इन दिनों मैं लड़ रहा हूं। ये लड़ाई मेरी खुद से ही है। और सबसे खास बात ये है...कि इस लड़ाई में लगातार मैं हार रहा हूं। मुझे लगता है...कि मैं अपने शरीर में बुरी तरह से कैद हो चुका हूं। मैं अंदर से लात मारकर...हाथ मारकर अपने शरीर से निकलना चाहता हूं...पर उस कैद से बाहर निकल नहीं पा रहा हूं। ये लड़ाई अब इस स्तर तक पहुंच चुकी है...कि मैं किसी से ना तो ठीक से बात कर पा रहा हूं, और ना ही...इस तिलिस्म को तोड़ पा रहा हूं। मुझे लग रहा है, कि कुछ ऐसा कर दूं...कि मैं इन सबसे आजाद हो जाऊं। लेकिन, फिर मैं सोचता हूं, कि मैं किस चीज का गुलाम हूं। वो कौन सी चीज है, जिसने मुझे जकड़ रखा है। पर मैं उस चीज को जान नहीं पाता। लाख कोशिश करने पर भी हासिल कुछ नहीं हो पा रहा है। दुनिया के सभी नॉर्मल लोग मुझे अजीब लग रहे हैं। उनका हंसना मुझे फर्जी लग रहा है। उनकी हरकतें मुझे बनावटी लग रही हैं।
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कम मैं अपने एक मित्र के साथ बातें कर रहा था। कुछ देर बात करने के बाद वो मेरी लड़ाई वाली स्थिति जान गये। उन्होंने मुझसे कहा...अभिजात, आदमी अगर दिल से सोचता है, तो फिर वो कहीं नहीं जा पाता है, और अगर वो दिमाग से सोचता है, तो फिर वो अनंत तक का सफर तय कर सकता है। ऐसे में आपको तय करना है, कि आपको कहां तक जाना है। उन्होंने कहा...ये दिल क्या होता है...घंटा। शरीर के अन्य अंगों की तरह ही एक अंग। जिसका काम बस...धड़कना है। धमनियों में खून की सप्लाई करना है। इससे ज्यादा दिल का काम कुछ नहीं है। हां, इसे इतनी खूबसूरत से बनाया गया है, कि इसे देखकर हम मोहित हो जाते हैं, और अपना किया धरा... सब इस कमबख्त दिल के नाम कर देते हैं। असल चीज, दिमाग है। जो हमें कंट्रोल करता है। हम दिमाग के कहे मुताबिक ही करते हैं। उसके इतर कुछ नहीं। हमें लगता है, कि फैसला हमने छाती के अंदर रखे दिल के कहने पर लिया है, पर ये सिर्फ हमारा वहम है, और कुछ नहीं। सारे फैसले दिमाग के होते हैं। हां, हमारा दिमाग अकसर कनफ्यूज कर देता है हमें। क्योंकि....हम एक साथ कई चीजें चुनना चाहते हैं।...
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अगर मैं उनके दिल और दिमाग वाली थ्योरी पर बात करूं, तो मेरे मन में कई प्रश्न उठ गये हैं। जब हम दिमाग के फैसले पर ही अमल करते हैं, तो फिर हम कौन हैं। दिमाग किसे इंस्ट्रक्शन देता रहता है। दिमाग किसे संदेश भेजता है। कोई फैसला लेने के लिए 'हमें' कहता है। ये '' हम '' कौन है ? इस सवाल ने मुझे विचलित कर दिया । क्योंकि...मैं सोचता हूं...कि हमारे पास दो मन हैं..। एक दिमाग है। एक दिल है। और...सबसे पड़े...एक आत्मा है।और सबका काम अलग अलग निर्धारित किया गया है। इन सबके साथ...एक चीज और होता है..। बिल्कुल अलग ऑब्जेक्ट। और वो जो एक अलग ऑब्जेक्ट है, वो हम हैं। जो मन, दिल, दिमाग और आत्मा का कहा सुना मानते हैं। करते हैं। किसी एक सिचुएशन को...ये दिल, दिमाग...मन और आत्मा...अलग अलग तरीके से परखता है, और अलग अलग फैसला सुनाता है। और हम...ऑब्जेक्ट...को सलेक्ट करना पड़ता है, कि हमें कौन सा...और किसका फैसला मानना है। और कौन से फैसले को खारिज करना है।
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कम मैं अपने एक मित्र के साथ बातें कर रहा था। कुछ देर बात करने के बाद वो मेरी लड़ाई वाली स्थिति जान गये। उन्होंने मुझसे कहा...अभिजात, आदमी अगर दिल से सोचता है, तो फिर वो कहीं नहीं जा पाता है, और अगर वो दिमाग से सोचता है, तो फिर वो अनंत तक का सफर तय कर सकता है। ऐसे में आपको तय करना है, कि आपको कहां तक जाना है। उन्होंने कहा...ये दिल क्या होता है...घंटा। शरीर के अन्य अंगों की तरह ही एक अंग। जिसका काम बस...धड़कना है। धमनियों में खून की सप्लाई करना है। इससे ज्यादा दिल का काम कुछ नहीं है। हां, इसे इतनी खूबसूरत से बनाया गया है, कि इसे देखकर हम मोहित हो जाते हैं, और अपना किया धरा... सब इस कमबख्त दिल के नाम कर देते हैं। असल चीज, दिमाग है। जो हमें कंट्रोल करता है। हम दिमाग के कहे मुताबिक ही करते हैं। उसके इतर कुछ नहीं। हमें लगता है, कि फैसला हमने छाती के अंदर रखे दिल के कहने पर लिया है, पर ये सिर्फ हमारा वहम है, और कुछ नहीं। सारे फैसले दिमाग के होते हैं। हां, हमारा दिमाग अकसर कनफ्यूज कर देता है हमें। क्योंकि....हम एक साथ कई चीजें चुनना चाहते हैं।...
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अगर मैं उनके दिल और दिमाग वाली थ्योरी पर बात करूं, तो मेरे मन में कई प्रश्न उठ गये हैं। जब हम दिमाग के फैसले पर ही अमल करते हैं, तो फिर हम कौन हैं। दिमाग किसे इंस्ट्रक्शन देता रहता है। दिमाग किसे संदेश भेजता है। कोई फैसला लेने के लिए 'हमें' कहता है। ये '' हम '' कौन है ? इस सवाल ने मुझे विचलित कर दिया । क्योंकि...मैं सोचता हूं...कि हमारे पास दो मन हैं..। एक दिमाग है। एक दिल है। और...सबसे पड़े...एक आत्मा है।और सबका काम अलग अलग निर्धारित किया गया है। इन सबके साथ...एक चीज और होता है..। बिल्कुल अलग ऑब्जेक्ट। और वो जो एक अलग ऑब्जेक्ट है, वो हम हैं। जो मन, दिल, दिमाग और आत्मा का कहा सुना मानते हैं। करते हैं। किसी एक सिचुएशन को...ये दिल, दिमाग...मन और आत्मा...अलग अलग तरीके से परखता है, और अलग अलग फैसला सुनाता है। और हम...ऑब्जेक्ट...को सलेक्ट करना पड़ता है, कि हमें कौन सा...और किसका फैसला मानना है। और कौन से फैसले को खारिज करना है।
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