Tuesday, 22 August 2017

पहाड़

वो मुझे कबूतर की तरह लगने लगी। कुछ नखरे ही थे उसके ऐसे। गर्दन स्थिर ही नहीं रहता। कभी इधर मुड़ के देखना...कभी उधर। आंखों में मानो करंट दौड़ती रहती है।

-क्या मैं तुम्हें कबूतर कहूं ?
- कबूतर...? हीहीही...कबूतर क्यों ? मैं कबूतर जैसी लगती हूं क्या ?
- हां, बिल्कुल कबूतर जैसी ही। बस मुंडेर पर नहीं बैठती।
- अच्छा....तो तुम मुझे कबूतर कहोगे
- नहीं, मैं तुम्हें खरगोश कहूंगा
- खरगोश क्यों ?
- क्योंकि...खरगोश पहाड़ो में रहते हैं। और पहाड़ मुझे बेहद पसंद हैं।
- अच्छा, तो मैं जा रही हूं।
- कहां ?
- पहाड़ों में
- क्यों ?
- पहाड़ पर चढ़कर मैं चिल्लाना चाहती हूं। जोर-जोर से। खुद को पुकारना चाहती हूं। मुझे लगता है, मैं पहाड़ों में कहीं खो गई हूं। शायद किसी चोटी पर मौजूद देवदार के पीछे।
-  मैंने थोड़ा सा मुस्कुरा दिया। फिर कहा- सुनो, पिछले साल उस देवदार के पीछे मैं खुद को छोड़कर आया था। वहां चोटी से पानी की एक धारा बहती है। वहां मैं काफी देर तक बैठा रहा था। फिर पानी गायब हो गया। और खड़ा देवदार सूख गया। मैं देवदार से गले लगकर काफी देर तक रोता रहा। फिर खुद को देवदार की जगह छोड़ दिया। अब वहां देवदार नहीं है।

वो पहाड़ों की तरफ बढ़ गई। मैंने कहा, रूको...ठहरो...। सुनो।
पर वो नहीं रूकी। पहाड़ों में चली गई। मैं वहीं खड़ा रह गया।

मेरा सपना टूट गया था। सुबह के पांच बज रहे थे। मैं कमरे से निकलकर खिड़की के पास आ गया। आसमान में बादल छाए हुए थे। मैं बारिश होने का इंतजार करने लगा।









Wednesday, 16 August 2017

अधूरी कहानी

क्या तुम्हारे पास बची है थोड़ी सी शराब या सिगरेट का आखिरी कश...थोड़ा दर्द या थोड़ी सी जिंदगी ? या जो तुम नहीं जानते, उसपर यकीन करने की हिम्मत है ? अगर तुम्हारा जवाब हां है, तो सुनो प्रेम की एक बेमिसाल रचना।

उंगलियों में सिगरेट फंसाए एक खाली पार्क में बेंच पर सर झुकाकर बैठा वो एक कहानी लिख रहा था। अंधेरी रात में सिर्फ आधे चांद की रोशनी बिखरी थी। वक्त के पास सिवाय खालीपन के कुछ नहीं था। वो महसूस रहा था, कि कहानी का एक टुकड़ा बेंच के खाली हिस्से पर पड़ा है, मगर वो उसे पढ़ नहीं सकता। बस, देख सकता है। उस कहानी का कोई शक्ल नहीं था, बस कुछ बिखड़े अक्षर थे, बेवजह के शब्द थे...और कोई उसे सिगरेट पीता हुआ देख रही थी। वो उन अक्षरों को...उन शब्दों को समेट कर अपने लैपटॉप में एक शक्ल उतार लेना चाहता था, जो उसे सिगरेट पीता हुआ देख रही थी।
क्या मैं भी तुम्हारे साथ सिगरेट पी सकती हूं?
एक लड़की काली साड़ी पहने उसके सामने खडी थी। उसके माथे पर एक लाल टीके की रेखा थी। और चेहरे पर चांदनी पसरी हुई थी। वो काफी ज्यादा लंबी थी। करीब 10 फीट लंबी। 
वो आधी रात में एक अनजान एक हद से ज्यादा लंबी लड़की को देख हड़बड़ा सा गया। और फिर खुद को संभालते हुए पूछा ....
तुम कौन हो ? इतनी रात गये यहां इस खाली पार्क में क्या कर रही हो ?
मैं रात की देवी हूं। मैं रात होते ही जमीन पर उतर आती हूं। तुम यहां क्या कर रहे हो ? इससे पहले तो यहां कभी नहीं देखा ?
-मैं एक कहानी लिख रहा हूं। एक भष्मासुर की कहानी । 
-अच्छा। सिगरेट है तुम्हारे पास
- हां, ये लो
- तुम रात की देवी हो। देवी तो सिगरेट नहीं पीती। 
- मुझे अपने लोगों ने त्याग दिया है। इसलिए हर रात जमीन पर भटकती रहती हूं। मुझे वही देख सकता, जिसे मैं चाहूंगी। तुम अकेले हो अभी, इसलिए तुम्हारे पास आई हूं। 
कुछ देर खामोशी पसरी रही। फिर वो बोली......पहली बार सिगरेट पी रही हूं।
-क्या, त्याग दिया है...? मैं कुछ समझा नहीं। किसने त्यागा है ? कौन हो तुम ?
- दुनिया में कई ऐसे रहस्य हैं, जिसे हम नहीं जानते हैं। और जिसे हम नहीं जानते उसे हम झूठ मानकर नकार देते हैं। बकवास ठहरा देते हैं।
- देखो, मुझे डर लग रहा है। मैं तुम्हारी बातें नहीं समझ रहा हूं। देखो, मेरे रोएं...मेरे कान गर्म हो चुके हैं।
- डरो मत, मैं बुरी नहीं हूं। कुछ गलत नहीं होगा तुम्हारे साथ।
- तो तुम्हारी कहानी क्या है ? किसने त्यागा है तुम्हें ?
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- हमारी एक अलग दुनिया है। रात की दुनिया। हमारी दुनिया के लोग... तुम लोगों से काफी लंबे होते हैं। तुम मेरी लंबाई देख ही रहे हो।
-हां देख रहा हूं। काफी ज्यादा लंबी हो तुम। कहां है तुम्हारी दुनिया ?
- यहीं। धरती पर। हम अदृश्य रहते हैं। 
















हमशक्ल

कई बार हम मगन हो चलते रहते हैं, कि अचानक कोई हमें आवाज देकर रोकता है. शक्ल निहारता है. गौर से देखता है. और फिर हमें कहता है, आपको पहले कहीं देखा है. आपका नाम कहीं वो तो नहीं. ? हम मुस्कुराते हैं और कहते हैं, जी नहीं. मेरा नाम ये है. 
ये वाकया अकसर मेरे साथ होता है. कई मित्र अलग अलग शक्लों में मुझे मिला चुके हैं. कुछ मित्र लोकल रणवीर कपूर तो एक मित्र ने यहां तक कह दिया, कि अगर तुम्हारा गाल भर जाए तो सुधीर चौधरी का हमशक्ल लगोगे तुम. मैं मुस्कुरा कर रह जाता हूं.
कार वाला रूका और मुझे रोकते हुए कहा... भाई आप बिल्कुल मेरे एक दोस्त की तरह दिखते हैं. उसने अपने दोस्त की तस्वीर मुझे दिखाई. थोड़ा बहुत चेहरा वाकई मिलता था. वो हाथ मिलाकर, मुस्कुराकर चले गये. ऐसी घटना मेरे साथ कई बार हो चुकी है.
वाकई, हम कई शक्लों से मिलकर बने होते हैं.

नफरत

एक अदृश्य व्यूह है, जो इंसान को नफरती बना रहा है. शायद "अंधेरा कायम रहे" बोलने वाला तमराज किलविश इसके लिए जिम्मेदार है. वो नहीं चाहता की सबकुछ ठीक रहे. वो लड़ाई चाहता है, नफरत चाहता है और उसने बहुत से लोगों को अपने मकसद के लिए चुन रखा है. कोई हथियार बनाए जा रहा है, कोई उन हथियारों से हत्याएं किए जा रहा है. कुछ हैं जो इन्हें हवा दिए जा रहे हैं. कुल मिलाकर किलविश शांति नहीं चाहता है. शांति में वो बेचैन हो जाता है.
एक दिन अंधेरे का राज होगा. 
मैं शांति चाहता हूं, और शांति के लिए किलविश का वध भी करना चाहता हूं. पर दिक्कत ये है, कि किलविश अदृश्य है. वो दिखता नहीं है. वो अपने चुने हुए लोगों के ठीक पीछे खड़ा रहता है. जो गलत कर रहे हैं, वो गुनहगार हैं नहीं, तो उन्हें खत्म नहीं किया जाना चाहिए. क्योंकि वो समझ नहीं पा रहे हैं, कि किलविश ने उन्हें अपना गुलाम बना रखा है.
उपाय क्या है?
एक चश्मे का इजाद होना चाहिए. शायद लेजर वाला या फिर ऐसे लेंस वाला, जिसके सहारे हम किलविश को देख लें, और फिर किलविश को कैद कर उसे दंड दे सकें.
फिलहाल?
अंधेरा कायम करने की कोशिश जारी है. अंधेरा फैल रहा है. किलविश और मजबूत हो रहा है.
हमें एक शक्तिमान की जरूरत है.

चमत्कार क्या है, बड़ी बात क्या है?

चमत्कार क्या है, बड़ी बात क्या है?
धरती पर दो ही चीज शाश्वत सत्य है, जन्म और मरण. जीवन में इनके अलावा एक और चीज को मैं महत्वपूर्ण मानता हूं, वो है किसी की जिंदगी बचा लेना. जैसे किसी घायल को या बीमार को वक्त रहते अस्पताल पहुंचा देना. इनके अलावा इंसानी जिंदगी में हर चीज क्षणभंगुर है. रुपया-पैसा, एश-ओ-आराम, किसी भी चीज की कोई अहमियत नहीं है. कोई बात बड़ी नहीं है. रुपया नहीं कमा पाए ना, कोई बात नहीं. गाड़ी छूट गई, कोई बात नहीं..अरे जीवन है ना, बस वही चमत्कार है, बड़ी बात है.
रायबरेली में एक दुकान पर हम और अंबेश बैठे बात कर रहे थे. अंबेश के कुछ दोस्त भी साथ में थे. जाते वक्त एक दोस्त बाइक पर बैठा, और बाइक रिवर्स करने लगा. तभी पीछे से एक तेज रफ्तार दूसरी बाइक आई, और इस बाइक से बुरी तरह टकराई. अंबेश का दोस्त वहीं गिर गया. मगर दूसरा बाइक वाला बाइक समेत कुछ फीट उछलता हुआ, कई फीट आगे जा गिरा. सामने से तेज रफ्तार ट्रक मौत बनकर बाइक वाले की तरफ बढ़ रही थी. ये पूरा वाकया हम लोगों के सामने इतनी तेजी से घट रहा था, कि हमारा मुंह खुल चुका था. दोनों हाथ माथे पर जा चुका था. तभी ट्रक वाले ने किसी तरह ब्रेक लगाया और बाइक वाले के पास जाकर ट्रक रूक गया. बाइक वाले की किस्मत अच्छी थी. वो बच गया. लोग दौरे. दोनों बाइक सवारों को उठाया. दोनों में किसी को चोट नहीं लगी, ये भी हमारे लिए एक शुभ चमत्कार ही था.
ऐसे हादसे होते रहते हैं. लोग जाते रहते हैं... तो फिर बड़ी बात क्या है...? बड़ी बात बस एक है, जिम्मेदारी निभाना. हम जैसे इंसान जो जिम्मेदारियों से भागते रहते हैं, उनके लिए ऐसी घटना सबक होती है, कि वो अपनी जिम्मेदारी निभाएं. चाहने वालों को खुश रखे..बाकी बड़ी बात कुछ नहीं है.

बॉस

उसके बॉस ने ((मेरे एक IT में काम करने वाले मित्र को)) नामालूम क्यों उसे जमकर फटकार लगाई थी. उसे सबके सामने बुरी तरह जलील किया था. वो चुपचाप फटकार सुनता रहा, गर्दन झुकाए...बिना जवाब दिए. डांट-फटकार सुनने के बाद वो वापस अपने काम में लग गया. 
आज मैंने उसकी एक तस्वीर देखी. वो अपनी बीवी और बेटी के साथ किसी मॉल में था. वो बेहद खुश लग रहा था. मैं समझ गया, कि बस इसी खुशी की खातिर वो उतनी डांट झेल गया. वरना वो अपने बॉस का दांत तोड़ सकता था. बाल पकड़कर अपने बॉस को घसीट सकता था.
मेरा मानना है, कि कभी भी किसी को किसी भी बात के लिए डांटना नहीं चाहिए या किसी पर भी गुस्सा नहीं करना चाहिए. क्षणिक गुस्सा हो सकता है, मगर उसके लिए जलील करना जरूरी नहीं है. हर कोई अपने स्तर तक समझदार होता है. और किसी को इस भ्रम में भी नहीं रहना चाहिए कि उसके अंदर आइंस्टीन वाला दिमाग फिट है. हां, अगर कुछ गलतियां हो रही हैं तो प्यार से समझाया जा सकता है.
और इंसान को इतना तो याद रखना ही चाहिए... कि जब अकबर धूल में मिल गया.. अलेक्जेंडर को शिकस्त का सामना करना पड़ा, राणा प्रताप को घास चबानी पड़ी, तो हम भी कोई तुर्रम खां तो हैं नहीं...
इसलिए...सभी इंसान को प्रेम से पेश आना चाहिए... ताकि आपके अवसान के वक्त भी वो आपसे प्रेम से पेश आए...

अतीत

अतीत मधुमक्खियों की तरह होती हैं. जब तक आप चल रहे होते हैं, वो आपके पीछे पड़ी रहती हैं, लेकिन जैसे ही आप कहीं ठहरते हैं, मधुमक्खियां आपको दबोच लेती हैं. रात एक ठहराव है. इसलिए मैं देर रात तक जागता रहता हूं. एक तरह से मैं मधुमक्खियों को झांसा देने की कोशिश करता रहता हूं. झूठ बोलकर मधुमक्खियों से पीछा छुड़ाने के क्रम में कहानियां लिखना शुरू कर देता हूं. मुझे प्रेम की झूठी कहानियां लिखना बेहद पसंद हैं. कहानी के नायक से देर तक संवाद चलता रहता है, और फिर अंत में मैं तरस खाकर नायक को नायिका से मिला देता हूं. 
असल जीवन में मेरी कहानी को बस एक झूठ या फरेब ही कहा जा सकता है.

राधा और कान्हा

राधा और कान्हा यमुना तट पर बैठे बात कर रहे थे। राधा जाने को थी, लेकिन कान्हा उन्हें रोक रहे थे। और कल फिर से मिलने की जिद कर रहे थे। कान्हा ने कहा... जब मैं मुरली बजाऊं, तो समझ लेना राधा, कि मैं नदी तट पर तुम्हारी राह देख रहा हूं।
राधा- ना ना..मैं हाथ जोड़ती हूं...मुरली ना बजाना
कान्हा ने कहा- क्यों, मुरली क्यों ना बजाऊं ?
राधा- ना जाने तुम्हारी मुरली की सुरों में क्या जादू है। दोपहर के समय मुरली सुनते ही मेरी सखियां जाग जाती हैं। जब मैं तुमसे मिलने आती हूं, तो झरोखों से वो मुझे देखने लगती हैं। फिर सबको पता चल जाता है, कि तुम गांव के बाहर आ गये हो। घर-घर में मेरी और तुम्हारी चर्चा होने लगी है। तू नहीं जानता कान्हा, तेरे लिए मुझे कितनी निंदा सहनी पड़ती है।
राधा के बेबस नयनों को देखते हुए कान्हा कहते हैं- देखो राधा, जो निंदा से डरे, उसे प्रेम की डगर पर नहीं चलना चाहिए। इसलिए, जब मैं मुरली बजाया करूं, तो तुम घर से मत निकला करो।
राधा शिकायत करते हुए कहती हैं- परंतु ये पापिन, मुरली ही तो सारे दुखों की जड़ है. इसे सुनकर आये बिना रहा भी नहीं जाता मुझसे। इस सौतन के सुर तो जैसे पाश में बांधकर ले आते हैं मुझे। इसलिए कहती हूं, मुझपे दया करो
कान्हा- फिर तो प्रेम करना छोड़ दो राधा
राधा- ये भी तो संभव नहीं है
कान्हा- फिर ये भी संभव नहीं, कि मैं आना छोड़ दूं। देखो राधा, मुझे किसी निंदा की डर नहीं। इसलिए, मैं तो आया करूंगा
राधा- अगर मैं नहीं आऊंगी, तो तुम क्या करोगे
कान्हा- तो मैं...तुम्हारे चरणचिन्हों को ही मुरली सुनाकर लौट जाऊंगा
राधा—मेरे चरणचिन्हों को ?
कान्हा- हां...तुम प्रात: सखियों के संग जल भरने नदी तट पर जाती हो ना, तो वहां सबके चरणचिन्ह होते हैं। मैं उनमें से तुम्हारे चरणचिन्हों को पहचान सकता हूं। बस... मैं उन्हीं को प्रेम कर लौट जाऊंगा।
राधा की आंखों से आंसू बहने लगते हैं।
तभी राधा की मां की आवाज यमुना तट पर सुनाई देने लगती हैं। राधा जल्दी से जाने के लिए उठती है। कान्हा कहते हैं- राधा तो तुम आओगी ना?
राधा मुंह बनाकर कहती हैं- हूं, आऊंगी। ऐसा हो सकता है, कि तू मुरली बजाए कान्हा...और मैं ना आऊं।
इस तरह कान्हा ने राधा से फिर मिलने का वचन ले ही लिया। कितने छलिया हैं हमारे कान्हा भी....

कबूतर कहानी नहीं लिखते

कबूतर कहानी नहीं लिखते
कबूतरों की एक अलग कहानी होती है
कोने में बहुत देर से एक कबूतर बैठा हुआ था. मैं उसे निहारे जा रहा था. उसकी अनगढ़ जिंदगी के बारे में सोच रहा था. मैंने गौर किया कि ये कबूतर काफी वक्त से गुटरगूं नहीं कर रहा है. मैं खिड़की खोल कर कमरे के बाहर दीवारों पर बैठे कबूतरों को देखने लगा. वो सब भी बेहद खामोश थे. उनकी खामोशी अब मुझे अखरने लगी थी. चारों तरफ सिर्फ गाड़ियों की कर्कश आवाज, पर नीम खामोशी. मैंने चिल्लाकर कहा... अरे भाई लोग, कुछ बोलते क्यों नहीं? इतने चुप क्यों हो ? हल्ला करो...शोर मचाओ. पर सब शांत रहे. मैंने खिड़की बंद कर दिया. कोने में बैठे कबूतर के सामने कुछ चावल के दाने और एक कटोरा पानी रख दिया. पर उसने खाने को बड़ी ही हिकारत की नजर देखा. मुझे उसका रूखापन अखरने लगा. मैंने कबूतर को अपने हाथों से उठा लिया... उसे हाथों से पुचकारने लगा.
मैंने महसूस किया... कि दिल्ली के कबूतर अब गुटरगूं नहीं करते हैं. आप सिर्फ उनके पंखों की फड़फड़ाने की आवाज ही सुन पाएंगे. गांवों के कबूतर बहुत शोर मचाते हैं, खेलते हैं गंदगी भी बहुत फैलाते हैं. पर दिल्ली के कबूतरों की वेग की धाराएं स्थिर हो गईं हैं. उनकी स्थिरता में शायद एक प्रश्न होता है या फिर उनके खालीपन और मौन को अभी पढ़ा जाना शेष है.
कभी कभी मुझे लगता है कि ये दुखी कबूतर हैं. इन्होंने शायद प्रेम का त्याग कर दिया है. ये बस जिंदा रहते हैं, जिंदगी के होने के मतलब से इनका कोई मतलब नहीं रह गया है. कुछ देर बाद मैंने घर के मुंडेर पर कबूतर को छोड़ दिया. पर आश्चर्य वो उड़ा नहीं. वो वहीं बैठा रहा... बहुत देर तक.
मैं वापस कमरे में था... खिड़की से बाहर देखते हुए... किसी प्रेम से भरे कबूतर के इंतजार में.....

मन बावर्ची

मन बावर्ची सा हो गया है इन दिनों. खयाली पलाव पकाता रहता है. मैं रोकता हूं, तो जायका खराब होने का डर सताने लगता है. कुछ लिखने बैठ जाता हूं. काफी देर कोरे कागज को ताकने के बाद भी कुछ लिख नहीं पाता. प्रेम पर मैं लंबे दृश्य रच सकता हूं, लंबे संवाद लिख सकता हूं, मगर आज प्रेम पर लिखने का जी नहीं किया, सो लिखने का प्लान स्थगित हो गया है.
फिल्में देखना शुरू कर देता हूं, मगर कौन सा फिल्म देखूं ये तय करने में घंटा भर वक्त निकल जाता है. हारकर कंप्यूटर बंद कर देता हूं. अब बस सन्नाटे में देखना ही काम बचा है. पूरी रात गुजरने के बाद बस एक ही लाइन लिख पाया...
'जीवन में परफेक्ट प्लान जैसा कुछ नहीं होता है. हमें चलते चलते एडजस्ट करना पड़ता है'

आधी रात

वो देर रात तक कुछ लिख रहा था. फिर बारिश होने की आवाजें सुनाई देने लगी. उसने लिखना बंद कर दिया, और खिड़की के पास आ गया. बारिश होते वक्त कोई शहर कितना अजीब लगने लगता है. वो खिड़की से स्ट्रीट लाइट देख रहा था. रास्ते पर पीला प्रकाश फैला हुआ था. ऐसा लग रहा था कि किसी पेंटर ने काले रंग के ऊपर बहुत सा उदास पीला रंग फेंक दिया हो. उदास पीला रंग सोचते ही अचानक उसे अपनी लिखी कहानी बेईमानी लगने लगी. वो प्रेम पर लिख रहा था, जबकि ठीक इस वक्त वो उदासी पर लिखना चाह रहा है. जो लड़की उसकी कहानी में खिलखिला रही थी, असल में उसे उदास होना चाहिए था. वो वापस कमरे में आ गया. कहानी के पांच पन्नों को उसने फाड़ दिया और रास्ते पर फैली पीली उदासी में उसने अपनी कहानी को प्रवाहित कर दिया.
प्रेम को किसी गुस्सैल साधू ने दिया है श्राप
या प्रेम है उस गुस्सैल के कमंडल से निकला पानी
जो गिरने के साथ ही इंसान को कर देता दुखी
ना ना, प्रेम एक अलग किस्म का हीरा है
जिसे पाते ही प्रेमी लगा लेते हैं होठों से
चुमती हैं प्रेमिकाएं
और हो जाते हैं निढ़ाल, अचेत, या जाती है जान
असल में प्रेम ना चूमने की चीज है, ना होठों से लगाने की
वो बस एक सजावट का सामान भर है
बारिश की बूंदों के बीच उसकी कहानी उदासी के पीले रंग में समा चुकी थी और वो आंख बंद किए नींद का इंतजार कर रहा था.

आइंस्टीन से असफल संवाद

इन दिनों मौसम कुछ ऐसा है कि अल-सुबह तक नींद नहीं आती. आंखों के अरण्य में झितिज तक खामोशी फैली रहती है. मैं करवटें ले-लेकर नींद की देवी को झांसा देने की कोशिश हर रात करता हूं, लेकिन मेरी बेईमानी पकड़ी जाती है. 
इन दिनों आइंस्टीन को पढ़ रहा हूं. आइंस्टीन को पढ़ना कौतूहल को और बढ़ाना है. हर नये पेज पर एक नये चमत्कार को बनता देखता हूं और नाउम्मीदी हर पृष्ट पर दम तोड़ती नजर आती है. कुछ देर उन्हें पढ़ने के बाद मैं जादू की दुनिया में चला जाता हूं. किताब को बस देखता रहता हूं, आइंस्टीन आंखों के सामने होते हैं. मैं उनसे कुछ सवाल करना चाहता हूं, उनसे बातें करना चाहता हूं, पर वो मेरे सवालों का जवाब नहीं देते. बस मुझे देखकर मुस्कुराते रहते हैं. मैं भी उन्हें देखकर मुस्कुराने का अभिनय करता हूं. देखने और मुस्कुराने की इस प्रक्रिया के बीच फिर से सुबह होने को है. कल मैं उन्हें किसी तरह से बात करने के लिए राजी कर लूंगा, ऐसा विचार कर मैंने किताब को बंद कर सिरहाने में रख दिया है. अब कल रात आइंस्टीन से क्या संवाद होंगे इसे लेकर बेहद उत्सुक हूं....

आधा घंटा

दफ्तर से देर रात आने के बाद दिल बड़ी देर तक किंकर्तब्यविमूढ़ की स्थिति में रहता है. इस वक्त कोई काम नहीं होता है. घर पहुंचते ही मैं अपने कमरे में लेट जाता हूं. कुछ देर आंखें बंद रहती है. मगर अंदर कोई ख्याल नहीं रहता. दिन भर चलायमान होने के बाद अचानक रूक जाना भी बेहद अजीब होता है. फिर मैं आहिस्ता आहिस्ता आंखे खोलता हूं, और कमरे को निहारने लगता हूं. जैसा इसे छोड़कर गया था, ये वैसा ही है ना, उसे मुआयना करने की कोशिश करने लगता हूं. कमरे के कोनों में पसरी खामोशियों में एक आवाज खोजने की कोशिश करता हूं. जब बड़ी देर तक कोई आवाज नहीं आती, तो फ्रिज देखने लगता हूं. फ्रिज खोलकर अंदर से सुख निकालने की कोशिश करता हूं, मगर दो घूंट पानी पीकर वापस बिस्तर पर आ जाता हूं.
इन तमाम प्रक्रियाओं के दरम्यां ना कोई उम्मीद होती है, ना सपना.. ना दर्द, ना चैन... ना स्मृति ना कोई खोज. इस वक्त छत पर मकड़ी के जाले को देखता मैं कौन होता हूं, पता ही नहीं चलता.
ना उमंग, ना उत्साह, ना नींद
पेशानी पर पसरा पसीना
ना सोने की इच्छा, ना जागने की ख्वाहिश
हाथ के नाखून से पैरों के नाखून को साफ करना
ऊंगलियों से दिवाल छूना, सहलाना
इस आधे घंटे में ये सब शामिल होता है
करीब आधे बाद मेरी ही शक्ल का एक आदमी मुझे मेरे सामने खड़ा दिखाई देता है. मैंने उसे 'दया' नाम दिया है. वो इंगलिश हैट पहना हुआ होता है. उसकी ऊंगलियों में सिगरेट सुलग रहा होता है. कोट पैंट और टाय पहना हुआ वो किसी सिक्रेट एजेंट सा दिखता है. दया मुझे बेबस निढ़ाल बिस्तर पर पड़ा देख रहा होता है. मैं उससे नजर मिलाता हूं पर उसकी आंखों में मेरे लिए करूणा दिखती है. करूणा दिखते ही मैं झट से खड़ा हो जाता हूं. मैं भला किसी की आंखों में खुद को बेबस कैसे देख सकता, इसलिए फौरन फ्रेश हो जाता हूं. बेबसी में बेरूखी शामिल होता है, इसलिए मैं खुद को बेबस नहीं देखना चाहता. मेरी शक्ल का आदमी अब गायब हो चुका होता है. इसलिए कॉपी कलम निकालकर मैं कुछ लिखने बैठ जाता हूं.

अकेलापन

अकेलेपन की स्थिति में मन सबसे बड़ा चुगलखोर होता है. अकेलापन नियती नहीं होता, इंडिया में हम अकेलापन चुनते हैं. बाध्य नहीं होते. हम अकेलापन क्यों चुनने लगे हैं. इसका ठीक ठीक पता नहीं चलता. हां कुछ जवाब जरूर मिलते हैं, जैसे क्या हम डरपोक होते जा रहे हैं ? क्या परिस्थितियों या जिम्मेदारियों से भागने लगे हैं? या फिर किसी चित्र या शक्ल की खोज के अरण्य में भटक रहे हैं? उस चित्र का रहस्य समझ लें या उस शक्ल को पढ़ लें तो अकेलापन चुनने की जरूरत नहीं होगी. मेरे लिए सारी वजहें सोचने के बाद भी हर वजह कम पड़ जाती हैं.
रात के 2 बजे रहे हैं. मैं कैब बुक कर घर से निकल गया. खिड़की से दिल्ली के रास्तों को भागते देख रहा हूं. एक जगह मैंने ड्राइवर को रूकने के लिए कहा. देखा, कि एक लड़की एक रिक्शे वाले से तेज आवाज में बातें कर रही है. मैं कार से नीचे उतर गया. ड्राइवर बोला, सर...वो दूसरे टाइप की लड़की है. तभी लड़की की नजर मेरी आंखों से टकरा गई. वो झेंप गई. उसकी आंखों में शर्म दिखने लगा था. शायद वो नई थी. और संभवत: पैसों को लेकर अपने ग्राहक से बहस कर रही थी. मुझे देखते ही उसका स्वर कमजोर होने लगा. फिर वो बहस छोड़ वहां से चली गई. नजर मिलने की वजह से मुझे गिल्ट फील होने लगा. मैं उस लड़की से सॉरी कहना चाहता था. पर ड्राइवर ने कहा- सर, यहां से चलिए. मैं वापिस कार में था. हम अभी इंडिया गेट के आस पास कहीं थे. कुछ देर बाद मैं कनॉट प्लेस में घूम रहा था. दिल्ली की रातें तनहा होतीं हैं. कुछ पुलिसवालों के अलावा रास्ते अमूमन खाली ही रहते हैं. अभी रात के 3 बज चुके हैं और मैं आईसक्रीम खा रहा हूं. रबड़ी आईसक्रीम का टेस्ट मुझे सबसे ज्यादा पसंद है.
आज की रात अकेलेपन को मैंने संपूर्णता के साथ जीया है. अब मैं वापस घर लौट रहा हूं.

भष्मासुर

बहुत लंबे अर्से से उपन्यास वहीं पर पड़ा है. कंप्लीट नहीं कर पाने की गिल्ट हमेशा मेरे चेहरे पर चिपका रहता है. 100 पेज के करीब लिख देने के बाद उसे फाड़ कर फेंक देने की हिम्मत मैं कर चुका हूं. जबकि शो बनाते वक्त अपना लिखा एक लाइन भी डिलिट करना मेरे लिए बहुत भारी होता है. ना जाने कितने ही शो के लिए मुझे डांट पड़ चुकी है, कि इतने ड्यूरेशन का शो क्यों बनाए हो. तो फिर मैंने सौ पेज कैसे रद्दी में फेंक डाला, अब भी सोचता हूं, तो अचरज होता है. फिर सोचता हूं, उपन्यास लिखना शायद किसी किस्म का उन्माद है. और उस उन्माद से मैं अभी दूर हूं.
मेरा मानना है, जो आप सोचते हो, वो असल जिंदगी में भले ही नामुमकिन हो, मगर उसे पर्दे पर जरूर उतारा जा सकता है. जो किताब मैं एक लंबे अर्से से लिख रहा हूं, उसमें बहुत कुछ असंभव बातें हैं. मैंने एक किरदार रचा है, जो मेरे लिए ही भष्मासुर बन बैठा है. उस किरदार को मैं खुद बहुत नापसंद करता हूं, लेकिन उस किरदार के संवाद और उसकी सनक ने मुझे उसे जिंदा रखने को मजबूर कर रखा है. और उपन्यास कंप्लीट ना कर पाने की सबसे बड़ी वजह यही है. सबसे बड़ी दिक्कत है क्लाइमेक्स. मैंने उस किरदार को इतना मजबूत बना दिया है, उसके हाथों में इतनी शक्ति दे दी है, कि मैं खुद उसका विनाश नहीं कर पा रहा हूं.
इस भष्मासुर के लिए मुझे एक विष्णु की तलाश है...

संबंध

रात के 11 बज रहे थे. मैं और श्वेता जी कैंटीन में खाना खा रहे थे. तभी ज़ी हिंदुस्तान के पॉलिटिकल एडिटर असित कुणाल सर वहां आ गये. बातें होने लगी. श्वेता जी ने उनसे कहा - सर, आपका बेटा बहुत क्यूट है. एकदम नटखट प्यारा सा. सर ने कहा-- अरे वो इतना बदमाश हो गया है कि क्या बताएं. सिर्फ 10 महीने का है वो मगर इतनी शैतानियां करता है, कि हम परेशान हो जाते हैं. इतना छोटा होकर भी तरह तरह के मुंह बनाता है. सर ने अपने 10 महीने के बेटे अचिंत्य की कुछ तस्वीरें हमें दिखाई. वो सच में अलग अलग अंदाज में मुंह बना रहा था. मैंने कहा- सर, वो आगे जाकर जरूर क्रिएटिव होगा. सर ने कहा- हर संडे मैं उसे शॉवर में नहलाता हूं. और अब किसी की मजाल है कि सनडे को उसे कोई और नहला दे. वो मेरे साथ ही कंधे पर बैठकर नहाएगा.
सर से बात करते करते मुझे बचपन की मेरी कहानी याद आ गई. मुझे देर रात जगने की आदत बचपन से ही थी. पापा कभी किस्सा सुनाते हुए कहते हैं, कि मुझे आईने में खुद को देखना बहुत अच्छा लगता था. ((अभी भी लगता है)) पापा मुझे घंटों तक आईने के सामने गोद में लिए खड़े रहते थे. मैं आईने में खुद को देखते जाता और बिलग बिलग की आवाज निकालता रहता था. पता नहीं मैं उस वक्त क्या सोचता होऊंगा. लेकिन अभी मुझे लगता है, कि एक पिता अपने बच्चों की शैतानियां किस किस तरह से नहीं सहता. वो धैर्य के साथ घंटों आईने के सामने मुझे लिए खड़े रहते थे. और मैं मुंह में हाथ लिए वो एक खास तरह की आवाज निकालते रहता था.अब मैं सोचता हूं, मेरे जैसे आलसी इंसान के लिए ऐसा करना नामुमकिन के बराबर है.
रौशन और मैं किसी काम से मेट्रो से कहीं जा रहे थे. और उस वक्त रौशन को मैंने अपने बचपन की ये कहानी बताई. उसने मुझसे पूछा, अगर तुम्हारा बेटा भी ऐसा करे तो ? हालांकि अभी तक मैं इन तमाम झंझटों से काफी दूर हूं, मगर फिर भी मैंने कहा- मैं पूरे घर में शीशा लगवा दूंगा. फ्लोर भी शीशा का ही रहेगा. ताकि उसे मुझे घंटों गोदी में लिए खड़ा ना रहना पड़े. ये तो खैर मजाक में मैंने कह दिया था. लेकिन मुंबई की वो महिला मुझे याद आ गई, जो घर में कंकाल बनकर रह गई, लेकिन उसका बेटा अमेरिका से नहीं आया. जब आया तो उसकी मां की मौत के कई महीने बीत चुके थे और उनकी हड्डियों का ढांचा घर में पड़ा था. अपने बेटे से प्यार करने की ये सजा उस महिला ने पाई थी. मुझे लगता है, हमारा देश वाकई बदल रहा है. यहां मानवीय संवेदनाएं वाकई खत्म होती जा रही हैं. रिश्ते और रिश्तों की गर्माहट सिर्फ ढांचा बनकर रह गई है जहां एक मां बाप अपने बच्चों की शैतानियां सहता रहता है वहां बदले में बेटा उसे हड्डियों का ढांचा बना देता है.

अधूरा पोस्ट--

मेरे पास दो चांद कभी ना रहा और ना ही दो दिल. ना तो दो रास्ता रहा और ना ही दो मन. मैं एक पत्ता बना रहा. जब तक शाख से जुड़ा था, डाल से लटका रहा. जब हवा में था, तो हवा के साथ उड़ता रहा और जब जमीन पर आया तो धूल में सना रहा. मैं कब कहां रहा, इसकी स्मृति और भविष्य कुछ भी नहीं.
जब डाल से निकला तो प्रेम में था. जब डाल से टूटा तो प्रेम में था. जब हवा के सानिध्य में आया तो प्रेम में था और जब जमीन पर आया तब भी प्रेम में था. बुहारकर धूल में मिला देने पर भी प्रेम में रहूंगा. ये मेरी अवस्थाएं हैं. इस वक्त जब एक शो के लिए स्क्रिप्ट लिख रहा हूं, तब मुझे अपनी लिखी एक अधूरी पोस्ट याद आ गई. लो अब सुनो आगे की बात...
स्त्री के परिधान पहनकर मैं रंगमंच पर खड़ा था
साड़ी, चूड़ी, बाली, कंगन से मुझे सजाया गया था
सामने कुछ दर्शक थे, और मेरा अभिनय जारी था
मैं एक शापित देवता की प्रेयसी की भूमिका में था
जिनका मिलन संभव ना था, उसे जाना था अपने लोक
देवता रो रहा था, दर्शकों की आंखों में सहानुभूती थी
पर मुझे अंत पता था, इसलिए मैं प्रेम में ही रहा
डायरेक्टर ने कहा था, तुम्हारा प्रेम आत्मा वाला है
इसलिए तुम खुश होकर देवता को विदा करो
मैंने खुश होकर देवता को विदा किया, वो मुक्त हो गया
फिर मैं पत्ता बन गया, डाल से गिरा, धूल में मिला, पर प्रेम में रहा...

डूबने वाले ने डूबते साहिल को आवाज दी...

वो एक खिलौना भर है...टूट जाना उसकी नीयति है..। वो टूट ही जाएगा...। फिर क्यों हम करें उसकी उम्मीद...।  दूर एक धुंधला सा लैंप पोस्ट दिखता है।...