Monday, 30 January 2017

Where the mind is without fear

एक मशहूर स्केच आर्टिस्ट के कुछ स्केच मैं देख रहा था. नाम मुझे याद नहीं रहता...उस चित्र को मैं समझ नहीं पाया... टेढ़ी मेढ़ी लकीरों के बीच मैंने कुछ शब्द अपने लिए चुन लिए.. जब मैं उन शब्दों को सजाने लगा तो मुझे वो नजर आने लगी...
गुरुदेव की where the mind is without fear पढ़ना मुझे बहुत प्रिय है...इसे पढ़कर मैं आजाद होना चाहता हूं... डर मेरे अंदर, बहुत अंदर तक पैबस्त है, उससे मैं निजात पाना चाहता हूं... बंधनों को मैं हटाना चाहता हूं... बंधन, बेचैनी की वजह है... इसलिए मुझे बंधन पसंद नहीं है...बंधन से बचने के लिए ईमानदार प्रयास जरूरी है.. मैं ये बात 2 दिन पहले तक जानता था, मगर ये कैसे तय होगा कि प्रयास ईमानदारी से किया गया है.. ये सवाल लिए मैं सालों भटकता रहा..जवाब तलाशने के लिए मैंने कई किताब पढ़े.. टैगोर को मैं पढ़ता रहा.. जवाब नहीं मिला... मुझे डर से छुटकारा चाहिए...किसी भी तरह से... लेकिन कैसे? पता नहीं चल रहा था.. फिर एक तमत्कार हुआ... मैं एक कार्यक्रम में जैकी चेन को सुन रहा था... उस वक्त मेरे मन में ये सवाल नहीं था.. मैं बस कार्यक्रम को देख रहा था... तभी जैकी चेन ने कहा, प्रयास ईमानदारी से करनी चाहिए... उन्होंने कहा, जब मैं संघर्ष कर रहा था, तो ऑस्कर अवार्ड के बारे में लोग पूछते थे, मुझे कहते थे... मैं सोचता था, ओह कहां ऑस्कर... मगर मैं जीवन में ईमानदारी से प्रयास करता गया... काम पर मेरा पूरा फोकस था.. एक एक सीन शूट करते वक्त मेरी तन्यमता चरम पर रहती थी... कोई क्या कर रहा है, मेरा इससे मतलब नहीं होता था, मैं बस अपने सीन में more then hundred persent देना चाहता था.. और एक दिन ऑस्कर अवार्ड ने मुझे तलाश लिया... मैं ऑस्कर के पास नहीं गया, ऑस्कर मेरी झोली में आ गई...
मैं ईमानदार प्रयास का मतलब समझ गया... फोकस का मतलब समझ गया... टैगोर क्या कहना चाहते थे, मैं समझ गया... 
Where the mind is without fear... उठो, जागो और आजाद हो जाओ.....

मैंने उन टेढ़ी-मेढ़ी लकीरों के बीच अपने लिए कुछ शब्द चुना था... शब्दों में मुझे वो नजर आने लगी थी...वो, स्वच्छंदता है... आजाद होना है..। उड़ जाना है...परिंदों की तरह... बहेलियों का खतरा होने के बाद भी उड़ना...उड़ते जाना...कभी किसी जामुन के पेड़ पर बैठना...कभी किसी किसी कांटेदार पेड़ पर बैठना...लेकिन, अपनी मर्जी से बैठना...अपनी मर्जी से उड़ जाना...।


Saturday, 28 January 2017

मेरा डाकिया

मैंने एक दुनिया बनाई है
जिसमें मैंने कुछ लोगों को शामिल किया है
मेरे कुछ दोस्त हैं, मां और पापा हैं, बहन है
क्या तुम मेरी दुनिया का हिस्सा बनोगी...?

जिंदगी को मैं जलेबी मानता हूं
सिर्फ गोल गोल, घुमा घुमा नहीं
चाशनी में डूबोया..मीठा, नहीं नहीं.. बहुत मीठा
एक हाथ मेरा होगा, दूसरा तुम्हारा
हाथों के दोने में लेकर साथ चखेंगे....जिंदगी

कल रात मैंने एक सपना देखा था
सपने में एक मधुर स्वर वाली चिड़िया आई थी
लाल रंग की नोक उसके माथे पर चढ़ी थी
वो बिल्कुल शर्मिली नहीं थी
जैसे तुम नहीं हो, जैसे तुम्हारे नाक पर 
वो गुस्से वाली लाल रंग की नोक चढ़ी रहती है
उसे मैंने तुम्हारे बारे में बताया और तुमसे मिलवाया
वो मधुर स्वर वाली चिड़िया अब तुमसे भी मिलेती रहेगी
मेरा डाकिया बनकर...और तुम कहना उससे संवाद
उस वक्त जब तुम तन्हा हो...
वो मधुर स्वर वाली चिड़िया रहेगी
अब हमारे बीच दूत बनकर...

पटना जंक्शन

नींद का एक झोंका आया.. पता नहीं कितनी देर मैं सोया था... फिर आँखे काफी समय तक खुली ही थी...इन बहुत सारे ऐसे बीते दिनों में, मुझे कितने दिन याद हैं ???... अगर इसमें सिर्फ जिए हुए को हिसाब रखूं..तो एक दिन ऐसा था, जिसे भूलना शायद संभव नहीं.
वो दिसंबर के ही दिन थे...कोलकाता से ट्रेन खुलने के साथ ही काफी लेट हो चुकी थी. मेरे साथ दो और मित्र थे. सभी को पटना आना था. ट्रेन सुबह करीब 4 बजे पटना जंक्शन पर पहुंची थी. सर्दी अपने चरम पर..फिर भी कॉलेज में पढ़ने वाले 3 लड़कों का प्लेटफॉर्म पर रात गुजारना मुश्किल होता है. सभी मस्ती के मुड में प्लेटफॉर्म से बाहर आ गये. गहरा सन्नाटा सब तरफ. कुछ गाएं भटक रहीं थीं. कुछ कुत्ते ठिठुर रहे थे. कहीं पुआल से धुंआ निकल रहा था, शायद देर रात तक किसी ने सर्दी से मुकाबला किया था. 
कुछ दूर एक चाय की दुकान थी. तीन लोग वहां बैठे चाय पी रहे थे. और बिहार के किसी आम चाय दुकान की तरह ही वो कभी भीषण ठंड पर तो कभी राजनीति पर चर्चा कर रहे थे. गर्मी के लिए वहां लकड़ियों से एक अलाव भी जलाया हुआ था...आग सेंकते उनकी बात खामोश रात को कभी कभी बेध सी जा रही थी....
सर्दी की रात में अगर चाय मिल जाए तो कहना ही क्या...मैं अपने दोस्तों के साथ पहुंच गया चाय पीने. सभी ने एक एक कप चाय ली. और अलाव के सामने हम सभी ने भी अपने अपने लिए बैठने का इंतजाम कर लिया...किसी घुसपैठिये की तरह हम सभी भी उनकी बात वाली राजनीति के चर्चे में शामिल हो गये..और उन्हें भी गप्प बढाने और भोर होने तक के लिए साथी मिल चुके थे...
थोड़ी सी चाय ही हमने खत्म की थी, कि दो किन्नर वहां पहुंच गई..और मेरे दोस्तों से पैसा मांगने लगी.. उनकी उम्र ज्यादा नहीं थी. दोनों ने लड़कियों जैसे कपड़े पहन रखे थे लिहाजा मैं उन्हें ((थी)) ही कह रहा हूं...मेरे एक दोस्त ने अपने पर्स से 10 का नोट निकालकर एक किन्नर के हाथों में रख दिया..मैं चाय पीने में मशगूल था.. कि अचानक..
एक किन्नर बेहद गौर से मुझे देखने लगी...वो अपनी निगाह मुझसे हटा ही नहीं रही थी... मुझे लगा वो अपनी निगाह तुरंत हटा लेगी पर नहीं...पर वो मुझे देखती रही, मैं अपनी निगाह बार बार हटा रहा था, मगर उसकी निगाहों से जो आकर्षण की बारिश होने लगी थी उसे बर्दाश्त करने की हिम्मत मेरे अंदर नहीं थी. 
कुछ 5/7 मिनट देखने के बाद उसने कहा..कि क्या मैं तुम्हें छू सकती हूं....मैं अचानक ऊभरे सवाल के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था. धुंध भरी सुबह में मुझे लगा कि सर्दी अचानक और बढ़ गई है. मैं तुम्हें छू लूं....मैं सकपका गया था. उसकी आंखों में एक अजीब तृष्णा थी.
ये ख्वाहिश कोई बड़ी या बुरी नहीं थी, मगर एक किन्नर की ये ख्वाहिश मुझे अटपटा लगा... मैं चौंक गया था, और मुंह से निकला क्या..?? आंखों में प्रश्नवाचक चिन्ह ऊभर आये थे. भौंहें भी सवाल पूछने लगे थे..कि वो फिर बोल पड़ी-- क्या मैं तुम्हें छू सकती हूं.. मैंने कहा क्यों...?? तो वो बोली, तुम अच्छे लग रहे हो मुझे... मैं अगर लड़की रहती, तो तुमसे शादी कर लेती...
कितना दुखद था यह वाक़्य... कितना छोटा था यह संबंध.. कितनी सरल थी वह। हमारे पास कहने के लिए कुछ नहीं था। क्या कह सकते थे? हम दोनों अलग थे... एक दूसरे की कहानी तक नहीं पता थीं..। संबंध में सिर्फ भाव थे... 
मैं अवाक था..सर्दी और ज्यादा लगने लगी थी मुझे..मेरे दोस्त हंसने लगे थे..चाय वाला किन्नर को जाने के लिए कह रहा था..मगर वो किन्नर सिर्फ एक बार छूने की जिद करने लगी थी.. मैंने उसे छूने देने से इनकार कर दिया... मेरे इनकार से वो उदास हो गई.. चेहरे पर उसके एक व्यथा ऊपर आई थी...जिसे मैं महसूस कर रहा था..समय ने शोर करना भी बंद कर दिया था....
एक किन्नर को मैं हमेशा सबसे पैसे लेते देखा था..जोर से, जबरदस्ती से...गाली देते...लड़ते हुए...झगड़ते हुए...लेकिन इसने पूरे परसेप्शन को ही बदल कर रख दिया. समझ में आया, एक दिल नाम की चीज है, हर किसी के हृदय में धड़कता है, भले लिंग कुछ भी हो, या कुछ नहीं भी हो. उसके इस भाव को पहचानते हुए भी मैं पहचानने से इनकार कर रहा था. सब जज्बात थे उसके पास..मगर वो अपूर्ण थी. उसे कुदरत ने संपूर्ण नहीं किया था. और वो इस बात ये जान रही थी. जब उसे छूने देने की इजाजत मेरी तरफ से नहीं मिली..तो कुछ वक्त वो आसमान में पसरे धुंध को निहारती रही. भावहीन, शून्य में. और फिर उसने अपनी पूर्ण नजर मेरे ऊपर रख दी. गहरी नजर समुद्र सा पूर्ण..अस्तित्व से भरा हुआ. अब उसने एक नया निवेदन किया.
बोली ठीक है मैं तुम्हें तुम्हारे इजाजत के बगैर नहीं छुऊंगी, लेकिन मेरी एक बात माननी होगी. मैंने कहा क्या. वो बोली, तुम्हारे चाय के पैसे मैं दूंगी. मैं अब इनकार नहीं कर सका. वो अपने पूर्ण होने के लिए कुछ करना चाहती थी, अपने लिए कुछ करना चाहती थी, शायद अपने प्यार में कुछ करना चाहती थी.
प्रार्थना की सी शांति छा गई थी वहां..उसके चेहरे से लग रहा था, कि शायद उसने अपने आप को कभी इतना अकेला नहीं देखा होगा. उसकी गुजारिश में समर्पण शामिल था...इनकार उसके भाव का तिरस्कार होता...  पैसे देने के बाद एक भरपूर नजरों में उसने मुझे समेट लिया..और बिना पलटे कहीं अंधेरे में गुम हो गई...
सुबह की पौ फट रही थी...और एक कहानी का अंत हो रहा था.

तोता-मैना

दृश्य 1
कहीं किसी जगह पेड़ की एक शाख पर एक तोता और मैना रहते थे. दूर कहीं किसी और जगह एक और पेड़ की शाख पर एक तोता- मैना रहते थे. सभी अपनी अपनी जिंदगी में मगन.
एक दिन इधर वाली मैना संयोगवश उस तरफ वाले तोते से मिल गई. तोते में अजीब सम्मोहन था. मैना आकर्षण के जाल में कैद हो गई. मैना के साथी को मैना के दिल का हाल पता चल गया. लेकिन उसने मैना से कुछ नहीं कहा. मैना कुछ महीने उस तरफ वाले तोते के सम्मोहन में कैद रही. तोते ने भी अपने सम्मोहन में मैना को कैद रखा. मैना ये जानते हुए भी कि वो अपने साथी के साथ गलत कर रही है, वो तोते के सम्मोहन से आजाद नहीं हो पा रही थी.
दृश्य-2
एक शाख पर एक तोता और मैना रहते थे. दोनों अपने प्रेम में मगन. कहीं किसी और जगह एक शाख पर एक और मैना रहती थी. मैना संयोगवश इधर वाले तोते से मिली. मैना तोते के सम्मोहन में कैद हो गई. वो तोते को अपना बनाना चाहती थी. और तोता अपने साथी को छोड़ नहीं सकता था. मैना का आकर्षण चरम पर था. तोते को डर था, कि इस सम्मोहन के जाल को अचानक काटने पर मैना खुद को चोट पहुंचा सकती है. तोता बेहद मुश्किल में आ गया. वो अपनी मैना से अपनी बात कहने से डरता था, कि कहीं उसकी मैना उसे गलत ना समझ ले.!
सम्मोहन की दुनिया में कोई नियम नहीं होते. यहां ना कोई कायदा होता, ना कानून ना इथिक्स. कई लोग मैना को तो कई लोग तोते को गलत या सही ठहरा सकते हैं. दृश्य-1 वाली मैना गलत नहीं है. वो एक अनसुलझे मायावी की चाह में कैद हो गई थी. और दृश्य-2 में भी ऐसा ही है. तोते की भूमिका दोनों जगह एक सा ही है, वो नहीं चाहता, कि उसके आकर्षण की मदहोशी में कोई भी मैना खुद को चोट पहुंचाए. 
आकर्षण की दुनिया अलबेली, अनसुलझी, अबूझ और अदृश्यता के कॉकटेल से बनी होती है. जहां मायावी लोग बसते हैं. कोई गलत नहीं होता. बस देखने का नजरिया होता है.

Monday, 23 January 2017

प्रेम और पीड़ा की तलाश

तुम्हारा प्रेम तलाशने के लिए मैंने तुम्हारा खत फिर से पढ़ना शुरू किया... पांच खत मैंने कुल पच्चीस बार पढ़ डाले... और हर खत पढ़ने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि अगर प्रेम तलाशना हो तो पीड़ा को पहले तलाशो... दरअसल प्रेम का अस्तित्व ही मेरी नजर में पीड़ा पर निर्भर करता है...
मैंने भगवान कृष्ण का रासलीला पढ़ा है... उसमें गोपियां कृष्ण के असीम प्रेम में होती हैं... मुझसे वर्णण करना मुमकिन नहीं है... मैं वर्णण भी नहीं कर रहा.. सिर्फ महसूसने की कोशिश कर रहा हूं.. कृष्ण के लिए विरहिन बनी गोपियां.. एक आलिंगन के लिए पीड़ा से तड़पती गोपियां...कृष्ण को बांसुरी बजाते देख बांस के भाग्य से जलन करती गोपियां.. सब पीड़ा ही तो है..प्रेम की पीड़ा, प्रेम में पीड़ा.... प्रेम अगर पराकाष्ठा से ऊपर जाने लगे तो वो भी पीड़ा का ही कारण है... गोपियों के साथ भी तो यही हो रहा था.. जलन भी तो प्रेम का एक कारक है...
तुम्हारे खतों को मैं बहुत देर से देख रहा हूं.. इनसे एक रिश्ता तो बहुत पहले कायम हो चुका था मगर अब इनसे अकसर मूक संवाद की आदत सी हो गई है...हल्का पीलापन, अपने लौ के दायरे में मुझे समेटे हुआ है...इसके सीने में अगणित शब्द हैं, और उनसे जिस तरह का रिश्ता है, उसे सिर्फ हम दोनों ही महसूस करते हैं...
मैंने तुम्हारे खत को मोड़कर वापस रख दिया है...उसे वापस रखते वक्त हम दोनों के मुंह से एक आह सी निकली है.. खत पढ़ने से पीड़ा कम होती है, या पीड़ा को रिक्त स्थान मिल जाता है मैं नहीं जान पाता हूं.
कमरे में भिनी भिनी खूशबू पसरी पड़ी है...और मैं आंखे बंद किए फिर से अकेला हो जाता हूं....

Wednesday, 18 January 2017

सपने को बदल दिया

राइटर ने कहानी को बदल दिया था...जैसे भगवान के हाथों में शक्ति होती है, जीवन को बदल देने की..धरती, आकाश.. इंसान, जानवर...हर चीज को बदल देने की शक्ति... ठीक उसी तरह की शक्ति होती है राइटर के पास कहानी को बदल देने की, किसी भी बिंदु से, किसी भी पूर्णविराम से...
मैंने भी सपने वाली कहानी को नये मोड़ पर लाकर छोड़ दिया था.. अगर उस कहानी को नहीं लिखता, तो वो वैसा का वैसा रहता..जीवित..सजीव. लेकिन उसके सजीव होने पर मैं असमंजस में रहता.. और उधेड़बुन की वो स्थिति मेरे लिए ठीक नहीं होता..
आप चाहें तो इस कहानी को पढ़ना यहीं बंद कर सकते हैं. इस कहानी में मैं कह रहा हूं, कुछ नहीं है. और अगर आप फिर भी पढ़ रहे हैं, तो जिम्मेदारी आपकी है...
मैं बीमार था...और बहुत मुश्किल से मुझे नींद आई थी... मैं सपने में चला गया... सपने देखना मेरे लिए कोई नई बात नहीं है... सोते वक्त अकसर देखता हूं, और उठने के बाद सपने मेरे अंदर टीस बनकर जिंदा भी रहते हैं..
सपने में एक लड़की आई थी..उसे मैं जानता हूं...मुस्कुरा रही थी...मुस्कुराते हुए मेरे पास आई...और आहिस्ता कहा..."मैं तुम्हें पसंद करती हूं"... हां, ठीक यही वाक्य था, इसे मैं अभी भी स्पष्ट सुन रहा हूं.. उसके लबों पर मुस्कुराहट की रेखाएं थीं, और आंखों में शर्माहट और शरारत का मिश्रण घुला हुआ था...
मैं बदले में बस मुस्कुरा कर रह गया... और उससे कहा - चलो एक कप चाय पीकर आते हैं!
मैंने सपने को रोक दिया..उठकर बैठ गया.. इतना सजीव सपना मैंने सालों से नहीं देखा था... उठने के साथ ही मैं बेचैन हो गया... मैं उसे खोजने लगा..कमरे में..घर के बाहर..मुझे लग रहा था, अभी तो वो यहां थी, शायद मेरे उठने की आहट से शर्माकर बाहर चली गई...या कहीं और चली गई...
मैं काफी वक्त तक सपने के बारे में सोचता रहा...वो अभी भी सजीव था..बिल्कुल शाश्वत...मैं उससे बात करना चाहता था... मैंने अपने एक दोस्त के जरिए उस तक खबर भिजवा दिया, कि मैं उससे बात करना चाह रहा था...
अगले दिन मेरे पास उसका फोन आता है... वो पूछती है, क्या तुम मुझसे बात करना चाह रहे थे... मैंने थोड़ा हड़बड़ाते हुए कहा.. हां.. हां, कल बात करना चाह रहा था...
--क्या, बोलो
-- हां, नहीं कुछ खास नहीं..
-- हड़बड़ाओ नहीं.. बोलो क्या हुआ
-- एक्चवली कल मैंने एक सपना देखा था.. सपने में तुम थी..
-- अच्छा, फिर??
-- वो जरा डरावना सपना था, मैं बीच में ही उठ गया, और सोचा तुमसे बात कर लूं
-- अच्छा मेरे बारे में डरावना सपना था
-- हां, मैंने सपने को बीच में ही रोक दिया.. और थोड़ा डर गया था, तो सोचा तुमसे जरा बात कर लूं
कुछ पलों के लिए सन्नाटा रहता है...
-- ओके, बाय..टेक केयर

राइटर ने कहानी बदल दिया था...सुंदर सपने को डरावना बनाकर खत्म कर दिया था...

खोया-पाया

एक परिचित को तांबे के थर्मस में पानी पीते देखा...मैं थर्मस को ध्यान से देख रहा था...तभी उनकी नजर मुझपर पड़ गई। मैंने मुस्कुरा दिया।...वो भी मुस्कुराईं और पानी पीना खत्म करते हुए कहा---

''तांबे के बर्तन में पानी पीना सेहत के लिए अच्छा होता है, ऐसा थर्मस आप भी ले लीजिए और हर वक्त पास रखा कीजिए''

मुझे ये बाद पता थी। लेकिन मैं अपने साथ ज्यादा चीजें नहीं रखता। मुझे खो देने की आदत है। अकसर अपना सामन कहीं ना कहीं खो देता हूं। कई बार मेट्रो के अंदर तो दो दफे ऑटो में अपना बैग खो चुका हूं। कई किताबें भी अब अपने पास नहीं देखता। ईयरफोन, रुपये-पैसे....बहुत कुछ खो देता हूं मैं। संभाल कर रखना मेरी आदत नहीं है। ....खो देने की आदत मुझे कब लगी इसका पता मुझे तब पहली बार चला, जब सालों पहले दिल्ली आया, और जेब के सारे पैसे रूमाल निकालते वक्त कहीं खो बैठा... अभी कुछ दिन पहले ही मैंने अपने साथी को खोया है। इसलिए तांबे का थर्मस साथ रखने वाली बात मैंने मन में ही खारिज कर दिया है।

मैं अपनी बेहद निजी चीजें महफूज रखने के लिए एक काले रंग के बैग में रखता हूं। याद से संभालकर। वो बैग घर में ही पड़ा रहता है। उस बैग को खोले मुझे महीनों हो जाते हैं।...मैं चाय पी रहा हूं, बेहद फीकी है। शायद पत्ती कम है, और चाय सही से उबली भी नहीं है। शायद चाय बनाने की इच्छा अब खत्म होने लगी है। चाय बनाने से और पीने से एक तरह का संबंध रहा है मेरा। और हर संबंध एक छोर पर आकर आत्महत्या की जगह खोज रहा होता है। आत्महत्या करे या ना करे की ऊहापोह में वो संबंध जिंदा रहता है। किसी भी तरह का निर्णय उस संबंध की हत्या करना है। कहीं चाय और हमारे बीच का संबंध भी तो आत्महत्या नहीं कर रहा है। एक खामोश चुप्पी ने मुझे जकड़ लिया है। 

मैं आज अपने बैग को खोलकर देखना चाहता था। उसमें रखे आत्मीय सामानों को छूना चाहता था। मैंने बैग खोला और अंदर झांककर देखा...खूशबू आ रही थी अंदर से। पुराना पेन...दो डायरी... कलाई से बांधने वाला एक रिंग...खराब हो चुके मोबाइल फोन...के साथ दो अलबम निकले। सालों के रिश्ते की महक कमरे में फैल चुकी थी। वो महक मेरा दम घोंटने लगी। सांसे फूलने लगी मेरी। मैंने तुरंत अपने कमरे का दरवाजा खोल दिया। मैं उसे नहीं देखना चाहता था। मुझे डर लग रहा था एलबम को खोलने से। फिर भी हिम्मत करते हुए एलबम को खोला। बीच में सहेजकर रखी तस्वीर मेरे सामने थी। उसकी तस्वीर देखने की हिम्मत नहीं हो रही थी मुझे। मेरी पेशानी पर पसीने आ चुके थे। मैंने फौरन एलबम को बंद कर बैग में रख दिया। मेरी आंखों में अजीब सी जलन हो रही थी। जिसकी वजह से मेरी आंखों से लगातार पानी आ गिरने लगा था। मैंने उसे भी खो दिया था। काफी तेजी से लगा चोट धीरे-धीरे असर करता है। मेरे साथ भी यही हो रहा था। चोट बहुत तेज लगी थी। शुरू में तो सिर्फ निशान दिख रहे थे चोट लगने के...शायद असर अब हो रहा था। 
मैंने अपने झूठे सपनों में उसे कुछ सालों तक फंसाए रखा था शायद... बस... या शायद वह मेरे झूठे सपनों के बारे में जान गई थी, इसीलिए मैंने उसे खो दिया है। 

दिन का सपना

दिन में बहुत बेवक्त सो गया था मैं...और सोने के साथ ही मैं एक सजीव सपना देखने लगा.. इतना सजीव, कि जगने के बाद भी उस सपने का एक एक दृश्य मेरी आंखों के सामने है.. सपने का एक एक संवाद मेरे कानों ने साक्षात गुंज रहे हैं... 
मैंने देखा, एक लड़की है...वो अपने एक सहेली के साथ है... थोड़ी सी शर्माते हुए मुझे अपने पास बुलाती है.. वो मुझे कुछ कहने के लिए बुला रही थी... उसकी सहेली इशारों में कुछ भी नहीं कहने को बोल रही थी.. मगर लड़की ने अपनी सहेली की बात मानने से अस्वीकार कर दिया, और चुपचाप मेरे कानों में कहा... मैं तुम्हें पसंद करती हूं... हां, ठीक यही वाक्य था, इसे मैं अभी भी स्पष्ट सुन रहा हूं.. उसके लबों पर मुस्कुराहट की रेखाएं थीं, और आंखों में शर्माहट और शरारत का मिश्रण घुला हुआ था...
मैं बदले में बस मुस्कुरा कर रह गया... और उससे कहा - चलो एक कप चाय पीकर आते हैं!

ऊबन



साल का आखिरी दिन है...और मैं कोरा पन्ना लेकर लिखने बैठा हूं...बहुत सारी अपेक्षाओं के साथ...। मगर क्या लिखूं...। शब्दों का वो कौन सा चित्र बनाऊं, जिसे उकेरते ही दिल हल्का हो जाए...वो जो थकान पसरी है वो ताजगी में तब्दील हो जाए...। एक अनवरत थकान जो सब से है...जिंदगी ने तजुर्बों का जो थकान दिया है, उन्हें किस दीवार पर टांगूं....

किताबों की ज्ञानवर्धक बातें...एक अनवरत चलने वाला काम का सिलसिला, जिनसे उलझकर मैं दिनों....महीनों...सालों से व्यस्त हूं, उनका क्या करूं...? 

दफ्तर में ढेरों टीवी टंगे हैं, जिनपर निगाह सालभर टिकी रहती हैं, जिनमें मैं चेहरे तलाशने की कोशिश करता हूं, लेकिन अब मैं इन दिवास्वप्न से भी बोर हो चुका हूं...। एक किताब पढ़ता हूं, तो दूसरे का ख्याल आ जाता है, एक फिल्म देखने बैंठता हूं, तो दूसरी दिमाग में घर कर जाता है और इन सबसे से भागने का दिल करता है, तो क्या इनके बारे में लिखूं...

थक हारकर कोरे कागज पर एक शब्द लिखता हूं, ऊबन...। इस शब्द को मैं देखे जा रहा हूं... और इसे देखने में एक सुकून का अहसास हो रहा है....फिर भी कुछ लिखा नहीं जा रहा है... पर ऊबन शब्द डेस्क से उठने नहीं देता...

यही सब तो रहने वाला है अगले साल भी...कई साल से यही सब तक रहा है...और इन्हीं सब के बीच उलझकर मैं इस दुनिया के सबसे बोरिंग इंसानों की फेहरिस्त में शामिल हो चुका हूं...

अपने अबोध और निर्दोष मन को पुचकारने के बाद मैं डेस्क से उठ जाऊंगा....इस सोच के साथ कि जीवन के थाह को पाना असंभव है...और प्रेम जीवन का सबसे सरल भाव है...जिसे मैं और करीब लाने की कोशिश करूंगा.....

सब खुश रहें......यही कामना है......

डूबने वाले ने डूबते साहिल को आवाज दी...

वो एक खिलौना भर है...टूट जाना उसकी नीयति है..। वो टूट ही जाएगा...। फिर क्यों हम करें उसकी उम्मीद...।  दूर एक धुंधला सा लैंप पोस्ट दिखता है।...