Wednesday, 5 December 2018

डूबने वाले ने डूबते साहिल को आवाज दी...

वो एक खिलौना भर है...टूट जाना उसकी नीयति है..। वो टूट ही जाएगा...। फिर क्यों हम करें उसकी उम्मीद...। 
दूर एक धुंधला सा लैंप पोस्ट दिखता है।...उस जगह जाकर हमें बिछड़ जाना है।...लैंप पोस्ट मुझे किसी ड्रैकुला सरीखा दिखता है..। उस पीली सी धुंधली रोशनी देखकर डरता रहता हूं।... क्या मैं उस निश्चित बिंदु पर उसे त्याग दूंगा।... क्या कहूंगा उस वक्त मैं उसे...? इस वक्त मुझे भगवान राम याद आ रहे हैं।...उन्होंने सीता को त्याग दिया था..। लक्ष्मण को त्याग दिया था...। अचानक.....
त्याग देना सबसे कठोर शब्द लग रहा है मुझे।
अचानक एक खरगोश दिखता है। चंचल सा खरगोश...डरा हुआ..। बिल्कुल मेरे मन जैसा...। खरगोश कठोर नहीं होता है। इसलिए ये मुझे सबसे ज्यादा प्रिय है। मुझे हाथी भी बहुत प्रिय है, क्योंकि मैं हाथी जितना कठोर होना चाहता हूं।...मुझे कबूतर इसलिए अच्छे लगते हैं, क्योंकि, एक दफे मैंने उसे अपनी कहानी सुनाई थी।...और फिर उसने मुझे कहा था...मुझे तुम्हारे जैसा इंसान बनना है। फिर उसने मुझे त्याग दिया था..। वापस नहीं आया...।
मैं कभी-कभी सोचता हूं...भगवान को आधा इंसान होना चाहिए था।... कम से कम उन्हें दिखना चाहिए था...। हालांकि, फिर भी मैं उनसे सवाल नहीं पूछता...मगर, मैं उनकी बेबसी देखकर मुस्कुराने का मौका नहीं चूकता।...और मैं चाहता...कि जब मैं उनकी बेबसी पर मुस्कुराता...तो वो मुझे देखते..। मुझपर कोफ्त करते...। फिर मैं जोर-जोर से हंसता...। राम की बेबसी पर मैं खामोश हो जाता हूं। मैं रोने लगता हूं, जब देखता हूं, कि सीता रथ में बैठकर जंगल जा रही हैं। मैं रोने लगता हूं, लक्ष्मण को देखकर जब उन्हें राम कहते हैं...जाओ मैंने तुम्हें त्याग दिया है।...
कितनी उदास कहानी मैं लिख रहा हूं।... पर इससे ज्यादा खूबसूरत और क्या होगा ? डूबते साहिल को आवाज देकर कहता हूं....हाथ बढ़ाकर संभाल लो मुझे।...

Saturday, 27 October 2018

बहकी हुई बातें... बहके हुए हम... । तुम याद आए.....

वो जमीन से हजारों फीट की ऊंचाई पर था...। आकाश में टिमटिमाते हुए तारों को देख रहा था..। जमीन पर भी हजारों दिए तारों की तरह ही दिखाई दे रहा था।... कितना अजीब सा अहसास था ये...। ये कोई पहली मर्तबा नहीं था...जब वो हवाई जहाज में सफर कर रहा था...मगर, अभी उसे ख्याल आ रहा था...कि अगर अभी प्लेन क्रेश कर जाए...तो क्या होगा ? सब मर जाएंगे...। आकाश में ही सब जल जाएंगे..। एक पल में सौ से ज्यादा लोग मर जाएंगे...।

उसकी आंखों में आंसू थे..। वो एक ऊंगली से आंखों के आसुंओं को पोंछ रहा था...। नहीं, वो डरा बिल्कुल भी नहीं था....मगर, कुछ था...जो आंखों में नमी बनकर उतर रहा था...। पानी का एक कतरा...। दो बूंदे...। भींगी सी...। वो भागना चाहता था...। वो भाग जाना चाहता था..।। किससे...  पता नहीं...। कहां... पता नहीं...। कितनी दूर पता नहीं...। मगर, अभी इस वक्त वो भाग जाना चाहता था...। कहीं दूर....सबसे दूर..। जहां, सिर्फ अकेलापन हो...। सिर्फ अकेलापन...।

क्या बचता है एक बार मर जाने के बाद..। क्या है इज्जत....। क्या है प्रतिष्ठा...। क्या है शान...। क्या होता है अपमान...। कौन करता है अपमान...? हजार सवाल... हजार जवाब...। पर किसे बताए...कौन सुने... । सुनकर कोई क्या करे...। एयर होस्टेस से उसने कहा....एक ग्लास पानी चाहिए...। जी सर, अभी लाती हूं...।


एक बार मर जाने के बाद कौन देखता है, कि उसने अपनी जिंदगी में क्या किया है...। क्या खोया है, क्या पाया है...। उसकी आंखों के सामने मां थी...पापा थे...बहन, भाई....और वो रिश्ता...जिसे वो कभी खोना नहीं चाहता था...। लेकिन, किसे बताए वो इतनी सारी बातें...। बिना बताए कोई सबकुछ क्यों नहीं समझ लेता है...? 

Monday, 24 September 2018

बरसात और पश्चाताप

आज दफ्तर के लिए घर से निकला ही था कि बरसात शुरू हो गई। मैं भींगते हुए...जैसे तैसे करके दफ्तर पहुंचा। आधा से ज्यादा भींग चुका था। बारिश में भींगते वक्त मैं सोच रहा था, कोई आग तो बरस नहीं रही है, कि मैं जल जाऊंगा...बारिश ही है...थोड़ा बहुत भींग ही जाऊंगा ना।..कोई बात नहीं। ये सब सोचते हुए मुझे वो याद आ गई। एक बार हम घूम रहे थे...। एक जगह पानी पीते हुए उसने थोड़ा सा पानी मेरे ऊपर फेंक दिया। मैंने डपटते हुए कहा...ये क्या कर रही हो। देख नहीं रही हो...भींग जाएंगे। वो थोड़ी उदास हो गई। और फिर कभी उसने मेरे ऊपर पानी नहीं फेंका। वो जो एक बार तय कर लेती है, दोबारा कभी नहीं करती। मैंने फिर कई दफे उससे कहा... कि तुम मेरे ऊपर पानी फेंक सकती हो...मगर, उसने दोबारा ऐसा नहीं किया। तय किए हुए पर टिके रहना उसकी आदत है। जिसे मैं बहुत बाद में जान पाया।
बचपन में मैंने एक बार एक कहानी पढ़ी थी। कहानी का शीर्षक था बरसात। एक राजा सूरसेन पर दुश्मन देश आक्रमण कर देता है। उस दिन काफी तेज बरसात हो रही थी। बरसात के बीच का आक्रमण राजा सूरसेन की सेना सह ना सकी...और सूरसेन लड़ाई हार गया। सूरसेन को देश छोड़ना पड़ा...और वो जंगल में रहने लगा। काफी लंबे वक्त तक सूरसेन अपनी शक्ति को संगठित करता रहा...और फिर बरसात के एक दिन उसने अपना राज्य पाने के लिए फिर से हमला कर दिया। इस बार उसने लड़ाई जीत ली। बरसात से बर्बादी का जो सफर शुरू हुआ था, वो बरसात पर ही आकर खत्म हुआ। पता नहीं क्यों, मगर ये कहानी मैं कभी भूल नहीं पाया। ये कहानी मेरे जेहन में अकसर आ जाया करती है। शक्ति को संगठित करने से हम फिर जीत सकते हैं। पर अगर भरोसा ही टूट चुका हो...तो क्या कर सकते हैं। भरोसा हासिल करने की चीज होती है...। कोई हम पर आंख मूंद कर भरोसा कर लेता है...और हम उस भरोसे को तोड़ देते हैं। असल में कहानी इतनी भर नहीं होती है...कहानी इसके बाद शुरू होती है...कि हमारे पास बस कोसना रह जाता है। और हम खुद को जीवन भर कोसते रह जाते हैं। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। कोसना बचा रह गया मेरे पास...। यहां पर शक्ति को संगठित करने का विकल्प नहीं होता। हम बस हार जाते हैं। हारे हुए जीवन जीते रहते हैं। 

Thursday, 13 September 2018

सुराख

कुछ नहीं करोगे...तो भी जीवन तो बीतता ही है। तो कुछ करते क्यों नहीं ? जीवन तो तुम्हें अपने साथ लेकर ही जाएगा..और तुम ठहरने की दस्तकें भर देते रह जाओगे...। आओ ...की बीत चलें जीवन के साथ।

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वक्त की थैली में सुराख है
कभी शाम टपक जाती है
कभी सुबह गिर जाता है

प्रेम के साथ भी ऐसा ही कुछ होता है

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अभी-अभी देखा
एक ट्रक गुजर गया दरख्त से बंधे कुछ तारों को तोड़ते हुए
एक कारीगर फिर कर आया दुरूस्त सभी टूटे तारों को
मन भी कभी टूट जाता है..कभी जोड़ दिया जाता है
जाना, मन का मरम्मत कोई और नहीं करता
मन के पास खुद का अपना कारीगर होता है
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दफ्तर में कुर्सी पर देर तक बैठने के बाद
कुर्सी की पीठ पर झुककर करता हूं आंखे बंद
ठीक इस वक्त आंखों में लाल रंग का आसमान दिखा है
पीठ की अकड़ अकसर आंखें बंद करने से खत्म हो जाती हैं

पर बहुत सारी चीजें बची की बची रह जाती हैं

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हंसना भूल गया....

मोबाइल पर एक चुटकला पढ़ते ही उसके मुंह से हंसी निकल गई...। वो हंस पड़ा...। बगल में बैठी आंटी ने कहा.. आज सूरज किस तरफ निकला है..? आंटी के सवाल से वो चौंक गया...और हंसते हुए आंटी की तरफ देखकर पूछा... क्यों...क्या हो गया...।
नहीं, तुम हंसे हो ना...इसीलिए पूछ बैठा...कि सूरज किस तरफ से आज निकला है। इतने दिनों में आज पहली बार तुम्हें हंसते हुए देखा है।

--नहीं, नहीं...ऐसी कोई बात नहीं है।

आखिरी बार मैं कब हंसा था। कब खुश हुआ था आखिरी बार..। बहुत सोचने के बाद भी याद नहीं आ रहा था। मैंने खुश होना कब बंद कर दिया इसका सही-सही अनुमान लगाना अब बहुत मुश्किल हो गया था। हां, याद आया, कि जब मां पिछले साल आई थी, तो उसने कहा था...तुम हंसते क्यों नहीं हो। तुम्हारे उमर के लोगों को देखो... हमेशा हंसते खेलते रहते हैं। उन्हें कोई फिक्र नहीं होती...और तुम बात भी करते हो, तो सीरियस तरीके से...या फिर गुमसुम रहते हो। क्या बात है... ? मैंने कहा था...बात क्या होगी..। बस ऐसे ही। अब हमेशा हंसते ही रहें क्या... हर बात पर ?
--नहीं, फिर भी हंस सकते हो। पहले तो हर वक्त मसखरा करते रहते थे।

एक हंसने वाला आदमी कब अचानक से चुप हो जाता है, उसे पता तक नहीं चलता। मैं बिल्कुल ऐसा नहीं था...। ऐसा होना भी नहीं चाहता था। पर ये हो कैसे गया, का सवाल अब मेरे साथ है। एक अनजाना सा डर हर पल मेरे साथ रहता है, और उस डर को मैं आजतक जान नहीं पाया। ऐसा लगता है, कि कहीं कुछ गलत तो नहीं हो गया है मुझसे..। कहीं कुछ टूट तो नहीं गया है मुझसे..। मां अकसर कह दिया करती है, कलेजा पुष्ट रखो..। और मैं ऐसा कर नहीं पाया।

मैं ये बात किसी को बताना चाहता था...पर ऐसा हो नहीं पाया। मैंने चाहा, मुझे इसे कहीं दर्ज कर लेनी चाहिए... और मैं यहा हूं। वैसे देखा जाए तो मेरे पास दुखी होने की एक भी वजह नही हैं..। हर वजह मेरा खुद का पाला हुआ है।

कल शाम सबसे प्रिय दोस्त से घंटे भर बात हुई। उसे मैंने अपना सारा दुख सुना डाला। मेरी पूरी बात खत्म होने के बाद उसने पूछा...तुम इन बातों में से किस बात पर दुखी हो ? मैंने कहा...सभी बातों पर। उसने हंसते हुए कहा... कि इनमें से एक भी बात दुखी करने वाली नहीं है। मैं चुप ही रहा।



Sunday, 9 September 2018

आदमी कातिल क्यों हो जाता है

एक आदमी...दूसरे आदमी को मार क्यों देता है..। सारी वजहों को सोचने के बाद भी एक भी वजह मुझे समझ में नहीं आती। जबकि, उसे पता होता है...कि एक बार उसकी जान चली गई, तो फिर वो कभी जिंदा नहीं हो पाएगा..। कभी बोल, हंस...चल नहीं पाएगा। उसका अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। जिसकी आपने हत्या कर दी है, उसका शव जब उसकी मां..बहन, पत्नी बेटी देखेगी..तो उसपर क्या बीतेगी। कुछ पल के गुस्से के लिए हम किसी से उसके जीने का हक क्यों छीन लेते हैं।
अभी दफ्तर पहुंचते ही पता चला...कि दिल्ली में एक कैब ड्राइवर की गोली मारकर हत्या कर दी गई। ये खबर देखते ही मन व्यथित हो गया। मैं अकसर कैब से यात्राएं करता रहता हूं। अकसर उनलोगों से बातचीत भी हो जाकी है। बिल्कुल हमारे जैसे होते हैं वो। सेम टू सेम। कुछ भी अलग नहीं। मैंने पाया है, कि वो मुझसे ज्यादा मेहनत करते हैं...दिन रात काम करते हैं। सबके अलग-अलग सपने होते हैं। और सबकी आंखों में मैं उनके परिवार को देखता हूं।
एक कैब ड्राइवर ने एक बार बातचीत के दौरान बताया था, कि सर महीने में करीब 25 हजार रुपया काम लेता हूं।गांव में घर बनवाना है। इसलिए थोड़ा और मेहनत अभी करना है। मैंने उसे हौसला देते हुए कहा... हो जाएगा... । अंत में देखिएगा...सब अच्छा होगा। हैप्पी एंडिंग। मैं अकसर...जब भी कोई अपनी समस्या मुझे बताता है, तो मैं कह देता हूं...चिंता मत कीजिए...देखिएया...सब अच्छा होगा। अंत में सब अच्छा होगा। पर क्या अंत में सब अच्छा हो जाता है ? ये सवाल कई बार मेरे मन में उठे हैं। पर '' अंत में सब अच्छा हो जाएगा '' वाले विश्वास से मैं हटना नहीं चाहता, इसलिए, मैंने इस सवाल पर कभी ध्यान नहीं दिया। कभी कभी मुझे लगता है, कि सिर्फ दिल रखने के लिए...या ढाढ़स बढ़ाने के लिए तो कहीं मैं नहीं बोल देता हूं...कि सब अच्छा हो जाएगा..। किसी फिल्म की कहानी का अंत तो मैं नहीं सोच लेता...कि फिल्मों के आखिरी में सब अच्छा ही होता है।

दिल्ली में जिस कैब वाले का मर्डर हुआ है, उसकी तस्वीर अभी देखी है। हट्टा-कट्टा जवान दिख रहा था। पर एक गोली ने उसे शव बना दिया।...हर दिन सैकड़ों हत्याएं होती हैं..। पर कोई इस तरफ सोचता तक नहीं । या किसी के सोचने से फर्क भी नहीं पड़ता। जैसे मेरे सोचने से फर्क नहीं पड़ता। लोग गुस्सैल होते जा रहे हैं।... हर आदमी दूसरे आदमी से ज्यादा गुस्सैल बनना चाहता है।...और गुस्से का अंजाम...कोई ना कोई शव होता है।.. किसी ना किसी का अस्तित्व मिटता है।

कान्हा...मुझे सब कुछ देना...गुस्सा और घमंड से दूर रखना।

Friday, 7 September 2018

उबन

दिन भर काम करने के बाद थका हुआ...बोझिल सा...दफ्तर में काम करने वाले अलग-अलग चेहरों को देख रहा हूं..। कोई हंस रहा है...कोई चुुप बैठा है...कोई किसी और से बात कर रहा है...। पर, किसी के चेहरे पर सुकून नहीं दिख रहा है..। अभी मेरे मन में सवाल उठ रहा है..कि हम क्यों करते हैं काम..। किसे खुश रखने के लिए कामों के साथ गुत्थमगुत्थी करते रहते हैं...। और अंत में सबसे हार मान लेते हैं..। न्यूजरूम को हम मछली बाजार कहते हैं...। यहां हर वक्त शोर मचा रहता है..। हर किसी के पास डेडलाइन...और उस डेडलाइन के बीच सब उलझे से रहते हैं..। हमारी जिंदगी ऐसी ही हो चली है...। हम लोग दिनभर कांग्रेस-बीजेपी करते रहते हैं...पर अंत में थकन कंधों पर उतर आती है...।
आज दिन में जीवन मिला...। वो एक दुकान पर अनमना सा खड़ा था। हमारी इनदिनों आपस में बन नहीं रही है..। हमने सोचा, क्यों ना जीवन से सुलह कर लिया जाए..। मैं सर झुकाए उसके सामने खड़ा हो गया...। उसने मुझे देखा...पर कुछ बात नहीं की..। मैं काफी देर तक उसके पास खड़ा रहा...और फिर बात करने की पहल मैंने ही की..। मैंने उससे कहा...जीवन, कैसे हो.. ? उसने अनमने अंदाज में ही कहा...ठीक हूं। और फिर वहां से जाने लगा....मैंने कहा...मुझसे बात नहीं करोगे..। उसने ना में सिर हिलाया...और चला गया..। मैं भी वहां से दफ्तर आ गया...।
अभी थोड़ी सी भूख लग रही है...पर खाने को मन नहीं कर रहा है..। ऐसा नहीं है, कि मैं किसी बात से दुखी हूं... पर मन नहीं लग रहा है...। ऐसा अकसर होता है मेरे साथ।... यह उबन है...। जो इस वक्त मेरे साथ बैठा है।.. पता नहीं कब तक बैठा रहेगा...। 

Wednesday, 5 September 2018

जरा सुनिए तो....

मैंने कई दफे देखा है...कि ब्लॉग पर जो मैं लिखता हूं, उसे अमेरिका या जर्मनी के लोग पढ़ते हैं। मैं नहीं जानता, कि ये सच है या ब्लॉग ऑडिएंस में कुछ गलत दिखा जाता है..। पर मेरे इस ब्लॉग का पता कुछ ही लोगों को है, और मैं दावे के साथ कह सकता हूं, कि वो भी मेरे इस ब्लॉग को नहीं पढ़ते होंगे। पर pageview दिखाता है, कि ब्लॉग को हर दिन कुछ लोग पढ़ रहे हैं। अकसर जर्मनी और अमेरिका दिखाता है। अगर ये सच है, तो मैं उन दोस्तों से अनुरोध करूंगा..कि संशय मिटाएं..। अगर वो सही में पढ़ते हैं, तो jha.abhijat@gmail.com पर मुझे मेल जरूर करें।

मुरब्बा हो हो हो नहीं...ओ रब्बा हो हो हो...

आज अभी-अभी मैंने मुरब्बा खाया है। इसे दिल्ली और उत्तर प्रदेश में पेठा भी कहते हैं। आगरा से एक साथी ने मुरब्बा लाया था। मुरब्बा खाना मुझे बेहद पसंद रहा है। मुझे याद है, कि बचपन में बाबा अकसर मुरब्बा लाया करते थे। उन दिनों हिंदी फिल्म का एक गीत काफी चर्चित हुआ था।...'एक लड़की इधर से गुजरी है.. दिल जान जिगर से गुजरी है... गोरे-गोरे गालों वाली...काले-काले बालों वाली...मस्त-मस्त चालों वाली... मेरे दिल को दिवाना करके गई... हो रब्बा हो हो हो.. हो रब्बा हो हो हो..। पर मैं हो रब्बा का मानी नहीं समझता था। मुझे ये शब्द भी नहीं पता था। मैं बचपन में जोर-जोर से ये गीत गाता था...पर मेरे बोल निकलते थे... मुरब्बा हो हो हो.. मुरब्बा हो हो हो...
मेरे एक मामा की शादी थी। मैं बाराती के तौर पर जा रहा था। कार में मेरे कुछ बड़े भाई भी थे। हम सब मस्ती करते हुए जा रहे थे। तभी मैंने ये गाना गाया...और गाने लगा...मुरब्बा हो हो हो...मुरब्बा हो हो हो..। तब मेरे ममेरे भाई ने मुझसे कहा...कि मुरब्बा हो हो हो नहीं है, ओ रब्बा हो हो हो... है। मैं आश्चर्य से भर गया। कि इतने दिनों से मैं गलत गाये जा रहा था, पर किसी ने सही क्यों नहीं किया...। मुझे उस वक्त बहुत हंसी आने लगी। पर ये बात मैं आजतक भूल नहीं पाया।.. अकसर जब भी मैं मुरब्बा खाया करता हूं, मुझे वो गाना भी याद आ जाता है, और बाराती वाली बात भी।

हम अनजाने में कितनी गलतियां कर जाते हैं।...और जब कोई उन गलतियों के बारे में बताता है, तो हमें पता चलता है, कि हम कितनी बड़ी गलती कर रहे थे। कुछ गलतियों पर हम हंस देते हैं, और कुछ गलतियों पर हम प्रायश्चित कर लेते हैं। पर कुछ गलतियां ऐसी होती हैं, जिन्हें करने के बाद हम खुद से भी माफी नहीं मांग पाते हैं। और अंदर ही अंदर गिजगिचापन महसूसते रहते हैं।... पवित्र शब्द कितना दूर लगता है कभी-कभी... इस शब्द को लिखते वक्त ऊंगलियां तक कांप जाती हैं।

इन दिनों लोगों को लगता है, कि मैं उनकी बात बहुत ध्यान से सुन रहा हूं।.. पर होता ऐसा नहीं है। असल में मैंने किसी भी बात को बहुत ही ध्यान से सुनने की कला सीख ली है। पर मैं कोई भी बात ध्यान से नहीं सुनता। बस थोड़ा सा मेरा मुंह खुला रहता है...आंखों में ''ध्यान से सुन रहा हूं'' वाली फीलिंग्स रहती हैं...पर मन कहीं और एकांत के अरण्य में भटकता रहता है। किसी रेगिस्तान में उस वक्त मैं अकेला चलता हुआ पाया जाता हूं। रेत में पैर पूरी तरह से धंसे रहते हैं...सिर से पसीना टपकता रहता है पर मैं लगातार चलता रहता हूं। कई बार मैंने पाया, कि रेगिस्तान में मैं चलता नहीं हूं...बल्कि, भटकता रहता हूं, या फिर मैं भागता रहता हूं। किससे भागता हूं, ये आजतक नहीं जान पाया। उसने कहा...तुम बेहद डरपोक हो...हमेशा भाग जाते हो... तुममे स्थिति को संभालने का...डटकर डिसिजन लेने की क्षमता नहीं है...। मैं उसकी बात बहुत ध्यान से सुन रहा था...। तभी मुझे पता चला...कि रेगिस्तान में मैं भटक नहीं रहा हूं, असल में मैं रेगिस्तान की रेत पर भागने की कोशिश कर रहा हूं...पर मेरे पैर इतने धंसे हुए हैं, कि मैं भाग नहीं पा रहा हूं। बहुत देर बाद भी मैं उसी के सामने खड़ा था। वो बोली जा रही था...बोली जा रही थी।... कुछ देर बाद वो रोने लगी।... मैं उसके आंसुओं को देख रहा था.... मैंने हाथ बढ़ाकर आंसुओं को पोंछ दिए...फिर उसने मेरे कंधे पर अपना सिर टिका दिया।... बोली, तुम इतने डरपोक क्यों हो ? मैंने कुछ नहीं कहा...। कुछ देर तक वो कांधे पर सिर रखकर रोती  रही..। फिर मैंने थोड़ी सी चालाकी दिखाते हुए उसे एक कहानी सुना दी...। कृष्ण की कहानी..। उसे मैंने मोह क्या है वाली कहानी सुना दी... । वो अब ठीक हो चुकी थी। फिर कुछ देर में केक खाते हुए हंसने लगी...और मुझसे कहा... तुम बहुत अच्छे हो...। सबसे अच्छे..।
मैं सोचने लगा...कि इस थोड़े से वक्त में क्या बदला है...? क्या मैं रेगिस्तान से बाहर आ चुका हूं.. ? क्या मैंने भागना बंद कर दिया है...? नहीं, मैं वहीं का वहीं खड़ा था।... अब मुरब्बे का स्वाद मुंह से जा चुका है..। पानी पीने को मन कर रहा है... किसी पहाड़ पर जाने का मन कर रहा है.... बहुत कुछ मन कर रहा है... असल में मेरा मन पागल है...।


हम एक जादुगर हैं

जिसे हम नहीं जानते-पहचानते...उनसे बहुत सारी बातें कहने को मन कर रहा है। किसी अजनबी को हर हाल सुनाकर खाली हो जाने को मन चाहता है। पर कितनी उलझनों को बता पाऊंगा...कितनी चाहनाओं को मैं खोल पाऊंगा...और उससे हासिल क्या होगा...? बहुत सारे सवाल लिए इस वक्त बस मैं अक्षरों के कुछ चित्र बना लेना चाहता हूं।

हम सब सोचते हैं, कि हम एक जादुगर हैं
सांप और छुछुन्दर वाली स्थिति...। कुछ ऐसी ही स्थिति में घिरा हुआ हूं..। इतना घिर चुका हूं...कि मन बेशर्मों की तरह हंस रहा है...और अभी ये लिखते वक्त भी मुंह पर मुस्कान आ गई है।... मैं अपने साथ कितने लोगों को नचाता रहता हूं।..और फिर नाचने वालों के साथ खुद भी नाचता रहता हूं। हां, इस खेल का पक्का खिलाड़ी हूं मैं। कभी किसी को अकेला नहीं छोड़ा है.। हां, जब वो पूरी तरह नाचकर थक चुके होते हैं, तो फिर मुझे छोड़ जाते हैं...और मैं उन्हें रोकता भी नहीं हूं।

एक बार मैं खुद से बेहद महत्वपूर्ण बात कर रहा था। मैंने कहा...कि असल में हम सब सोचते हैं, कि हम एक बहुत बड़े जादूगर हैं, और हर वक्त हम कोई ना कोई जादू कर सकते हैं। इस भ्रम में जीते-जीते एक दिन ऐसा आता है, कि हम इस भ्रम के तिलिस्म में कहीं खो से जाते हैं। और फिर जीवन को जादू समझ लेते हैं। पर जीवन तो जादू होता नहीं है। हां, जीवन में चमत्कार होते रहते हैं। मैं उन चमत्कारों की बात नहीं करूंगा...। पर हां, मैं उन मुसीबतों की बात जरूर करूंगा, जिसे गाहे-बगाहे हम अपने लिए चुनते रहते हैं। या चुनकर चुपचाप पॉकेट में भरकर सड़क पर चलने लगते हैं। वो मुसीबत हर वक्त छुट्टे रुपयों की तरह खनकते रहते हैं, और हम उनसे खीझते रहते हैं। दुनिया की तमाम बड़ी से बड़ी मुसीबतों में से सबसे बड़ी मुसीबत है, किसी का साथ। जी हां...ये मैं पूरी होशो-हवास में कह रहा हूं। ..... छोड़िए...इससे ज्यादा मुझे कुछ नहीं कहना है।

आज क्या है...कुछ नहीं है...चलो एक और झूठ तुम्हेें बताता हूं।

आज कुछ नहीं है...। आज मैं ये बात क्यों कह रहा हूं, मुझे नहीं पता है। पर मैं आज सिर्फ झूठ बोलना चाहता हूं। मैं अकसर झूठ ही बोलता पाया जाता हूं। खुद से नहीं, औरों से। अपने आप से मैंने आज तक झूठ नहीं बोला है, लेकिन मेरी बातों को अकसर झूठ ही समझा गया है। जैसे, मैं तुम्हें खुश रखना चाहता हूं..। मैं उन्हें भी खुश रखना चाहता हूं, जो मेरे लिए विशेष हैं।
मेरे भाई ने मुझसे कहा... आप हर रिश्ते को खुश रख नहीं सकते...मगर, कोशिश कीजिए की हर जगह आप सही हों। सही होने का मतलब सच बोल देना होता है...भले ही कष्ट पहुंचे...। और आप किसी को कष्ट पहुंचाकर अपने को सही सलामत वहां से बाहर निकाल सकते हैं। ये रास्ता कितना सरल है..। और मैं इसे आजतक समझ क्यों नहीं पाया...?
कल मैंने अपने एक दोस्त से कहा...कि तुम्हें मेरी जिंदगी पर एक फिल्मकथा लिखनी चाहिए..। मैं बिल्कुल किसी फिल्म का मैटेरियल हूं। वो हंस पड़ा..। उसके साथ मैं भी।...ये बात मैं पहले भी एक बार कर चुका हूं। उसने मुझसे कहा...हर दो-तीन महीने तुम्हारी जिंदगी सही रहती है, फिर तुम उलझ जाते हो...। वो ठीक ही कह रहा था।
असल में मैं सारी परेशानियों को खुद दावत देता हुआ पाया जाता हूं। एक बार मैंने कहीं किसी पेज पर... ऑफिस की मीटिंग में बैठे-बैठे लिख दिया था...मेरे साथ-साथ एक कहानी भी चलती रहती है। असल में अगर मैं शांत हूं, तो फिर मुझे मन नहीं लगता। मैं जब तक अशांत रहता हूं, तभी तक शांत रह पाता हूं। ये एक तरह का सेल्फ डिस्ट्रक्शन मोड में चला जाना भी है। और इसे मैं अकसर जीता हूं। जीता क्या हूं, भोगता हूं।... एक बार और मैंने कहीं लिख दिया था...कि मैं अव्वल दर्जे का शैतान हूं... और बहुत बाद में इस बात को मैं समझ पाया...।

Thursday, 23 August 2018

दोपहर की दो बातें

कई बार चोट लगने को होती है
और हम बाल-बाल बच जाते हैं

पर प्रेम में ऐसा कहां होता है...
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बरगद के पेड़ पर नहीं हैं एक भी पीले पत्ते
अमलतास के पेड़ पर उगे हुए हैं पीले फूल
गुलमोहर भी लाल-नारंगी रंगों से लदा है

खुशी सिर्फ एक रंग का कहां होता है...

Saturday, 11 August 2018

ऐ हवा...मुझे उन नर्तकियों के पास ले चल.......

थोड़ी सी धूप...थोड़ी छांह के बीच बढ़ते कदम अचानक ठिठक कर थम चुके थे...। चारों तरफ घने और लंबे पड़ों की हरियाली और बीच में बना एक छोटा सा स्टेज..। हां, उसे मैं एक स्टेज ही कह सकता हूं...। फूस और छप्पड़ों से बना एक छोटा सा घर...आंगन में लोगों के बैठने के लिए एक छोटी सी जगह ..गोबर से पुता हुआ फर्स... बिल्कुल गांव का नजारा...। मगर, वो गांव नहीं था। एक दरबे के पास कुछ नर्तकी बैठी...अपनी बारी का इंतजार करती हुई...और दूसरी तरफ स्टेज पर...ढोलक पर थाप देते...लंबी मूंछों वाले कुछ कलाकार...। ढोलक की थाप से क्या आवाज निकल रही थी, उसे मैं बस समझने की कोशिश कर रहा था, मगर समझ नहीं पा रहा था...। शायद, समझने की कोशिश भी नहीं कर रहा था।... पर हां, ये देखते हुए मुझे अपना गांव याद आ गया...जब दशहरे के मेले में मैं जाया करता था।...

मैं उदयपुर के शिल्प ग्राम में था। स्टेज पर पांच नर्तकियां कालबेलिया डांस करने आईं। मैंने अब तक सिर्फ इस डांस के बारे में सुना था...कभी देखा नहीं था।...कालबेलिया नृत्य राजस्थान के ग्रामीण परिवेश में रहने वाले जनजातियों के रहन सहन को बखान करता है।... प्रमुख नर्तक महिलाएं होती हैं...। जो काले घाघरे पहन कर सांप के गतिविधियों की नकल करते हुए नाचती और चक्कर मारती हैं...। शरीर के ऊपरी भाग में पहने जाने वाला वस्त्र अंगरखा कहलाता है...। सिर को ओढ़नी से ढंककर रखा जाता है..। और नीचले भाग में लहंगा पहना जाता है..।

पांचों नर्तकियां अब अपने रंग में आ चुकी थीं..। सभी के पैर ऐसे थिरक रहे थे, मानो धरती पर कोई नक्काशी कर रही हों। 3 महिलाएं ज्यादा उम्र की थीं, और 2 लड़कियां आगे से नृत्य कर रहीं थीं। वो सभी नर्तकियां हंस रही थीं, मगर उनकी हंसी में मुझे कुछ भाव नज़र नहीं आ रहा था...। ये हंसने का कैसा भाव था, उसे मैं समझने की असफल कोशिश लगातार किए जा रहा था...। नृत्य की ये भंगिमा मेरे लिए बिल्कुल नया अनुभव था।... वो लहंगा को ऐसे समेट रहीं थी, मानो पूरे चांद को ढंक रही हों...।

नृत्य अब खत्म हो चुका था....। और इस बात को बीते अब कई हफ्ते हो चुके हैं।... पर अभी दफ्तर में बैठे मुझे लगा, कि उन नर्तकियों के बारे में मुझे लिख लेना चाहिए।... उनके बारे में लिख लेना चाहिए, जो 5 दर्शकों के सामने भी नृत्य करने से इनकार नहीं करतीं...। भाव...सम्मोहन..ताल...भंगिमा...सादगी....सरलता...और वो भावविहीन हंसी...। और भी बहुत कुछ...जिसे शायद फिर कभी मैं लिख सकूं.....

मुझे अभी ऐसा लग रहा है...कि मैं हवा से कहूं...कि ऐ हवा...मुझे उन नर्तकियों के पास ले चल.....













Friday, 13 July 2018

आनंद

इन दिनों अजनबियों से संबंध बन रहे हैं। मेट्रो से ऑफिस आ रहा था। माथे पर तिलक लगा हुआ था। जब गुरुजी मुझे तिलक लगा रहे थे, तब उन्होंने मुझसे पूछा था, लाज तो नहीं आएगी ऑफिस जाते वक्त...या बाहर निकलते वक्त तिलक लगाए। मैंने कहा, नहीं...बिल्कुल नहीं लाज आएगी। गुरुजी ने कहा...तब ठीक है।
खैर..मेट्रो में मैं बैठा था...कि दो बच्चियां पास आईं। आते ही कहा...भैया राधे-राधे।... मैं मुस्कुरा उठा। जवाब में कहा...राधे-राधे। फिर वो चली गईं। काफी देर तक मुस्कान मेरे मुंह पर तैरती रही। इन दिनों अकसर ऐसा मेरे साथ होने लगा है। कई अजनबी मुझे टोक चुके हैं। ज्यादातर इस्कॉन से जुड़े भक्त होते हैं। बात करते हैं, और फिर साथ इस्कॉन चलने को कहते हैं। मैं सभी का आग्रह स्वीकार कर लेता हूं, मगर अभी तक व्यस्तता की वजह से जा नहीं पाया। एक दिन मेट्रो में हरि जी मिले। पहली बार मुलाकात हुई। उनके माथे पर तिलक नहीं था, पर हाथ में माला थी। हरे कृष्णा किया। इस्कॉन से जुड़े हुए भक्त थे। हरि जी से मुलाकात कर काफी अच्छा लगा। फिर ऑफिस में नारायण मिले। अभी नये नये इंटर्न आए हैं हमारे यहां। वो भी इस्कॉन से हैं। हालांकि, ऑफिस जाने वाले ज्यादातर लोग तिलक नहीं लगाते हैं। कहते हैं, लोग हंसेंगे। पर मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ। अभी तक दफ्तर में मिलने वाले एक भी साथी से मुझे लाज नहीं लगी है...ना ही वो हंसे हैं मुझपर। कई साथी तो मेरे इस नये रूप को विस्तार से जानने को इच्छुक थे। हमने यथा संभव आध्यात्म के बारे में उनसे चर्चा भी की। कई साथी दफ्तर में ऐसे भी मिले, जो मेरी ही तरह हैं, मगर अभी तक अपना स्वरूप छुपाए हुए हैं।
काफी अच्छा लग रहा है। ये आनंद का अनुभव है, कि दो प्यारी प्यारी बच्चियां राधे-राधे कहती हुई मेरे पास आईं। जीवन में अजनबी कुछ नहीं होता...सब अपने होते हैं...बस हम उनके स्वरूप से अनभिज्ञ हो
ते हैं।

Saturday, 9 June 2018

मां-पापा

आजकल मां-पापा आये हुए हैं। तो अभी शब्दों को वीराम है। अभी कुछ नहीं लिख रहे हैं।

Monday, 28 May 2018

बेवक्त की बातें

हम अकसर करते रहते हैं, बेवक्त की बातें..। जोड़ते रहते हैं, कुछ शब्दों के समूह को...देखते रहते हैं, कुछ चित्र... निकालते रहते हैं, उन चित्रों से मतलब...करते रहते हैं, उन मतलबों से संवाद...और इन सबके बीच...बीतते रहते हैं हम..। वो बीतना किस बात के लिए...। मैंने सोचा कई दफे...पर कुछ समझ नहीं आया।....

हम कोई तस्वीर देखकर यूं मोहित क्यों हो जाते हैं।... हमारी चाहना क्यों जग जाती है, कि काश उस चित्र को हम बनाएं।...करें एक बार फिर से उस चित्र का निर्माण अपनी कूंचियों से।

हतप्रभ...विस्मित...

मैंने ऐसा महसूस किया है...कि जिस चित्र को मैंने देखा है...कुछ अर्से बाद वो चित्र सजीव होकर मेरे सामने आ जाती हैं..। और मैं विस्मित हो जाता हूं। उस चित्र से एक तरह का संवाद शुरू हो जाता है।

नहीं...अब मैं किसी भी चित्र के साथ कोई संवाद नहीं करूंगा। किसी भी चित्र को जानने की...उसे समझने की कोई कोशिश नहीं करूंगा। प्रण...हां, इसे मैं अपना प्रण ही मान रहा हूं। जब किसी चित्र की मानी हम समझ जाते हैं, तो एक गहरी सांस लेते हैं। फिर उसे चित्र को हम गंदला कर देते हैं। मैंने कई चित्रों को जिज्ञासा से देखा... उसे जानने की कोशिश की...और इस प्रक्रिया के खत्म होते होते...मैंने देखा...वो चित्र गंदला हो चुका है।

बाहर बहुत धूप है। गर्म हवा बह रही है। मैं अंदर घर में बैठा हुआ हूं...चित्र को मैं सामने देख सकता हूं। उसमें एक अलग किस्म का आकर्षण मैं महसूस कर रहा हूं।

मैंने उस चित्र को ढंक दिया है। नहीं, मुझे नहीं देखना कोई और चित्र। नहीं करना निर्माण...किसी और चित्र का। 

Friday, 25 May 2018

उदास रात

तस्वीर काफी पुरानी है।
उदास रात को जरा सी स्पाइसी बनाने के लिए
हमने पी ली 2 पैग शराब
जरा सी गुस्ताखी की...
और बना दिए तुम्हारे होठों पर एक लाल निशान
तुम कहो तो खुद को बिखेर दूं तुम पर....

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अभी मैं अपने अफसोसों को रख रहा हूं
कंप्यूटर टेबल के नीचे
जहां हर रात मैं लड़ता रहता हूं लड़ाई
और तुम्हें मेरी कसम मेरे महबूब
तुम तो वहां आना ही मत
कि बस एक यही काम तो बचा है मेरे पास

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फोन में हजारों तस्वीरें सोई हुई हैं
उनमें से जगाता हूं एक तस्वीर
अब तुम्हारी नींद इस वक्त टूट गई
तो इसमें मैं अपना कसूर नहीं मानता हूं

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सब कुछ तुम्हारे ही बारे में है
प्याले में भरी आधी कच्ची शराब
फ्रीज में रखा हुआ बर्फ के बारीक टुकड़े
प्लेट में रखा हुआ साबूत मिर्च
पंखे पर बैठा हुआ कबूतर
और मन में विचारों के हाथी और खरगोश

सबकुछ उसी के बारे में है...जो है ही नहीं।

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रात के चार बजे हैं। यहां गली के कुत्ते बहुत भौंकते हैं। मन गुस्से से भर जाता है। इनदिनों मैं गुस्सा बहुत करने लगा हूं। खैर जाने तो... मेरे गुस्से से कौन सा कुत्ते भौेंकना बंद कर देंगे।





Magical road


This night ... walking on this magical street, I wake up in the middle of a wild desire 
that if I could touch you by touching you
,

At three o'clock in the night. I am sitting in the chair ... watching the 'tukur-tukur' computer. There is nothing to do at this time. Not even for writing something. The same tired dialogue ... the same words ... the same things heard ... the same story heard. But I have something for you at the moment ... 


What is it, I will not tell you that. If you want you can bash me ... but, no ... I will not tell. In the day I lost 2200 rupees and ATM card. Then walked 5 kilometers, because the pocket was empty. But would you believe ... that even in the afternoon I was not feeling heat. However, I was frightened by sweat ... and the face has now turned black ... but I did not seem to heat. I was surprised at myself after coming home .... How did this happen to me ... Your thoughts hold me tight. The legs were moving fast on their own. Just like a tune, I was just going ahead ... it was going to grow .... Just ... car ... auto ... all were passing beside my side, but I was not feeling anything. Just looked at the feet ... and your name in the mind. I came to the house I Then lying on the bed for 2 hours. Maybe it was a little fever ... I was lying in the slopes ... eyes shut ... And your face in front of you .... When you used to take your tongue out a bit ... and I used to emulate your tongue a little bit while imitating you.

My life....
So the color of my wish is gray
That you see ...
And you do not know by touching in what color ....
So you do not go anywhere ...


Well ... I'm absolutely right ..... There was no ocean ... dried up. Some stones are left ... the sand is left ... I have left ... this is the night left ... you are left ... and this magical road is left.

जादुई सड़क

इस रात...इस जादुई सड़क पर चलते हुए
मन में उठती है एक जंगली कामना
कि बस तुम्हें छूने से अगर मैं पिघल पाता
तो हवा बनकर तुमसे लिपट जाता मैं।

रात के तीन बजे हैं। मैं कुर्सी पर बैठा...कंप्यूटर को टुकुर-टुकुर देख रहा हूं। इस वक्त करने के लिए कुछ नहीं है मेरे पास। कुछ लिखने के लिए भी नहीं। वही थके संवाद...वही बुझे शब्द...वही कही सुनी बातें...वही सुनी सुनाई कहानी। पर मेरे पास इस वक्त तुम्हारे लिए कुछ है...। 


क्या है, वो मैं तुम्हें नहीं बताऊंगा। तुम चाहो तो मुझे कोस सकती हो...लेकिन, नहीं...मैं नहीं बताऊंगा। दिन में मैंने 2200  रुपये और एटीएम कार्ड खो दिया। फिर 5 किलोमीटर तक पैदल चलता रहा, क्योंकि, जेब खाली हो चुका था। लेकिन क्या तुम यकीन करोगी...कि दोपहर के वक्त भी मुझे गर्मी नहीं लग रही थी। हालांकि, मैं पसीने से भींगा हुआ था...और चेहरा तो अब मेरा काला हो ही चुका है...पर मुझे गर्मी नहीं लग रही थी। मैं खुद हैरान हो गया था घर आने के बाद.... कि ऐसा कैसे हो गया मेरे साथ..। तुम्हारा ख्याल मुझे जकड़े रहा। पैर अपने आप तेज चल रहे थे। एक धुन की तरह मैं बस आगे बढ़ा जा रहा था... बढ़ा जा रहा था...। बस...कार...ऑटो... सब मेरे अगल बगल से गुजर रहे थे, मगर मुझे कुछ सूझ ही नहीं रहा था। बस पैरों के पास नजर थी..और मन में तुम्हारा नाम। घर तक आ गया मैं। फिर बिस्तर पर 2 घंटे तक लेटा रहा। थोड़ा बुखार हो गया था शायद..। मैं निढ़ाल लेटा हुआ था...आंखे बंद...और सामने तुम्हारा चेहरा...। जब तुम अपना जीभ थोड़ा सा बाहर निकालता थी...और मैं तुम्हारा नकल करते हुए अपना जीभ थोड़ा बाहर  निकाल लिया करता था।

मेरी जान....
इसलिए मेरी चाहत का रंग सलेटी है
कि तुम्हें देखूं....
और तुम्हें छूकर पता नहीं ढल जाऊं किस रंग में ...।
इसलिए तुम कहीं मत जाओ...


खैर...मैं बिल्कुल ठीक हूं....। कोई सागर था...सूख गया। कुछ पत्थर बचे हैं...रेत बची है...मैं बचा हूं...ये रात बची है...तुम बची हो... और ये जादुई सड़क बचा है।


Wednesday, 23 May 2018

देखो कज़ान ! चमत्कार हुआ है....

देखो कज़ान ! आज चमत्कार हुआ है....। सुबह हो गई है। एक बार फिर से। और मैंने इसे चमत्कार का नाम दिया है। असल में सुबह हर रोज होती है, इस लिए हम इसे चमत्कार मानना भूल जाते हैं। लेकिन ये एक किस्म का चमत्कार ही है।
अभी मुझे हल्का सा गुस्सा आ रहा है। और मेरा गुस्सा वैसा ही है, जैसे मैंने एक बार शेर को देखने के बाद गुस्सा किया था। शेर पिंजरे में बंद था, और मैं ठीक उसके सामने खड़ा था। पर वो मुझे ऐसे देख रहा था, जैसे मैं उसके सामने नहीं हूं। मैं एक पारदर्शी आदमी हूं। मैं गुस्से में भर उठा। शेर मुझे यूं दरकिनार कैसे कर सकता है ? मैं उस शेर के सामने जोर-जोर से चिल्लाने लगा। अजीब-अजीब हरकतें करना लगा, पर उसपर कोई फर्क नहीं पड़ा। बाद में मेरे दोस्त ने मुझे बताया, कि उस वक्त बिल्कुल मैं बंदरों जैसी हरकतें कर रहा था।

इस वक्त भी मैं वैसे ही गुस्से में हूं। घर में कोई नहीं है, और मैं निर्वात में चीख रहा हूं...चिल्ला रहा हूं, पर घर की दीवारों को...कंप्यूटर को...बिस्तर पर पड़ी सलवटों को...किचन में रखे गैस सिलेंडर को....कोई फर्क ही नहीं पड़ा रहा।

चिढ़....आईना देख रहा हूं।
कोफ्त....ऐसा मैं क्यों कर रहा हूं।
गुस्सा...लोग उधार ले लेते हैं, वक्त पर लौटाते नहीं
हंसी... अभी मार्केट गया था प्रिमिक्स कॉफी लाने। दुकानदार एक लंबे से फ्रीज पर लेटा हुआ था, और उसका एक दोस्त गल्ले पर बैठा था। मैंने उसे कॉफी के पैसे दिए । वह कॉफी के कई डिब्बों से मेरा कॉफी खोजने लगा। वो हर डिब्बा उठा रहा था, सिवाई उसके जो मैंने ऑर्डर किया था। मैं उसे इशारे से दिखा रहा था, कि वो डिब्बा लाओ, पर वो दाएं-बाएं...ऊपर नीचे उलझा हुआ था। मुझे जोर से हंसी आने लगी। फिर खुद दुकानदार उसे गालियां बकता हुआ उठा, और मुझे कॉफी का डिब्बा दिया।

मेरे चेहरे पर अभी भी मुस्कुराहट है। कुछ ही पल में कितना हम बदल जाते हैं। मुझे लगा, इसे लिख लेना चाहिए। कभी खाली दोपहर में फिर से इसे पढ़ लेंगे...कुछ देर मुस्कुरा लेंगे..। असल में ये चमत्कार ही है... ठीक वैसा ही चमत्कार...कि हम सांस लेते हैं।










कज़ान

मैं उस आदमी को सत सत धन्यवाद देना चाहता हूं, जिसमे प्रेम का आविष्कार किया होगा।

ओह....मैं कितनी देर इस कुर्सी पर बैठा रहूं। कितनी देर खुद को कोसता रहूं। कितनी देर अपना चेहरा आईने में देखता रहूं। उस आदमी से बैर सा होने लगा है, जिसे आईना देखना बहुत पसंद था। क्या मैं यहा लिख दूं, कि मुझे तुम्हें एक बार देखने को मन कर रहा है ? क्या इतना भर कर देने से मैं चैन से सो पाऊंगा ?  या फिर मैं एक बार फिर से तुम्हारी आवाज सुन लूं...और तुम्हें एक बार बुड़बक कह दूं...तो मुझे नींद आ जाएगी ? एकांत के अरण्य में मैं कब तक भटकता रहूं। क्या बस खुद को कोस भर लेने से शांति मिल जाती है ?

नहीं मेरे सारे सवाल व्यर्थ के हैं।

इस बीच मुझे एक नाम मिला है।.. कज़ान..। ये नाम मैंने तुम्हारा रखा है। मैंने अपने उपन्यास के लीडिंग फीमेल कैरेक्टर का नाम कज़ान रख दिया है। मेरे एक दोस्त ने इस नाम को डायरी में लिखा देखा... उसने कहा... बहुत प्यारा नाम है। मैंने कहा...ये उसका नाम है। फिर वो कई सवाल करने लगा, पर मैंने उसकी सवालों का कोई जवाब नहीं दिया।

क्या तुम्हें पता चला, कि मैंने तुम्हारा नाम कज़ान रखा है ?

अभी मोबाइल पर एक मैसेज आया। मैंने फौरन उठाकर देखा...लगा, कहीं तुम मेरी बात सुन तो नहीं रही। और कहीं तुमने मुझे कोई संदेश तो नहीं भेजा है। किसी कंपनी का कोई मैसेज था। मैंने वापस मोबाइल रख दिया है।

मैं अभी कुछ लिख नहीं पा रहा हूं। अभी मुझे शराब की जरूरत महसूस हो रही है। सारे शब्द गर्दन के पास कहीं फंसे से हैं। इस समय उंगलियों से बेचैनी टपक जाना चाहिए था, पर ऐसा कुछ नहीं हो पा रहा है। कहीं ये तुम्हारा कोई शाप नहीं ? 

अधूरी कहानी...

रात के करीब 3 बजने वाले हैं...और मेरा मन तुम्हें एक कहानी सुनाने का कर रहा है। कोई भी कहानी नहीं... एक प्यार वाली झूठी कहानी। जिसके अंत में प्रेमी-प्रेमिका मिल जाते हैं। मैं सच्ची कहानी सुनाकर तुम्हें रूलाना नहीं चाहता। या फिर एक राजा और एक राक्षस की कहानी। और मैं अंत में उस राक्षस को मरने ना दूं। उसे ज़िंदा रखूं, ताकि, अगली बार वो कहानी मैं वहीं से शुरू कर सकूं।

वो बिस्तर पर लेटा हुआ मोबाइल में कुछ से कुछ कर रहा था। तभी उसे एक सोशल नेटवर्क पर एक लड़की की तस्वीर दिखाई दी। उसका चेहरा देखते ही...वो सम्मोहन से भर गया। वो नज़र नहीं हटा पा रहा था। वो उस लड़की को बार-बार देखता रहा। कुछ चाहनाएं जगीं...कुछ सपने जगे...। वो रात भर जगा रहा...एक कविता गढ़ने की कोशिश करता रहा...। और अंत में वो एक कविता लिखने में सफल भी रहा। वो किसी के मार्फत कविता उस लड़की तक पहुंचाने में सफल भी रहा......।

नहीं...इससे ज्यादा मैं ये कहानी नहीं लिख सकता। ये एक बेहद खूबसूरत कहानी है...जिसे मैंने बाद में बहुत खराब कर दिया। इसलिए नहीं...अब मैं ये कहानी नहीं लिख सकता।

लौट आओ सजना...मेरा दिल पुकारे रे...। मेरा मन अभी ये गीत गाने का कर रहा है।



ओ साथी मेरे..

ओ साथी मेरे.. हाथों में तेरे..  
हाथों की अब गिरहा दी ऐसे  
की टूटे ये कभी ना

चल ना कहीं सपनों के गाँव रे  
छूटे ना फिर भी धरती से पाऊं रे  
आग और पानी से फिर लिख वो वादे सारे  
साथ ही में रोए हंसे, संग धुप छाओं रे  
आग और पानी से फिर लिख वो वादे सारे  
साथ ही में रोए हंसे, संग धुप छाओं रे 

ओ साथी मेरे.. हाथों में तेरे..  
हाथों की अब गिरहा दी ऐसे  की टूटे ये कभी ना  
हम जो बिखरे कभी 
तुमसे जो हम उधड़े कहीं  
बुन ले ना फिर से हर धागा  
हम तो अधूरे यहां  
तुम भी मगर पूरे कहाँ
करले अधूरेपन को हम आधा  
जो अभी हमारा हो मीठा हो या खारा हो आओ ना कर ले हम सब साझा 

ओ साथी मेरे.. हाथों में तेरे  
हाथों की अब गिरहा दी ऐसे  की टूटे ये कभी ना  
गहरी अँधेरी या उजले सवेरे हों  
ये सारे तो हैं तुम से ही  
आँख में तेरी मेरी उतरे इक साथ ही  
दिन हो पतझर के रातें या फूलों के  
कितना भी हम रूठे पर बात करें साथी  
मौसम मौसम यूँही साथ चलेंगे हम  
लम्बी इन राहों में या फूँक के पाहों से  
रखेंगे पाऊँ पे तेरे मरहम

आओ मिले हम इस तरह  
आए ना कभी विरह 
हम से मैं ना हो रिहा  
हमदम तुम ही हो हरदम तुम ही हो अब है यही दुआ 

चल ना कहीं सपनों के गाँव रे  
छूटे ना फिर भी धरती से पाऊं रे  
आग और पानी से फिर लिख वो वादे सारे  
साथ ही में रोए हंसे, संग धुप छाओं रे  
आग और पानी से फिर लिख वो वादे सारे  
साथ ही में रोए हंसे, संग धुप छाओं रे  

ओ साथी मेरे.. 
हाथों में तेरे  हाथों की अब गिरहा दी ऐसे  
की टूटे ये कभी ना

Monday, 21 May 2018

कहां कुछ बचता है

बाहर तेज गर्म हवा चल रही है... घर में तीन कबूतर पंखे पर बैठे हुए हैं। साया किसे पसंद नहीं होता, गर्मी के दिनों में। कबूतरों का गर्दन स्थिर है। बिल्कुल शांत। मेरी तरह। ऐसा लग रहा है, ये कबूतर किसी फैसले पर पहुंचना चाहते हैं।

भूत वाले वाकये के बाद घर से हर दोपहर कई फोन आने लगे थे..। मां और पापा...बारी बारी से फोन कर मेरा हाल पूछते रहते थे...। पर आज कोई फोन नहीं आया। फोन बगल में रखा हुआ है। मैं बार-बार फोन देख लेता हूं, कि कहीं साइलेंट मोड पर तो नहीं है।

वक्त सब कुछ बिसार देता है। शायद पापा भी भूल गये होंगे..मां को भी याद नहीं रहा होगा, कि दोपहर के वक्त मैं घर में बिल्कुल अकेला होता हूं। और अपने कमरे में ही होता हूं। तो क्या मैं इस वक्त कह सकता हूं, कि सब ठीक हो जाता है। लोग सब बात भूलने लगते हैं...या फिर वक्त के कंधे पर धरकर शांत हो जाते हैं। ''जो होना होता है, होकर रहता है'' जैसी बातों पर यकीन कर लेते हैं।

कुछ देर पहले कंप्यूटर पर '' मैं जिस दिन भुल दूं, तेरा प्यार दिल से...वो दिन आखिरी हो मेरी ज़िंदगी का'' ये गीत चल रहा था। गीत सुनकर मैं हंसने लगा। .....कहां होता है ऐसा। देखो कज़ान, मैं ज़िंदा हूं। सालों के प्यार की बातों के बात भी ज़िंदा हूं। असल में मैं अब मानने लगा हूं, कि शपथ टाइप कोई बात होती ही नहीं। वादें बस मुंह से निकला हवा है, जो बस सुनाई देता है, उसका कोई आकार नहीं होता है।


थोड़ी सी रात बची होती
थोड़ी सी बात बची होती
थोड़े दिन बचे होते
तुम्हारा साथ बचा होता

कहां कुछ बचता है...सब खत्म ही तो हो जाता है। खत्म होना ही शाश्वत है...अटल है। हम तो बस खत्म के साथ चलते चलते...कहीं...किसी रोज...किसी खाई में गिर जाते हैं...और फिर वहां से कभी निकल नहीं पाते।

कज़ान

देर रात सपने में तुम थी...और मैं तुम्हें कज़ान नाम से पुकार रहा था। तुम्हें इस नाम के मानी नहीं पता थे, पर तुम्हें अच्छा लग रहा था। तुमने मुझसे पूछा, क्या होता है इस नाम का मतलब। मैंने तुम्हें इस नाम के मानी नहीं बताया। और तुम मुझे मुक्का मारने लगी। तुम थोड़ी चिढ़ रही थी और मुझे तुम्हारा यूं चिढ़ना अच्छा लग रहा था...

मैं चाह रहा था, कभी चुुपके से तुम्हारे कान में ये नाम कहूं। मैं कहूं, सुनो, मैंने तुम्हारा नाम कज़ान रखा है। पर इस नाम के मानी नहीं बताऊं।....पर ऐसा हो नहीं पाया। ये नाम जितना दूर रहा मुझसे, उतना ही दूर तुम मुझसे रही।

दोपहर का वक्त है। मैं अकसर पराठे वाले को फोन पर 2 पराठे ऑर्डर कर दिया करता था। कहता था, भैया मैं ठीक एक बजे आऊंगा, आप पराठे तैयार रखना। मुझे इंतजार करना अच्छा नहीं लगता बाहर...इसलिए मैं तय वक्त पर जाकर उससे पराठे ले आता था। एक बार ऑर्डर देने के बाद मैं पराठे लेने नहीं गया। आज जब फोन किया, तो उसने कहा...सर, पक्का आओगे ना ? मैंने हंसते हुए कहा...हां भैया, पक्का आऊंगा पराठे लेने। वो मान गया था। लेकिन, मैं सोच में पड़ गया। कितनी पतली होती है विश्वास की रेखा...। कितनी जल्दी टूट जाती है विश्वास की रेखा...। बस एक दिन नहीं गया पराठे लेने, तो पराठे वाला का यकीन टूट गया....और मैंने तो तुम्हारा यकीन पूरी तरह से तोड़ चुका था।.... फिर भी तुम्हें मेरे ऊपर यकीन था। खुद को कितना धिक्कारूं... कितना कोसूं...कितना खुद को खरी-खोटी सुनाऊं....जो कहीं दो पलों के लिए चैन मिल जाए। माफ करने वाला माफ कर देता है...पर जिसे माफ कर दिया गया होता है, वो जलता रहता है... जलता रहता है... जलता रहता है। मेरा जलने का वक्त है...

साथी ये जलना कबूल
ये पिघलना कबूल...
इस तरह जगना...फिर उठना कबूल
ये सजा...ये शाप...वो दुआ कबूल
साथी कैसे कहूं...तू मुझे कबूल .....?

कज़ान....साथी मैंने आज के सपने में तुम्हारा ये नाम रखा है।

Sunday, 20 May 2018

देर रात...

कोई सपना देख लूं...कोई गीत गुनगुना लूं...तुम्हें अपना बना लूं...। जैसे विचारों के बहुत से हाथी... खरगोश... और कबूतर मेरे विचारों में आ रहे हैं...और मुझे लग रहा है, कि मैं एक डंडे से...उन विचारों को हांक कर... कहीं किसी जंगल में छोड़ दूं। पर मैं खुद को बेबस पाता हूं।... बहुत बेबस..। झूठ बोलते हुए । अगर कोई मुझसे इसकी वजह पूछे...तो मैं हंसकर झूठ बोल दूंगा...। और मैं ऐसा ही करता हूं। झूठ बोल देता हूं। मुझे लगता है, कि इन दिनों झूठ मेरा सबसे अच्छा दोस्त हो गया है। हर सवाल पर मैं झूठ को आगे कर देता हूं। झूठ के पर्दे के पीछे खुद को छुपा लेता हूं। सच... कांटे की तरह चुभने लगता है, तो मैं अपने पैर आगे बढ़ा देता हूं।

किन हालातों से मैं गुजर रहा हूं.. ? खुद को किस तरफ ले जा रहा हूं मैं, जबकि मैं ये जानता हूं, कि उस तरफ हाथी, खरगोश और कबूतर नहीं रहते...उधर कुछ बाघ रहते हैं, जो मुझे घायल कर देंगे, या हो सकता है, मुझे मार ही दें, पर मैं भागा जा रहा हूं, बगैर किसी को दोष दिए।


असल में मैंने बहुत दुःखी किया है तुम्हें। तुमने खुद को मेरा अंग माना, एक हिस्सा माना...और मैंने......

बस, देर रात की इतनी ही बात है।

बेवफा की डायरी-- 2

आज दिन भर की खामोशी के बाद देर रात मुझे पता चला...कि मैं बहुत दिनों बात तुम्हारे पास लौटा हूं। मुझे लगा, कि मुझे इस बात को लिख लेना चाहिए। और मैं लिखने बैठ चुका हूं। उस आदमी से बैर सा होने लगा है, जो हर वक्त लिखना ..... बस लिखना चाहता था। मैंने कई बार सोचा...कि किसी तरह उसे मना लूं... किसी तरह उससे सुलह कर लूं...पर ऐसा हो नहीं पाया। लंबे अर्से के बाद कुछ लिखने बैठा हूं। नशे में हूं। बताने की जरूरत नहीं...कि पश्चाताप कर रहा हूं। ऐसा लग रहा है, कि रेगिस्तान में भटक रहा हूं...पानी की तलाश में हूं....या फिर कीकर का कांटा पैरों में चुभा हुआ है...और मैं मुंह बंद अंदर ही अंदर चिल्ला रहा हूं।

जो मैंने किया हुआ है...उसे मैंने गुनाह नाम दिया हुआ है।...और मैं हर वक्त उसके साथ रहता हूं। माफी की आकांक्षा भी नहीं है...पर कुछ ऐसा है...जो अंदर फंसा हुआ है...जो निकल जाए, तो मैं राहत की सांस लूं। मैं कितना खुश हो जाया करता था, तुम्हारी हंसी देखकर...तुम्हारी आंखों की मिलमिलाहट देखकर...पर अब मेरे पास बचा क्या है।.. तुमने अपना एक अंग मुझे समझ लिया था, ये मुझे तब पता चला, जब मैं गलतियां कर चुका था...मैं बहुत गुस्सा हुआ...कि तुम्हें पहले बताना चाहिए था...लेकिन वो तो मुझे खुद समझ लेना चाहिए था....तुमसे सुनने की अभिलाशा बेकार की बात हुई ना। ओह......

मुंह से पतली सी आह निकलती है...और रात के सन्नाटे में गुम हो जाती है। किससे कहूं, अपनी बेवफाई के किस्से... कहा रो लूं...कहां बहा लूं इन बहते हुआ आंसुओं को....कि इसका कतरा नहीं देख पाए कोई....कि नहीं उठा पाए कोई सवाल...ना मैं दे पाऊं जवाब...जबकि, मैं जानता हूं...तुमने मुझे माफ कर दिया है।... शायद मेरा दिल रखने के लिए ही....शायद, मुझसे प्रेम करने के लिए वास्ते ही....और मैंने क्या किया..........

इन दिनों मैं खूब सपने देखता हूं...हर सपने के बाद बहुत डर जाता हूं...डर इतना...कि सोते हुए मुंह से डर भरी आवाज निकलती है...और उठ जाता हूं..। कुछ देर खुद को आईने में देखता रहता हूं। आईने में उस निरीह इंसान को देखता हूं..जिसने कहा था...सुनो...तुम आंखे मिलमिलाती हो, तो बहुत अच्छी लगती हो...प्लीज एक बार और आंखे मिलमिलाओ ना...और तुम खुश होकर मेरी बातें मान लिया करती थीं। कहां से लाऊं इतनी मासूमियत.. कहां से लाऊं वो वाला प्यार...कहां से लाऊं तुम्हारे वो वाले जज्बात...वो निश्छल हंसी...लो निस्वार्थ प्रेम.... आह....

जो चोट खाता है, उसका दर्द सब देखते हैं...और जो चोट देता है, वो खामोश मौत मरते रहता है...मरते रहता है.. मरते रहता है।.....

Friday, 18 May 2018

भूत होते हैं...

जब आप किसी समस्या से घिरे हों...और आपके बेहद नजदीक लोगों को उस समस्या के बारे में पता हो, तो अपने आपको बेवजह फोन करते रहते हैं। बिना बात के फोन करते हैं। और फिजूल की बातें करने लग जाते हैं। आप खिन्न होते हैं...असल, में आपके अपने बस ये जानना चाहते हैं, कि आप ठीक हैं या नहीं। आप किसी परेशानी में तो नहीं हैं। बस, इतना ही जानना चाहते हैं वो।

love you all....


कर्नाटक चुनाव के परिणाम आ रहे थे। सुबह काफी पहले उठ गया था। टीवी ऑन कर न्यूज देखने लगा। अंबेश ने चाय पिलाई। फिर मेड खाना बनाने लगी।...सुबह के करीब 10 बज गये थे। मेड खाना बनाकर चली गई थी। अंबेश भी ऑफिस चला गया था। मैं अब भी टीवी पर रिजल्ट देख रहा था। वक्त बीत रहा था । और दिन के 11 बज गये। मैं कुछ देर सो गया। दोपहर 12 बजे मैं सोकर उठ गया। और खाना खाने लगा। खाना खाने के बाद मैं वापस अपने बिस्तर पर था। सोचा, ऑफिस जाने से पहले कुछ देर सो लूं। मैं बिस्तर पर लेटे हुए मोबाइल पर कुछ तस्वीरों को निहारने लगा। और मेरी आंखे झपकने लगीं। तभी मैं महसूस करता हूं, कि मेरी पीठ पर बहुत ठंढी हवा लग रही है। मैंने सोचा, शायद दिल्ली में मौसम ने करवट बदली हो। अचानक, मैं महसूस करता हूं, कि किसी ने मेरे दोनों कंधे को जोर से पकड़ लिया हो। मैं पलटकर देखना चाहता था, कि किसने मुझे पकड़ा है। लेकिन, मैं पलट नहीं पा रहा था। मेरा पूरा शरीर...पत्थर की तरह सख्त हो चुका था। मैं महसूस कर पा रहा था, कि एक लड़की ने मुझे पीछे से मेरे कंधों को जोर से पकड़ लिया है। मैं उसकी गिरफ्त से छूटना चाह रहा था, पर खुद को छुड़ा नहीं पा रहा था। अचानक पीछे से आवाज आई....मैं तुम्हें छोड़ूंगी नहीं। तबतक मैं समझ चुका था, कि मुझे भूत ने पकड़ लिया है।

अभी ये लिखते वक्त...मेरे रोएं खड़े हो गये हैं, लेकिन, आप यकीन मानिए, उस वक्त मैं बिल्कुल भी डरा नहीं था। अमूमन लोग इस परिस्थिति में चिल्लाना शुरू कर देते हैं। लेकिन, मैंने धीरे से मोबाइल उठाया। सोचा, अबेश को फोन करूं। अगर कुछ बोल भी ना पाऊं, तो कम से कम चिल्ला तो दूं ही। जैसे ही मैने मोबाइल उठाया, लड़की की फिर से आवाज आई, अच्छा, मोबाइल से फोन करोगे। मोबाइल ऑन नहीं हो रहा था। ऐसा लग रहा था, मोबाइल स्वीच ऑफ हो गया हो। मैं समझ गया, कि मोबाइल काम नहीं करने वाला। अब तक वो कुछ और बोल चुकी थी, लेकिन, वो मुझे याद नहीं। मैंने जय मां दूर्गा...जय मां दूर्गा बोलना शुरू किया। जिसे सुनकर वो बोलती है, अच्छा, अब भगवान को बुलाओगे। मैं डरा अब भी नहीं था, लेकिन, मेरा खुद पर वश नहीं चल रहा था। अब मैंने जोर-जोर से जय हनुमान जी...जय हनुमान जी बोलना शुरू कर दिया।.. शायद, 1 मिनट और बीते होंगे..कि मैंने महसूस किया, कि उसके हाथों का दवाब कम हो रहा है। फिर मैंने पूरी ताकत के साथ दीवाल पर पैर टिकाया, और एक झटके से उठ गया। पीछे पलटकर देखा...तो कोई नहीं था। मैं अपने कमरे से निकलकर भगवान जी वाले कमरे में आ गया।

करीब 10 मिनट बाद मैं वापस कमरे में गया...तो मैं अच्छी तरह महसूस कर पा रहा था, कि वो अभी भी कुर्सी पर बैठी हुई है। मैं वापस भगवान जी वाले कमरे में चला गया। कुछ देर बाद वो जा चुकी थी। दिन के ठीक 12 बजकर 35 मिनट पर उस लड़की के भूत ने मुझे पकड़ा था।


मैं भूतों पर यकीन करता था...लेकिन, मुझे ये नहीं पता था, कि वो मेरे ऊपर भी हावी हो जाएगी। मैं डरा इसलिए नहीं...क्योंकि, मैंने भूतों को लेकर कई सारे शोज बनाए हैं। लास्ट वाले शो में पैरा नॉर्मल एक्सपर्ट राज से मिला। राज से भूतों को लेकर कई तरह की बातें हुईं।..और राज ने कहा था, कि सर, भूत आपको कुछ नहीं कर सकते, बस आप डरिएगा नहीं। जब उस लड़की की भूत ने मुझे पकड़ रखा था, उस वक्त मुझे राज की बातें याद आ रही थीं, और इसलिए मैं बिल्कुल भी डरा नहीं। हां, 2 बातें पक्की तौर पर मैं जान गया...भले आप यकीन करें, या ना करें...कि पहला...भूत होते हैं...और दूसरी बात...कि भगवान भी होते हैं...जो भूतों से बहुत ज्यादा शक्तिशाली हैं। मैं बिल्कुल ठीक हूं।...स्वस्थ हूं...हां, घर पर बताने के बाद से मां और पापा बहुत टेंशन में हैं। बार बार फोन कर हाल पूछते रहते हैं। अंबेश और राजन लगातार फोन करते रहते हैं। मेरी खैरियत पूछते रहते हैं। मैं उन्हें कहता हूं...dont worry.... मैं बिल्कुल ठीक हूं। भूतनी ही तो थी...पकड़ ली...तो पकड़ ली..। क्या हो गया।....








Tuesday, 1 May 2018

बेवफा की डायरी-1

गीत गाता हूं मैं ..गुनगुनाता हूं मैं...मैंने हंसने का वादा किया था कभी...इसलिए अब सदा मुस्कुराता हूं मैं।.... रात के ठीक 12 बज रहे हैं..और मैं ये गाना सुन रहा हूं। अच्छा लग रहा है..। पर जब भी ....मैंने हंसने का वादा किया था कभी...इसलिए अब सदा मुस्कुराता हूं मैं...ये लाइन आ रहा है, मेरा मन चुप हो जाता है। उसने हंसने का वादा किया था...इसलिए मन में एक कचोट सा उठता है...। खुद को कोसने का मन करता है...। दौड़ पड़ने का मन करता है...जैसे दौड़कर कुछ उठा लूं... सब कुछ समेट कर रख दूं कहीं..। फिर शायद इत्मिनान मिले..। पर कहां भागूं...कहां दौड़ूं...। पैर थोड़े आगे बढ़ते हैं..और वहीं रूक जाते हैं...। आप अपनी करनी पर असीम वेदना से गुजरने लगते हैं..।

हम कहते हैं, कि सब ठीक हो जाएगा..। पर कहां हो पाता है सब ठीक। अधूरेपन को पूर्णता की निशानी मान लेते हैं...पर अधूरापन आखिर में मन के सन्नाटे में तब्दील हो जाता है..। मन मेरा मानता है, कि मैं गुनहगार हूं..। कभी हंसता हूं...तो फरेब की एक रेख होठों पर बन जाती है। मन समझ लेता है...पर मन के पास कोई इलाज नहीं है।.... मन फिर से मुझे कोसने लगता है। एक गलत कदम कितना कुछ बदल कर रख देता है। बहुत कुछ खत्म कर देता है...। मैंने भी बहुत कुछ खत्म कर दिया है..। काफी लंबे अर्से से कुछ लिख नहीं पा रहा हूं। वो लिखने वाला कोई और था...जो अब बैरी हो चुका है... । वो मुझे कहता है, तुम एक निकृष्ट इंसान निकले..। अब मैं तुम्हें शब्द नहीं दूंगा। मैं कई बार चाहता हूं, उससे सुलह कर लूं...पर हर बार वो मुंह फेरकर आगे निकल जाता है। मैं अफसोस लिए वहीं खड़ा रह जाता हूं।

कितने महान लोग थे...जिन्होंने मेरी बातों पर विश्वास किया..। कितने महान लोग हैं, जिन्होंने मुझे क्षमा दिया..। और कैसा मैं हू्ं, कि बस क्षमा याचणा ही करता रह गया।... शाप मिले...शाप स्वीकार किया...। मैं किसी भी तरह से भाग जाना चाहता हूं खुद से।... असल में मैं अब खुद को बेहद नापसंद करने लगा हूं।

रात के साढ़े बारह बज रहे हैं। मैं अपनी गलतियां लिख देना चाहता हूं। हाथ के मैल धो देना चाहता हूं। पर कुछ नहीं कर पा रहा हूं। अलग अलग बहाने कर खुद से भाग जाता हूं। आह...मुंह से अब बस यही शब्द निलकते हैं। पश्चाताप की अग्नि में जलना भी आसान नहीं होता है। मैं आजकल पश्चाताप की अग्नि में ही जल रहा हूं।...और शायद ताउम्र जलता रहूंगा।.. साथी तुम सुखी रहना।...

Monday, 26 March 2018

तुम लौट कर मत आना....

यादों की कुंडली में सेंधमारी करके उन्हें तोड़ देने की कला अभी तक नहीं सीख पाया। कच्ची शराब देर तक पीता रहा...सुबह खुद का मुंह आईने में देख लिया। मैं काला दिख रहा था। अपने चेहरे को देखकर मैं खुश हो गया। कालापन मुझे पसंद था। उसकी आंखें भी इसी तरह काली थीं। बड़ी-बड़ी। मुझे हंसी आने लगी। मैं कुछ-कुछ उससा दिखने लगा था। पर खुद को मैं ऐसा देखना नहीं चाहता था। बाथरूम में खुद का चेहरा साफ करने लगा। साबुन से धोया...पर कालापन नहीं गया। फिर आईने के सामने था। मन ने कहा...चेहरा सूख गया है। मैं फिर से नल की तरफ बढ़ने लगा। पर फिसल गया। पैरों में चोट लगी। मुंह से आह निकली...पर चीख कहीं विलिन हो गई। मैं पैर पकड़कर बैठ गया। काफी देर तक बैठा रहा। फिर हंसने लगा। वापस बिस्तर पर आ गया। मोबाइल उठाया....पर वो बंद हो चुका था। मुझे लगा, इस दर्द को लिख लेना चाहिए। कभी-कभी दर्द हमारी जिंदगी में बेहद उपयोगी हो जाते हैं। ऐसे दर्द को लिख लेने से वो सुरक्षित भी हो जाते हैं। हमने दर्द को सुरक्षित करने की सोची....पर अपना चेहरा बार-बार अपनी ही आंखों के सामने आ रहा था। मुझे लग रहा था, किसी ने फरेब की कालिख मेरे मुंह पर पोत दिया हो। पर, मेरे ऊपर इसका कोई असर नहीं हो रहा था। उसने कहा था...तुम गिर चुके हो। मैंने माफी मांग ली। उसने कुछ शाप दिए। मैं मुस्कुराता रहा। मुझे लगा...शायद, उसके चश्मे से शाप निकलकर मेरे मुंह पर फैल गया है। पर इस कालेपन से अचानक मैं प्यार करने लगा था। मैंने उससे भी प्यार किया था...पर ये प्यार उसे तोड़ गया। मैंने उसे तोड़ दिया।
हाहाहाहा...पता नहीं मैं अब भी किस बात पर हंस रहा था। ऐसा होता है...रेगिस्तान के रेत के नीचे की नमी दिखती नहीं। दिल तो रोता रहता है...पर आंसू दिखते नहीं। तुमने अच्छा ही किया मुझसे नाता तोड़ के...कि मेरे पास नहीं था फेवीकॉल..तुम्हारें टूटे दिल को दुरूस्त करने के लिए।

Friday, 9 February 2018

इन दिनों मैं लड़ रहा हूं...

इन दिनों मैं लड़ रहा हूं। ये लड़ाई मेरी खुद से ही है। और सबसे खास बात ये है...कि इस लड़ाई में लगातार मैं हार रहा हूं। मुझे लगता है...कि मैं अपने शरीर में बुरी तरह से कैद हो चुका हूं। मैं अंदर से लात मारकर...हाथ मारकर अपने शरीर से निकलना चाहता हूं...पर उस कैद से बाहर निकल नहीं पा रहा हूं। ये लड़ाई अब इस स्तर तक पहुंच चुकी है...कि मैं किसी से ना तो ठीक से बात कर पा रहा हूं, और ना ही...इस तिलिस्म को तोड़ पा रहा हूं। मुझे लग रहा है, कि कुछ ऐसा कर दूं...कि मैं इन सबसे आजाद हो जाऊं। लेकिन, फिर मैं सोचता हूं, कि मैं किस चीज का गुलाम हूं। वो कौन सी चीज है, जिसने मुझे जकड़ रखा है। पर मैं उस चीज को जान नहीं पाता। लाख कोशिश करने पर भी हासिल कुछ नहीं हो पा रहा है। दुनिया के सभी नॉर्मल लोग मुझे अजीब लग रहे हैं। उनका हंसना मुझे फर्जी लग रहा है। उनकी हरकतें मुझे बनावटी लग रही हैं।

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कम मैं अपने एक मित्र के साथ बातें कर रहा था। कुछ देर बात करने के बाद वो मेरी लड़ाई वाली स्थिति जान गये। उन्होंने मुझसे कहा...अभिजात, आदमी अगर दिल से सोचता है, तो फिर वो कहीं नहीं जा पाता है, और अगर वो दिमाग से सोचता है, तो फिर वो अनंत तक का सफर तय कर सकता है। ऐसे में आपको तय करना है, कि आपको कहां तक जाना है। उन्होंने कहा...ये दिल क्या होता है...घंटा। शरीर के अन्य अंगों की तरह ही एक अंग। जिसका काम बस...धड़कना है। धमनियों में खून की सप्लाई करना है। इससे ज्यादा दिल का काम कुछ नहीं है। हां, इसे इतनी खूबसूरत से बनाया गया है, कि इसे देखकर हम मोहित हो जाते हैं, और अपना किया धरा... सब इस कमबख्त दिल के नाम कर देते हैं। असल चीज, दिमाग है। जो हमें कंट्रोल करता है। हम दिमाग के कहे मुताबिक ही करते हैं। उसके इतर कुछ नहीं। हमें लगता है, कि फैसला हमने छाती के अंदर रखे दिल के कहने पर लिया है, पर ये सिर्फ हमारा वहम है, और कुछ नहीं। सारे फैसले दिमाग के होते हैं। हां, हमारा दिमाग अकसर कनफ्यूज कर देता है हमें। क्योंकि....हम एक साथ कई चीजें चुनना चाहते हैं।...

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अगर मैं उनके दिल और दिमाग वाली थ्योरी पर बात करूं, तो मेरे मन में कई प्रश्न उठ गये हैं। जब हम दिमाग के फैसले पर ही अमल करते हैं, तो फिर हम कौन हैं। दिमाग किसे इंस्ट्रक्शन देता रहता है। दिमाग किसे संदेश भेजता है। कोई फैसला लेने के लिए 'हमें' कहता है। ये '' हम '' कौन है ? इस सवाल ने मुझे विचलित कर दिया । क्योंकि...मैं सोचता हूं...कि हमारे पास दो मन हैं..। एक दिमाग है। एक दिल है। और...सबसे पड़े...एक आत्मा है।और सबका काम अलग अलग निर्धारित किया गया है। इन सबके साथ...एक चीज और होता है..। बिल्कुल अलग ऑब्जेक्ट। और वो जो एक अलग ऑब्जेक्ट है, वो हम हैं। जो मन, दिल, दिमाग और आत्मा का कहा सुना मानते हैं। करते हैं। किसी एक सिचुएशन को...ये दिल, दिमाग...मन और आत्मा...अलग अलग तरीके से परखता है, और अलग अलग फैसला सुनाता है। और हम...ऑब्जेक्ट...को सलेक्ट करना पड़ता है, कि हमें कौन सा...और किसका फैसला मानना है। और कौन से फैसले को खारिज करना है।

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Thursday, 8 February 2018

रिश्ते...लंबी जिंदगी में बस किसी फ्रेम की तरह होते हैं।....

पिछले कई दिनों से मैं अलग-अलग रिश्तों के बारे में सोच रहा था। हर तरह के रिश्तों के बारे में। और सोचते-सोचते मैं दुखी हुआ जाता हूं। वो कौन सी गर्माहट है, जिससे रिश्ते मुकम्मल होते हैं। और वो कौन सा पल होता है, जिससे रिश्ते खत्म हो जाते हैं। मैं यहां, उन रिश्तों के बारे में बात कर रहा हूं, जो खत्म हो जाता है...जिसे खत्म कर दिया जाता है।....
मैंने अपने जीवन में अब तक...3 हजार से ज्यादा क्राइम की स्टोरीज पर काम किया है। और किसी के जीवन में 3 हजार उदाहरण कम नहीं होते। मैंने देखा है...बाप को...अपने इकलौते बेटे का मर्डर करते हुए।...मैंने देखा है...मां को...अपने बेटे को जहर देकर मारते हुए। मैंने देखा है पत्नी को...अपने पति और बच्चों की हत्या करते हुए। मैंने देखा है उस शख्स को... जो एक कुल्हाड़ी उठाता है...और पूरे परिवार को काट डालता है। मैंने देखा है...उस बाप को... जो अपनी बेटी को सरेआम...केरोसिन डालकर जिंदा जला देता है।..और मैंने उस बेटी को भी देखा है...जो खाने में जहर मिलाकर अपने पूरे परिवार को खत्म कर देती है, ताकि वो अपने प्रेमी के साथ सुकून से रह सके। इतने सारे रिश्तों का कत्ल...मैं सोचता हूं, तो घबरा जाता हूं। हर किसी ने हर किसी का कत्ल किया है...और हर किसी ने मिलकर विश्वास का कत्ल किया है। मैंने देखा है...6 महीने की बच्ची से लेकर 80 साल की महिला तक से बलात्कार करने वालों को...। बस ये समझ लीजिए...हर तरह की बुराई...और हर तरह के बुरे इंसान को मैंने देख लिया है।...
अब आप कह सकते हैं, कि दुनिया बहुत अच्छी है...और बुरे आदमी कहां नहीं रहते।.. मैं भी अपने आप को यही कहता हूं।...मगर, यहां से मेरी ख्वाहिशें खत्म होने लगती हैं...और मैं अपने लिए एक काल्पनिक दुनिया बना लेता हूं। दूसरा विकल्प हो भी क्या सकता है ? जो दलील आप मुझे दे सकते हैं, हर उस दलील को मैं जानता हूं। मैंने इसपर अब बहस भी करना छोड़ दिया है..कि दुनिया खराब है या हसीन...। अब किसी भी तरह की विभत्सता मुझे विचलित नहीं करती। हां, मैं डरने लगा हूं...। एक अजीब सी लहर उठती रहती है।... और आंसू तो जैसे सूख चुके हैं मेरे अंदर के।... किसी चीज की फिक्र नहीं होती मुझे।
हां...कुछ होना चाहिए आपके पास...जिसके सहारे आप जिंदा रह सकें।...तो मेरे पास दो चीजें हैं.. जिनके सहारे मैं जिंदा हूं..। एक मुझे लिखना सबसे प्रिय है..। और मैं भरपूर लिखता हूं।... और दूसरी पापा का दिया गीता उपदेश...। उन्होंने मुझसे एक बार कहा था... सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ।
बस...जिंदा रहने के लिए दो ही चीजें हैं मेरे पास।....

Monday, 5 February 2018

तुम मेरे लिए रसगुल्ला हो...

तुम मेरे लिए रसगुल्ले की तरह हो। सबसे प्रिय। जब मैं खाना खाता हूं, तो रसगुल्ला प्लेट में साइड में पड़ा रहता है। उस वक्त मैं बाकी चीजें खाता रहता हूं। रसगुल्ला सोचता रहता है, कि मैं उसकी उपेक्षा कर रहा हूं। एक नजर देखकर...फिर से बाकी चीजें खाने लगता हूं। रसगुल्ला मुझसे काफी गुस्सा होने लगता है। इसी बीच में जल्दी जल्दी खाना खाता हूं। जब बाकी का खाना खत्म हो जाता है, तो मैं...रसगुल्ले को प्लेट से उठाकर अंत में उसे खाता हूं, सबसे आखिर में। स्वाद लेकर। कई घंटे तक...रसगुल्ले की मिठास...मेरे मुंह में....मन में घुलती रहती है। मैं उस मिठास को महसूस करता रहता हूं...बिल्कुल तुम्हारी आवाज की तरह।.... बीच-बीच में मेरे मन की सरलता लड़खड़ाती रहती है...और कभी कभी निश्चिंत होकर...मैं सो भी जाता हूं।

दरअसल, मैं रसगुल्ले की उपेक्षा नहीं कर रहा होता। आपके पास जो अनमोल चीज होता है, उसे आप संभाल कर... बेहद संभाल कर रखते हैं।...उसे हम यूं ही हर चीज में मिला तो नहीं सकते ना। और एक दिक्कत ये भी है...कि उसे आंखों के सामने ज्यादा देर रखो...तो खुद की भी नजर लग जाती है। इसलिए गहने हम बैंक के लॉकर में रख देते हैं, खुद से बहुत दूर। ताकि, वो चोरी ना हो जाए।

सनम....तुम मेरे लिए रसगुल्ला हो।.....

Thursday, 1 February 2018

एक अजीब सपना

कुछ कहूं या चुप ही रह जाऊं...जैसे विचारों के बहुत से हाथी, खरगोश और कबूतर मेरे मन में उछल कूद कर रहे हैं..। पर मन की हर बात मैं खारिज कर दे रहा हूं। वो दुआ क्यों मांगू जो सच हो जाए तो सुनामी के वेग में सब बह जाए। और यही ख्याल था, जब सपने वाली बात मैंने तुम्हें बताना सही नहीं समझा।

सपने में तुम बुला रहीं थीं....और मैं व्याकुल सा भागा जा रहा था आपसे मिलने। तभी रास्ते पर पड़े एक रोड़े से मैं टकरा गया। अंगूठे से खून  निकलने लगा। मेरे मुंह से पतली चीख निकली और शोर में खो गई। मैंने हाथों से अंगूठा पकड़ लिया। खून रोकने की कोशिश करने लगा। पास से गुजर रहे एक आदमी ने मदद की। पर अब मैं भाग नहीं पा रहा था। मैं दौ़ड़ना चाह रहा था, पर पैरों ंमें ताकत नहीं बची थी। मुझे लग रहा था. मेरे पास वक्त बेहद कम हैं, इसलिए पूरा दम लगाकर मैं फिर से भागा। तभी रास्ता खत्म हो गया। सामने खाई थी। कोई पुल नहीं था। मैं सबको कोसने लगा। मुझे आपसे मिलने बहुत दूर जाना था। मैं वापस मुड़ा, कुछ कदम चला, तो वापस अपने घर के पास खड़ा था। तुमसे मिलने की मियाद खत्म हो चुकी थी। मैं जग चुका था। 

सब कुछ बेहद अजीब लग रहा था मुझे। मैं इस सपने का रहस्य नहीं समझ पाया। हो सकता है, इसका कोई रहस्य ना भी हो, पर कुछ ना कुछ तो होता ही है। सब कुछ व्यर्थ तो हो नहीं सकता। सबकुछ हम यूं ही खारिज तो नहीं कर सकते। वो हुक का उठना भी उसमें शामिल है। मैं जानता हूं, ये बेवजह की बातें हैं...। पर बातें तो हैं...जिसे तुमसे कहने में मुझे अभी हर्ज नहीं लग रहा। 
मंदिर में बहुत पुराने पेड़ की डाली पर मन्नत का धागा बांधा...एक दुआ की ख्वाहिश लिए...पर किसी डाली से अनगिणत बंधे धागों में से किसी धागे को उतरते नहीं देखा ..। दुआ कबूल नहीं हुई। मैंने देखा बहुत सारे धागे उस डाल से उतरने के इंतजार में थे...पर ये कैसा इंतजार था ? मैंने शिवजी के मंदिर में दरख्वास्त लगाई....शिवजी के वाहन नंदी के कान में मन की निजी बात कही... पर मन चमत्कार की आस में बैठा रहा, और हर मियाद पूरी होती रही। एक वक्त आता है, जब हम कहते हैं, दुनिया की सुराही से खट्टा पानी ही बहता है। 

Tuesday, 30 January 2018

अधूरे रिश्ते की मुकम्मल दास्तान

जब कभी आप सम्मोहन में कैद होते हैं, तो आप एक अदृश्य दुनिया में भटकने लगते हैं। उस मूरत से मोहब्बत करने को जी चाहता है। एक अदृश्य आवाज का हम पीछा करने लगते हैं। एक मायावी घटना का आप गवाह बनना शुरू कर देते हैं। हम छायावादी प्रेम संबंध की तरफ बढ़ने लगते हैं। उम्र के फासले ....पहाड़ के हासिये पर रखे किसी पत्थर के छोटे टुकड़े की तरह किसी खाई में गिरता दिखता है। आप एक अप्रत्याशित वक्त में बंधने लगते हैं।
उन दोनों के बीच उम्र का फासला काफी ज्यादा था। पर वो उसकी तरफ काफी ज्यादा आकर्षित हो चुकी थी। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था, कि वो क्या करे। उसकी चाहना में सबसे खास बात ये थी, कि उसका मन स्वार्थविहीन था। कभी कभी उसका मन बस एक आलिंगन के लिए तरसता था। जबकि, उसे पता था, जिस चेहरे की तरफ वो आकर्षित हुई है, जिस सम्मोहन के फांस में वो फंसी है, वो पहले से ना सिर्फ शादीशुदा है, बल्कि, बड़े हो चुके दो बच्चों का पिता भी है। मगर, उसे अपनी चाहना पर कोई कंट्रोल नहीं था। और सच तो ये है, कि उस वक्त वो अपनी भावनाओं पर कोई कंट्रोल चाहती भी नहीं थी। उसे उमड़ने देना चाहती थी। मेघ की तरह... बरसने देना चाह रही थी। उसका मन बेहद कोमल था और नाजुकता के उस धागे से बिंधा हुआ था, कि उस सिचुएशन को हम निस्वार्थ प्रेम ही बस कह सकते हैं। और कुछ नहीं। जबकि, उसे पता था...कि पहले से ही किसी और संबंध में है, और उस संबंध से भी वो बाहर निकलना नहीं चाह रही थी। उसके शब्दों की मादक गंध उसके भीतर उतर चुकी थी। ज्यादा ख्वाहिश नहीं कर रही थी वो...बस एक आलिंगन चाह रही थी। एक छुअन... एक चुंबन से संतुष्ट होना चाह रही थी वो।
प्रेम का यह कौन सा रूप है मायावी ?

वो जिस छलावे के आकर्षण में कैद हुई थी, कुछ दिनों के लिए उसके अलावा और कुछ ख्याल नहीं रहता था उसे। वो इस संबंध को प्रेम का भी नाम नहीं दे रही थी, वो इसे एक पवित्र बंधन मान रही थी...। बेहद पवित्र। हालांकि, दुनिया के लिए ये संबंध काफी विचित्र...एक किस्म का पागलपन...एक किस्म की गाली हो सकती थी। पर उसके लिए ये रिश्ता आत्मा जैसा पवित्र था। बेहद पवित्र।
उस रिश्ते से उसे कुछ हासिल नहीं करना था....कुछ पाना नहीं था...। ना कोई नाम देना था। दोनों ने अपने- अपने अहसास एक दूसरे से साझा किए। कोई संबंध नहीं था उनके बीच, पर वो अजनबी नहीं रहे। किसी किस्म का कोई हक नहीं था उनका एक दूसरे के ऊपर....और ना ही किसी किस्म के वादों की जंजीर में जकड़े थे दोनों..। एक छुअन...एक आलिंगन...एक चुंबन...और कुछ वक्त सीने से लगने की ख्वाहिश थी बस उनके दरम्यां।



आकर्षण का अवसान होता है। एक निश्चित वक्त के बाद आकर्षण अपनी आखिरी सांसे ले चुका होता है। यहां भी यही हुआ। एक अजन्मा खूबसूरत रिश्ता था...जो अधूरा होकर भी मुकम्मल बन गया।



एक बड़ा दरवाजा

एक बड़ा दरवाजा है और उसमें छोटी-छोटी खिड़कियां हैं। हम बाहर झांकते हैं, और फिर चुप हो जाते है। उस वक्त हमारे मन में कुछ नहीं चलता होता है।  बाहर हमें बहुत तेज रफ्तार में भागता जीवन दिखता है। हम जीवन के रफ्तार को छूकर देखना चाहते हैं, पर हाथ छिल जाने के डर से खिड़की पर पर्दा लगा देते हैं। हम घर में अकेले होते हैं। और उस वक्त हमारे मन में मोहब्बत करने की इच्छा जग पड़ती है। हम फिर से खिड़की से पर्दा हटाकर किसी झुरझुरी याद में खो जाना चाहते हैं। 

Monday, 29 January 2018

जाड़े की धूप एक उपहार है।

उसे मैंने पहली बार धूप में खड़ा देखा था। किसी का इंतजार करते शायद। धूप की गर्मी से आंखे थोड़ी सिकुड़ी हुई लग रही थी मगर भिगी हवा की अपनी अदा होती है। ये जनवरी का आखिरी हफ्ता है। सर्दी अपने अवसान पर है। मैं भी धूप के कोने में कहीं खड़ा हुआ था, कि उसे देख लिया। हल्की हवा की सबसे खास बात ये होती है, कि इसमें आपके बाल थोड़ लहराते रहते हैं, जिन्हें संभालना अच्छा लगता है। उसे भी शायद अच्छा लग रहा होगा। मैं चाय पी रहा था। उसने अपने हैंडबैक से सिगरेट का एक डिब्बा निकाला। और फिर एक लाइटर। फिर वो सिगरेट पीने लगी। किसी का इंतजार करते वक्त सिगरेट पीते हुए अच्छा वक्त कटता है, ऐसा मैंने सुना था। आज देख रहा था। तभी एक और लड़की उसके पास आई। उसके हाथों में भी सिगरेट सुलग रही थी। दोनों गलें मिलीं। फिर सिगरेट का कश खींचा। मुझे अब धूप थोड़ी चुभने लगी थी, इसलिए मैं वापस दफ्तर आ गया। दफ्तर में शोरगुल मचा हुआ था। न्यूजरूम ऐसा ही होता है। गहमागहमी मची रहती है। हमें उस शोर की आदत होती है। और एक वक्त ऐसा आता है, कि हम उस शोर में शांति तलाशने का हूनर जान लेते हैं। मुझे लगा, कि इन बातों को लिख लेनी चाहिए। 

अकसर हम छोटी-छोटी बातों को...कहे गये कुछ जज्बातों को दर्ज करना भूल जाते हैं। मुझे याद है, मैं उस वक्त तीसरी कक्षा में था। मेरे पापा ही मुझे गणित पढ़ाया करते थे। इसलिए मैं गणित में काफी अच्छा था। मैं गणित के वही बने बनाये सवालों को बनाते बनाते ऊब चुका था। इसलिए एक शाम पढ़ते वक्त पापा से कहा, मुझे गणित में कुछ नया सीखना है। वही पुराने सवाल अब नहीं बनाना है। मैं बोर हो चुका हूं। पापा मुस्कुराने लगे। फिर बोले...ठीक है, आज औसत सिखाता हूं। मैंने पहली बार औसत का नाम सुना था। मैं खुश हो गया। पापा ने मुझे औसत बनाना सिखा दिया। चंद सवाल बनाने के तरीके जान लेने के बाद पापा वहां से चले गये। और मैं खुद से सवाल बनाने लगा। मुझे अब भी याद है, मैंने पूरा का पूरा चैप्टर खुद ही बना डाला। मुझे औसत बनाना काफी अच्छा लग रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था, कि इन सवालों को मैं पहले से ही बनाना जानता था, बस तरीका भूल गया था। पापा ने बस वो तरीका बता दिया है। मुझे वो बात अब तक याद है, जबकि उस वक्त मैं शायद 7 या 8 साल का रहा होऊंगा। हालांकि, पापा अब साथ नहीं होते। दूर रहते हैं। लेकिन, जब भी किसी मुश्किल में फंसता हूं, तो मुझे गणित का वो चैप्टर...औसत याद आ जाता है। मुझे लगता है, इस सवाल को हल करना मुझे आता है, बस मैं इस वक्त उसका तरीका नहीं जानता। फिर मैं तरीका खोजने लगता हूं। एक वक्त फिर ऐसा आता है, जब तरीका भी मिल जाता है, और परेशानी खत्म हो जाती है। तो क्या, हमारी जिंदगी में ऐसा होता है, कि परेशानी आने से पहले हमारे पास उसे सॉल्व करने का तरीका आ जाता है, बस हमें उसे थोड़ी सी मेहनत से खोजना भर होता है ? मुझे लगता है, कि मेरे इस सवाल का जवाब शायद हां मे हैं।

ऊपर मैंने जिस लड़की को धूप में सिगरेट पीते हुए देखने का जिक्र किया है, वो सरासर झूठ है। मैं न्यूजरूम में ही काफी अर्से से बैठा हुआ हूं। मैंने किसी को सिगरेट पीते हुए नहीं देखा। मुझे लगा था, कि मुझे बाहर जाना चाहिए। और मैंने अपने अक्स को बाहर चाय पीने के लिए भेज दिया। और मेरे अक्स ने किसी लड़की को सिगरेट पीते हुए की कल्पना की। जिसे मैंने अपने इस ब्लॉग में दर्ज कर लिया। हां, मगर जिंदगी औसत की तरह है, इस बात पर मैं अब तक कायम हूं।




Sunday, 28 January 2018

आलस

आलस से भरा हुआ हूं। गालिब के जूतों की तरह मन चर्र-मर्र कर रहा है। आज आवश्यकता से ज्यादा खाना खा लिया था तो आलस उसी हिसाब से है। ऐसे समय में चाय पीने की तीव्र इच्छा होने लगी, सो चाय भी पी आया। बाहर थोड़ी धूप में चाय पीना सुकून लग रहा था। आस पास कुछ कुत्ते सो रहे थे। हवा भी शांत थी। ठंड के महीने में थोड़ी धूप और हाथों में चाय...बस नींद की कमी थी। मुझे यकीन है, अगर मैं इस वक्त बिस्तर पर चला जाऊं, तो यकीनन नींद से सुलह हो जाए। और मैं गहरी नींद में सो जाऊं। दिल से कहूं, तो अभी मुझे किसी अजनबी से बात करने का मन हो रहा है। किसी अजनबी को जानने का मन हो रहा है। किसी अनजान विषय पर देर तक संवाद करने का मन कर रहा है।
जब आप किसी के बारे में कुछ नहीं जानते तो अच्छा होता है। ये बोतल में बंद शराब देखने जैसा अनुभव होता है। कभी थोड़ा पीने को जी करता है, फिर कड़वाहट के डर से उससे दूर ही रहने का मन करता है। अभी-अभी एक परिचित का फोन आया..। कुछ देर बातें करने के बाद मन ऊबने लगा...सो, किसी और से भी बात करने का ख्याल त्याग दिया। सामने टीवी स्क्रीन पर तरह तरह के चेहरे ऊभर रहे हैं...एक नजर उन्हें भी देख लेता हूं। बाबा रामदेव, पीएम मोदी, शशि थरूर दिख रहे हैं। फिर यूपी में हुए दंगे की तस्वीरें देखता हूं तो मन कोफ्त से भर जाता है। और फिर कुछ लिखने की इच्छा भी चली जाती है।




Saturday, 27 January 2018

सपना

मैं अकसर कई लोगों को सपने में देखता हूं। किसी के साथ मुलाकात का दृश्य होता है... तो किसी के साथ कुछ संवाद का। कभी कभी तो ऐसा होता है ...कि मिलने के लिए मैं प्लानिंग करता रहता हूं...वो इंतजार करते रहते हैं...मुलाकात की सारी तैयारियां पूरी हो जाती हैं...लेकिन एन मुलाकात के वक्त मैं जाग जाता हूं। इस सपने की सबसे खास बात ये होती है...कि जिससे एक बार सपने में देख लिया, उसे दुबारा नहीं देखता। कभी नहीं। अगली बार फिर कोई और शकल...। अगली बार फिर से कोई और संवाद। एक बार मैं सपने में किसी के घर खाना खा रहा था। हम साथ खाना खा रहे थे...लेकिन, खाना खाने के साथ ही सब सफेद होने लगा और मैं जग गया। फिर मैं काफी देर तक सपने के बारे में सोचता रहा। जब किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे...तो कोई और सपना देखने लगा।
मैं तुम्हें कई बार सपने में देख चुका हूं। तुम बार बार आती हो...। और बार बार तुम्हें देखने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं, कि सपने में तुम्हें बार-बार देखना किसी किस्म का चमत्कार है। हां, मैं इसे चमत्कार ही मानता हूं। मैंने अभी तक किसी को तुम्हारा नाम नहीं बताया है। सच तो ये है..कि मैं खुद तुम्हारा नाम नहीं जानता। हां, सपने में मैं तुम्हें कई बार कहना चाहता था, कि तुम बहुत सुंदर हो। हां, बस इतना ही कहना था। ना इससे कुछ ज्यादा और ना ही इससे कम। बहुत सारे झूठ के बीच मैंने सोचा कि आज तुम्हें ये सच बात दूं। और अगर तुम फिर भी इसे झूठ समझोगी, तो इससे प्यारा झूठ और क्या हो सकता है।
मेरा मन कहता है, कि जिसे मैं सपने में देखूं, उसे इस बात की जानकारी दे दूं, पर मैं ऐसा नहीं करता। क्योंकि, इससे सवालों का सिलसिला शुरू होगा। और मैं किसी सवाल का जवाब नहीं देना चाहता। क्या होगा इतने सारे सवालों का जवाब देकर..? इसलिए मैंने सपने के बारे में किसी को बताने की बात त्याग दी। अब ऐसा होता है...कि मैं सपने में किसी को देखता हूं। फिर मैं उसके और अपने संबंध के बारे में सोचता हूं। एक धुंध में कुछ देर खुद को घिरा पाता हूं।...और फिर सब भूलकर वापस सो जाता हूं। जैसे अभी सो रहा हूं।

Monday, 22 January 2018

तो क्या मैं ऊड़ जाऊं... ?

थोड़ी धूप निकल आई थी। और मैं कुर्सी लेकर छत पर धूप सेंकने पहुंच गया। एक लंबे अर्से के बाद छत पर यूं धूप में बैठना कुछ अच्छा लग रहा था। सामने की छत पर दो महिलाएं बातें करने में मशगूल थीं और साथ में दो छोटे-छोटे बच्चे किताबें खोलकर पढ़ रहे थे। पढ़ कम रहे थे, झूल ज्यादा रहे थे। बिल्कुल मेरी तरह। मुझे याद है, जब मैं बचपन में पढ़ता था, तो हिंदी की कोई कविता पढ़ते वक्त कुछ इसी तरह से मशगूल हो जाया करता था। ज्यादातर कविताएं मुझे याद रहती थीं, इसलिए किताब देखे बगैर ...आंख मूंदकर मैं जोर-जोर से कविताएं पढ़ता रहता था। मेरी आवाज छत से होते हुए कई घरों तक पहुंचती रहती थीं। मां को लगता था, कि मैं पढ़ाई में मशगूल हूं। जब कभी गणित बनाने बैठता, तो चप्पलें खाकर पढ़ाई खत्म होती थीं। हर बच्चे बचपन में एक जैसे ही होते हैं। वो बच्चा भी झूल झूलकर पढ़ रहा था। मेरे सामने छत के मूंडेर पर एक कबूतर आ बैठा है। पंख फड़फड़ाता हुआ। मैं मुस्कुराते हुए कबूतर देखने लगा। कबूतरों की सबसे खास बात ये होती है, कि उनका गर्दन स्थिर नहीं रहता। हर वक्त गर्दन में एक हलचल मचा रहता है, बिल्कुल मेरे मन की तरह । इधर से ऊधर भटकता हुआ। कबूतर का गर्दन या मेरा मन...बात बराबर।
कबूतर को सामने देख मुझे मेरे साथी की याद आ गई। और मैं नीचे चाय बनाने आ गया। अकसर चाय बनाते वक्त मेरा साथी मेरा साथ मौजूद रहता था। हम अकसर बातें करते थे। लेकिन, अब वो नहीं है। कबूतरों का सिर्फ गर्दन ही नहीं, मन भी बहुत चंचल होता है। एक जगह नहीं ठहरते। मेरा साथी भी नहीं ठहरा। चाय उबल रही थी...। चाय बनाते वक्त अकसर मैं सपने देखना शुरू कर देता हूं। हम जैसे लोगों के लिए सपने कितने मायने रखते हैं। सपना देखते वक्त हम बेहद खामोश होते हैं। और धीरे-धीरे हमारे लिए हर एकांत कम एकांत लगने लगता है। भीड़ भी हमारे लिए अकेलापन बन जाता है। और सपना खत्म होते होते हमारे चेहरे पर एक मुस्कान तैरने लगती है। हम हौले से मुस्कुरा देते हैं। मैं कभी-कभी दफ्तर जाते वक्त मेट्रो में भी मुस्कुरा देता हूं। सच कहूं तो मुझे मुस्कुराना अच्छा लगता है। और दूसरा सच ये है...कि हमारे जैसे लोग सपनों की बदौलत ही जिंदा रहते हैं। जिस दिन हमारा ये सपना खत्म हो जाएगा, हम खत्म हो जाएंगे। सपनों ने हमें जिंदा रखे हुआ है। सपनों के बारे में एक खास बात बताऊं ? हम जब भी सपने देखते हैं, हम आसमान की तरफ देखने लगते हैं। आसमाने में उस वक्त क्या होता है, वो हमें पता नहीं चलता । हमारी आंखों के सामने बादलों का धुंध होता है। और हम उस धुंध में कुछ तलाशने की कोशिश करते रहते हैं। सच में...सपने देखते वक्त हम कबूतर बन जाते हैं, और बादलों के बीच से दाने चुगते रहते हैं। और जब बादलों का धुंध छंट जाता है, तो हम मुस्कुरा देते हैं।


तो क्या मैं ऊड़ जाऊं।...थोड़े कच्चे पंख हैं...और कबूतर वाले मन हैं, जो...बांह पसारे उड़ने की इजाजत मांग रहा है। तो क्या मैं ऊड़ जाऊं... ?






सफल किरदार...असफल किरदार

क्या असफल रहते हुए सफल संवाद लिखे जा सकते हैं ? क्या बिना सफलता मिले किसी कहानी में किसी किरदार को अंत में संघर्षों के बाद उसे सफलता के शिखर पर चढ़ा हुआ लिखा जा सकता है ? आसान शब्दों में अगर मैं कहूं, तो क्या उस कहानी को...उस किरदार को सफल माना जाएगा। या फिर उसे सिर्फ दिमागी वहम मानकर सिरे से खारिज कर दिया जाएगा। काफी शंकाओं के बीच मैंने कई कहानिया शुरू कीं, मगर उसे बीच में ही अधूरा छोड़ उस कहानी को लिखना बंद कर दिया। वो किरदार अकसर मुझसे शिकायत करते रहते हैं। मगर, मैं उसे पूरा करने से कतराता रहता हूं। बिना मेरे सफल हुए मेरी कहानी का किरदार कैसे सफल हो सकता है। या फिर, जब मेरी कहानी का किरदार सफल होगा, उसके बाद मुझे सफल माना जाएगा। एक झिझक है...एक डर है... कहानी को आगे बढ़ाने के खयाल से ही हाथों में कंपन होने लगती है, और मैं कहानी को पूरा करने का खयाल त्याग किसी और कहानी की तलाश में लग जाता हूं। 
जैसे मैं चाहता हूं, कि मेरी कहानी का एक किरदार अंत में जाकर...कई सारे संघर्षों से जूझते हुए अपना मुकाम हासिल कर ले...लेकिन, मैं उसे सफल नहीं बनाता। संघर्षों के साथ उसे छोड़ देता हूं। मुझे लगता है, कहानी तो उसी की बनती है ना...जो सफल हो चुका है। और जो सफल नहीं हुआ है, भला उसकी कहानी कैसे बन सकती है। उसके संघर्षों से लोग क्या सीखेंगे ? उसके संघर्षों को जानकर लोग क्या करेंगे ? जैसे आज सुबह मेरे अजीज मित्र ने मुझसे कहा... कि या तो तुम भविष्य में काफी बड़े राइटर बन ही जाओगे, या फिर बर्बाद ही हो जाओगे। मैंने भी अपने बारे में यही अनुमान लगा रखा है। वैसे बर्बाद होने का अनुमान कुछ ज्यादा है। 
वैसे आजकल मैं सोच रहा हूं, कि एक रिस्क ले लिया जाए। कुछ किरदारों को सफल कर देते हैं। संघर्षों का नजीता और कहानी का अंत हैप्पी कर देते हैं। लेकिन एक सवाल जो अभी मेरे मन में है, कि क्या किसी किरदार को सफल कर देने पर मैं खुश हो पाऊंगा ? पता नहीं, अभी मेरे पास इसका जवाब नहीं है। और इसके लिए मुझे किसी कहानी को उसके अंजाम पर पहुंचाना होगा। 

अनजान आदमी

मैं एक आदमी को जानता हूं, जो दिन में कई दफे कमरे का दरवाजा खोलकर बाहर आता है।...और फिर कमरे में वापिस दाखिल हो जाता है। उसे लगता है, कमरे के उस पार कुछ है, जिसकी आहट वो सुनता रहता है। हर आहट पर वो चौंक जाता है...मगर, किसी को उस पार नहीं पाकर वापस दरबे में सिमट जाता है। अगर उसकी कहानी बस इतनी भर रहती तो अच्छा होता...पर उसकी कहानी उस कमरे के आयताकार जगह में खत्म नहीं होती। उसे कभी-कभी लगता है, कि वो असंभव से बिखराव को एक धागे में पिरोने की कोशिश कर रहा है। उसके बाल काफी बड़े-बड़े हो चुके हैं। दाढ़ी पर सफेदी छाने लगी है। चेहरा धुंधला दिखने लगा है। लोगों से घिरा रहने पर भी अकेलेपन का शिकार रहता है। मैंने कई दफे उससे संवाद करने की कोशिश की...पर हर बार असफल रहा।    

Sunday, 21 January 2018

शिद्दत

पूरी शिद्दत के साथ सुबह हमने जो काम शुरू किया था, शाम होते होते वो एक गोलाकार में सिमटने लगता है. रात हो जाती है, और वापिस कमरे में बैठकर हम कहते हैं, दुनिया गोल है. रात होने तक हम इस गोलाकार का एक चक्कर लगा चुके होते हैं, और अंत में बिस्तर पर पड़ी सिलवटों को छूकर कहते हैं, लो फिर से हम उद्गम के पास आ गये. हम घूमते-घामते वहीं आ जाते हैं, जहां से हमने ये यात्रा शुरू की थी. दरअसल हम घूमते कम हैं, भटकते ज्यादा हैं. इस भटकने के खेल में हमारा शरीर कब सो जाता है, हमें पता नहीं चलता. पर भटकने के इस अंतराल में हमारा मन कुछ कहानियों का निर्माण कर बैठता है, और हमारे सपनों में उन कहानियों के किरदार हमें तमाशा दिखाना शुरू कर देते हैं.  

Saturday, 20 January 2018

डाकू खड़गसिंह एक अच्छा इंसान है।


मुझे लगता है, कि मेरे पास दो मन है..। और दोनों आपस में बातें करते रहते हैं।.. उनकी बातें अकसर मैं नहीं जान पाता हूं। पर, फुसफुसाहट मैं सुनता रहता हूं। मुझे लगता है, कि वो बात करते वक्त गुप्त शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, या फिर ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं, जिसे मैं नहीं समझ सकूं। हां, मेरे दोनों मन इतना रहम जरूर मुझपर करते हैं, कि जब वो दोनों आपसे में बातें करना खत्म कर लेते हैं, तो उसका निचोर मुझे बता देतें हैं।..या फिर मैं ये कह सकता हूं, कि मुझे समझा देते हैं।.. दोनों मनों के बीच का संवाद लगातार चलता रहता है। और मैं इस बात से अकसर हैरान रह जाता हूं, कि मेरे पढ़े के मुताबिक, मेरे शरीर में एक मन, एक आत्मा और एक दिल होना चाहिए।...मगर, मैं साफ महसूस कर पाता हूं, कि आत्मा चुप है, दिल शांत है...मगर दोनों मन...प्रिय दोस्तों की तरह ही आपस में बातें कर रहे हैं..।

काफी दिनों की मेहनत के बाद आखिरकार वो पल आ ही गया, जब मैंने मनों के बीच की भाषा को समझना सीख गया। और फिर एक दिन फुर्सत निकालकर मैं उनकी बातों को सुनने के लिए किसी चुगलखोर की तरह बैठ गया।
मन 1- मुझे काफी दिनों से जलेबी खाने का मन कर रहा है। सोच रहा हूं, किसी दिन जब चैन से बैठूंगा, तो ढाई सौ ग्राम जलेबी खरीदकर दुकान से लाऊंगा, और फिर बैठकर अकेले पूरा खा जाऊंगा।
मन 2- पर उतना जलेबी तुम अकेले कैसे खा पाआगे।
मन 1- हां, जानता हूं, उतना जलेगी अकेले नहीं खा पाऊंगा, मगर खाने के बाद दोने में जो जलेबी बचेगी, उसे देखकर अहसास होगा, कि अभी मैं फुर्सत में हूं, और अभी अभी मैंने ढेर सारी जलेबी खत्म की है।
मन 2- हां, ये तो है।
मन 1- और तुम क्या सोचते रहते हो ? बहुत देर से गुमशुम चुप उदास बैठे हो ?
मन 2- नहीं, मैं उदास नहीं बैठा हूं...सोच रहा हूं, कि कोई ऐसा होता, जिससे मैं अपनी सारी फरमाईशें सुनाता...और वो मेरी हर फरमाईशें पूरी कर देता ?
मन 1- क्या फरमाईशें हैं तुम्हारी ?
मन 2- कुछ नहीं...बस जैसे मैं तुम्हें जलेबी लाने के लिए कहता, और तुम फौरन बाजार से जलेबी ले आते...

पहला मन हंस पड़ता है। उसे देख दूसरा मन मुस्कुरा उठता है। दोनों एक दूसरे का हाथ थाम लेते हैं। काफी देर तक यूं ही बैठे रहते हैं। मैं उनकी बात चुपचाप सुनता रहता हूं। 


सच तो ये है कि...मैं जोर से चिल्लाना चाहता हूं। चीजों को तोड़ डालना चाहता हूं। हर सामान...जो भी मेरे आसपास है...सारी चीजों को बुकनी-बुकनी कर डालना चाहता हूं। जो भी हाथ लगे..। और फिर घंटों बैठकर टूटे-बिखड़े पड़े सामानों को देखना चाहता हूं। फिर उन्हें छूकर जोड़ देने के बारे में सोचूं। और जब उन्हें किसी तरह से जोड़ ना पाऊं, तो उन्हें बुहारकर घर के किसी कोने में जमा कर दूं। मैं असल में अपनी यादों के साथ कुछ ऐसा ही करता हूं। दूसरा मन शून्य की तरफ देखते हुए अपनी बात कहे जा रहा था...और पहला मन उसकी बात सुनता जा रहा था। दूसरे मन की आंखे एकदम से स्थिर हो चुकी थीं। चेहरा दायीं तरफ मुड़ा हुआ था।
मैं, उन दोनों को चुपचाप छिपकर बस निहार रहा था। चारों तरफ खामोशी सी फैली हुई थी। हवा भी शोर नहीं मचा रही थी। दूसरा मन हल्का-हल्का सांस लेते हुए फिर बोल पड़ा...असल में हमें चिल्लाकर कह देनी चाहिए, सब ठीक है। सब शांत है। लेकिन हम ऐसा नहीं करते हैं। मैंने ऐसा करने की एक बार कोशिश की थी, पर कर नहीं पाया था। मैंने देखा था, कि एक आदमी...मेट्रो में पहले तो कुछ-कुछ धीरे-धीरे बोल रहा था, फिर अचानक जोर से चिल्ला पड़ा। मेट्रो में तमाम लोग उसकी तरफ देखने लगे। वो फिर शांत हो गया। कुछ पल उसे देखने के बाद लोग अपनी-अपनी में मशगूल हो गये। कुछ अभी भी हंस रहे थे। कुछ उसके बारे में पता नहीं क्या बातें करने लगे। उस आदमी को देखने के बाद मैंने चिल्लाने का प्लान त्याग दिया था। 
असल में पता नहीं मैं क्या चाहता हूं। मैं चाहता हूं, तुम मुझे गले से लगा लो। कुछ देर यूं ही गले से लगाकर रखो। फिर हम सो जाएंगे। चैन से। और मुझे भी नींद आ जाएगी। 

मैं वहां से निकल गया, दोनों मन को आपस में बातें करता हुआ छोड़कर। मैं किसी धुंध में खो जाना चाहता था। मैं पहाड़ों की तरफ निकल गया। खाईयों को देखने लगा। अनंत तक गहराईयों के बीच अनंत चोटियां...और चोटियों के बीच तरह-तरह के पेड़ पहाड़ों में जड़ जमाए खड़े थे। उनके बीच धुंध का डेरा था। कई छोटे फूल धुंध में खोए थे, ठीक उसी तरह जैसे मैं पहाड़ों के बीच खोया हुआ हूं। मुझे कहां जाना है, कहां ठहरना है, कहां से वापस आ जाना है, मुझे पता नहीं है। मैं पीपल, इमली छोड़कर बरगद की छाया तलाश रहा हूं। एक बरगद का पेड़ मेरे गांव के स्कूल में था। हम वहीं पढ़ते थे। मास्साब, हमें बरगद के घने साये में पढ़ाते थे। मुझे शुरू से कहानियां पढ़ने में अच्छा लगता था। मैं कहानियों में खो जाया करता था। मुझे याद है, बरगद के नीचे मास्साब हमें हिंदी पढ़ा रहे थे। फिर उन्होंने मुझे हिंदी किताब की किसी भी एक कहानी का संक्षिप्त विवरण सुनाने को कहा था। मैं क्लास में खड़ा हो गया और किताब की एक कहानी सुनाने लगा। बाबा भारती और उनके प्यारे घोड़े की कहानी। कहानी का नाम 'हार की जीत' था। मैंने शुरू किया... मां को अपने बेटे और किसान को अपनी लहलहाती फसल देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। कहानी में बाबा भारती का घोड़ा खड़गसिंह नाम का एक डाकू धोखे से चुरा लेता है। बाबा भारती काफी दुखी हो जाते हैं। लेकिन, फिर डाकू खड़गसिंह के अंदर का इंसान जाग उठता है, और वो बाबा भारती को उनका प्यारा घोड़ा वापस कर देता है। मैंने पूरी की पूरी कहानी वैसे का वैसा सुना दिया। मास्साब खुश हो गये। उन्होंने मुझे कहा...तुम एक दिन काफी अच्छा लिखोगे। मैं उस दिन काफी खुश हो गया था। पूरे क्लास में हर किसी के चेहरे की तरफ देख रहा था। सब मुझे देख रहे थे। मुझे वो घटना अब तक याद है। पर मुझे अब लगता है, कि मेरे पास भी एक घोड़ा था...जिसे किसी डाकू खड़गसिंह ने चुरा लिया। धोखे से...और मैं अपने प्यारे घोड़े के खोने से काफी दुखी हूं। लंबे अर्से हो चुके हैं, मेरे प्यारे घोड़े को मुझसे दूर गये हुए...पर डाकू खड़गसिंह अब तक मेरा घोड़ा लेकर नहीं आया है। उसके अंदर का इंसान अब तक नहीं जगा है। मैं हर दिन एक बार अपने कमरे को अच्छे से देखता हूं, कमरे में घोड़े के हिनहिनाने की आवाज तलाशता हूं...और हर दिन मायूस हो जाता हूं। और फिर मुझे स्कूल का वो बरगद पेड़ और मास्साब की शाबाशी याद आने लगती है। बचपन में मां कहती थी, मास्साब जान लेते हैं, कि उनका कौन सा छात्र पढ़ने वाला है, और कौन सा छात्र आगे जाकर क्या बनने वाला है। मास्साब ने मुझे एक अच्छा रायटर होना बताया था...पर मैं अब तक नहीं बन पाया। पता नहीं, मैं कब तक जिंदा रहूंगा ? पता नहीं, मैं इस धुंध में कब खो जाऊंगा ? पता नहीं, मास्साब का कहा हुआ सच होगा या नहीं...? मैं एक बार फिर से स्कूल जाना चाहता था। मुझे लगता था, कि शायद उस बरगद के नीचे मेरा वो घोड़ा डाकू खड़गसिंह बांधकर चला गया होगा...। पर बाद में मुझे पता चला...कि स्कूल में बरगद का वो पेड़ अब नहीं रहा। लोग बताते हैं, स्कूल में नया बिल्डिंग बनना था, इसलिए उसे काट दिया गया। मैं समझ गया...कि डाकू खड़गसिंह मेरा घोड़ा लेकर आया होगा, मगर बरगद का पेड़ उसे मिला नहीं होगा, इसलिए वो घोड़ा छोड़कर कहीं और चला गया। मेरा घोड़ा अब इस दुनिया में खो चुका है।..कहीं, भटक चुका है। जरूरत ने बरगद के पेड़ को काट दिया। जरूरतें एक अच्छी किस्म की आड़ी या कुल्हाड़ी होती हैं। वो कभी भावनाओं को काट देती हैं, तो कभी आपकी इच्छाओं को..। डाकू खड़गसिंह अब भी एक अच्छा इंसान है, मगर उसे बरगद का पेड़ ही नहीं मिला, जहां वो मेरे घोड़े को बांधकर जाता।


डूबने वाले ने डूबते साहिल को आवाज दी...

वो एक खिलौना भर है...टूट जाना उसकी नीयति है..। वो टूट ही जाएगा...। फिर क्यों हम करें उसकी उम्मीद...।  दूर एक धुंधला सा लैंप पोस्ट दिखता है।...