Tuesday, 30 January 2018

अधूरे रिश्ते की मुकम्मल दास्तान

जब कभी आप सम्मोहन में कैद होते हैं, तो आप एक अदृश्य दुनिया में भटकने लगते हैं। उस मूरत से मोहब्बत करने को जी चाहता है। एक अदृश्य आवाज का हम पीछा करने लगते हैं। एक मायावी घटना का आप गवाह बनना शुरू कर देते हैं। हम छायावादी प्रेम संबंध की तरफ बढ़ने लगते हैं। उम्र के फासले ....पहाड़ के हासिये पर रखे किसी पत्थर के छोटे टुकड़े की तरह किसी खाई में गिरता दिखता है। आप एक अप्रत्याशित वक्त में बंधने लगते हैं।
उन दोनों के बीच उम्र का फासला काफी ज्यादा था। पर वो उसकी तरफ काफी ज्यादा आकर्षित हो चुकी थी। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था, कि वो क्या करे। उसकी चाहना में सबसे खास बात ये थी, कि उसका मन स्वार्थविहीन था। कभी कभी उसका मन बस एक आलिंगन के लिए तरसता था। जबकि, उसे पता था, जिस चेहरे की तरफ वो आकर्षित हुई है, जिस सम्मोहन के फांस में वो फंसी है, वो पहले से ना सिर्फ शादीशुदा है, बल्कि, बड़े हो चुके दो बच्चों का पिता भी है। मगर, उसे अपनी चाहना पर कोई कंट्रोल नहीं था। और सच तो ये है, कि उस वक्त वो अपनी भावनाओं पर कोई कंट्रोल चाहती भी नहीं थी। उसे उमड़ने देना चाहती थी। मेघ की तरह... बरसने देना चाह रही थी। उसका मन बेहद कोमल था और नाजुकता के उस धागे से बिंधा हुआ था, कि उस सिचुएशन को हम निस्वार्थ प्रेम ही बस कह सकते हैं। और कुछ नहीं। जबकि, उसे पता था...कि पहले से ही किसी और संबंध में है, और उस संबंध से भी वो बाहर निकलना नहीं चाह रही थी। उसके शब्दों की मादक गंध उसके भीतर उतर चुकी थी। ज्यादा ख्वाहिश नहीं कर रही थी वो...बस एक आलिंगन चाह रही थी। एक छुअन... एक चुंबन से संतुष्ट होना चाह रही थी वो।
प्रेम का यह कौन सा रूप है मायावी ?

वो जिस छलावे के आकर्षण में कैद हुई थी, कुछ दिनों के लिए उसके अलावा और कुछ ख्याल नहीं रहता था उसे। वो इस संबंध को प्रेम का भी नाम नहीं दे रही थी, वो इसे एक पवित्र बंधन मान रही थी...। बेहद पवित्र। हालांकि, दुनिया के लिए ये संबंध काफी विचित्र...एक किस्म का पागलपन...एक किस्म की गाली हो सकती थी। पर उसके लिए ये रिश्ता आत्मा जैसा पवित्र था। बेहद पवित्र।
उस रिश्ते से उसे कुछ हासिल नहीं करना था....कुछ पाना नहीं था...। ना कोई नाम देना था। दोनों ने अपने- अपने अहसास एक दूसरे से साझा किए। कोई संबंध नहीं था उनके बीच, पर वो अजनबी नहीं रहे। किसी किस्म का कोई हक नहीं था उनका एक दूसरे के ऊपर....और ना ही किसी किस्म के वादों की जंजीर में जकड़े थे दोनों..। एक छुअन...एक आलिंगन...एक चुंबन...और कुछ वक्त सीने से लगने की ख्वाहिश थी बस उनके दरम्यां।



आकर्षण का अवसान होता है। एक निश्चित वक्त के बाद आकर्षण अपनी आखिरी सांसे ले चुका होता है। यहां भी यही हुआ। एक अजन्मा खूबसूरत रिश्ता था...जो अधूरा होकर भी मुकम्मल बन गया।



एक बड़ा दरवाजा

एक बड़ा दरवाजा है और उसमें छोटी-छोटी खिड़कियां हैं। हम बाहर झांकते हैं, और फिर चुप हो जाते है। उस वक्त हमारे मन में कुछ नहीं चलता होता है।  बाहर हमें बहुत तेज रफ्तार में भागता जीवन दिखता है। हम जीवन के रफ्तार को छूकर देखना चाहते हैं, पर हाथ छिल जाने के डर से खिड़की पर पर्दा लगा देते हैं। हम घर में अकेले होते हैं। और उस वक्त हमारे मन में मोहब्बत करने की इच्छा जग पड़ती है। हम फिर से खिड़की से पर्दा हटाकर किसी झुरझुरी याद में खो जाना चाहते हैं। 

Monday, 29 January 2018

जाड़े की धूप एक उपहार है।

उसे मैंने पहली बार धूप में खड़ा देखा था। किसी का इंतजार करते शायद। धूप की गर्मी से आंखे थोड़ी सिकुड़ी हुई लग रही थी मगर भिगी हवा की अपनी अदा होती है। ये जनवरी का आखिरी हफ्ता है। सर्दी अपने अवसान पर है। मैं भी धूप के कोने में कहीं खड़ा हुआ था, कि उसे देख लिया। हल्की हवा की सबसे खास बात ये होती है, कि इसमें आपके बाल थोड़ लहराते रहते हैं, जिन्हें संभालना अच्छा लगता है। उसे भी शायद अच्छा लग रहा होगा। मैं चाय पी रहा था। उसने अपने हैंडबैक से सिगरेट का एक डिब्बा निकाला। और फिर एक लाइटर। फिर वो सिगरेट पीने लगी। किसी का इंतजार करते वक्त सिगरेट पीते हुए अच्छा वक्त कटता है, ऐसा मैंने सुना था। आज देख रहा था। तभी एक और लड़की उसके पास आई। उसके हाथों में भी सिगरेट सुलग रही थी। दोनों गलें मिलीं। फिर सिगरेट का कश खींचा। मुझे अब धूप थोड़ी चुभने लगी थी, इसलिए मैं वापस दफ्तर आ गया। दफ्तर में शोरगुल मचा हुआ था। न्यूजरूम ऐसा ही होता है। गहमागहमी मची रहती है। हमें उस शोर की आदत होती है। और एक वक्त ऐसा आता है, कि हम उस शोर में शांति तलाशने का हूनर जान लेते हैं। मुझे लगा, कि इन बातों को लिख लेनी चाहिए। 

अकसर हम छोटी-छोटी बातों को...कहे गये कुछ जज्बातों को दर्ज करना भूल जाते हैं। मुझे याद है, मैं उस वक्त तीसरी कक्षा में था। मेरे पापा ही मुझे गणित पढ़ाया करते थे। इसलिए मैं गणित में काफी अच्छा था। मैं गणित के वही बने बनाये सवालों को बनाते बनाते ऊब चुका था। इसलिए एक शाम पढ़ते वक्त पापा से कहा, मुझे गणित में कुछ नया सीखना है। वही पुराने सवाल अब नहीं बनाना है। मैं बोर हो चुका हूं। पापा मुस्कुराने लगे। फिर बोले...ठीक है, आज औसत सिखाता हूं। मैंने पहली बार औसत का नाम सुना था। मैं खुश हो गया। पापा ने मुझे औसत बनाना सिखा दिया। चंद सवाल बनाने के तरीके जान लेने के बाद पापा वहां से चले गये। और मैं खुद से सवाल बनाने लगा। मुझे अब भी याद है, मैंने पूरा का पूरा चैप्टर खुद ही बना डाला। मुझे औसत बनाना काफी अच्छा लग रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था, कि इन सवालों को मैं पहले से ही बनाना जानता था, बस तरीका भूल गया था। पापा ने बस वो तरीका बता दिया है। मुझे वो बात अब तक याद है, जबकि उस वक्त मैं शायद 7 या 8 साल का रहा होऊंगा। हालांकि, पापा अब साथ नहीं होते। दूर रहते हैं। लेकिन, जब भी किसी मुश्किल में फंसता हूं, तो मुझे गणित का वो चैप्टर...औसत याद आ जाता है। मुझे लगता है, इस सवाल को हल करना मुझे आता है, बस मैं इस वक्त उसका तरीका नहीं जानता। फिर मैं तरीका खोजने लगता हूं। एक वक्त फिर ऐसा आता है, जब तरीका भी मिल जाता है, और परेशानी खत्म हो जाती है। तो क्या, हमारी जिंदगी में ऐसा होता है, कि परेशानी आने से पहले हमारे पास उसे सॉल्व करने का तरीका आ जाता है, बस हमें उसे थोड़ी सी मेहनत से खोजना भर होता है ? मुझे लगता है, कि मेरे इस सवाल का जवाब शायद हां मे हैं।

ऊपर मैंने जिस लड़की को धूप में सिगरेट पीते हुए देखने का जिक्र किया है, वो सरासर झूठ है। मैं न्यूजरूम में ही काफी अर्से से बैठा हुआ हूं। मैंने किसी को सिगरेट पीते हुए नहीं देखा। मुझे लगा था, कि मुझे बाहर जाना चाहिए। और मैंने अपने अक्स को बाहर चाय पीने के लिए भेज दिया। और मेरे अक्स ने किसी लड़की को सिगरेट पीते हुए की कल्पना की। जिसे मैंने अपने इस ब्लॉग में दर्ज कर लिया। हां, मगर जिंदगी औसत की तरह है, इस बात पर मैं अब तक कायम हूं।




Sunday, 28 January 2018

आलस

आलस से भरा हुआ हूं। गालिब के जूतों की तरह मन चर्र-मर्र कर रहा है। आज आवश्यकता से ज्यादा खाना खा लिया था तो आलस उसी हिसाब से है। ऐसे समय में चाय पीने की तीव्र इच्छा होने लगी, सो चाय भी पी आया। बाहर थोड़ी धूप में चाय पीना सुकून लग रहा था। आस पास कुछ कुत्ते सो रहे थे। हवा भी शांत थी। ठंड के महीने में थोड़ी धूप और हाथों में चाय...बस नींद की कमी थी। मुझे यकीन है, अगर मैं इस वक्त बिस्तर पर चला जाऊं, तो यकीनन नींद से सुलह हो जाए। और मैं गहरी नींद में सो जाऊं। दिल से कहूं, तो अभी मुझे किसी अजनबी से बात करने का मन हो रहा है। किसी अजनबी को जानने का मन हो रहा है। किसी अनजान विषय पर देर तक संवाद करने का मन कर रहा है।
जब आप किसी के बारे में कुछ नहीं जानते तो अच्छा होता है। ये बोतल में बंद शराब देखने जैसा अनुभव होता है। कभी थोड़ा पीने को जी करता है, फिर कड़वाहट के डर से उससे दूर ही रहने का मन करता है। अभी-अभी एक परिचित का फोन आया..। कुछ देर बातें करने के बाद मन ऊबने लगा...सो, किसी और से भी बात करने का ख्याल त्याग दिया। सामने टीवी स्क्रीन पर तरह तरह के चेहरे ऊभर रहे हैं...एक नजर उन्हें भी देख लेता हूं। बाबा रामदेव, पीएम मोदी, शशि थरूर दिख रहे हैं। फिर यूपी में हुए दंगे की तस्वीरें देखता हूं तो मन कोफ्त से भर जाता है। और फिर कुछ लिखने की इच्छा भी चली जाती है।




Saturday, 27 January 2018

सपना

मैं अकसर कई लोगों को सपने में देखता हूं। किसी के साथ मुलाकात का दृश्य होता है... तो किसी के साथ कुछ संवाद का। कभी कभी तो ऐसा होता है ...कि मिलने के लिए मैं प्लानिंग करता रहता हूं...वो इंतजार करते रहते हैं...मुलाकात की सारी तैयारियां पूरी हो जाती हैं...लेकिन एन मुलाकात के वक्त मैं जाग जाता हूं। इस सपने की सबसे खास बात ये होती है...कि जिससे एक बार सपने में देख लिया, उसे दुबारा नहीं देखता। कभी नहीं। अगली बार फिर कोई और शकल...। अगली बार फिर से कोई और संवाद। एक बार मैं सपने में किसी के घर खाना खा रहा था। हम साथ खाना खा रहे थे...लेकिन, खाना खाने के साथ ही सब सफेद होने लगा और मैं जग गया। फिर मैं काफी देर तक सपने के बारे में सोचता रहा। जब किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे...तो कोई और सपना देखने लगा।
मैं तुम्हें कई बार सपने में देख चुका हूं। तुम बार बार आती हो...। और बार बार तुम्हें देखने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं, कि सपने में तुम्हें बार-बार देखना किसी किस्म का चमत्कार है। हां, मैं इसे चमत्कार ही मानता हूं। मैंने अभी तक किसी को तुम्हारा नाम नहीं बताया है। सच तो ये है..कि मैं खुद तुम्हारा नाम नहीं जानता। हां, सपने में मैं तुम्हें कई बार कहना चाहता था, कि तुम बहुत सुंदर हो। हां, बस इतना ही कहना था। ना इससे कुछ ज्यादा और ना ही इससे कम। बहुत सारे झूठ के बीच मैंने सोचा कि आज तुम्हें ये सच बात दूं। और अगर तुम फिर भी इसे झूठ समझोगी, तो इससे प्यारा झूठ और क्या हो सकता है।
मेरा मन कहता है, कि जिसे मैं सपने में देखूं, उसे इस बात की जानकारी दे दूं, पर मैं ऐसा नहीं करता। क्योंकि, इससे सवालों का सिलसिला शुरू होगा। और मैं किसी सवाल का जवाब नहीं देना चाहता। क्या होगा इतने सारे सवालों का जवाब देकर..? इसलिए मैंने सपने के बारे में किसी को बताने की बात त्याग दी। अब ऐसा होता है...कि मैं सपने में किसी को देखता हूं। फिर मैं उसके और अपने संबंध के बारे में सोचता हूं। एक धुंध में कुछ देर खुद को घिरा पाता हूं।...और फिर सब भूलकर वापस सो जाता हूं। जैसे अभी सो रहा हूं।

Monday, 22 January 2018

तो क्या मैं ऊड़ जाऊं... ?

थोड़ी धूप निकल आई थी। और मैं कुर्सी लेकर छत पर धूप सेंकने पहुंच गया। एक लंबे अर्से के बाद छत पर यूं धूप में बैठना कुछ अच्छा लग रहा था। सामने की छत पर दो महिलाएं बातें करने में मशगूल थीं और साथ में दो छोटे-छोटे बच्चे किताबें खोलकर पढ़ रहे थे। पढ़ कम रहे थे, झूल ज्यादा रहे थे। बिल्कुल मेरी तरह। मुझे याद है, जब मैं बचपन में पढ़ता था, तो हिंदी की कोई कविता पढ़ते वक्त कुछ इसी तरह से मशगूल हो जाया करता था। ज्यादातर कविताएं मुझे याद रहती थीं, इसलिए किताब देखे बगैर ...आंख मूंदकर मैं जोर-जोर से कविताएं पढ़ता रहता था। मेरी आवाज छत से होते हुए कई घरों तक पहुंचती रहती थीं। मां को लगता था, कि मैं पढ़ाई में मशगूल हूं। जब कभी गणित बनाने बैठता, तो चप्पलें खाकर पढ़ाई खत्म होती थीं। हर बच्चे बचपन में एक जैसे ही होते हैं। वो बच्चा भी झूल झूलकर पढ़ रहा था। मेरे सामने छत के मूंडेर पर एक कबूतर आ बैठा है। पंख फड़फड़ाता हुआ। मैं मुस्कुराते हुए कबूतर देखने लगा। कबूतरों की सबसे खास बात ये होती है, कि उनका गर्दन स्थिर नहीं रहता। हर वक्त गर्दन में एक हलचल मचा रहता है, बिल्कुल मेरे मन की तरह । इधर से ऊधर भटकता हुआ। कबूतर का गर्दन या मेरा मन...बात बराबर।
कबूतर को सामने देख मुझे मेरे साथी की याद आ गई। और मैं नीचे चाय बनाने आ गया। अकसर चाय बनाते वक्त मेरा साथी मेरा साथ मौजूद रहता था। हम अकसर बातें करते थे। लेकिन, अब वो नहीं है। कबूतरों का सिर्फ गर्दन ही नहीं, मन भी बहुत चंचल होता है। एक जगह नहीं ठहरते। मेरा साथी भी नहीं ठहरा। चाय उबल रही थी...। चाय बनाते वक्त अकसर मैं सपने देखना शुरू कर देता हूं। हम जैसे लोगों के लिए सपने कितने मायने रखते हैं। सपना देखते वक्त हम बेहद खामोश होते हैं। और धीरे-धीरे हमारे लिए हर एकांत कम एकांत लगने लगता है। भीड़ भी हमारे लिए अकेलापन बन जाता है। और सपना खत्म होते होते हमारे चेहरे पर एक मुस्कान तैरने लगती है। हम हौले से मुस्कुरा देते हैं। मैं कभी-कभी दफ्तर जाते वक्त मेट्रो में भी मुस्कुरा देता हूं। सच कहूं तो मुझे मुस्कुराना अच्छा लगता है। और दूसरा सच ये है...कि हमारे जैसे लोग सपनों की बदौलत ही जिंदा रहते हैं। जिस दिन हमारा ये सपना खत्म हो जाएगा, हम खत्म हो जाएंगे। सपनों ने हमें जिंदा रखे हुआ है। सपनों के बारे में एक खास बात बताऊं ? हम जब भी सपने देखते हैं, हम आसमान की तरफ देखने लगते हैं। आसमाने में उस वक्त क्या होता है, वो हमें पता नहीं चलता । हमारी आंखों के सामने बादलों का धुंध होता है। और हम उस धुंध में कुछ तलाशने की कोशिश करते रहते हैं। सच में...सपने देखते वक्त हम कबूतर बन जाते हैं, और बादलों के बीच से दाने चुगते रहते हैं। और जब बादलों का धुंध छंट जाता है, तो हम मुस्कुरा देते हैं।


तो क्या मैं ऊड़ जाऊं।...थोड़े कच्चे पंख हैं...और कबूतर वाले मन हैं, जो...बांह पसारे उड़ने की इजाजत मांग रहा है। तो क्या मैं ऊड़ जाऊं... ?






सफल किरदार...असफल किरदार

क्या असफल रहते हुए सफल संवाद लिखे जा सकते हैं ? क्या बिना सफलता मिले किसी कहानी में किसी किरदार को अंत में संघर्षों के बाद उसे सफलता के शिखर पर चढ़ा हुआ लिखा जा सकता है ? आसान शब्दों में अगर मैं कहूं, तो क्या उस कहानी को...उस किरदार को सफल माना जाएगा। या फिर उसे सिर्फ दिमागी वहम मानकर सिरे से खारिज कर दिया जाएगा। काफी शंकाओं के बीच मैंने कई कहानिया शुरू कीं, मगर उसे बीच में ही अधूरा छोड़ उस कहानी को लिखना बंद कर दिया। वो किरदार अकसर मुझसे शिकायत करते रहते हैं। मगर, मैं उसे पूरा करने से कतराता रहता हूं। बिना मेरे सफल हुए मेरी कहानी का किरदार कैसे सफल हो सकता है। या फिर, जब मेरी कहानी का किरदार सफल होगा, उसके बाद मुझे सफल माना जाएगा। एक झिझक है...एक डर है... कहानी को आगे बढ़ाने के खयाल से ही हाथों में कंपन होने लगती है, और मैं कहानी को पूरा करने का खयाल त्याग किसी और कहानी की तलाश में लग जाता हूं। 
जैसे मैं चाहता हूं, कि मेरी कहानी का एक किरदार अंत में जाकर...कई सारे संघर्षों से जूझते हुए अपना मुकाम हासिल कर ले...लेकिन, मैं उसे सफल नहीं बनाता। संघर्षों के साथ उसे छोड़ देता हूं। मुझे लगता है, कहानी तो उसी की बनती है ना...जो सफल हो चुका है। और जो सफल नहीं हुआ है, भला उसकी कहानी कैसे बन सकती है। उसके संघर्षों से लोग क्या सीखेंगे ? उसके संघर्षों को जानकर लोग क्या करेंगे ? जैसे आज सुबह मेरे अजीज मित्र ने मुझसे कहा... कि या तो तुम भविष्य में काफी बड़े राइटर बन ही जाओगे, या फिर बर्बाद ही हो जाओगे। मैंने भी अपने बारे में यही अनुमान लगा रखा है। वैसे बर्बाद होने का अनुमान कुछ ज्यादा है। 
वैसे आजकल मैं सोच रहा हूं, कि एक रिस्क ले लिया जाए। कुछ किरदारों को सफल कर देते हैं। संघर्षों का नजीता और कहानी का अंत हैप्पी कर देते हैं। लेकिन एक सवाल जो अभी मेरे मन में है, कि क्या किसी किरदार को सफल कर देने पर मैं खुश हो पाऊंगा ? पता नहीं, अभी मेरे पास इसका जवाब नहीं है। और इसके लिए मुझे किसी कहानी को उसके अंजाम पर पहुंचाना होगा। 

अनजान आदमी

मैं एक आदमी को जानता हूं, जो दिन में कई दफे कमरे का दरवाजा खोलकर बाहर आता है।...और फिर कमरे में वापिस दाखिल हो जाता है। उसे लगता है, कमरे के उस पार कुछ है, जिसकी आहट वो सुनता रहता है। हर आहट पर वो चौंक जाता है...मगर, किसी को उस पार नहीं पाकर वापस दरबे में सिमट जाता है। अगर उसकी कहानी बस इतनी भर रहती तो अच्छा होता...पर उसकी कहानी उस कमरे के आयताकार जगह में खत्म नहीं होती। उसे कभी-कभी लगता है, कि वो असंभव से बिखराव को एक धागे में पिरोने की कोशिश कर रहा है। उसके बाल काफी बड़े-बड़े हो चुके हैं। दाढ़ी पर सफेदी छाने लगी है। चेहरा धुंधला दिखने लगा है। लोगों से घिरा रहने पर भी अकेलेपन का शिकार रहता है। मैंने कई दफे उससे संवाद करने की कोशिश की...पर हर बार असफल रहा।    

Sunday, 21 January 2018

शिद्दत

पूरी शिद्दत के साथ सुबह हमने जो काम शुरू किया था, शाम होते होते वो एक गोलाकार में सिमटने लगता है. रात हो जाती है, और वापिस कमरे में बैठकर हम कहते हैं, दुनिया गोल है. रात होने तक हम इस गोलाकार का एक चक्कर लगा चुके होते हैं, और अंत में बिस्तर पर पड़ी सिलवटों को छूकर कहते हैं, लो फिर से हम उद्गम के पास आ गये. हम घूमते-घामते वहीं आ जाते हैं, जहां से हमने ये यात्रा शुरू की थी. दरअसल हम घूमते कम हैं, भटकते ज्यादा हैं. इस भटकने के खेल में हमारा शरीर कब सो जाता है, हमें पता नहीं चलता. पर भटकने के इस अंतराल में हमारा मन कुछ कहानियों का निर्माण कर बैठता है, और हमारे सपनों में उन कहानियों के किरदार हमें तमाशा दिखाना शुरू कर देते हैं.  

Saturday, 20 January 2018

डाकू खड़गसिंह एक अच्छा इंसान है।


मुझे लगता है, कि मेरे पास दो मन है..। और दोनों आपस में बातें करते रहते हैं।.. उनकी बातें अकसर मैं नहीं जान पाता हूं। पर, फुसफुसाहट मैं सुनता रहता हूं। मुझे लगता है, कि वो बात करते वक्त गुप्त शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, या फिर ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं, जिसे मैं नहीं समझ सकूं। हां, मेरे दोनों मन इतना रहम जरूर मुझपर करते हैं, कि जब वो दोनों आपसे में बातें करना खत्म कर लेते हैं, तो उसका निचोर मुझे बता देतें हैं।..या फिर मैं ये कह सकता हूं, कि मुझे समझा देते हैं।.. दोनों मनों के बीच का संवाद लगातार चलता रहता है। और मैं इस बात से अकसर हैरान रह जाता हूं, कि मेरे पढ़े के मुताबिक, मेरे शरीर में एक मन, एक आत्मा और एक दिल होना चाहिए।...मगर, मैं साफ महसूस कर पाता हूं, कि आत्मा चुप है, दिल शांत है...मगर दोनों मन...प्रिय दोस्तों की तरह ही आपस में बातें कर रहे हैं..।

काफी दिनों की मेहनत के बाद आखिरकार वो पल आ ही गया, जब मैंने मनों के बीच की भाषा को समझना सीख गया। और फिर एक दिन फुर्सत निकालकर मैं उनकी बातों को सुनने के लिए किसी चुगलखोर की तरह बैठ गया।
मन 1- मुझे काफी दिनों से जलेबी खाने का मन कर रहा है। सोच रहा हूं, किसी दिन जब चैन से बैठूंगा, तो ढाई सौ ग्राम जलेबी खरीदकर दुकान से लाऊंगा, और फिर बैठकर अकेले पूरा खा जाऊंगा।
मन 2- पर उतना जलेबी तुम अकेले कैसे खा पाआगे।
मन 1- हां, जानता हूं, उतना जलेगी अकेले नहीं खा पाऊंगा, मगर खाने के बाद दोने में जो जलेबी बचेगी, उसे देखकर अहसास होगा, कि अभी मैं फुर्सत में हूं, और अभी अभी मैंने ढेर सारी जलेबी खत्म की है।
मन 2- हां, ये तो है।
मन 1- और तुम क्या सोचते रहते हो ? बहुत देर से गुमशुम चुप उदास बैठे हो ?
मन 2- नहीं, मैं उदास नहीं बैठा हूं...सोच रहा हूं, कि कोई ऐसा होता, जिससे मैं अपनी सारी फरमाईशें सुनाता...और वो मेरी हर फरमाईशें पूरी कर देता ?
मन 1- क्या फरमाईशें हैं तुम्हारी ?
मन 2- कुछ नहीं...बस जैसे मैं तुम्हें जलेबी लाने के लिए कहता, और तुम फौरन बाजार से जलेबी ले आते...

पहला मन हंस पड़ता है। उसे देख दूसरा मन मुस्कुरा उठता है। दोनों एक दूसरे का हाथ थाम लेते हैं। काफी देर तक यूं ही बैठे रहते हैं। मैं उनकी बात चुपचाप सुनता रहता हूं। 


सच तो ये है कि...मैं जोर से चिल्लाना चाहता हूं। चीजों को तोड़ डालना चाहता हूं। हर सामान...जो भी मेरे आसपास है...सारी चीजों को बुकनी-बुकनी कर डालना चाहता हूं। जो भी हाथ लगे..। और फिर घंटों बैठकर टूटे-बिखड़े पड़े सामानों को देखना चाहता हूं। फिर उन्हें छूकर जोड़ देने के बारे में सोचूं। और जब उन्हें किसी तरह से जोड़ ना पाऊं, तो उन्हें बुहारकर घर के किसी कोने में जमा कर दूं। मैं असल में अपनी यादों के साथ कुछ ऐसा ही करता हूं। दूसरा मन शून्य की तरफ देखते हुए अपनी बात कहे जा रहा था...और पहला मन उसकी बात सुनता जा रहा था। दूसरे मन की आंखे एकदम से स्थिर हो चुकी थीं। चेहरा दायीं तरफ मुड़ा हुआ था।
मैं, उन दोनों को चुपचाप छिपकर बस निहार रहा था। चारों तरफ खामोशी सी फैली हुई थी। हवा भी शोर नहीं मचा रही थी। दूसरा मन हल्का-हल्का सांस लेते हुए फिर बोल पड़ा...असल में हमें चिल्लाकर कह देनी चाहिए, सब ठीक है। सब शांत है। लेकिन हम ऐसा नहीं करते हैं। मैंने ऐसा करने की एक बार कोशिश की थी, पर कर नहीं पाया था। मैंने देखा था, कि एक आदमी...मेट्रो में पहले तो कुछ-कुछ धीरे-धीरे बोल रहा था, फिर अचानक जोर से चिल्ला पड़ा। मेट्रो में तमाम लोग उसकी तरफ देखने लगे। वो फिर शांत हो गया। कुछ पल उसे देखने के बाद लोग अपनी-अपनी में मशगूल हो गये। कुछ अभी भी हंस रहे थे। कुछ उसके बारे में पता नहीं क्या बातें करने लगे। उस आदमी को देखने के बाद मैंने चिल्लाने का प्लान त्याग दिया था। 
असल में पता नहीं मैं क्या चाहता हूं। मैं चाहता हूं, तुम मुझे गले से लगा लो। कुछ देर यूं ही गले से लगाकर रखो। फिर हम सो जाएंगे। चैन से। और मुझे भी नींद आ जाएगी। 

मैं वहां से निकल गया, दोनों मन को आपस में बातें करता हुआ छोड़कर। मैं किसी धुंध में खो जाना चाहता था। मैं पहाड़ों की तरफ निकल गया। खाईयों को देखने लगा। अनंत तक गहराईयों के बीच अनंत चोटियां...और चोटियों के बीच तरह-तरह के पेड़ पहाड़ों में जड़ जमाए खड़े थे। उनके बीच धुंध का डेरा था। कई छोटे फूल धुंध में खोए थे, ठीक उसी तरह जैसे मैं पहाड़ों के बीच खोया हुआ हूं। मुझे कहां जाना है, कहां ठहरना है, कहां से वापस आ जाना है, मुझे पता नहीं है। मैं पीपल, इमली छोड़कर बरगद की छाया तलाश रहा हूं। एक बरगद का पेड़ मेरे गांव के स्कूल में था। हम वहीं पढ़ते थे। मास्साब, हमें बरगद के घने साये में पढ़ाते थे। मुझे शुरू से कहानियां पढ़ने में अच्छा लगता था। मैं कहानियों में खो जाया करता था। मुझे याद है, बरगद के नीचे मास्साब हमें हिंदी पढ़ा रहे थे। फिर उन्होंने मुझे हिंदी किताब की किसी भी एक कहानी का संक्षिप्त विवरण सुनाने को कहा था। मैं क्लास में खड़ा हो गया और किताब की एक कहानी सुनाने लगा। बाबा भारती और उनके प्यारे घोड़े की कहानी। कहानी का नाम 'हार की जीत' था। मैंने शुरू किया... मां को अपने बेटे और किसान को अपनी लहलहाती फसल देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। कहानी में बाबा भारती का घोड़ा खड़गसिंह नाम का एक डाकू धोखे से चुरा लेता है। बाबा भारती काफी दुखी हो जाते हैं। लेकिन, फिर डाकू खड़गसिंह के अंदर का इंसान जाग उठता है, और वो बाबा भारती को उनका प्यारा घोड़ा वापस कर देता है। मैंने पूरी की पूरी कहानी वैसे का वैसा सुना दिया। मास्साब खुश हो गये। उन्होंने मुझे कहा...तुम एक दिन काफी अच्छा लिखोगे। मैं उस दिन काफी खुश हो गया था। पूरे क्लास में हर किसी के चेहरे की तरफ देख रहा था। सब मुझे देख रहे थे। मुझे वो घटना अब तक याद है। पर मुझे अब लगता है, कि मेरे पास भी एक घोड़ा था...जिसे किसी डाकू खड़गसिंह ने चुरा लिया। धोखे से...और मैं अपने प्यारे घोड़े के खोने से काफी दुखी हूं। लंबे अर्से हो चुके हैं, मेरे प्यारे घोड़े को मुझसे दूर गये हुए...पर डाकू खड़गसिंह अब तक मेरा घोड़ा लेकर नहीं आया है। उसके अंदर का इंसान अब तक नहीं जगा है। मैं हर दिन एक बार अपने कमरे को अच्छे से देखता हूं, कमरे में घोड़े के हिनहिनाने की आवाज तलाशता हूं...और हर दिन मायूस हो जाता हूं। और फिर मुझे स्कूल का वो बरगद पेड़ और मास्साब की शाबाशी याद आने लगती है। बचपन में मां कहती थी, मास्साब जान लेते हैं, कि उनका कौन सा छात्र पढ़ने वाला है, और कौन सा छात्र आगे जाकर क्या बनने वाला है। मास्साब ने मुझे एक अच्छा रायटर होना बताया था...पर मैं अब तक नहीं बन पाया। पता नहीं, मैं कब तक जिंदा रहूंगा ? पता नहीं, मैं इस धुंध में कब खो जाऊंगा ? पता नहीं, मास्साब का कहा हुआ सच होगा या नहीं...? मैं एक बार फिर से स्कूल जाना चाहता था। मुझे लगता था, कि शायद उस बरगद के नीचे मेरा वो घोड़ा डाकू खड़गसिंह बांधकर चला गया होगा...। पर बाद में मुझे पता चला...कि स्कूल में बरगद का वो पेड़ अब नहीं रहा। लोग बताते हैं, स्कूल में नया बिल्डिंग बनना था, इसलिए उसे काट दिया गया। मैं समझ गया...कि डाकू खड़गसिंह मेरा घोड़ा लेकर आया होगा, मगर बरगद का पेड़ उसे मिला नहीं होगा, इसलिए वो घोड़ा छोड़कर कहीं और चला गया। मेरा घोड़ा अब इस दुनिया में खो चुका है।..कहीं, भटक चुका है। जरूरत ने बरगद के पेड़ को काट दिया। जरूरतें एक अच्छी किस्म की आड़ी या कुल्हाड़ी होती हैं। वो कभी भावनाओं को काट देती हैं, तो कभी आपकी इच्छाओं को..। डाकू खड़गसिंह अब भी एक अच्छा इंसान है, मगर उसे बरगद का पेड़ ही नहीं मिला, जहां वो मेरे घोड़े को बांधकर जाता।


डूबने वाले ने डूबते साहिल को आवाज दी...

वो एक खिलौना भर है...टूट जाना उसकी नीयति है..। वो टूट ही जाएगा...। फिर क्यों हम करें उसकी उम्मीद...।  दूर एक धुंधला सा लैंप पोस्ट दिखता है।...