Tuesday, 28 February 2017

भष्मासुर

मैं चाह रहा था कि सबसे परे कभी मैं अपनी व्यस्तता के बारे में लिखूं। लेकिन रूटीन का काम करना मुझे अच्छा नहीं लगता । फिर भी तमाम अपेक्षाओं का गला घोंट मैं रूटीन का काम ही करता हूं। एक किताब लिख रहा हूं एक लंबे अर्से से, कई दिनों बाद उसमें चंद पन्ने जोड़ देता हूं, हालांकि अपनी किताब के किरदारों से मेरी बात अकसर होती रहती है लेकिन उन्हें शब्दों का रूप देने से मैं ज्यादातर वक्त कतराता हूं। उन्हें मैं अंदर ही रखने की कोशिश करता हूं, और कहानी के रोमांच को खुद में महसूस करता हूं।
एक डर सा लगा रहता है उन किरदारों को पन्ने पर कुरेदने से। उनके सामने आने का डर लगा रहता है। सामने आने पर मैं उनसे क्या बातें करूंगा, उनके सवालों का क्या जवाब दूंगा। वो मुझसे पूछ सकते हैं, कि मेरा क्या कसूर था, मुझे क्यों रचा, इसमें तुम्हारा क्या फायदा है.... इन सवालों का कोई जवाब नहीं होता मेरे पास और मैं किरदारों से मन में ही बात करता रहता हूं।
मेरी किताब का एक किरदार बेहद निर्दयी है, वो बेहद क्रूर भी है। ये दोनों शब्द एक हैं लेकिन उसके ऊपर दोनों सही मालूम होते हैं। वो पता नहीं क्यों लेकिन अपनी क्रूरता से मुझे गुस्सा दिला देता है। मैं उसे डांटने की कोशिश करता हूं, उससे नफरत तक करने लगता हूं, लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। वो अट्टहास करता है। उसके हाथों में एक अजीब सी शक्ति है, और उस शक्ति का नाजायज, गलत इस्तेमाल करने में उसे मजा आता है। मैं उसका अंत कैसे करूं, ये मुझे समझ नहीं आ रहा। कभी-कभी मैं सोचता हूं, कि कहीं मेरी हालत शिवजी जैसी तो नहीं हूई...क्या मैंने अपने पीछे किसी भष्मासुर को लगा लिया है ? क्या मुझे किसी विष्णु की जरूरत है। फिर मैं सोचने लगता हूं, कि अगर मैंने भष्मासुर पैदा किया है, तो मुझे एक विष्णु का भी निर्माण करना चाहिए। वो विष्णु जो इस भष्मासुर का अंत कर सके और मैं सुकून से सांस ले सकूं।

Sunday, 26 February 2017

आम का पेड़

मुझे गांव में सुबह होते देखना अच्छा लगता है। गांव में मुझे दरवाजे पर बैठ कर अतीत को सोचना अच्छा लगता है। गांव की सुबह शहरों की तरह कुम्हलाई नहीं होती है। बिना किसी दाग के होती है। साफ...स्वच्छ, धुली हुई। मैं दालान पर बैठा हुआ हूं। सामने गिलहरियां खेल रही हैं। गिलहरियों ने तो आपस में होड़ लगा रखा है, पेड़ पर चढ़ने-उतरने का। कभी एक जीतती है, और मुंह बनाकर दूसरे को चिढ़ाने लगती है और फिर से रेस शुरू। मैं गिलहरियों को पेड़ पर चढ़ते देखता हूं, मुस्कुराता हूं स्थिर नजरों से। कितना शांत है सब कुछ। इतना शांत कि हवा की खामोशियां भी कानों में गुंज रही हैं। ऐसे ही दिन हुआ करते थे, जब मैं दालान से चिपकी सीढ़ियों से कभी तेज...तो कभी धीमें उतरता था, पौधों को पानी देने के लिए। मुझे पेड़ लगाना बेहद पसंद था। मुझे पौधों को बढ़ते हुए देखना अच्छा लगता था। मैं हर दिन पौधों की लंबाई नापता था और उस दिन खुशी से चिल्ला पड़ता था, जब उनकी लंबाई थोड़ी बढ़ जाती थी। मैं पूरे घर में कोहराम मचा देता था। दादाजी को खींचकर ले जाता था पौधे की बढ़ृी लंबाई दिखाने। और जब वो मेरे साथी हामी में सिर हिलाते और मुझे देखकर हंसने लगते तो मैं भी उनके साथ हंसने लगता था। मैं दादाजी से पूछने लगता था, कि हम पौधों जैसे क्यों नहीं बढ़ते हैं। हम अपनी लंबाई को बढ़ते हुए कब देखेंगे? दादाजी मुस्कुराते हुए हर बार अलग-अलग जवाब देते थे, और मै उनके जवाब को सत्य मानकर पूरे गांव का चक्कर लगा आता था।
वो पौधा जिसे मैंने दादाजी के साथ मिलकर लगाया था, वो अब आम का पेड़ बन चुका है। दादाजी जब दुनिया से जा रहे थे तो आखिरी बार उन्हें उसी पेड़ के नीचे रखा गया था। मैं उस वक्त तक गांव से दूर हो चुका था। और जब दादाजी के जाने के बाद गांव आया तो देखा कि दादाजी आम के पेड़ के साये में सोए हुए हैं। कितना बड़ा हो चुका था ये पेड़। एक रिश्ते की ही तो ये कहानी है। मैं, मेरे दादाजी और मेरा आम का पेड़। हमारे साथ पला, हमारे साथ बढ़ा। दादाजी के जाने के बाद मैं अकसर आम के पेड़ को हाथों में कसकर पकड़ लेता था। मुझे लगता था कि मैं दादाजी के सीने से सिमटा हुआ हूं। आम के पेड़ के साथ मेरे संबंध और गहरे हो गये। अब मैं अपनी निजी तकलीफें उसे सुनाने लगा। आम का पेड़ मेरे लिए एक गुप्त कोना बन गया।
धीरे-धीरे मुझे समझ में आने लगा कि इंसानी रिश्ते और पेड़-पौधें आपस में जुड़े होते हैं। हमें खुशी देखकर पेड़ अपने तनों को प्रसन्न होकर हिलाने लगता है। हमें दुखी देखकर तने कुम्हला जाते हैं, स्थिर हो जाते हैं। इस रिश्ते में इंसानी रिश्तों की तरह बेमानी नहीं होता। हम अपने रिश्ते में कितना बेमानी करते हैं। दरअसल, हम नाटक कर रहे होते हैं रिश्तों को निभाने की। हम अलग-अलग किरदारों में खुद को बांट लेते हैं और किरदार अपनी-अपनी भूमिका निभाने लगता है।
कुछ दिनों पहले मैं एक प्रेमी के किरदार में था। एक लड़की मेरी प्रेमिका की भूमिका में थी। हम दोनों अपने-अपने रिश्ते को निभाने का वादा करते थे। कभी-कभी ये वादा, दावा भी बन जाता था। हम दोनों एक दूसरे के साथ खुश होने का अभिनय करने लगे। कई महीनों तक ये अभिनय चलता रहा। मैं अपने किरदार के प्रति समर्पित था। हर सुबह उसे बाइक से उसके दफ्तर छोड़ने जाना और तय वक्त पर उसे वापस घर छो़ड़ना इस नाटक का हिस्सा था। ये सिलसिला महीनों चलता रहा। एक दिन उसने नाटक से अपना हिस्सा खत्म करने की बात कह दी। अब इस नाटक में अकेला मेरा किरदार बचा। मेरे किरदार ने अपनी भूमिका बदल ली। दुखी होने का, सदमें में रहने का अभिनय करने लगा। वो शराब पीने लगा। चंद महीनों में शराब पर लाख रुपये से ज्यादा खर्च करने के बाद मैं अपने किरदार का गला घोंटने में सफल रहा। और वो नाटक पूरी तरह से खत्म हो गई। जब मैं आम के पेड़ से बात कर रहा था, तो मुझे लगा कि शायद पेड़-पौधों के पास एक अलग तरह की आत्मा होती है। इंसानों से बिल्कुल अलग। मैंने आम के पेड़ को अपनी निजी कहानी सुनाई। उसने अपने अंक में मुझे भर लिया। मैं अब राहत महसूस कर रहा था। और आम का पेड़ हवा के झोंकों के साथ लहरा रहा था। 

रचना और मेरा गुस्सा

मैं हंस रहा था. मैं खुश था. मैं बातचीत कर रहा था. मुझे भूख लग रही थी और काम खत्म करने के साथ ही मैं खाना खाने के लिए कैंटीन चल गया। लेकिन कैंटीन में बने खाने को देखते ही मैं बुरी तरह अंदर ही अंदर झल्ला उठा। आलू की अजीबोगरीब सब्जी, काली दाल, और अजीब तरह के दिख रहे पनीर को देखकर मैंने खाने की इच्छा का त्याग कर दिया। दफ्तर से बाहर निकलकर एक प्याली चाय पी, मगर चाय भी ठीक से नहीं पी पा रहा था। पहले मैं गुस्से से भरा था, फिर निराशा से भर गया। अचानक कुछ ही पलों में हर चीज में मुझे निराशा दिखाई देने लगी। मुझे अपने लिखने से निराशा होने लगी है। काम से मन उचट गया और अब मैं बेहद अकेला रहना चाहता हूं, मगर दफ्तर में शोर पसरा हुआ है और ये शोर मुझे चीरने लगी है। मैं हर चीज को तोड़ देना चाहता हूं, फोड़ देना चाहता हूं और इतने सारे मूड स्विंग्स के बीच मैंने लिखना शुरू कर दिया है।

लिखना मुझे अच्छा लगता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कैसे लिखता हूं, क्या लिखता हूं , मेरे पास अकसर लिखने को कुछ होता भी नहीं है और उन पलों में मैं खोया रहता हूं, लिखने के लिए कुछ तलाशता रहता हूं। दोस्तों के साथ होते हुए भी मैं खुद को अकेला कर लेता हूं। मुझे लगता है, शायद अकेलेपन की स्थिति में मैं कोई कहानी लिख दूं, कोई कविता गढ़ दूं, कोई लेख लिख दूं, या कोई शायरी ही मेरे दिमाग में आ जाए...लेकिन अकसर ऐसा नहीं होता...खामोशी का अंधेरा विराना ही रहता है और मैं खोया हुआ बोलता हूं, खाता हूं, पीता हूं...। लिखना मुझे क्यों सुकून देता है इसे मैं समझने की कोशिश करता हूं, लेकिन आज तक समझ नहीं पाया। लिखने से मुझे क्या हासिल होता है, पता नहीं। फिर मैं कुछ लिखना क्यों चाहता हूं।

अभी अचानक लिखने के दौरान मुझे लगा, कि क्या रचना करने से मुझे खुशी होती मिलती है। क्या कुछ रचकर मैं अपने अंदर पसरे खालीपन को भर लेता हूं। रचना...अचानक ये शब्द मुझे अच्छा लगने लगा है। मैं चारों तरफ एक बार नजर घुमाता हूं, और फिर इस शब्द को देखने लगता हूं। मैं महसूस कर रहा हूं, कि अंदर से मुझे कुछ अच्छा लगने लगा है, हालांकि मेरा मुंह अभी जोे देख ले वो यही कहेगा, कि इसका चेहरा शुतुरमुर्ग की तरह क्यों है ? और मुझे खुद ऐसा लगा रहा है, कि मेरा चेहरा इस वक्त बेहद खराब लग रहा है। मगर, खामोशी की चादर पर पड़ी सिलवटें अब साफ दिखने लगी है। मेरा गुस्सा बेहद कम हो चुका है। ये जो अभी मैं लिख रहा हूं, ये मेरे शब्द हैं, ये मेरी रचना है। घर जाने के बाद अपनी इस रचना के साथ मैं खाना बना सकता हूं, मुस्कुराते हुए खा सकता हूं। इसे अपने सीने से लगाए आज की रात सो सकता हूं।

Thursday, 23 February 2017

पैटर्न का बहिष्कार

हम अकसर जीवन को सांस लेते देखते हैं और हम पाते हैं एक पैटर्न है, जिसपर हम रेंगते रहते हैं. मैंने एक फिल्म देखी A beautiful mind. एक बने बनाए पैटर्न को चुनौती देने वाली एक सच्ची कहानी, जिसमें नायक पागल ठहरा दिया जाता है, लेकिन वो बने बनाए पैटर्न पर लौटने से इनकार कर देता है. साइंटिस्ट जॉन नेश शुरू से ही मेरे आदर्श रहे हैं. बहुत कम ही लोग मेरे आदर्श हैं, या बहुत कम लोग हैं जिन्हें मैं पैटर्न का बहिष्कार करते हुए देखता हूं.
एक मूर्तिकार पहले गीली मिट्टी से खेलता है, और फिर चाक पर गिली मिट्टी को जोर-जोर से घुमाना शुरू कर देता है. धीरे धीरे एक संरचना, एक आकार का दिखना शुरू हो जाता है. मैं अकसर उस आकार को देखता हूं और धीरे से मुस्कुराता हूं. मैं मूर्तिकार नहीं हूं. लेकिन संरचना का बनना मुझे अच्छा लगता है, मुझे चाक भी पसंद नहीं है, मैं हाथों से संरचना गढ़ना चाहता हूं. मैं पैटर्न का हिस्सा नहीं बनना चाहता. खामोशी से उस पैटर्न का बहिष्कार कर रहा हूं. एक नई संरचना गढ़ना चाहता हूं. इसमें मुझे सुख मिलता है. मैं बच्चा हो जाता हूं. बच्चा बनने का अभिनय कर भी मैं खुश होता हूं. एक गहरी सांस लेता हूं और कमरे में पसरे सन्नाटे में खुद को देखने लगता हूं.

Saturday, 18 February 2017

हसीन दुश्मन-- ((आखिरी हिस्सा))

फांसी का फंदा गले में डाले हर्ष ने अपनी जिंदगी का आखिरी फैसला कर लिया था। वो स्टूल को गिराने ही वाला था, कि अचानक बजी फोन की घंटी ने हर्ष का ध्यान तोड़ दिया। फंदे को गले से निकालकर उसने बिस्तर पर पड़े फोन को हाथों में उठाया। स्क्रीन पर उसकी छोटी बहन का नंबर उभर रहा था।
--हलो, सुनो बिग-बी, मुझे काले रंग का सूट चाहिए। मैंने फोटो भेज दिया है। अभी ऑर्डर कर दो। मुझे ये सूट हर हाल में चाहिए।

फोन पर उसकी छोटी बहन कड़कती आवाज में उससे सूट दिलवाने की फरमाईश कर रही थी। किसी तरह फोन पर अपनी बहन को सूट दिलवा देने की बात कहने के बाद हर्ष ने मोबाइल डिस्कनेक्ट किया, और फफक-फकर...किसी बच्चे की तरह रोने लगा। कुछ पल पहले तक आत्महत्या करने का ख्याल करने वाले हर्ष के दिमाग में, अब मां पापा और छोटी बहन की तस्वीर, किसी बिजली की तरह कौंधने लगी थी।

--वो किसके लिए अपनी जिंदगी खत्म कर रहा था। उसके लिए, जिसने उसे उस वक्त भी देखना जरूरी नहीं समझा, जब हो एक्सीडेंट के बाद हॉस्पीटल में पड़ा था। तमाम दोस्त आये, और खबर मिलने के बाद भी रागिनी नहीं आई।
--अब हर्ष ने आत्महत्या करने का ख्याल अपने जेहन से निकाल दिया था। बहन हर्ष की जिंदगी में फरिश्ता बनकर आई थी।
--अगले दिन जब हर्ष दफ्तर पहुंचा, तो दफ्तर में सब उसे बदले नजर आये। कोई उससे सही तरीके से बात भी नहीं कर रहा था। उसे पता चला, कि रागिनी ने पूरे दफ्तर वालों से कहा है, कि हर्ष उसके पीछे पड़ा है। उसे धमकियां दे रहा है। साथ काम करने वाले जो लोग कल तक उससे बात करने से भी हिचकिचाते थे, वो उसे नफरत भरी निगाहों से देख रहे हैं। मीटिंग में बॉस ने हर्ष से स्पेशल शो भी ले लिया। दफ्तर में अब उसे करने के लिए कुछ नहीं बचा था।
-- अपमान का घूंट पीते हुए भी हर्ष दफ्तर में काम करने के लिए मजबूर था, क्योंकि, घर की जिम्मेदारी उसके ऊपर थी। वो बदनाम किया जा चुका था। हर्ष अब सिर्फ अपने काम से मतलब रखने लगा था।
--कुछ महीने इसी तरह बीत गये। अचानक एक दिन शाम के वक्त हर्ष के मोबाइल पर रागिनी का मैसेज आया। ‘’ हर्ष मुझे रूम चेंज करना है, और मुझसे अकेले हो नहीं रहा है, क्या तुम हेल्प कर दोगे।
--हां, मैं आ जाता हूं-
--नहीं, तुम मत आओ, किसी हेल्पर को भेज दो, मेरे साथ मेरे पापा हैं
--हर्ष ने एक हेल्पर का नंबर रागिनी के मोबाइल पर मैसेज कर दिया. रागिनी का मैसेज फिर से मिलने के बाद हर्ष जिस प्यार के दर्द को अब बर्दाश्त करना करना सीख रहा था, वो प्यार फिर से जग उठा। उसे लगा, कि शायद रागिनी अब मान जाएगी। हर्ष ने आखिरी बार रागिनी को अपनी जिंदगी में लाने की सोची। और रागिनी के नंबर पर लौट आने की मनुहार की। रागिनी ने मैसेज का उत्तर देते हुए कहा—देखते हैं। रागिनी ने वाट्सएप पर भी हर्ष को अनब्लॉक कर दिया था।
-- दो दिन गुजर गये
--दो दिन बाद हर्ष को ऑफिस में किसी ने बताया, कि रागिनी ने दफ्तर से इस्तीफा दे दिया है। उसे किसी बड़े चैनल में नई जॉब मिली है। हर्ष मन ही मन मुस्कुराने लगा। वो समझ गया, कि रागिनी ने उसका इस्तेमाल किया है। उसने रागिनी को मैसेज में नई जॉब मिलने की बधाई दे दी। बदले में कोई जवाब नहीं आया। रागिनी दफ्तर से जा चुकी थी। और दफ्तर से जाने के साथ ही फिर से हर्ष को वाट्सएप पर ब्लॉक कर चुकी थी।

--वक्त के मरहम ने हर्ष के जख्मों पर लेप लगाया, तो धीरे-धीरे हर्ष की जिंदगी भी रास्ते पर लौटने लगी।
--6 महीने बीत चुके था। हर्ष को भी नई नौकरी मिल चुकी थी। दोनों अपने-अपने रास्ते पर... अपने-अपने काम में मग्न हो गये। हर्ष नये जोश के साथ नये दफ्तर में काम कर रहा था, क्योंकि उसे पैसे इकट्ठे करने थे, अपनी छोटी बहन की शादी के लिए। सैलरी बढ़ाने के लिए वो एक बार फिर चैनल बदलना चाहता था।
--एक दिन हर्ष को पता चला, कि उस चैनल में जॉब के लिए वेकेंसी निकली है, जहां रागिनी काम कर रही है। कुछ देर सोचने के बाद हर्ष इंटरव्यू देने पहुंच गया। अपनी हाजिरजवाबी और काम में निपुण हर्ष इंटरव्यू क्वालीफाई कर चुका था। अब उसे फाइनल इंटरव्यू देने के लिए जाना था। फाइनल इटरव्यू की तारीख और वक्त तय हो चुका था। फाइनल इंटरव्यू वाले दिन जब वो तैयार होकर घर से निकलने वाला था, कि नये दफ्तर के एचआर की तरफ से उसे फोन पर बताया गया, कि उसका इंटरव्यू कैंसिल हो चुका है। हर्ष स्तब्ध था। सलेक्शन होने के बाद उसे फाइनल इंटरव्यू से पहले खारिज कर दिया गया था।
कुछ दिनों बाद हर्ष को पता चला, कि रगिनी उसे इंटरव्यू वाले दिन देख चुकी थी। और ऑफिस में शिकायत कर दी, कि हर्ष का कैरेक्टर काफी खराब है। इसलिए उसे नौकरी पर नहीं रखा जाए। रागिनी के कंप्लेन के बाद हर्ष को नौकरी नहीं देने का फैसला किया गया था।
--हर्ष एक बार फिर से बेचैन हो चुका था। वो तय नहीं कर पा रहा था, कि जिस रागिनी को वो भूलने की कोशिश कर रहा है, वो उसकी जिंदगी में फिर से भूचाल क्यों लाना चाहती है। कोई दुश्मन भी किसी के पेट पर लात नहीं मारता। रागिनी ने तो उससे उसकी नौकरी ही छीन ली थी।
कई दिनों तक बेचैन रहने के बाद हर्ष ने फैसला किया, कि वो रागिनी को कुछ नहीं कहेगा। अपने कैरेक्टर पर दाग लगने के बाद भी हर्ष ने फैसला किया, कि वो रागिनी को पता नहीं चलने देगा, कि उसे सारी बातें पता चल चुकी हैं। हर्ष अब रागिनी को हसीन दुश्मन मानने लगा था।

अब हर्ष ने एक फैसला लिया है...जिंदगी में इतना आगे निकल जाने का फैसला...जहां तक रागिनी की सोच भी नहीं पहुंच सके।

हसीन दुश्मन-- PART-3

अनजाने में की गई गलती हर्ष के लिए नाकाबिले-माफी बन चुकी थी। वो लड़की जिसके चेहरे को हाथों में लेने से उसका दिल, किसी बच्चे की तरह मचल उठता है, वो उसे बदनाम... ये सोच भी वो कैसे सकता है? वो लड़की, जिसे सीने से लगाए वो अनकहे किस्से सुनाता है, उसे वो भला रुसवा कैसे कर सकता है? और जो उसके और रागिनी के दरम्यां हुआ था, वो अकेले उसकी ही मर्जी तो नहीं थी? दोनों अपनी मर्जी से करीब आये थे। लेकिन ये मर्जी की लड़ाई कहां थी? इस गुस्से का मतलब था विश्वास की बुनियाद का दरकना। और वो जानता था, कि जहां प्यार है, वहां यकीन का अलाव हमेशा जलना चाहिए। नहीं, तो रिश्ते का महत्व नहीं रहता।

हर्ष जितना सोचता, उससे ज्यादा सवाल उसकी जेहन को झकझोड़ने के लिए आ जाते। रागिनी तो उसका फोन रिसीव ही नहीं कर रही थी। हर डायल के बाद फोन बस यही जवाब देता, कि आपने जिस नंबर को डायल किया है, वो इस समय जवाब नहीं दे रहा।

हर्ष का कमरा सिगरेट की धुएं से भरा था। माथे का पसीना उसका पाप बनकर उसकी पेशानी पर बार-बार आ धमकता। और वो पसीने की बूंद को पोंछने की कोशिश भी नहीं करता। वो तो बस एक बार रागिनी का आवाज सुनना चाहता है। अपनी बात कहना चाहता है। वो बेवफा नहीं है, रागिनी को समझाना चाहता है। जो कुछ भी हुआ है, वो एक गलतफहमी से इतर कुछ भी नहीं, प्रेम अपने मन पर आधारित होता है, बाहरी परिस्थितियों पर नहीं। कोई उनके बारे में क्या सोच रहा है, इससे उन्हें क्या मतलब? मगर, रागिनी फोन उठाए तब ना वो सफाई दे।

अगले दिन रागिनी जब दफ्तर आई, तो वो भावहीन थी। ना गुस्सा, ना प्यार, ना संवेदना। कुछ भी नहीं। हर्ष ने उससे बात करने की कोशिश की, तो उसने साफ कह दिया

--हर्ष, हमारे बीच का रिश्ता अब खत्म हो चुका है। अब तुम मुझसे कॉन्टेक्ट करने की कोशिश मत करना।
-- क्या, ऐसे कैसे हो सकता है रागिनी? इस रिश्ते को एक गलतफहमी की वजह से मत खत्म करो। रिश्ता तो सहेज कर रखने की चीज है। और जो तुम सुन रही हो, उससे मेरा कोई लेना देना नहीं है। दफ्तर के कुछ लोग हमारे रिश्ते खुश नहीं हैं। और वो तुम्हें बर्गलाने की कोशिश कर रहे हैं। 
-- मुझे तुमसे कोई मतलब नहीं है हर्ष। अब मैं तुमसे कोई बात नहीं करना चाहती। लीव मी अलोन। ओके

रागिनी अपने काम में व्यस्त हो गई। हर्ष वहीं खड़ा-खड़ा रागिनी को निहारता रहा। उसकी परेशानी, उसका दर्द मानो उसकी आंखें फाड़कर बाहर आ जाना चाहता था। दिन बीतते गये, और अब तो हर्ष को मैसेज के बदले गालियां मिलने लगीं थी। उसे वाट्सएप पर ब्लॉक कर दिया था रागिनी ने। लेकिन, हर्ष लगातार मैसेज किए जा रहा था। रागिनी ने तो एक मैसेज में यहां तक कह दिया
--तुम मर जाओ उससे भी मुझे कोई मतलब नहीं है।

हर्ष किसी आम प्रेमी की तरह ही खुद को शराब और सिगरेट के नशे में बेसुध कर चुका था। कमरे की तनहाई ने उसके मन में आत्महत्या करने तक का ख्याल ला दिया । अरे, इतना भी क्या गुस्सा, कि एक बार बात तक ना करना चाहे? क्या इतने दिनों का प्यार एक गलतफहमी की वजह से खत्म हो सकता है? कमरे में भरे सिगरेट के धुएं ने उसकी आंखों को सुर्ख लाल कर दिया था। और गुस्से ने उसके दिमाग को सुन्न कर दिया था। और उसने पंखे से रस्सियों को बांधकर अपने लिए मौत का फंदा तैयार कर लिया। उसने रागिनी को आखिरी मैसेज किया...
--ठीक है, तुम्हारे उठाए गये हर कदम को मैं चूमता हूं। चाय ज्यादा नहीं पीना। तुम्हें माइग्रेन है ना। खाना वक्त से खाना। ये नहीं कि रात 10 बजे घर पहुंचती हो, तो डिनर के बदले मैगी खाकर सो जाना। पापा, मम्मी, कार्तिकेय, किर्तिका का ध्यान रखना, ठीक वैसे ही, जैसे मैं अपनी मम्मी, पापा और बहनों का ख्याल रखता हूं। तुम्हारी बहन फैशनेबल है ना, मेरी छोटी बहन की तरह? वो मुझे बिग-बी कहकर पुकारती है। लंच लेकर हमेशा ऑफिस जाना। ऑफिस में लोगों से अच्छे से पेश आना। अगर मैं गलत हूं, तो मेरी गलती को भी माफ करोगी। ये शायद आखिरी मैसेज है। तुम मेरी जिंदगी में हसीन दुश्मन बनकर आई। गुड बाइ
सिर्फ तुम्हारा हर्ष


हर्ष ने रागिनी को आखिरी मैसेज कर दिया था। और फिर स्टूल पर खड़ा होकर फांसी के फंदे को अपनी गर्दन में डाल लिया। उसकी आंखों के सामने रागिनी के साथ बिताए गये एक-एक पल तैरने लगे। आंखों से आंसुओं की धार बहती जा रही थी। हर्ष अपनी जिंदगी को खत्म करने का फैसला कर चुका था। अब बस स्टूल का गिरना बचा था, कि तभी उसके फोन की घंटी बजी। 

हसीन दुश्मन...PART-2

कहने को तो रागिनी ने बस हलो कहा था, लेकन हर्ष के लिए आज ये आवाज, बिल्कुल नई लग रही थी। रागिनी ने फिर कहा...हलो, .....हर्ष । रागिनी की आवाज में अचानक ये अधिकार कहां से आ गया? हर्ष के दिल में अच्छा, बुरा, डर, संभावना...नामालुम कितने की खयाल एक साथ उमड़ने लगे थे। और तमाम खयालों को समेटकर वो मुंह से फिर इतना ही बोल पाया, हलो, रागिनी ।
क्या हम अब दोस्त नहीं रह सकते ? तुम्हें पता है, तुमसे पहले भी मुझे कई लड़के अलग-अलग तरीकों से प्रपोज कर चुके हैं। और मैंने ना कहने में, एक पल का भी वक्त नहीं लगाया। हलो, तुम सुन रहे हो ना? हां-हां, मैं सुन रहा हूं, थोड़ा डरते, थोड़ा संभलते हुए हर्ष ने कहा। अच्छा, तुमने जो मैसेज में कहा, वो अब बोलो। मैं तुम्हारे मुंह से सुनना चाहती हूं।
ये लड़कियां भी ना, बहुत शैतान होती। मैं तो कहता हूं, शैतान भी इनके आगे पानी मांग ले। हर चीज ये मुंह से ही क्यों सुनना चाहती हैं, कुछ महसूस क्यों नहीं करती। बदमाशी करने पर तो मानो इनका जन्मसिद्ध अधिकार ही होता है।
अरे बोलो ना, जो तुम कहना चाह रहे थे। रागिनी की आवाज इस बार जरा तल्ख थी। अब हर्ष ने तय कर लिया, अरे बोल देता हूं, प्यार ही तो किया है, कोई दुश्मनी करने का न्यौता थोड़े ही दे रहा हूं। हर्ष ने कहा, रागिनी, आई लव यू। मैं तुम्हें चाहने लगा हूं। ये बात..ये बात मैं कई दिनों से कहना चाहता था, लेकिन...
लेकिन क्या...जब कहना चाह रहे थे, तो कहे क्यों नहीं? बुद्धू, अगर पहले बोलते, तो मैं पहले ही बोल देती, आई लव यू टू।
आई लव यू टू। रागिनी के इतना कहते ही, आकाश के मुंह से आह की आवाज निकली। उसके दिल में जितने भी खयालात थे, मुंह से निकले हवा के साथ उसने सबों को दिल से बेदखल कर दिया। पहले प्यार की पहला दस्तक संभाले नहीं संभाल पा रहा था हर्ष। अजब रीत है प्यार की भी, जब दोनों के दिल की बात मिल गई, तो लाख बातें होते हुए भी दोनों कुछ बोल नहीं पा रहे थे। वो रात बीत गई। और वक्त के साथ दिन भी बीतने लगे। दफ्तर में जब भी रागिनी किसी खास शो के लिए साड़ी पहनती, या कोई सूट पहनती, तो वो चाहती, कि सबसे पहले उसे हर्ष ही देखे। हर्ष को मैसेज करती, मेकअप रूम आओ, कुछ दिखाना है। वो मेकअप रूम के शीशे में नहीं, बल्कि हर्ष की आंखों में खुद की सुंदरता निहारती थी। दोनों बेहद करीब आने लगे थे। आधुनिक प्रेमियों की तरह ही घंटों फोन पर चिपके रहना, इनका भी शगल बन गया था। हर छोटी बड़ी बात पर लड़कर ये भी प्यार के दूसरे पैमानों की रस्मअदायगी करते थे। महानगरों का प्यार छोटे कस्बों के प्यार जैसा नहीं होता। छोटे कस्बों में मन का मिलन तो जल्दी हो सकता है, मगर तन का मिलन शायद ही संभव हो पाता है। मेट्रो सिटीज में बंदिशें ना के बराबर होती हैं। और इसे खामी कहें, या प्यार की एक और मंजिल, हर्ष और रागिनी के बीच भी बंदिशें ना रहीं। वो जो लड़का और लड़की के बीच दीवार होती है, वो टूट चुकी थी।

हर्ष अपने रिश्ते को लेकर काफी सीरियस हो चुका था। रागिनी भी सीरियस ही दिखती थी। अभी 6 महीने भी नहीं बीते थे, कि इनके प्यार के चर्चे आफिस के गार्ड तक को मालूम पड़ चुका था। और वो जो इश्क और मुश्क वाला मुहावरा होता है ना, उसके एक और उदाहरण ये दोनों बन चुके थे।

हसीन दुश्मन...PART-1

पेड़, पत्ती, पहाड़, पत्थर, जो हैं मुझसे काफी दूर
मैं उन्हें छूना चाहता हूं
क्या मेरी इस चाहना का, पेड़, पत्ती, पहाड़, पत्थर
पर कुछ प्रतिक्रिया होगी?

........क्या प्रतिक्रिया हो सकती है ?.....हाथों में कलम लिए हर्ष कागज पर अगली पंक्ती लिखने की उधेड़बुन में था। कि तभी एक मीठी आवाज ने उसकी तन्मयता को भंग कर दिया। Excuse me…क्या 8 बजे जो स्पेशल शो जाने वाला है, वो आप ही बना रहे हैं। तन्मयता टूटने से भन्नाये हर्ष ने अपना चेहरा ऊपर उठाया, तो सामने खड़ी 22 साल की एक खूबसूरत लड़की, उससे फिर पूछ बैठी। क्या 8 बजे का स्पेशल शो आप ही बना रहे हैं? हर्ष ने बस हूं में जवाब दिया। -मुझे शो बारे में आपसे कुछ बात करनी है। लड़की आंखों में चमक भरे बोली। आंखों से ही इशारा करते हुए हर्ष ने कहा, पूछिए ....। मुझे शो के बारे में कुछ बता दीजिए। आज मैं यहां पहला शो एंकर करने वाली हूं। कागज पर अधूरी लिखी कविता को शर्ट की जेब में रखते हुए हर्ष शो के बारे में बातें करने लगा।
ये पहली मुलाकात थी हर्ष और रागिनी की। रागिनी ने आज ही ज्वाइन किया था स्वाभिमान इंडिया न्यूज चैनल। जहां हर्ष एक लंबे वक्त से काम कर रहा था। शो के सिलसिले में अब अकसर दोनों की बातें होने लगीं। वक्त का काम ही तो बीतना है, तो वो बीतता रहा...और इनके बीच की बातें, अब सिर्फ शो तक ही सीमित नहीं रही थी। कभी साथ चाय पीने लगे, तो कभी ऑफिस के छोटे से कैंटीन में बेफिजूल की गप्पें करने लगे। कहते हैं ना, ये दिल.....कोई शैतान बच्चा ही तो है। ये कहां किसी की सुनता है। हर्ष और रागिनी के दिलों के साथ भी यही होने लगा था। सपनों के लड्डू साथ खाने लगे थे ये दोनों दिल। आकर्षण का शहद कब साथ-साथ चखने लगे दोनों, कुछ पता ही नहीं चला। न्यूज रूम में पचासों लोगों की मौजूदगी में आंख भर बात करना भी आ गया था दोनों को। लेकिन, जुबां पर... बस वो बाली बात अब तक नहीं आई थी। हालांकि, अब तक दोनों को एक दूसरे की नजरों की तलब तो लगने लगी थी, लेकिन प्रेम की पहल कौन करे पहले? प्रेम...ये बस एक शब्द भर तो नहीं है। रूमानी अहसास है, आत्मा का संबोधन है। तो कौन बताए, कि हां मैं तुमसे प्रेम करने लगी हूं, या हां, मैं तुमसे प्रेम करने लगा हूं।    
हमारे शहर में एक कहावत है, लड़की भले ही कितनी भी मॉडर्न क्यों ना हो जाए, वो पहला कदम तो नहीं बढ़ाती। दोनों फोन पर घंटों बात करने लगे थे, सैकड़ों मैसेज भेजने लगे थे एक दूसरे को, लेकिन जादू वाले वो तीन शब्द... अभी तक ना तो मैसेज में में समा पाए थे, और ना ही जुबान पर चढ़ सके थे। हालांकि, हर्ष को अब रागिनी से जुड़ी एक-एक चीज प्यारी लगने लगी थी। उसके रिश्तेदार, उसका पसंदीदा चॉकलेट, उसके सूट का रंग, यहां तक की जिस हॉस्टल में वो रहती थी, उस हॉस्टल के गेट पर भौंकने वाला कुत्ता भी प्यारा हो चुका था हर्ष को।
नजरें जब हद से ज्यादा बेकरार होने लगीं, तो हर्ष ने अपने दिल की उलझन, साथ ही काम करने वाले संदीप को बताई । संदीप ने पूरा माजरा सुना, और हर्ष के उलझन को सुलझाने के अंदाज में बोला, तुम उसे मैसेज में क्यों नहीं बोल देते, कि रागिनी मैं तुम्हें चाहने लगा हूं। हर्ष को ये सलाह पसंद आई। ऐसा नहीं था, कि हर्ष को ये ख्याल नहीं आया था, मगर हिम्मत ने अब तक साथ नहीं दिया था। हर्ष ने ऑफिस के बाहर सिगरेट पीते हुए सोचा, आज की रात भले कुछ भी हो जाए, वो रागिनी से अपने दिल की बात बताकर ही रहेगा।

रात के 11 बज चुके थे। हर्ष ने काफी हिम्मत करते हुए हाथों से मोबाइल उठाया। और पहला मैसेज किया, रागिनी, मैं ये दोस्ती-वोस्ती नहीं रखना चाहता। उधर से रागिनी का मैसेज आया, क्यों, ऐसा क्या हो गया। मेरे किस बात से तुम नाराज हो गये। हर्ष ने रिप्लाई किया, नाराज और तुमसे? ये बात तो मैं सोच भी नहीं सकता। तो, फिर दोस्ती क्यों नहीं रखना चाहते? रागिनी का मैसेज था ये। देखो, मैं सीधे बात पर आता हूं, एक्च्वली, मैं तुम्हें चाहने लगा हूं। मैं तुमसे प्यार करने लगा हूं। आई लव यू। हर्ष ने धड़कते दिलों से मैसेज सेंड कर दिया। कुछ देर तक माहौल में स्तब्धता छाई रही। रागिनी का रिप्लाई नहीं आया। 10 मिनट बीत गये। 20 मिनट बीत गये। आधा घंटा, एक घंटा, 3 घंटे हो गये। रागिनी का कोई मैसेज नहीं आया। हर्ष कभी मोबाइल हाथ में उठाता, तो कभी पलंग के किसी कोने में वापस मोबाइल रख देता। रात के तीन बजे मोबाइल की घंटी बज उठी। रागिनी का फोन था। हर्ष ने बहुत धीमी आवाज में कहा, हलो...। उधर से रागिनी की आवाज आई, हलो...। 

Tuesday, 14 February 2017

घोंसला

उसकी काजल लगी आंखों से हंसी के कुछ छोटे छोटे टुकड़े तैरते दिखाई दे रहे थे. वो पास आई. मेरे सिर पर हाथ रखा. मेरा बदन बुखार से जल रहा था. सिर की गर्मी देख वो चौंक गई.
--तुम्हें तो बुखार है
--हां, शरीर में काफी दर्द है. थोड़ी प्यास भी लगी है
--रूको, मैं पानी लाती हूं
वो गर्म पानी लिए मेरे बगल में बैठ गई. मैं पानी पीने लगा. मुझे कुछ राहत मिलने लगी. मैं आंखों के काजल से निकलते हंसी के टुकड़ों को निहारने लगा. मैं अब थोड़ा थोड़ा मुस्कुराने लगा था.
--क्या हम बुढा होने तक साथ रह पाएंगें ?
--मेरी प्यास बुझ गई है, अब थोड़ा बेहतर लग रहा है..
तुमने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया.? ये कहकर वो जाने लगी. हंसी के टुकड़े गायब होने लगे थे. मैं उसका हाथ पकड़कर उसे रोकना चाहता था. लेकिन बुखार ने उठने नहीं दिया.
--सुनो... रूको... मैं.. मैं... कहां जा रही हो..?
--मैं पहाड़ों में जा रही हूं.
--पहाड़ों में...? वहां क्या है.?
--देवदार
--लेकिन पहाड़ों में जंगली जानवर होते हैं. शेर, बाघ....
--देवदार के नीचे बैठती हूं तो लगता है अपने पापा के पास हूं. तुम नहीं समझोगे..
मैं भी तुम्हारें साथ देवदार के साये में बैठना चाहता हूं. हम नीली चाय पीएंगे. पत्तियों से टपकते पानी की बूंदों को हाथों से पकड़ने की कोशिश करेंगे.
वो खुश हो गई. मेरी तरफ हाथ बढ़ाया. हम देवदार के नीचे बैठे थे. सामने पहाड़ों के उस पार पानी बरस रहे थे. गिलहड़ियां फुदक रहीं थीं.
मैंने उससे कहा.. देखो देवदार के उस डाल पर एक घोंसला है. वो चिड़ियां अपने बच्चों को पानी पिला रही है. पता है, पानी और प्यास का रास्ता एक होता है.
जैसे मैं प्यासा तुम पानी....

Sunday, 12 February 2017

मैं डब्बे में बंद हूं...

मुझे बंधन पसंद नहीं है. किसी भी तरह का बंधन. चाहे वो रिश्तों का ही बंधन क्यों ना हो. बंधन में मैं घुटने लगता हूं. मुझे कार में बैठना पसंद नहीं है, कार एक डब्बा सरीखी मुझे लगती है... मुझे ऐसा लगता है, कि किसी ने मुझे डिब्बे में बंद कर दिया है. उसमें मुझे घुटन महसूस होने लगती है. मैं मेट्रो का इस्तेमाल करता हूं.
मैं एक दिन सोचने लगा, मेट्रो ट्रेन भी डब्बा जैसा ही है. एक बड़ा सा कई खानों वाला डब्बा. इसमें भी तो मैं कैद ही रहता हूं. इस सोच ने मेरे बाकी सोच को मौन कर दिया. असल में हम कई खानों में, कई डब्बों में कैद रहते हैं... हमें कैद में रहने की आदत हो गई है.. और इस हिसाब से ये धरती भी तो एक डब्बा ही है. मैं पृथ्वी नाम के डिब्बे में कैद हूं. ये ख्याल आते ही मेरा दम घुटने लगा. मैं इस कैद से फौरन मुक्त होने की सोचने लगा.. लेकिन मुक्ति का मार्ग क्या होगा ? पूजा, पाठ, ध्यान, किर्तन...अर्चना.. वगैरह वगैरह.. ओह... मैं इस पृथ्वी रूपी डब्बे से बाहर निकलने के लिए बेताब होने लगा. मैं लड़ने लगा.. पता नहीं किससे.. मैं इधर ऊधर भागने लगा.. काफी देर भागने के बाद भी मुझे कोई छोर नहीं मिल रहा है. किस दिशा में मैं भागूं.. किस तरफ किनारा है. तभी मुझे ख्याल आया, ओह... धरती गोल है, सेब जैसा. मैंने हाथों में एक सेब ले लिया..सेब को बेहद गौर से मैं देखने लगा.. मुझे लगा, कि सेब की डंठल के पास कहीं मैं खड़ा हूं, गहराई में कहीं. मैंने सोचा, पहले गहराई से निकलना होगा, फिर सेब के सतह पर आने के बाद एक जोरदार छलांग लगानी होगी, और मैं धरती की कैद से बाहर हो जाऊंगा... क्षितिज में कहीं... अंतरिक्ष में कहीं... तारों के बीच कहीं ठहरकर पृथ्वी को देखूंगा... हाथ हिलाकर बाय बोलूंगा.. उस पल मैं खुश होऊंगा... बेहद खुश...

जज्बात की बात...

किसी घटना के ठीक बाद जज्बातों का जो तूफान जन्म लेता है, मैं उसे ही असली मानता हूं. बाद में तो हम उस जज्बात तराजू के पलड़े पर तौलना शुरू कर देते हैं. कभी थोड़ा घटाना, कभी बढ़ाना... संतुलित करने की प्रक्रिया सी चल पड़ती है, और इन सबके बीच जज्बात कहीं मौन हो जाता है, सहम जाता है.
मेरी कहानी के दो किरदारों के बीच संवाद चल रहा है, और कागज पर बिखड़े उन संवादों को पढ़कर मेरी धड़़कने बढ़ जाती हैं, मैं रोमांचित हो उठता हूं, थोड़ा मुस्कुराता हूं, संवाद फिर देखता हूं, और आगे बढ़ जाता हूं. 
इन जज्बातों को लिखना जरूरी था, क्योंकि अभी ये असली है, कुछ वक्त बाद इनका मौन होना तय है....

Wednesday, 8 February 2017

आसमान में चित्र

कुछ सालों से मैं एक चित्र देखता आ रहा था. मैं उस चित्र को इतनी बारिकी से देखता था, कि धीरे धीरे उससे पहचान हो गई. उसके एक एक लकीर को मैं अच्छी तरह पहचान गया. मुझे हमेशा लगता था, कि किसी दिन उस चित्र से एक चेहरा निकलेगा और मेरी तरफ हाथ बढ़ाएगा. मुस्कुराएगा, हो सकता है मेरे गले भी लग जाए, मुझसे ढेर सारी बातें करे और मुझसे कहे, कि आखिर हम मिल ही गये...
एक दिन मैंने हिम्मत करके चित्र से पूछ ही लिया, हम एक अर्से से एक दूसरे को देख रहे हैं, मैं तुम्हें देखने के लिए ही इस रास्ते से गुजरता हूं, जब तुम किसी दिन आकार लोगे तो क्या मुझे पहचान पाओगे..?
चित्र हमेशा की तरह खामोश रहा...भावहीन, शब्दहीन..
मैं चाय लेकर अपनी बालकनी से रास्ते पर आ जा रहे लोगों को देख रहा था. सामने रास्ते के दूसरी तरह कुछ घर हैं. घरों के बीच से कुछ गलियां गुजरतीं हैं. गलियों में कुछ बच्चे खेल रहे थे. मैं उनके शोर से कुछ अनसुलझा अर्थ निकाल रहा था. तभी मुझे एक परछाई दिखी. मैं होठों पर पतली मुस्कान लिए उस परछाई को देखने लगा. धीरे धीरे वो परछाई सामने आने लगी. मैंने अपनी गर्दन बालकनी से थोड़ी और बाहर निकाल ली. मुझे उसका चेहरा नज़र आने लगा. चेहरा देखते ही मैं हतप्रभ रह गया. वो मेरा चित्र था, जो रास्ते से गुजर रहा था. मैं चाय छोड़कर नीचे भागा...वो आगे जा रही थी. मैं उसे आवाज देना चाहता था, लेकिन मुझे उसका नाम नहीं पता था. मैं जोर से चिल्लाया... चित्र... लेकिन वो नहीं सुनी.. मैं तेज भागने लगा.. उसके पास पहुंच गया, बिल्कुल पास.. वो हुबहू मेरी चित्र ही थी. मैं हांफ रहा था, वो आश्चर्य से मुझे देख रही थी. मैंने उसकी तरफ देखकर इशारा किया, तुम चित्र हो ना..?
वो आश्चर्य से और थोड़ा डरकर भी मुझे देखे जा रही थी
तुम चित्र हो ना, जिसे मैं अकसर देखता हूं..??
कौन सा चित्र..? मैं कोई चित्र नहीं हूं..?
नहीं, हो तुम... हम अकसर मिलते हैं...
कहां..? मैं तुमसे नहीं मिली हूं..
हां, मिली हो..वहां
मैंने आसमान की तरफ ऊंगली से इशारा किया.. वो मेरी ऊंगलियों से होते हुए आसमान देखने लगी..ऊपर आसमान से कुछ बादल के टुकड़े चिपके हुए थे. हल्के से उभरता चांद किसी कैनवाश की तरह दिख रहा था. दो चार तारे धुंधला सा चमकने की कोशिश में थे..
मेरे हाथ आसमान की तरफ थे.. वो मुझे देखने लगी... कुछ क्षण ठहरी..फिर होठों से कुछ बुदबुदाते हुए बगल से गुजर गई.. मैं कभी आसमान तो कभी उसे देख रहा था....

Monday, 6 February 2017

खाली कमरे से बातचीत

मैं कितना खुलकर अपने कमरे से बात कर लेता हूं. दीवार पर चिपकी खामोशियों को हंसाता हूं. बेतरतीब पड़ी किताबों से कहानियां सुनता हूं, सेल्फ पर पड़े आईने में कभी अपना चेहरा देखता हूं, तो कभी आईने को पलटकर कहीं और रख देता हूं. पंखे पर जमा हो चुके धूल को हटाने का प्लान बनाना और अस्त-व्यस्त पड़े कपड़ों को करीने से रखने की प्लानिंग करना भी मेरी दिनचर्या में शामिल है, मगर कर आज तक नहीं पाया. सब वैसा का वैसा ही रहता है, जब तक कोई और ना आकर उसे सलीके से सजा दे...
जिन चीजों को हम निर्जीव समझते हैं, दरअसल वो चीजें कितना ज्यादा जिंदा होती हैं, बस उन्हें टटोलने भर की जरूरत होती है

Sunday, 5 February 2017

कायर

थोड़ी देर उसका नाम लेने के बाद वो मेरे सपने में चली आई। मैं एक पार्क के एक बेंच पर बैठा था। वो हंसकर मेरे बगल में बैठ गई। मैं उसके हाथों को छूना चाहता था, लेकिन उसने हाथ पीछे खींच लिए। मैं उसके हाथों को देखने लगा और वो मुझे। उसने मेरे हाथों को पकड़ लिया...मेरे होठों पर मुस्कुराहट की एक रेखा खिंच गई। वो भी मुस्कुराई। कुछ देर सोचती रही और फिर बोल पड़ी, तुम बहुत बड़े कायर हो। मैंने उससे पूछा- क्यों? तो वो बोली- क्योंकि तुममे हिम्मत नहीं है। 
वो मुस्कुराकर महत्वपूर्ण बातें कहने लगी। मैं गर्दन झुकाए जमीन पर देखने लगा। जमीन पर घास का बिझौना पड़ा था। गिलहरियां आपस में रेस लगा रही थीं। एक गिलहरी को मुंगफली का दाना भी मिल गया था। वो उसे लेकर पार्क के कोने में उगे पेड़ पर चढ़ गई। गिलहरी मेरे नजरों से ओझल हो चुकी थी। 
क्या तुम मेरी बात सुन रहे हो ? उसने इस बार थोड़े गुस्से में सवाल किया था। मेरी तंद्रा अचानक टूटी। और अकचकाते हुए मैंने उससे कहा...उं हांहां..सुन रहा हूं!
क्या सुने ? मैंने क्या कहा ?
मैं उसे अपने कायर नहीं होने के कई सबूत दे सकता था। लेकिन अब मैं सबूत नहीं देना चाहता था। ये खेल चालाकी का होता है। मैंने अपनी गर्म सांसों को लपेटकर उसके हाथों पर रख दिया। 

मैं अकसर जीवन को सरल समझने की भूल करता हूं। पर वो जीवन के मायने समझती है। मैं उसके साथ बूढ़ा होना चाहता हूं। और ये बात उसे मैं बूढ़ा होने पर बताऊंगा। तब तक मैं उसके साथ कायर बनकर ही रहना चाहता हूं।

मेरी गर्म सांसो ने उसके मन को पिघला दिया था। वो मेरे कंधे पर अपना सर रख चुकी थी। वो ऐसा अकसर करती है। 
मैं सपने से बाहर आ गया था। और बड़ी व्याकुलता से वो मुझे याद आने लगी। मैंने उसे फोन किया। वो मेरी व्याकुलता समझ गई थी। पूछी क्या हुआ? मैंने कुछ बेवजह के सवाल किए। कुछ सवालों पर वो झल्लाई। कुछ पर हंसी। मुझे उसका झल्लाना और उसकी हंसी दोनों पसंद है। मैंने फोन रख दिया। और फिर शून्य में खुद को निहारने लगा। 

डूबने वाले ने डूबते साहिल को आवाज दी...

वो एक खिलौना भर है...टूट जाना उसकी नीयति है..। वो टूट ही जाएगा...। फिर क्यों हम करें उसकी उम्मीद...।  दूर एक धुंधला सा लैंप पोस्ट दिखता है।...