Friday, 9 February 2018

इन दिनों मैं लड़ रहा हूं...

इन दिनों मैं लड़ रहा हूं। ये लड़ाई मेरी खुद से ही है। और सबसे खास बात ये है...कि इस लड़ाई में लगातार मैं हार रहा हूं। मुझे लगता है...कि मैं अपने शरीर में बुरी तरह से कैद हो चुका हूं। मैं अंदर से लात मारकर...हाथ मारकर अपने शरीर से निकलना चाहता हूं...पर उस कैद से बाहर निकल नहीं पा रहा हूं। ये लड़ाई अब इस स्तर तक पहुंच चुकी है...कि मैं किसी से ना तो ठीक से बात कर पा रहा हूं, और ना ही...इस तिलिस्म को तोड़ पा रहा हूं। मुझे लग रहा है, कि कुछ ऐसा कर दूं...कि मैं इन सबसे आजाद हो जाऊं। लेकिन, फिर मैं सोचता हूं, कि मैं किस चीज का गुलाम हूं। वो कौन सी चीज है, जिसने मुझे जकड़ रखा है। पर मैं उस चीज को जान नहीं पाता। लाख कोशिश करने पर भी हासिल कुछ नहीं हो पा रहा है। दुनिया के सभी नॉर्मल लोग मुझे अजीब लग रहे हैं। उनका हंसना मुझे फर्जी लग रहा है। उनकी हरकतें मुझे बनावटी लग रही हैं।

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कम मैं अपने एक मित्र के साथ बातें कर रहा था। कुछ देर बात करने के बाद वो मेरी लड़ाई वाली स्थिति जान गये। उन्होंने मुझसे कहा...अभिजात, आदमी अगर दिल से सोचता है, तो फिर वो कहीं नहीं जा पाता है, और अगर वो दिमाग से सोचता है, तो फिर वो अनंत तक का सफर तय कर सकता है। ऐसे में आपको तय करना है, कि आपको कहां तक जाना है। उन्होंने कहा...ये दिल क्या होता है...घंटा। शरीर के अन्य अंगों की तरह ही एक अंग। जिसका काम बस...धड़कना है। धमनियों में खून की सप्लाई करना है। इससे ज्यादा दिल का काम कुछ नहीं है। हां, इसे इतनी खूबसूरत से बनाया गया है, कि इसे देखकर हम मोहित हो जाते हैं, और अपना किया धरा... सब इस कमबख्त दिल के नाम कर देते हैं। असल चीज, दिमाग है। जो हमें कंट्रोल करता है। हम दिमाग के कहे मुताबिक ही करते हैं। उसके इतर कुछ नहीं। हमें लगता है, कि फैसला हमने छाती के अंदर रखे दिल के कहने पर लिया है, पर ये सिर्फ हमारा वहम है, और कुछ नहीं। सारे फैसले दिमाग के होते हैं। हां, हमारा दिमाग अकसर कनफ्यूज कर देता है हमें। क्योंकि....हम एक साथ कई चीजें चुनना चाहते हैं।...

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अगर मैं उनके दिल और दिमाग वाली थ्योरी पर बात करूं, तो मेरे मन में कई प्रश्न उठ गये हैं। जब हम दिमाग के फैसले पर ही अमल करते हैं, तो फिर हम कौन हैं। दिमाग किसे इंस्ट्रक्शन देता रहता है। दिमाग किसे संदेश भेजता है। कोई फैसला लेने के लिए 'हमें' कहता है। ये '' हम '' कौन है ? इस सवाल ने मुझे विचलित कर दिया । क्योंकि...मैं सोचता हूं...कि हमारे पास दो मन हैं..। एक दिमाग है। एक दिल है। और...सबसे पड़े...एक आत्मा है।और सबका काम अलग अलग निर्धारित किया गया है। इन सबके साथ...एक चीज और होता है..। बिल्कुल अलग ऑब्जेक्ट। और वो जो एक अलग ऑब्जेक्ट है, वो हम हैं। जो मन, दिल, दिमाग और आत्मा का कहा सुना मानते हैं। करते हैं। किसी एक सिचुएशन को...ये दिल, दिमाग...मन और आत्मा...अलग अलग तरीके से परखता है, और अलग अलग फैसला सुनाता है। और हम...ऑब्जेक्ट...को सलेक्ट करना पड़ता है, कि हमें कौन सा...और किसका फैसला मानना है। और कौन से फैसले को खारिज करना है।

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Thursday, 8 February 2018

रिश्ते...लंबी जिंदगी में बस किसी फ्रेम की तरह होते हैं।....

पिछले कई दिनों से मैं अलग-अलग रिश्तों के बारे में सोच रहा था। हर तरह के रिश्तों के बारे में। और सोचते-सोचते मैं दुखी हुआ जाता हूं। वो कौन सी गर्माहट है, जिससे रिश्ते मुकम्मल होते हैं। और वो कौन सा पल होता है, जिससे रिश्ते खत्म हो जाते हैं। मैं यहां, उन रिश्तों के बारे में बात कर रहा हूं, जो खत्म हो जाता है...जिसे खत्म कर दिया जाता है।....
मैंने अपने जीवन में अब तक...3 हजार से ज्यादा क्राइम की स्टोरीज पर काम किया है। और किसी के जीवन में 3 हजार उदाहरण कम नहीं होते। मैंने देखा है...बाप को...अपने इकलौते बेटे का मर्डर करते हुए।...मैंने देखा है...मां को...अपने बेटे को जहर देकर मारते हुए। मैंने देखा है पत्नी को...अपने पति और बच्चों की हत्या करते हुए। मैंने देखा है उस शख्स को... जो एक कुल्हाड़ी उठाता है...और पूरे परिवार को काट डालता है। मैंने देखा है...उस बाप को... जो अपनी बेटी को सरेआम...केरोसिन डालकर जिंदा जला देता है।..और मैंने उस बेटी को भी देखा है...जो खाने में जहर मिलाकर अपने पूरे परिवार को खत्म कर देती है, ताकि वो अपने प्रेमी के साथ सुकून से रह सके। इतने सारे रिश्तों का कत्ल...मैं सोचता हूं, तो घबरा जाता हूं। हर किसी ने हर किसी का कत्ल किया है...और हर किसी ने मिलकर विश्वास का कत्ल किया है। मैंने देखा है...6 महीने की बच्ची से लेकर 80 साल की महिला तक से बलात्कार करने वालों को...। बस ये समझ लीजिए...हर तरह की बुराई...और हर तरह के बुरे इंसान को मैंने देख लिया है।...
अब आप कह सकते हैं, कि दुनिया बहुत अच्छी है...और बुरे आदमी कहां नहीं रहते।.. मैं भी अपने आप को यही कहता हूं।...मगर, यहां से मेरी ख्वाहिशें खत्म होने लगती हैं...और मैं अपने लिए एक काल्पनिक दुनिया बना लेता हूं। दूसरा विकल्प हो भी क्या सकता है ? जो दलील आप मुझे दे सकते हैं, हर उस दलील को मैं जानता हूं। मैंने इसपर अब बहस भी करना छोड़ दिया है..कि दुनिया खराब है या हसीन...। अब किसी भी तरह की विभत्सता मुझे विचलित नहीं करती। हां, मैं डरने लगा हूं...। एक अजीब सी लहर उठती रहती है।... और आंसू तो जैसे सूख चुके हैं मेरे अंदर के।... किसी चीज की फिक्र नहीं होती मुझे।
हां...कुछ होना चाहिए आपके पास...जिसके सहारे आप जिंदा रह सकें।...तो मेरे पास दो चीजें हैं.. जिनके सहारे मैं जिंदा हूं..। एक मुझे लिखना सबसे प्रिय है..। और मैं भरपूर लिखता हूं।... और दूसरी पापा का दिया गीता उपदेश...। उन्होंने मुझसे एक बार कहा था... सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ । ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ।
बस...जिंदा रहने के लिए दो ही चीजें हैं मेरे पास।....

Monday, 5 February 2018

तुम मेरे लिए रसगुल्ला हो...

तुम मेरे लिए रसगुल्ले की तरह हो। सबसे प्रिय। जब मैं खाना खाता हूं, तो रसगुल्ला प्लेट में साइड में पड़ा रहता है। उस वक्त मैं बाकी चीजें खाता रहता हूं। रसगुल्ला सोचता रहता है, कि मैं उसकी उपेक्षा कर रहा हूं। एक नजर देखकर...फिर से बाकी चीजें खाने लगता हूं। रसगुल्ला मुझसे काफी गुस्सा होने लगता है। इसी बीच में जल्दी जल्दी खाना खाता हूं। जब बाकी का खाना खत्म हो जाता है, तो मैं...रसगुल्ले को प्लेट से उठाकर अंत में उसे खाता हूं, सबसे आखिर में। स्वाद लेकर। कई घंटे तक...रसगुल्ले की मिठास...मेरे मुंह में....मन में घुलती रहती है। मैं उस मिठास को महसूस करता रहता हूं...बिल्कुल तुम्हारी आवाज की तरह।.... बीच-बीच में मेरे मन की सरलता लड़खड़ाती रहती है...और कभी कभी निश्चिंत होकर...मैं सो भी जाता हूं।

दरअसल, मैं रसगुल्ले की उपेक्षा नहीं कर रहा होता। आपके पास जो अनमोल चीज होता है, उसे आप संभाल कर... बेहद संभाल कर रखते हैं।...उसे हम यूं ही हर चीज में मिला तो नहीं सकते ना। और एक दिक्कत ये भी है...कि उसे आंखों के सामने ज्यादा देर रखो...तो खुद की भी नजर लग जाती है। इसलिए गहने हम बैंक के लॉकर में रख देते हैं, खुद से बहुत दूर। ताकि, वो चोरी ना हो जाए।

सनम....तुम मेरे लिए रसगुल्ला हो।.....

Thursday, 1 February 2018

एक अजीब सपना

कुछ कहूं या चुप ही रह जाऊं...जैसे विचारों के बहुत से हाथी, खरगोश और कबूतर मेरे मन में उछल कूद कर रहे हैं..। पर मन की हर बात मैं खारिज कर दे रहा हूं। वो दुआ क्यों मांगू जो सच हो जाए तो सुनामी के वेग में सब बह जाए। और यही ख्याल था, जब सपने वाली बात मैंने तुम्हें बताना सही नहीं समझा।

सपने में तुम बुला रहीं थीं....और मैं व्याकुल सा भागा जा रहा था आपसे मिलने। तभी रास्ते पर पड़े एक रोड़े से मैं टकरा गया। अंगूठे से खून  निकलने लगा। मेरे मुंह से पतली चीख निकली और शोर में खो गई। मैंने हाथों से अंगूठा पकड़ लिया। खून रोकने की कोशिश करने लगा। पास से गुजर रहे एक आदमी ने मदद की। पर अब मैं भाग नहीं पा रहा था। मैं दौ़ड़ना चाह रहा था, पर पैरों ंमें ताकत नहीं बची थी। मुझे लग रहा था. मेरे पास वक्त बेहद कम हैं, इसलिए पूरा दम लगाकर मैं फिर से भागा। तभी रास्ता खत्म हो गया। सामने खाई थी। कोई पुल नहीं था। मैं सबको कोसने लगा। मुझे आपसे मिलने बहुत दूर जाना था। मैं वापस मुड़ा, कुछ कदम चला, तो वापस अपने घर के पास खड़ा था। तुमसे मिलने की मियाद खत्म हो चुकी थी। मैं जग चुका था। 

सब कुछ बेहद अजीब लग रहा था मुझे। मैं इस सपने का रहस्य नहीं समझ पाया। हो सकता है, इसका कोई रहस्य ना भी हो, पर कुछ ना कुछ तो होता ही है। सब कुछ व्यर्थ तो हो नहीं सकता। सबकुछ हम यूं ही खारिज तो नहीं कर सकते। वो हुक का उठना भी उसमें शामिल है। मैं जानता हूं, ये बेवजह की बातें हैं...। पर बातें तो हैं...जिसे तुमसे कहने में मुझे अभी हर्ज नहीं लग रहा। 
मंदिर में बहुत पुराने पेड़ की डाली पर मन्नत का धागा बांधा...एक दुआ की ख्वाहिश लिए...पर किसी डाली से अनगिणत बंधे धागों में से किसी धागे को उतरते नहीं देखा ..। दुआ कबूल नहीं हुई। मैंने देखा बहुत सारे धागे उस डाल से उतरने के इंतजार में थे...पर ये कैसा इंतजार था ? मैंने शिवजी के मंदिर में दरख्वास्त लगाई....शिवजी के वाहन नंदी के कान में मन की निजी बात कही... पर मन चमत्कार की आस में बैठा रहा, और हर मियाद पूरी होती रही। एक वक्त आता है, जब हम कहते हैं, दुनिया की सुराही से खट्टा पानी ही बहता है। 

डूबने वाले ने डूबते साहिल को आवाज दी...

वो एक खिलौना भर है...टूट जाना उसकी नीयति है..। वो टूट ही जाएगा...। फिर क्यों हम करें उसकी उम्मीद...।  दूर एक धुंधला सा लैंप पोस्ट दिखता है।...