मैं चाह रहा था कि सबसे परे कभी मैं अपनी व्यस्तता के बारे में लिखूं। लेकिन रूटीन का काम करना मुझे अच्छा नहीं लगता । फिर भी तमाम अपेक्षाओं का गला घोंट मैं रूटीन का काम ही करता हूं। एक किताब लिख रहा हूं एक लंबे अर्से से, कई दिनों बाद उसमें चंद पन्ने जोड़ देता हूं, हालांकि अपनी किताब के किरदारों से मेरी बात अकसर होती रहती है लेकिन उन्हें शब्दों का रूप देने से मैं ज्यादातर वक्त कतराता हूं। उन्हें मैं अंदर ही रखने की कोशिश करता हूं, और कहानी के रोमांच को खुद में महसूस करता हूं।
एक डर सा लगा रहता है उन किरदारों को पन्ने पर कुरेदने से। उनके सामने आने का डर लगा रहता है। सामने आने पर मैं उनसे क्या बातें करूंगा, उनके सवालों का क्या जवाब दूंगा। वो मुझसे पूछ सकते हैं, कि मेरा क्या कसूर था, मुझे क्यों रचा, इसमें तुम्हारा क्या फायदा है.... इन सवालों का कोई जवाब नहीं होता मेरे पास और मैं किरदारों से मन में ही बात करता रहता हूं।
मेरी किताब का एक किरदार बेहद निर्दयी है, वो बेहद क्रूर भी है। ये दोनों शब्द एक हैं लेकिन उसके ऊपर दोनों सही मालूम होते हैं। वो पता नहीं क्यों लेकिन अपनी क्रूरता से मुझे गुस्सा दिला देता है। मैं उसे डांटने की कोशिश करता हूं, उससे नफरत तक करने लगता हूं, लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। वो अट्टहास करता है। उसके हाथों में एक अजीब सी शक्ति है, और उस शक्ति का नाजायज, गलत इस्तेमाल करने में उसे मजा आता है। मैं उसका अंत कैसे करूं, ये मुझे समझ नहीं आ रहा। कभी-कभी मैं सोचता हूं, कि कहीं मेरी हालत शिवजी जैसी तो नहीं हूई...क्या मैंने अपने पीछे किसी भष्मासुर को लगा लिया है ? क्या मुझे किसी विष्णु की जरूरत है। फिर मैं सोचने लगता हूं, कि अगर मैंने भष्मासुर पैदा किया है, तो मुझे एक विष्णु का भी निर्माण करना चाहिए। वो विष्णु जो इस भष्मासुर का अंत कर सके और मैं सुकून से सांस ले सकूं।
एक डर सा लगा रहता है उन किरदारों को पन्ने पर कुरेदने से। उनके सामने आने का डर लगा रहता है। सामने आने पर मैं उनसे क्या बातें करूंगा, उनके सवालों का क्या जवाब दूंगा। वो मुझसे पूछ सकते हैं, कि मेरा क्या कसूर था, मुझे क्यों रचा, इसमें तुम्हारा क्या फायदा है.... इन सवालों का कोई जवाब नहीं होता मेरे पास और मैं किरदारों से मन में ही बात करता रहता हूं।
मेरी किताब का एक किरदार बेहद निर्दयी है, वो बेहद क्रूर भी है। ये दोनों शब्द एक हैं लेकिन उसके ऊपर दोनों सही मालूम होते हैं। वो पता नहीं क्यों लेकिन अपनी क्रूरता से मुझे गुस्सा दिला देता है। मैं उसे डांटने की कोशिश करता हूं, उससे नफरत तक करने लगता हूं, लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। वो अट्टहास करता है। उसके हाथों में एक अजीब सी शक्ति है, और उस शक्ति का नाजायज, गलत इस्तेमाल करने में उसे मजा आता है। मैं उसका अंत कैसे करूं, ये मुझे समझ नहीं आ रहा। कभी-कभी मैं सोचता हूं, कि कहीं मेरी हालत शिवजी जैसी तो नहीं हूई...क्या मैंने अपने पीछे किसी भष्मासुर को लगा लिया है ? क्या मुझे किसी विष्णु की जरूरत है। फिर मैं सोचने लगता हूं, कि अगर मैंने भष्मासुर पैदा किया है, तो मुझे एक विष्णु का भी निर्माण करना चाहिए। वो विष्णु जो इस भष्मासुर का अंत कर सके और मैं सुकून से सांस ले सकूं।