थोड़ी सी धूप...थोड़ी छांह के बीच बढ़ते कदम अचानक ठिठक कर थम चुके थे...। चारों तरफ घने और लंबे पड़ों की हरियाली और बीच में बना एक छोटा सा स्टेज..। हां, उसे मैं एक स्टेज ही कह सकता हूं...। फूस और छप्पड़ों से बना एक छोटा सा घर...आंगन में लोगों के बैठने के लिए एक छोटी सी जगह ..गोबर से पुता हुआ फर्स... बिल्कुल गांव का नजारा...। मगर, वो गांव नहीं था। एक दरबे के पास कुछ नर्तकी बैठी...अपनी बारी का इंतजार करती हुई...और दूसरी तरफ स्टेज पर...ढोलक पर थाप देते...लंबी मूंछों वाले कुछ कलाकार...। ढोलक की थाप से क्या आवाज निकल रही थी, उसे मैं बस समझने की कोशिश कर रहा था, मगर समझ नहीं पा रहा था...। शायद, समझने की कोशिश भी नहीं कर रहा था।... पर हां, ये देखते हुए मुझे अपना गांव याद आ गया...जब दशहरे के मेले में मैं जाया करता था।...
मैं उदयपुर के शिल्प ग्राम में था। स्टेज पर पांच नर्तकियां कालबेलिया डांस करने आईं। मैंने अब तक सिर्फ इस डांस के बारे में सुना था...कभी देखा नहीं था।...कालबेलिया नृत्य राजस्थान के ग्रामीण परिवेश में रहने वाले जनजातियों के रहन सहन को बखान करता है।... प्रमुख नर्तक महिलाएं होती हैं...। जो काले घाघरे पहन कर सांप के गतिविधियों की नकल करते हुए नाचती और चक्कर मारती हैं...। शरीर के ऊपरी भाग में पहने जाने वाला वस्त्र अंगरखा कहलाता है...। सिर को ओढ़नी से ढंककर रखा जाता है..। और नीचले भाग में लहंगा पहना जाता है..।
पांचों नर्तकियां अब अपने रंग में आ चुकी थीं..। सभी के पैर ऐसे थिरक रहे थे, मानो धरती पर कोई नक्काशी कर रही हों। 3 महिलाएं ज्यादा उम्र की थीं, और 2 लड़कियां आगे से नृत्य कर रहीं थीं। वो सभी नर्तकियां हंस रही थीं, मगर उनकी हंसी में मुझे कुछ भाव नज़र नहीं आ रहा था...। ये हंसने का कैसा भाव था, उसे मैं समझने की असफल कोशिश लगातार किए जा रहा था...। नृत्य की ये भंगिमा मेरे लिए बिल्कुल नया अनुभव था।... वो लहंगा को ऐसे समेट रहीं थी, मानो पूरे चांद को ढंक रही हों...।
नृत्य अब खत्म हो चुका था....। और इस बात को बीते अब कई हफ्ते हो चुके हैं।... पर अभी दफ्तर में बैठे मुझे लगा, कि उन नर्तकियों के बारे में मुझे लिख लेना चाहिए।... उनके बारे में लिख लेना चाहिए, जो 5 दर्शकों के सामने भी नृत्य करने से इनकार नहीं करतीं...। भाव...सम्मोहन..ताल...भंगिमा...सादगी....सरलता...और वो भावविहीन हंसी...। और भी बहुत कुछ...जिसे शायद फिर कभी मैं लिख सकूं.....
मुझे अभी ऐसा लग रहा है...कि मैं हवा से कहूं...कि ऐ हवा...मुझे उन नर्तकियों के पास ले चल.....