की सोच भी नहीं पहुंच सके।

हसीन दुश्मन-- PART-3

अनजाने में की गई गलती हर्ष के लिए नाकाबिले-माफी बन चुकी थी। वो लड़की जिसके चेहरे को हाथों में लेने से उसका दिल, किसी बच्चे की तरह मचल उठता है, वो उसे बदनाम... ये सोच भी वो कैसे सकता है? वो लड़की, जिसे सीने से लगाए वो अनकहे किस्से सुनाता है, उसे वो भला रुसवा कैसे कर सकता है? और जो उसके और रागिनी के दरम्यां हुआ था, वो अकेले उसकी ही मर्जी तो नहीं थी? दोनों अपनी मर्जी से करीब आये थे। लेकिन ये मर्जी की लड़ाई कहां थी? इस गुस्से का मतलब था विश्वास की बुनियाद का दरकना। और वो जानता था, कि जहां प्यार है, वहां यकीन का अलाव हमेशा जलना चाहिए। नहीं, तो रिश्ते का महत्व नहीं रहता।

हर्ष जितना सोचता, उससे ज्यादा सवाल उसकी जेहन को झकझोड़ने के लिए आ जाते। रागिनी तो उसका फोन रिसीव ही नहीं कर रही थी। हर डायल के बाद फोन बस यही जवाब देता, कि आपने जिस नंबर को डायल किया है, वो इस समय जवाब नहीं दे रहा।

हर्ष का कमरा सिगरेट की धुएं से भरा था। माथे का पसीना उसका पाप बनकर उसकी पेशानी पर बार-बार आ धमकता। और वो पसीने की बूंद को पोंछने की कोशिश भी नहीं करता। वो तो बस एक बार रागिनी का आवाज सुनना चाहता है। अपनी बात कहना चाहता है। वो बेवफा नहीं है, रागिनी को समझाना चाहता है। जो कुछ भी हुआ है, वो एक गलतफहमी से इतर कुछ भी नहीं, प्रेम अपने मन पर आधारित होता है, बाहरी परिस्थितियों पर नहीं। कोई उनके बारे में क्या सोच रहा है, इससे उन्हें क्या मतलब? मगर, रागिनी फोन उठाए तब ना वो सफाई दे।

अगले दिन रागिनी जब दफ्तर आई, तो वो भावहीन थी। ना गुस्सा, ना प्यार, ना संवेदना। कुछ भी नहीं। हर्ष ने उससे बात करने की कोशिश की, तो उसने साफ कह दिया

--हर्ष, हमारे बीच का रिश्ता अब खत्म हो चुका है। अब तुम मुझसे कॉन्टेक्ट करने की कोशिश मत करना।
-- क्या, ऐसे कैसे हो सकता है रागिनी? इस रिश्ते को एक गलतफहमी की वजह से मत खत्म करो। रिश्ता तो सहेज कर रखने की चीज है। और जो तुम सुन रही हो, उससे मेरा कोई लेना देना नहीं है। दफ्तर के कुछ लोग हमारे रिश्ते खुश नहीं हैं। और वो तुम्हें बर्गलाने की कोशिश कर रहे हैं। 
-- मुझे तुमसे कोई मतलब नहीं है हर्ष। अब मैं तुमसे कोई बात नहीं करना चाहती। लीव मी अलोन। ओके

रागिनी अपने काम में व्यस्त हो गई। हर्ष वहीं खड़ा-खड़ा रागिनी को निहारता रहा। उसकी परेशानी, उसका दर्द मानो उसकी आंखें फाड़कर बाहर आ जाना चाहता था। दिन बीतते गये, और अब तो हर्ष को मैसेज के बदले गालियां मिलने लगीं थी। उसे वाट्सएप पर ब्लॉक कर दिया था रागिनी ने। लेकिन, हर्ष लगातार मैसेज किए जा रहा था। रागिनी ने तो एक मैसेज में यहां तक कह दिया
--तुम मर जाओ उससे भी मुझे कोई मतलब नहीं है।

हर्ष किसी आम प्रेमी की तरह ही खुद को शराब और सिगरेट के नशे में बेसुध कर चुका था। कमरे की तनहाई ने उसके मन में आत्महत्या करने तक का ख्याल ला दिया । अरे, इतना भी क्या गुस्सा, कि एक बार बात तक ना करना चाहे? क्या इतने दिनों का प्यार एक गलतफहमी की वजह से खत्म हो सकता है? कमरे में भरे सिगरेट के धुएं ने उसकी आंखों को सुर्ख लाल कर दिया था। और गुस्से ने उसके दिमाग को सुन्न कर दिया था। और उसने पंखे से रस्सियों को बांधकर अपने लिए मौत का फंदा तैयार कर लिया। उसने रागिनी को आखिरी मैसेज किया...
--ठीक है, तुम्हारे उठाए गये हर कदम को मैं चूमता हूं। चाय ज्यादा नहीं पीना। तुम्हें माइग्रेन है ना। खाना वक्त से खाना। ये नहीं कि रात 10 बजे घर पहुंचती हो, तो डिनर के बदले मैगी खाकर सो जाना। पापा, मम्मी, कार्तिकेय, किर्तिका का ध्यान रखना, ठीक वैसे ही, जैसे मैं अपनी मम्मी, पापा और बहनों का ख्याल रखता हूं। तुम्हारी बहन फैशनेबल है ना, मेरी छोटी बहन की तरह? वो मुझे बिग-बी कहकर पुकारती है। लंच लेकर हमेशा ऑफिस जाना। ऑफिस में लोगों से अच्छे से पेश आना। अगर मैं गलत हूं, तो मेरी गलती को भी माफ करोगी। ये शायद आखिरी मैसेज है। तुम मेरी जिंदगी में हसीन दुश्मन बनकर आई। गुड बाइ
सिर्फ तुम्हारा हर्ष


हर्ष ने रागिनी को आखिरी मैसेज कर दिया था। और फिर स्टूल पर खड़ा होकर फांसी के फंदे को अपनी गर्दन में डाल लिया। उसकी आंखों के सामने रागिनी के साथ बिताए गये एक-एक पल तैरने लगे। आंखों से आंसुओं की धार बहती जा रही थी। हर्ष अपनी जिंदगी को खत्म करने का फैसला कर चुका था। अब बस स्टूल का गिरना बचा था, कि तभी उसके फोन की घंटी बजी। 

डूबने वाले ने डूबते साहिल को आवाज दी...

वो एक खिलौना भर है...टूट जाना उसकी नीयति है..। वो टूट ही जाएगा...। फिर क्यों हम करें उसकी उम्मीद...।  दूर एक धुंधला सा लैंप पोस्ट दिखता है।...