Monday, 27 March 2017

चाय....

चाय बनाना मेरे लिए एक सुखद अहसास होता है. इसमें हमें किसी तरह के नियम में फंसना नहीं पड़ता. दूध, पानी और शक्कर का सरल समीकरण.. बस. और कुछ नहीं. मन है तो अदरक डाल दीजिए या इलायची. नहीं डालने का मन है, तो कोई बात नहीं. चाय फिर भी अच्छी बनेगी.
नियम के बगैर जो काम होता है, वो अच्छा लगता है मुझे. 
अब मैं लाल पेन से कोई फॉर्म क्यों नहीं भर सकता ? परीक्षा में लाल पेन का इस्तेमाल क्यों नहीं कर सकता ? इस नियम की जरूरत क्यों है ? दस्तखत मैं लाल पेन से क्यों नहीं कर सकता ? इंटरव्यू देते वक्त हंसने तक पर भी नियम क्यों लागू है. सब कुछ सरल क्यों नहीं है ? 
नियम निरर्थक होते हैं
चाय पीना सार्थक है...

मैं चिल्लाना चाहता हूं...

सुबह जब दफ्तर के लिये निकलता हूं, तो लोग कितने हरे भरे दिखते हैं. सब बने ठने रहते हैं. हर किसी के चेहरे पर ताजगी, एनर्जी.. हर चेहरे पर वो वाली बात होती है..| वहीं लौटते वक्त हर चेहरा मुरझाया सा दिखता है. हरारत, थकन और नीची झुकी गर्दनें..
मेट्रो में हर तरह के चेहरे दिखते हैं और हर चेहरे की अलग अलग कहानी होती है. कोई मोबाइल में झांकता दिखता है, तो कोई अपनी आंखे बंद किए घर पहुंचने के इंतजार में रहता है. मैं भी इन्हीं चेहरों में एक चेहरा बना रहता हूं. मेट्रो के अंदर एक मां दिखती है अपने बेटे के साथ. वो अपने बेटे को कहती है, मन लगाकर पढ़ोगे तो बड़ा आदमी बनोगे. हिंदुस्तान में करीब हर मां अपने बच्चों को यही कहती है. मैं उस मां की बात सुनकर मुस्कुरा देता हूं.. वो बच्चा भी मेरी तरह ही मुस्कुरा रहा होता है. पहले मैं बड़ा आदमी मतलब लंबा आदमी समझता था. मैं बड़ा आदमी बनने का मतलब आज तक नहीं जान पाया हूं. बड़ा आदमी बनकर मैं क्या करूंगा ? बड़ा आदमी कैसे बना जाता है, समझ नहीं पाता हूं. पैसा कमाने में मुझे कुछ खास दिलचस्पी है नहीं. क्यों नहीं है, कभी जानने की कोशिश नहीं की.
मेट्रो के अंदर हर शाम एक चुप्पी पसरी रहती है... और उस चुप्पी में सब खोए रहते हैं. किसी के पास बोलने के लिए कुछ नहीं होता. हर शाम मुझे वो चुप्पी अखड़ने लगती है. मैं उस सन्नाटे को चिल्लाकर भेद देना चाहता हूं. मैं चिल्लाकर कहना चाहता हूं, भाईयों तुम लोग चुप क्यों हो? तुम्हें ये खामोशी इतनी प्यारी क्यों लगने लगी है. आओ, और मेरे साथ तुम लेग भी चिल्लाओ...! लेकिन ना तो मैंने कभी चिल्लाने की कोशिश की और ना ही उस चुप्पी को भेदा जा सका है.

मुझे शांत दुनिया चाहिए....

बचपन से ही मुझे टीवी देखने का बहुत शौक रहा है. मां कहती है, जब मैं साल भर का था, तभी से टीवी के सामने टकटकी लगाए बैठा रहता था. कुछ 3/4 साल की उम्र होने के बाद टीवी को लेकर मेरा आकर्षण काफी बढ़ गया. हालांकि मैं कुछ समझता नहीं था, लेकिन टीवी की दुनिया में हो रहे एक्शन मुझे काफी पसंद आते थे.
जब पर्दे पर हीरो चलता था तो बूट से एक टन-टन की आवाज आती थी. मुझे वो आवाज काफी पसंद थी. मुझे लगता था, कि फर्श पर टीन की चादर बिछा दी गई है और उस पर चलने से ये आवाज निकलती है. मैं पापा से जिद करता था, कि पूरे आंगन और घर में टीन की चादर बिछवा दीजिए. ताकि मैं चलूं तो वैसी ही आवाज निकलनी चाहिए. पापा हर बार अगली तारीख दे देते थे. मैं अब भी गांव जाता हूं, तो आंगन में टीन की चादर तलाशता हूं. मुझे मारधार वाले दृश्य बिल्कुल पसंद नहीं आते थे. रोमांस को मैं बचपन से ही पसंद करने लगा था. क्राइम फिल्में मेरी आखिरी च्वाइस होती थी. मीडिया फिल्ड में आने के बाद मुझे क्राइम शो बनाने का ही अवसर मिला. 8 साल के कैरियर में मैंने करीब पांच साल तक क्राइम शो ही प्रोड्यूस किया. मुझे मारपीट वाली नही. मुझे एक शांत दुनिया चाहिए थी. लेकिन मेरी यह ख्वाहिश टीन की चादर की तरह ही अभी तक अधूरा है...

Monday, 20 March 2017

सूखा इंसान

आज एक बेहद अजीब वाकया हुआ मेरे साथ। शाम में सोकर उठने के बाद मैं चाय बनाने लगा। घर में चूहों के करतबों को देखकर मैं मुस्कुरा रहा था कि मेरे रूम ऑनर किराया लेने के लिए आ गये। किराया देने के बाद मैंने उन्हें चाय पी लेने का आग्रह किया और वो चाय पीने के लिए तैयार हो गये। चाय बनाते-बनाते मैंने उनसे पूछा- कैसे हैं भैया...? कुछ पल चुप रहने के बाद उन्होंने कहा- ठीक नहीं हूं। मैंने पूछा क्या हो गया ? उन्होंने बेहद चुप खामोशी के साथ कहा- पता नहीं क्यों रोने का मन करता रहता है।
वो कमरे में इधर-ऊधर देखने लगे। मैं उनकी तरफ देख रहा था। लंबी चुप्पी के बाद उन्होंने कहा...अभी दुकान पर बैठा था, और रोने का मन करने लगा, तो इधर आ गया। घर में किसी चीज की कमी नहीं है। दोनों बेटों ने दो दुकानों को संभाल लिया है। घर में काफी पैसा आता है। पत्नी भी काफी अच्छी है, लेकिन मेरा हर वक्त छुप कर रोने का मन करता रहता है। हर पल गुस्से में भरा रहता हूं।
मैं उनका मर्ज समझ गया था। मैंने मुस्कुराते हुए उनसे पूछा- आप पूजा करते हैं? उन्होंने कहा- मेरी पत्नी करती है। मैंने कहा- आप खुद करते हैं ? उन्होंने कहा- नहीं। मैं समझ गया कि ये पैसा कमाते-कमाते अंदर तक सूख चुके हैं। इनके अंदर कुछ बचा नहीं है। मैंने कहा- मेरी एक बात मानेंगे ? उन्होंने कहा- हां बोलो... मैंने कहा- आप हर दिन श्रीमद् भागवत जी पढ़ा करिए। आप आत्मा से दूर हो गये हैं। अगर अब रोने का मन करे तो मेरे पास आ जाया करिए, मैं आपको श्रीमद् भागवत जी सुना दिया करूंगा, और मुझे यकीन है कुछ ही दिनों में आप बिल्कुल ठीक हो जाएंगे। उन्होंने कहा- पक्का...। मैंने उन्होंने विश्वास दिलाते हुए कहा- हां पक्का। भैया चले गये।
मैं अकसर प्रेम की बात करता हूं। दरअसल वो आत्मा वाला प्रेम है। ईश्वर से प्रेम करने की बात मैं करता हूं। अपने आत्मा से प्रेम करने की बात करता हूं। हम भौतिकता में इतना लिप्त हो चुके हैं, कि खुद को पूरी तरह से सुखा चुके हैं। हमें प्रेम की जरूरत है। हमें आत्मा से साक्षात्कार की जरूरत है। मैं कन्हैया को अपना सखा मानता हूं। और अपनी सारी बातें उन्हें बताता रहता हूं। इसलिए मेरे दोस्तों, अगर आप प्रेम से दूर हैं, तो अपने आराध्य के नजदीक जाईये। आत्मा से प्रेम करिए, फिर देखिए....आप सूखेपन से सदैव मुक्त हो जाएंगे।

योगी के मुख्यमंत्री बनने पर

आज मेरे एक मुस्लिम दोस्त ने मुझसे कहा, अभिजात भाई बहुत गलत हो रहा है. पता नहीं क्या होगा योगी के सीएम बनने के बाद.? उस मित्र की निगाहों में मैंने चिंता की रखाएं देखी. मैंने उनसे कहा कि आपको मुझपर यकीन है? उन्होंने हां कहा. मैंने कहा, कि मेरे जैसे लाखों हिंदू जो मोदी के कट्टर से कट्टर समर्थक भी हैं, यकीन मानिए वो कुछ नहीं होने देंगे. वो हर गलत कदम का विरोध करेंगे. उनके चेहरे पर तसल्ली आई.
दरअसल हमारे देश को विकास से पहले विश्वास की जरूरत है. और मुझे लगता है, इस देश में हिंदू और मुस्लिमों के बीच विश्वास बढ़ाने का ये स्वर्णिम काल है. केन्द्र में कट्टर हिंदू माने जाने वाले मोदी जी और सबसे बड़े प्रांत में उनके जैसा ही कट्टर योगी जी. मोदी जी को तीन साल होने वाले हैं पीएम बने हुए, लेकिन एक भी दंगा नहीं हुआ. मुस्लिमों के खिलाफ एक भी कदम नहीं उठाया गया, दरअसल ये हमारे लोकतंत्र के लिए सुखद संकेत हैं.
मुस्लिमों के दिल में नेताओं ने इस कदर डर भर दिया है, कि वो आज आतंकित होने पर मजबूर हैं, जबकि मुझे यकीन है मोदी और योगी आदित्यनाथ कोई भी गलत कदम नहीं उठाने वाले और ना ही देश के हिंदू उन्हें उठाने देंगे.
ये वक्त है डराने वालों को जवाब देने का. ये वक्त है विश्वास बढाने का. ये वक्त है दिल से दिल को मिलाने का और तभी इंडिया विश्व का महान राष्ट्र बन सकेगा.
अगले लोकसभा चुनाव तक मुझे यकीन है, बीजेपी के ऊपर से सांप्रदायिक होने का दाग धुल जाएगा और मुस्लिम समुदाय बीजेपी को दिल खोलकर वोट करेंगे वो भी विकास के नाम पर और बीजेपी भी दिल खोलकर मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देकर सत्ता में भागीदार बनाएगी.

Sunday, 12 March 2017

तुम्हारी आवाज

गुनगुनी सी रात की ये बात है
जब चिराग़ ने खोली थी अपनी लाल मद्धम सी आंखे
उस वक्त मैं शब्दों को प्रेम करना सिखा रहा था
तभी फिसल कर गिरी थी सिरहाने में तुम्हारी आवाज
और मैंने डिब्बे में भर कर तुम्हारी आवाज को रख लिया था
अक़सर गाहे बगाहे मैं डिब्बे से निकालकर
तुम्हारी आवाज की छोटी सी डली चख लिया करता था
आज फिर गुनगुनी सी शाम थी
और मुझे तलब लगी थी तुम्हारी आवाज चखने की
मैेने आलमारी से डिब्बा निकाला, उसे खोला
मगर वो खाली मिला...
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हर चीज की एक मियाद होती है, हर चीज खत्म हो जाता है
तुम्हारी आवाज भी खत्म हो गई
लेकिन ये तलब है, और मैंने देखा है अक़सर
तलब हो या व्यसन...
बढ़ता जाता है, बढ़ता जाता है, बढ़ता जाता है...

Sunday, 5 March 2017

बीमार जैसा कुछ

मैं जब बीमार नहीं होता हूं, तब सोचता हूं कि बीमार आदमी असहाय नहीं होते, वो असहाय होने का सिर्फ अभिनय करते रहते हैं. अभी मैं बीमार हूं, हालांकि, मैं दिनचर्या के तमाम काम कर रहा हूं, दफ्तर भी जा रहा हूं, लेकिन 'असहाय होने का अभिनय' अब इस बात पर मुझे हंसी आने लगी है. दवा खाकर काम करना भी आसान नहीं होता.
इस वक्त मैं एक कहानी लिख रहा था. नेहा नाम की लड़की की कहानी, जो समुंदर हो जाना चाहती है. हर एक जज्बात को अपने दायरे में समेटकर रखना चाहती है. लेकिन मुझे उसका दरिया होना ज्यादा पसंद है. उसका बहना ज्यादा पसंद है. इसलिए मैंने कहानी को अधूरा छोड़ दिया है. मैं किरदार की मर्जी से कहानी नहीं लिख सकता.
पिछले हफ्ते मेरा साथी ((कबूतर)) वापस मेरे पास आ गया. उसे देखकर मुझे बहुत खुशी हुई. लेकिन वो घायल था. शायद किसी ने उसे पत्थर से निशाना बनाया था. मैंने उसे बचाने की कोशिश की, लेकिन नहीं बचा पाया. मैं बहुत निराश हो गया. वो जाते वक्त किसी नये साथी के पास जाने की बात कहकर गया था, लेकिन आखिरी वक्त मेरे पास लौट आया, इस बात की संतुष्टि है मुझे.
वो मायाजाल से मुक्त हो चुका है. अब मैं चाय बनाऊंगा. और अपने कहानी के किरदार से फिर बात करूंगा, शायद अब वो दरिया बनकर रहने को राजी हो जाए...

Wednesday, 1 March 2017

Missing you.

नहीं कोई कहानी नहीं है। ये असल में कहानी की कतरनें हैं....जो छूट रही हैं। इन कहानी की कतरनों से भी कहानियां बन रही हैं, जिसे सिर्फ वो दोनों ही सिर्फ सुन रहे हैं। दिल में एक टीस उठती है उसका क्या करना है, एक कोना है, जहां लौ सी जल जाती है उसे कैसे नोचना है, उसकी उपाय करने की कोशिश वो करती है, लेकिन एक उपाय करने जाती है, तो अपने ही जालों में उलझ कर रह जाती है... 
आजकल लड़की को मूक संवाद करने की आदत हो गई है। इंतजार के अमावस में वो फंस सी गई है। वो लड़के को मिस कर रही थी, बेहद से भी बेहद...लेकिन वो ये बात कह भी नहीं सकती है। छाती से निकलती चीख गले में कहीं फंस जा रही है। वो गले लगना चाहती है...चूमना चाहती है, सीने से चिपकना चाहती है, वो ये बात लड़के के हाथों पर अपना सिर रखकर बताना चाहती है। लेकिन उसे तमाम तमन्नाएं कमरे के कोने में नोंच कर फेंक देनी पड़ रही है।
हम सब परिस्थिती नाम के डिब्बे में कैद कर लिए गये हैं। डिब्बे में एक छेद किया गया है, जिसके जरिए रोशनी की एक रेखा सी आती है। हम उसे रेखा के जरिए डिब्बे की कैद से बाहर निकल जाना चाहते है, छूट जाना चाहते हैं। लड़की भी डिब्बे में कैद है इस वक्त। डिब्बे के बाहर एक पहरेदार बैठा है। कड़क। मूंछों वाला। पैनी नजर जमाए। लड़की उसकी आंखों से ओझल होना चाहती है, लेकिन नहीं हो रही है। पहरेदार उस लड़की को कुछ देर के लिए डिब्बे से बाहर लड़की को निकालता है, और लड़की को वापस छटपटाने के बाद उस डिब्बे में फिर से कैद होना पड़ता है। ये बेहद अजीब परिस्थिति है।
क्या हम उस परिस्थिति नाम के डिब्बे को तोड़ सकते हैं? क्या हम पहरेदार को चकमा देकर भाग सकते हैं? क्या हम अपनी कमजोरी से पार पा सकते हैं। बहुत मुमकिन है पार पा लेना....बहुत मुमकिन है पहरेदार की नजरों से बचकर निकल जाना...लेकिन कहानी में सवाल पूछना और असल जिंदगी में उसपर यकीन करना....दोनों एक दूसरे से बेहद अलग होते हैं। ये कहानी भी अलग परिस्थिति की ही है।...लड़की को अभी डिब्ब में कैद रहना होगा। तड़पना होगा........और रोशनी की एक रेखा के सहारे जीवन का चित्र तैयार करना होगा।

डूबने वाले ने डूबते साहिल को आवाज दी...

वो एक खिलौना भर है...टूट जाना उसकी नीयति है..। वो टूट ही जाएगा...। फिर क्यों हम करें उसकी उम्मीद...।  दूर एक धुंधला सा लैंप पोस्ट दिखता है।...