Friday, 24 October 2014

आंखे


ये आंखें तेरे दीदार की शौकीन नहीं
पर बता ऐ मेरे हमनशीं
तेरे दर्द की दवा वहां मिलती है क्या
जा तू कर दे, किसी गैर के घर को रोशन
जा तू कर दे, किसी गैर के घर को रोशन
मैंने अपने पालने में भी इक आफताब पाल रखा है
कि...
दर्द, दवा, जख्म, आब-ए-चश्म....
बहुत मिलते हैं तेरे बाजार में
मगर, मुतमइन हूं मैं....

कि तेरी दुकान के सामने खड़ा हूं.....

नई पड़ोसन

नई पड़ोसन
जब से आई नई पड़ोसन, घरवाली बेहाल है
जब वो हमसे बात करे, यह क्रोध में होती लाल है
गोरी-गोरी हाय पड़ोसन, जब लेती अंगराई
चोरी-चोरी हम दरार से, देखा करते भाई
चोरी पकड़ी घरवलाली ने, अब ना गलती दाल है
जब वो हमसे बात करे, वो क्रोध में होती लाल है
एक दिन आई नई पड़ोसन, घरवाली से बतियाने
जाते-जाते कह गई हैंडसम, हमको भैया क्यों माने
ताव में आकर घरवाली ने, मुंडवाये सर के बाल है
अब ना देखे हमें पड़ोसन, घरवाली खुशहाल है


डूबने वाले ने डूबते साहिल को आवाज दी...

वो एक खिलौना भर है...टूट जाना उसकी नीयति है..। वो टूट ही जाएगा...। फिर क्यों हम करें उसकी उम्मीद...।  दूर एक धुंधला सा लैंप पोस्ट दिखता है।...