Monday, 28 May 2018

बेवक्त की बातें

हम अकसर करते रहते हैं, बेवक्त की बातें..। जोड़ते रहते हैं, कुछ शब्दों के समूह को...देखते रहते हैं, कुछ चित्र... निकालते रहते हैं, उन चित्रों से मतलब...करते रहते हैं, उन मतलबों से संवाद...और इन सबके बीच...बीतते रहते हैं हम..। वो बीतना किस बात के लिए...। मैंने सोचा कई दफे...पर कुछ समझ नहीं आया।....

हम कोई तस्वीर देखकर यूं मोहित क्यों हो जाते हैं।... हमारी चाहना क्यों जग जाती है, कि काश उस चित्र को हम बनाएं।...करें एक बार फिर से उस चित्र का निर्माण अपनी कूंचियों से।

हतप्रभ...विस्मित...

मैंने ऐसा महसूस किया है...कि जिस चित्र को मैंने देखा है...कुछ अर्से बाद वो चित्र सजीव होकर मेरे सामने आ जाती हैं..। और मैं विस्मित हो जाता हूं। उस चित्र से एक तरह का संवाद शुरू हो जाता है।

नहीं...अब मैं किसी भी चित्र के साथ कोई संवाद नहीं करूंगा। किसी भी चित्र को जानने की...उसे समझने की कोई कोशिश नहीं करूंगा। प्रण...हां, इसे मैं अपना प्रण ही मान रहा हूं। जब किसी चित्र की मानी हम समझ जाते हैं, तो एक गहरी सांस लेते हैं। फिर उसे चित्र को हम गंदला कर देते हैं। मैंने कई चित्रों को जिज्ञासा से देखा... उसे जानने की कोशिश की...और इस प्रक्रिया के खत्म होते होते...मैंने देखा...वो चित्र गंदला हो चुका है।

बाहर बहुत धूप है। गर्म हवा बह रही है। मैं अंदर घर में बैठा हुआ हूं...चित्र को मैं सामने देख सकता हूं। उसमें एक अलग किस्म का आकर्षण मैं महसूस कर रहा हूं।

मैंने उस चित्र को ढंक दिया है। नहीं, मुझे नहीं देखना कोई और चित्र। नहीं करना निर्माण...किसी और चित्र का। 

Friday, 25 May 2018

उदास रात

तस्वीर काफी पुरानी है।
उदास रात को जरा सी स्पाइसी बनाने के लिए
हमने पी ली 2 पैग शराब
जरा सी गुस्ताखी की...
और बना दिए तुम्हारे होठों पर एक लाल निशान
तुम कहो तो खुद को बिखेर दूं तुम पर....

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अभी मैं अपने अफसोसों को रख रहा हूं
कंप्यूटर टेबल के नीचे
जहां हर रात मैं लड़ता रहता हूं लड़ाई
और तुम्हें मेरी कसम मेरे महबूब
तुम तो वहां आना ही मत
कि बस एक यही काम तो बचा है मेरे पास

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फोन में हजारों तस्वीरें सोई हुई हैं
उनमें से जगाता हूं एक तस्वीर
अब तुम्हारी नींद इस वक्त टूट गई
तो इसमें मैं अपना कसूर नहीं मानता हूं

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सब कुछ तुम्हारे ही बारे में है
प्याले में भरी आधी कच्ची शराब
फ्रीज में रखा हुआ बर्फ के बारीक टुकड़े
प्लेट में रखा हुआ साबूत मिर्च
पंखे पर बैठा हुआ कबूतर
और मन में विचारों के हाथी और खरगोश

सबकुछ उसी के बारे में है...जो है ही नहीं।

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रात के चार बजे हैं। यहां गली के कुत्ते बहुत भौंकते हैं। मन गुस्से से भर जाता है। इनदिनों मैं गुस्सा बहुत करने लगा हूं। खैर जाने तो... मेरे गुस्से से कौन सा कुत्ते भौेंकना बंद कर देंगे।





Magical road


This night ... walking on this magical street, I wake up in the middle of a wild desire 
that if I could touch you by touching you
,

At three o'clock in the night. I am sitting in the chair ... watching the 'tukur-tukur' computer. There is nothing to do at this time. Not even for writing something. The same tired dialogue ... the same words ... the same things heard ... the same story heard. But I have something for you at the moment ... 


What is it, I will not tell you that. If you want you can bash me ... but, no ... I will not tell. In the day I lost 2200 rupees and ATM card. Then walked 5 kilometers, because the pocket was empty. But would you believe ... that even in the afternoon I was not feeling heat. However, I was frightened by sweat ... and the face has now turned black ... but I did not seem to heat. I was surprised at myself after coming home .... How did this happen to me ... Your thoughts hold me tight. The legs were moving fast on their own. Just like a tune, I was just going ahead ... it was going to grow .... Just ... car ... auto ... all were passing beside my side, but I was not feeling anything. Just looked at the feet ... and your name in the mind. I came to the house I Then lying on the bed for 2 hours. Maybe it was a little fever ... I was lying in the slopes ... eyes shut ... And your face in front of you .... When you used to take your tongue out a bit ... and I used to emulate your tongue a little bit while imitating you.

My life....
So the color of my wish is gray
That you see ...
And you do not know by touching in what color ....
So you do not go anywhere ...


Well ... I'm absolutely right ..... There was no ocean ... dried up. Some stones are left ... the sand is left ... I have left ... this is the night left ... you are left ... and this magical road is left.

जादुई सड़क

इस रात...इस जादुई सड़क पर चलते हुए
मन में उठती है एक जंगली कामना
कि बस तुम्हें छूने से अगर मैं पिघल पाता
तो हवा बनकर तुमसे लिपट जाता मैं।

रात के तीन बजे हैं। मैं कुर्सी पर बैठा...कंप्यूटर को टुकुर-टुकुर देख रहा हूं। इस वक्त करने के लिए कुछ नहीं है मेरे पास। कुछ लिखने के लिए भी नहीं। वही थके संवाद...वही बुझे शब्द...वही कही सुनी बातें...वही सुनी सुनाई कहानी। पर मेरे पास इस वक्त तुम्हारे लिए कुछ है...। 


क्या है, वो मैं तुम्हें नहीं बताऊंगा। तुम चाहो तो मुझे कोस सकती हो...लेकिन, नहीं...मैं नहीं बताऊंगा। दिन में मैंने 2200  रुपये और एटीएम कार्ड खो दिया। फिर 5 किलोमीटर तक पैदल चलता रहा, क्योंकि, जेब खाली हो चुका था। लेकिन क्या तुम यकीन करोगी...कि दोपहर के वक्त भी मुझे गर्मी नहीं लग रही थी। हालांकि, मैं पसीने से भींगा हुआ था...और चेहरा तो अब मेरा काला हो ही चुका है...पर मुझे गर्मी नहीं लग रही थी। मैं खुद हैरान हो गया था घर आने के बाद.... कि ऐसा कैसे हो गया मेरे साथ..। तुम्हारा ख्याल मुझे जकड़े रहा। पैर अपने आप तेज चल रहे थे। एक धुन की तरह मैं बस आगे बढ़ा जा रहा था... बढ़ा जा रहा था...। बस...कार...ऑटो... सब मेरे अगल बगल से गुजर रहे थे, मगर मुझे कुछ सूझ ही नहीं रहा था। बस पैरों के पास नजर थी..और मन में तुम्हारा नाम। घर तक आ गया मैं। फिर बिस्तर पर 2 घंटे तक लेटा रहा। थोड़ा बुखार हो गया था शायद..। मैं निढ़ाल लेटा हुआ था...आंखे बंद...और सामने तुम्हारा चेहरा...। जब तुम अपना जीभ थोड़ा सा बाहर निकालता थी...और मैं तुम्हारा नकल करते हुए अपना जीभ थोड़ा बाहर  निकाल लिया करता था।

मेरी जान....
इसलिए मेरी चाहत का रंग सलेटी है
कि तुम्हें देखूं....
और तुम्हें छूकर पता नहीं ढल जाऊं किस रंग में ...।
इसलिए तुम कहीं मत जाओ...


खैर...मैं बिल्कुल ठीक हूं....। कोई सागर था...सूख गया। कुछ पत्थर बचे हैं...रेत बची है...मैं बचा हूं...ये रात बची है...तुम बची हो... और ये जादुई सड़क बचा है।


Wednesday, 23 May 2018

देखो कज़ान ! चमत्कार हुआ है....

देखो कज़ान ! आज चमत्कार हुआ है....। सुबह हो गई है। एक बार फिर से। और मैंने इसे चमत्कार का नाम दिया है। असल में सुबह हर रोज होती है, इस लिए हम इसे चमत्कार मानना भूल जाते हैं। लेकिन ये एक किस्म का चमत्कार ही है।
अभी मुझे हल्का सा गुस्सा आ रहा है। और मेरा गुस्सा वैसा ही है, जैसे मैंने एक बार शेर को देखने के बाद गुस्सा किया था। शेर पिंजरे में बंद था, और मैं ठीक उसके सामने खड़ा था। पर वो मुझे ऐसे देख रहा था, जैसे मैं उसके सामने नहीं हूं। मैं एक पारदर्शी आदमी हूं। मैं गुस्से में भर उठा। शेर मुझे यूं दरकिनार कैसे कर सकता है ? मैं उस शेर के सामने जोर-जोर से चिल्लाने लगा। अजीब-अजीब हरकतें करना लगा, पर उसपर कोई फर्क नहीं पड़ा। बाद में मेरे दोस्त ने मुझे बताया, कि उस वक्त बिल्कुल मैं बंदरों जैसी हरकतें कर रहा था।

इस वक्त भी मैं वैसे ही गुस्से में हूं। घर में कोई नहीं है, और मैं निर्वात में चीख रहा हूं...चिल्ला रहा हूं, पर घर की दीवारों को...कंप्यूटर को...बिस्तर पर पड़ी सलवटों को...किचन में रखे गैस सिलेंडर को....कोई फर्क ही नहीं पड़ा रहा।

चिढ़....आईना देख रहा हूं।
कोफ्त....ऐसा मैं क्यों कर रहा हूं।
गुस्सा...लोग उधार ले लेते हैं, वक्त पर लौटाते नहीं
हंसी... अभी मार्केट गया था प्रिमिक्स कॉफी लाने। दुकानदार एक लंबे से फ्रीज पर लेटा हुआ था, और उसका एक दोस्त गल्ले पर बैठा था। मैंने उसे कॉफी के पैसे दिए । वह कॉफी के कई डिब्बों से मेरा कॉफी खोजने लगा। वो हर डिब्बा उठा रहा था, सिवाई उसके जो मैंने ऑर्डर किया था। मैं उसे इशारे से दिखा रहा था, कि वो डिब्बा लाओ, पर वो दाएं-बाएं...ऊपर नीचे उलझा हुआ था। मुझे जोर से हंसी आने लगी। फिर खुद दुकानदार उसे गालियां बकता हुआ उठा, और मुझे कॉफी का डिब्बा दिया।

मेरे चेहरे पर अभी भी मुस्कुराहट है। कुछ ही पल में कितना हम बदल जाते हैं। मुझे लगा, इसे लिख लेना चाहिए। कभी खाली दोपहर में फिर से इसे पढ़ लेंगे...कुछ देर मुस्कुरा लेंगे..। असल में ये चमत्कार ही है... ठीक वैसा ही चमत्कार...कि हम सांस लेते हैं।










कज़ान

मैं उस आदमी को सत सत धन्यवाद देना चाहता हूं, जिसमे प्रेम का आविष्कार किया होगा।

ओह....मैं कितनी देर इस कुर्सी पर बैठा रहूं। कितनी देर खुद को कोसता रहूं। कितनी देर अपना चेहरा आईने में देखता रहूं। उस आदमी से बैर सा होने लगा है, जिसे आईना देखना बहुत पसंद था। क्या मैं यहा लिख दूं, कि मुझे तुम्हें एक बार देखने को मन कर रहा है ? क्या इतना भर कर देने से मैं चैन से सो पाऊंगा ?  या फिर मैं एक बार फिर से तुम्हारी आवाज सुन लूं...और तुम्हें एक बार बुड़बक कह दूं...तो मुझे नींद आ जाएगी ? एकांत के अरण्य में मैं कब तक भटकता रहूं। क्या बस खुद को कोस भर लेने से शांति मिल जाती है ?

नहीं मेरे सारे सवाल व्यर्थ के हैं।

इस बीच मुझे एक नाम मिला है।.. कज़ान..। ये नाम मैंने तुम्हारा रखा है। मैंने अपने उपन्यास के लीडिंग फीमेल कैरेक्टर का नाम कज़ान रख दिया है। मेरे एक दोस्त ने इस नाम को डायरी में लिखा देखा... उसने कहा... बहुत प्यारा नाम है। मैंने कहा...ये उसका नाम है। फिर वो कई सवाल करने लगा, पर मैंने उसकी सवालों का कोई जवाब नहीं दिया।

क्या तुम्हें पता चला, कि मैंने तुम्हारा नाम कज़ान रखा है ?

अभी मोबाइल पर एक मैसेज आया। मैंने फौरन उठाकर देखा...लगा, कहीं तुम मेरी बात सुन तो नहीं रही। और कहीं तुमने मुझे कोई संदेश तो नहीं भेजा है। किसी कंपनी का कोई मैसेज था। मैंने वापस मोबाइल रख दिया है।

मैं अभी कुछ लिख नहीं पा रहा हूं। अभी मुझे शराब की जरूरत महसूस हो रही है। सारे शब्द गर्दन के पास कहीं फंसे से हैं। इस समय उंगलियों से बेचैनी टपक जाना चाहिए था, पर ऐसा कुछ नहीं हो पा रहा है। कहीं ये तुम्हारा कोई शाप नहीं ? 

अधूरी कहानी...

रात के करीब 3 बजने वाले हैं...और मेरा मन तुम्हें एक कहानी सुनाने का कर रहा है। कोई भी कहानी नहीं... एक प्यार वाली झूठी कहानी। जिसके अंत में प्रेमी-प्रेमिका मिल जाते हैं। मैं सच्ची कहानी सुनाकर तुम्हें रूलाना नहीं चाहता। या फिर एक राजा और एक राक्षस की कहानी। और मैं अंत में उस राक्षस को मरने ना दूं। उसे ज़िंदा रखूं, ताकि, अगली बार वो कहानी मैं वहीं से शुरू कर सकूं।

वो बिस्तर पर लेटा हुआ मोबाइल में कुछ से कुछ कर रहा था। तभी उसे एक सोशल नेटवर्क पर एक लड़की की तस्वीर दिखाई दी। उसका चेहरा देखते ही...वो सम्मोहन से भर गया। वो नज़र नहीं हटा पा रहा था। वो उस लड़की को बार-बार देखता रहा। कुछ चाहनाएं जगीं...कुछ सपने जगे...। वो रात भर जगा रहा...एक कविता गढ़ने की कोशिश करता रहा...। और अंत में वो एक कविता लिखने में सफल भी रहा। वो किसी के मार्फत कविता उस लड़की तक पहुंचाने में सफल भी रहा......।

नहीं...इससे ज्यादा मैं ये कहानी नहीं लिख सकता। ये एक बेहद खूबसूरत कहानी है...जिसे मैंने बाद में बहुत खराब कर दिया। इसलिए नहीं...अब मैं ये कहानी नहीं लिख सकता।

लौट आओ सजना...मेरा दिल पुकारे रे...। मेरा मन अभी ये गीत गाने का कर रहा है।



ओ साथी मेरे..

ओ साथी मेरे.. हाथों में तेरे..  
हाथों की अब गिरहा दी ऐसे  
की टूटे ये कभी ना

चल ना कहीं सपनों के गाँव रे  
छूटे ना फिर भी धरती से पाऊं रे  
आग और पानी से फिर लिख वो वादे सारे  
साथ ही में रोए हंसे, संग धुप छाओं रे  
आग और पानी से फिर लिख वो वादे सारे  
साथ ही में रोए हंसे, संग धुप छाओं रे 

ओ साथी मेरे.. हाथों में तेरे..  
हाथों की अब गिरहा दी ऐसे  की टूटे ये कभी ना  
हम जो बिखरे कभी 
तुमसे जो हम उधड़े कहीं  
बुन ले ना फिर से हर धागा  
हम तो अधूरे यहां  
तुम भी मगर पूरे कहाँ
करले अधूरेपन को हम आधा  
जो अभी हमारा हो मीठा हो या खारा हो आओ ना कर ले हम सब साझा 

ओ साथी मेरे.. हाथों में तेरे  
हाथों की अब गिरहा दी ऐसे  की टूटे ये कभी ना  
गहरी अँधेरी या उजले सवेरे हों  
ये सारे तो हैं तुम से ही  
आँख में तेरी मेरी उतरे इक साथ ही  
दिन हो पतझर के रातें या फूलों के  
कितना भी हम रूठे पर बात करें साथी  
मौसम मौसम यूँही साथ चलेंगे हम  
लम्बी इन राहों में या फूँक के पाहों से  
रखेंगे पाऊँ पे तेरे मरहम

आओ मिले हम इस तरह  
आए ना कभी विरह 
हम से मैं ना हो रिहा  
हमदम तुम ही हो हरदम तुम ही हो अब है यही दुआ 

चल ना कहीं सपनों के गाँव रे  
छूटे ना फिर भी धरती से पाऊं रे  
आग और पानी से फिर लिख वो वादे सारे  
साथ ही में रोए हंसे, संग धुप छाओं रे  
आग और पानी से फिर लिख वो वादे सारे  
साथ ही में रोए हंसे, संग धुप छाओं रे  

ओ साथी मेरे.. 
हाथों में तेरे  हाथों की अब गिरहा दी ऐसे  
की टूटे ये कभी ना

Monday, 21 May 2018

कहां कुछ बचता है

बाहर तेज गर्म हवा चल रही है... घर में तीन कबूतर पंखे पर बैठे हुए हैं। साया किसे पसंद नहीं होता, गर्मी के दिनों में। कबूतरों का गर्दन स्थिर है। बिल्कुल शांत। मेरी तरह। ऐसा लग रहा है, ये कबूतर किसी फैसले पर पहुंचना चाहते हैं।

भूत वाले वाकये के बाद घर से हर दोपहर कई फोन आने लगे थे..। मां और पापा...बारी बारी से फोन कर मेरा हाल पूछते रहते थे...। पर आज कोई फोन नहीं आया। फोन बगल में रखा हुआ है। मैं बार-बार फोन देख लेता हूं, कि कहीं साइलेंट मोड पर तो नहीं है।

वक्त सब कुछ बिसार देता है। शायद पापा भी भूल गये होंगे..मां को भी याद नहीं रहा होगा, कि दोपहर के वक्त मैं घर में बिल्कुल अकेला होता हूं। और अपने कमरे में ही होता हूं। तो क्या मैं इस वक्त कह सकता हूं, कि सब ठीक हो जाता है। लोग सब बात भूलने लगते हैं...या फिर वक्त के कंधे पर धरकर शांत हो जाते हैं। ''जो होना होता है, होकर रहता है'' जैसी बातों पर यकीन कर लेते हैं।

कुछ देर पहले कंप्यूटर पर '' मैं जिस दिन भुल दूं, तेरा प्यार दिल से...वो दिन आखिरी हो मेरी ज़िंदगी का'' ये गीत चल रहा था। गीत सुनकर मैं हंसने लगा। .....कहां होता है ऐसा। देखो कज़ान, मैं ज़िंदा हूं। सालों के प्यार की बातों के बात भी ज़िंदा हूं। असल में मैं अब मानने लगा हूं, कि शपथ टाइप कोई बात होती ही नहीं। वादें बस मुंह से निकला हवा है, जो बस सुनाई देता है, उसका कोई आकार नहीं होता है।


थोड़ी सी रात बची होती
थोड़ी सी बात बची होती
थोड़े दिन बचे होते
तुम्हारा साथ बचा होता

कहां कुछ बचता है...सब खत्म ही तो हो जाता है। खत्म होना ही शाश्वत है...अटल है। हम तो बस खत्म के साथ चलते चलते...कहीं...किसी रोज...किसी खाई में गिर जाते हैं...और फिर वहां से कभी निकल नहीं पाते।

कज़ान

देर रात सपने में तुम थी...और मैं तुम्हें कज़ान नाम से पुकार रहा था। तुम्हें इस नाम के मानी नहीं पता थे, पर तुम्हें अच्छा लग रहा था। तुमने मुझसे पूछा, क्या होता है इस नाम का मतलब। मैंने तुम्हें इस नाम के मानी नहीं बताया। और तुम मुझे मुक्का मारने लगी। तुम थोड़ी चिढ़ रही थी और मुझे तुम्हारा यूं चिढ़ना अच्छा लग रहा था...

मैं चाह रहा था, कभी चुुपके से तुम्हारे कान में ये नाम कहूं। मैं कहूं, सुनो, मैंने तुम्हारा नाम कज़ान रखा है। पर इस नाम के मानी नहीं बताऊं।....पर ऐसा हो नहीं पाया। ये नाम जितना दूर रहा मुझसे, उतना ही दूर तुम मुझसे रही।

दोपहर का वक्त है। मैं अकसर पराठे वाले को फोन पर 2 पराठे ऑर्डर कर दिया करता था। कहता था, भैया मैं ठीक एक बजे आऊंगा, आप पराठे तैयार रखना। मुझे इंतजार करना अच्छा नहीं लगता बाहर...इसलिए मैं तय वक्त पर जाकर उससे पराठे ले आता था। एक बार ऑर्डर देने के बाद मैं पराठे लेने नहीं गया। आज जब फोन किया, तो उसने कहा...सर, पक्का आओगे ना ? मैंने हंसते हुए कहा...हां भैया, पक्का आऊंगा पराठे लेने। वो मान गया था। लेकिन, मैं सोच में पड़ गया। कितनी पतली होती है विश्वास की रेखा...। कितनी जल्दी टूट जाती है विश्वास की रेखा...। बस एक दिन नहीं गया पराठे लेने, तो पराठे वाला का यकीन टूट गया....और मैंने तो तुम्हारा यकीन पूरी तरह से तोड़ चुका था।.... फिर भी तुम्हें मेरे ऊपर यकीन था। खुद को कितना धिक्कारूं... कितना कोसूं...कितना खुद को खरी-खोटी सुनाऊं....जो कहीं दो पलों के लिए चैन मिल जाए। माफ करने वाला माफ कर देता है...पर जिसे माफ कर दिया गया होता है, वो जलता रहता है... जलता रहता है... जलता रहता है। मेरा जलने का वक्त है...

साथी ये जलना कबूल
ये पिघलना कबूल...
इस तरह जगना...फिर उठना कबूल
ये सजा...ये शाप...वो दुआ कबूल
साथी कैसे कहूं...तू मुझे कबूल .....?

कज़ान....साथी मैंने आज के सपने में तुम्हारा ये नाम रखा है।

Sunday, 20 May 2018

देर रात...

कोई सपना देख लूं...कोई गीत गुनगुना लूं...तुम्हें अपना बना लूं...। जैसे विचारों के बहुत से हाथी... खरगोश... और कबूतर मेरे विचारों में आ रहे हैं...और मुझे लग रहा है, कि मैं एक डंडे से...उन विचारों को हांक कर... कहीं किसी जंगल में छोड़ दूं। पर मैं खुद को बेबस पाता हूं।... बहुत बेबस..। झूठ बोलते हुए । अगर कोई मुझसे इसकी वजह पूछे...तो मैं हंसकर झूठ बोल दूंगा...। और मैं ऐसा ही करता हूं। झूठ बोल देता हूं। मुझे लगता है, कि इन दिनों झूठ मेरा सबसे अच्छा दोस्त हो गया है। हर सवाल पर मैं झूठ को आगे कर देता हूं। झूठ के पर्दे के पीछे खुद को छुपा लेता हूं। सच... कांटे की तरह चुभने लगता है, तो मैं अपने पैर आगे बढ़ा देता हूं।

किन हालातों से मैं गुजर रहा हूं.. ? खुद को किस तरफ ले जा रहा हूं मैं, जबकि मैं ये जानता हूं, कि उस तरफ हाथी, खरगोश और कबूतर नहीं रहते...उधर कुछ बाघ रहते हैं, जो मुझे घायल कर देंगे, या हो सकता है, मुझे मार ही दें, पर मैं भागा जा रहा हूं, बगैर किसी को दोष दिए।


असल में मैंने बहुत दुःखी किया है तुम्हें। तुमने खुद को मेरा अंग माना, एक हिस्सा माना...और मैंने......

बस, देर रात की इतनी ही बात है।

बेवफा की डायरी-- 2

आज दिन भर की खामोशी के बाद देर रात मुझे पता चला...कि मैं बहुत दिनों बात तुम्हारे पास लौटा हूं। मुझे लगा, कि मुझे इस बात को लिख लेना चाहिए। और मैं लिखने बैठ चुका हूं। उस आदमी से बैर सा होने लगा है, जो हर वक्त लिखना ..... बस लिखना चाहता था। मैंने कई बार सोचा...कि किसी तरह उसे मना लूं... किसी तरह उससे सुलह कर लूं...पर ऐसा हो नहीं पाया। लंबे अर्से के बाद कुछ लिखने बैठा हूं। नशे में हूं। बताने की जरूरत नहीं...कि पश्चाताप कर रहा हूं। ऐसा लग रहा है, कि रेगिस्तान में भटक रहा हूं...पानी की तलाश में हूं....या फिर कीकर का कांटा पैरों में चुभा हुआ है...और मैं मुंह बंद अंदर ही अंदर चिल्ला रहा हूं।

जो मैंने किया हुआ है...उसे मैंने गुनाह नाम दिया हुआ है।...और मैं हर वक्त उसके साथ रहता हूं। माफी की आकांक्षा भी नहीं है...पर कुछ ऐसा है...जो अंदर फंसा हुआ है...जो निकल जाए, तो मैं राहत की सांस लूं। मैं कितना खुश हो जाया करता था, तुम्हारी हंसी देखकर...तुम्हारी आंखों की मिलमिलाहट देखकर...पर अब मेरे पास बचा क्या है।.. तुमने अपना एक अंग मुझे समझ लिया था, ये मुझे तब पता चला, जब मैं गलतियां कर चुका था...मैं बहुत गुस्सा हुआ...कि तुम्हें पहले बताना चाहिए था...लेकिन वो तो मुझे खुद समझ लेना चाहिए था....तुमसे सुनने की अभिलाशा बेकार की बात हुई ना। ओह......

मुंह से पतली सी आह निकलती है...और रात के सन्नाटे में गुम हो जाती है। किससे कहूं, अपनी बेवफाई के किस्से... कहा रो लूं...कहां बहा लूं इन बहते हुआ आंसुओं को....कि इसका कतरा नहीं देख पाए कोई....कि नहीं उठा पाए कोई सवाल...ना मैं दे पाऊं जवाब...जबकि, मैं जानता हूं...तुमने मुझे माफ कर दिया है।... शायद मेरा दिल रखने के लिए ही....शायद, मुझसे प्रेम करने के लिए वास्ते ही....और मैंने क्या किया..........

इन दिनों मैं खूब सपने देखता हूं...हर सपने के बाद बहुत डर जाता हूं...डर इतना...कि सोते हुए मुंह से डर भरी आवाज निकलती है...और उठ जाता हूं..। कुछ देर खुद को आईने में देखता रहता हूं। आईने में उस निरीह इंसान को देखता हूं..जिसने कहा था...सुनो...तुम आंखे मिलमिलाती हो, तो बहुत अच्छी लगती हो...प्लीज एक बार और आंखे मिलमिलाओ ना...और तुम खुश होकर मेरी बातें मान लिया करती थीं। कहां से लाऊं इतनी मासूमियत.. कहां से लाऊं वो वाला प्यार...कहां से लाऊं तुम्हारे वो वाले जज्बात...वो निश्छल हंसी...लो निस्वार्थ प्रेम.... आह....

जो चोट खाता है, उसका दर्द सब देखते हैं...और जो चोट देता है, वो खामोश मौत मरते रहता है...मरते रहता है.. मरते रहता है।.....

Friday, 18 May 2018

भूत होते हैं...

जब आप किसी समस्या से घिरे हों...और आपके बेहद नजदीक लोगों को उस समस्या के बारे में पता हो, तो अपने आपको बेवजह फोन करते रहते हैं। बिना बात के फोन करते हैं। और फिजूल की बातें करने लग जाते हैं। आप खिन्न होते हैं...असल, में आपके अपने बस ये जानना चाहते हैं, कि आप ठीक हैं या नहीं। आप किसी परेशानी में तो नहीं हैं। बस, इतना ही जानना चाहते हैं वो।

love you all....


कर्नाटक चुनाव के परिणाम आ रहे थे। सुबह काफी पहले उठ गया था। टीवी ऑन कर न्यूज देखने लगा। अंबेश ने चाय पिलाई। फिर मेड खाना बनाने लगी।...सुबह के करीब 10 बज गये थे। मेड खाना बनाकर चली गई थी। अंबेश भी ऑफिस चला गया था। मैं अब भी टीवी पर रिजल्ट देख रहा था। वक्त बीत रहा था । और दिन के 11 बज गये। मैं कुछ देर सो गया। दोपहर 12 बजे मैं सोकर उठ गया। और खाना खाने लगा। खाना खाने के बाद मैं वापस अपने बिस्तर पर था। सोचा, ऑफिस जाने से पहले कुछ देर सो लूं। मैं बिस्तर पर लेटे हुए मोबाइल पर कुछ तस्वीरों को निहारने लगा। और मेरी आंखे झपकने लगीं। तभी मैं महसूस करता हूं, कि मेरी पीठ पर बहुत ठंढी हवा लग रही है। मैंने सोचा, शायद दिल्ली में मौसम ने करवट बदली हो। अचानक, मैं महसूस करता हूं, कि किसी ने मेरे दोनों कंधे को जोर से पकड़ लिया हो। मैं पलटकर देखना चाहता था, कि किसने मुझे पकड़ा है। लेकिन, मैं पलट नहीं पा रहा था। मेरा पूरा शरीर...पत्थर की तरह सख्त हो चुका था। मैं महसूस कर पा रहा था, कि एक लड़की ने मुझे पीछे से मेरे कंधों को जोर से पकड़ लिया है। मैं उसकी गिरफ्त से छूटना चाह रहा था, पर खुद को छुड़ा नहीं पा रहा था। अचानक पीछे से आवाज आई....मैं तुम्हें छोड़ूंगी नहीं। तबतक मैं समझ चुका था, कि मुझे भूत ने पकड़ लिया है।

अभी ये लिखते वक्त...मेरे रोएं खड़े हो गये हैं, लेकिन, आप यकीन मानिए, उस वक्त मैं बिल्कुल भी डरा नहीं था। अमूमन लोग इस परिस्थिति में चिल्लाना शुरू कर देते हैं। लेकिन, मैंने धीरे से मोबाइल उठाया। सोचा, अबेश को फोन करूं। अगर कुछ बोल भी ना पाऊं, तो कम से कम चिल्ला तो दूं ही। जैसे ही मैने मोबाइल उठाया, लड़की की फिर से आवाज आई, अच्छा, मोबाइल से फोन करोगे। मोबाइल ऑन नहीं हो रहा था। ऐसा लग रहा था, मोबाइल स्वीच ऑफ हो गया हो। मैं समझ गया, कि मोबाइल काम नहीं करने वाला। अब तक वो कुछ और बोल चुकी थी, लेकिन, वो मुझे याद नहीं। मैंने जय मां दूर्गा...जय मां दूर्गा बोलना शुरू किया। जिसे सुनकर वो बोलती है, अच्छा, अब भगवान को बुलाओगे। मैं डरा अब भी नहीं था, लेकिन, मेरा खुद पर वश नहीं चल रहा था। अब मैंने जोर-जोर से जय हनुमान जी...जय हनुमान जी बोलना शुरू कर दिया।.. शायद, 1 मिनट और बीते होंगे..कि मैंने महसूस किया, कि उसके हाथों का दवाब कम हो रहा है। फिर मैंने पूरी ताकत के साथ दीवाल पर पैर टिकाया, और एक झटके से उठ गया। पीछे पलटकर देखा...तो कोई नहीं था। मैं अपने कमरे से निकलकर भगवान जी वाले कमरे में आ गया।

करीब 10 मिनट बाद मैं वापस कमरे में गया...तो मैं अच्छी तरह महसूस कर पा रहा था, कि वो अभी भी कुर्सी पर बैठी हुई है। मैं वापस भगवान जी वाले कमरे में चला गया। कुछ देर बाद वो जा चुकी थी। दिन के ठीक 12 बजकर 35 मिनट पर उस लड़की के भूत ने मुझे पकड़ा था।


मैं भूतों पर यकीन करता था...लेकिन, मुझे ये नहीं पता था, कि वो मेरे ऊपर भी हावी हो जाएगी। मैं डरा इसलिए नहीं...क्योंकि, मैंने भूतों को लेकर कई सारे शोज बनाए हैं। लास्ट वाले शो में पैरा नॉर्मल एक्सपर्ट राज से मिला। राज से भूतों को लेकर कई तरह की बातें हुईं।..और राज ने कहा था, कि सर, भूत आपको कुछ नहीं कर सकते, बस आप डरिएगा नहीं। जब उस लड़की की भूत ने मुझे पकड़ रखा था, उस वक्त मुझे राज की बातें याद आ रही थीं, और इसलिए मैं बिल्कुल भी डरा नहीं। हां, 2 बातें पक्की तौर पर मैं जान गया...भले आप यकीन करें, या ना करें...कि पहला...भूत होते हैं...और दूसरी बात...कि भगवान भी होते हैं...जो भूतों से बहुत ज्यादा शक्तिशाली हैं। मैं बिल्कुल ठीक हूं।...स्वस्थ हूं...हां, घर पर बताने के बाद से मां और पापा बहुत टेंशन में हैं। बार बार फोन कर हाल पूछते रहते हैं। अंबेश और राजन लगातार फोन करते रहते हैं। मेरी खैरियत पूछते रहते हैं। मैं उन्हें कहता हूं...dont worry.... मैं बिल्कुल ठीक हूं। भूतनी ही तो थी...पकड़ ली...तो पकड़ ली..। क्या हो गया।....








Tuesday, 1 May 2018

बेवफा की डायरी-1

गीत गाता हूं मैं ..गुनगुनाता हूं मैं...मैंने हंसने का वादा किया था कभी...इसलिए अब सदा मुस्कुराता हूं मैं।.... रात के ठीक 12 बज रहे हैं..और मैं ये गाना सुन रहा हूं। अच्छा लग रहा है..। पर जब भी ....मैंने हंसने का वादा किया था कभी...इसलिए अब सदा मुस्कुराता हूं मैं...ये लाइन आ रहा है, मेरा मन चुप हो जाता है। उसने हंसने का वादा किया था...इसलिए मन में एक कचोट सा उठता है...। खुद को कोसने का मन करता है...। दौड़ पड़ने का मन करता है...जैसे दौड़कर कुछ उठा लूं... सब कुछ समेट कर रख दूं कहीं..। फिर शायद इत्मिनान मिले..। पर कहां भागूं...कहां दौड़ूं...। पैर थोड़े आगे बढ़ते हैं..और वहीं रूक जाते हैं...। आप अपनी करनी पर असीम वेदना से गुजरने लगते हैं..।

हम कहते हैं, कि सब ठीक हो जाएगा..। पर कहां हो पाता है सब ठीक। अधूरेपन को पूर्णता की निशानी मान लेते हैं...पर अधूरापन आखिर में मन के सन्नाटे में तब्दील हो जाता है..। मन मेरा मानता है, कि मैं गुनहगार हूं..। कभी हंसता हूं...तो फरेब की एक रेख होठों पर बन जाती है। मन समझ लेता है...पर मन के पास कोई इलाज नहीं है।.... मन फिर से मुझे कोसने लगता है। एक गलत कदम कितना कुछ बदल कर रख देता है। बहुत कुछ खत्म कर देता है...। मैंने भी बहुत कुछ खत्म कर दिया है..। काफी लंबे अर्से से कुछ लिख नहीं पा रहा हूं। वो लिखने वाला कोई और था...जो अब बैरी हो चुका है... । वो मुझे कहता है, तुम एक निकृष्ट इंसान निकले..। अब मैं तुम्हें शब्द नहीं दूंगा। मैं कई बार चाहता हूं, उससे सुलह कर लूं...पर हर बार वो मुंह फेरकर आगे निकल जाता है। मैं अफसोस लिए वहीं खड़ा रह जाता हूं।

कितने महान लोग थे...जिन्होंने मेरी बातों पर विश्वास किया..। कितने महान लोग हैं, जिन्होंने मुझे क्षमा दिया..। और कैसा मैं हू्ं, कि बस क्षमा याचणा ही करता रह गया।... शाप मिले...शाप स्वीकार किया...। मैं किसी भी तरह से भाग जाना चाहता हूं खुद से।... असल में मैं अब खुद को बेहद नापसंद करने लगा हूं।

रात के साढ़े बारह बज रहे हैं। मैं अपनी गलतियां लिख देना चाहता हूं। हाथ के मैल धो देना चाहता हूं। पर कुछ नहीं कर पा रहा हूं। अलग अलग बहाने कर खुद से भाग जाता हूं। आह...मुंह से अब बस यही शब्द निलकते हैं। पश्चाताप की अग्नि में जलना भी आसान नहीं होता है। मैं आजकल पश्चाताप की अग्नि में ही जल रहा हूं।...और शायद ताउम्र जलता रहूंगा।.. साथी तुम सुखी रहना।...

डूबने वाले ने डूबते साहिल को आवाज दी...

वो एक खिलौना भर है...टूट जाना उसकी नीयति है..। वो टूट ही जाएगा...। फिर क्यों हम करें उसकी उम्मीद...।  दूर एक धुंधला सा लैंप पोस्ट दिखता है।...