इन दिनों अजनबियों से संबंध बन रहे हैं। मेट्रो से ऑफिस आ रहा था। माथे पर तिलक लगा हुआ था। जब गुरुजी मुझे तिलक लगा रहे थे, तब उन्होंने मुझसे पूछा था, लाज तो नहीं आएगी ऑफिस जाते वक्त...या बाहर निकलते वक्त तिलक लगाए। मैंने कहा, नहीं...बिल्कुल नहीं लाज आएगी। गुरुजी ने कहा...तब ठीक है।
खैर..मेट्रो में मैं बैठा था...कि दो बच्चियां पास आईं। आते ही कहा...भैया राधे-राधे।... मैं मुस्कुरा उठा। जवाब में कहा...राधे-राधे। फिर वो चली गईं। काफी देर तक मुस्कान मेरे मुंह पर तैरती रही। इन दिनों अकसर ऐसा मेरे साथ होने लगा है। कई अजनबी मुझे टोक चुके हैं। ज्यादातर इस्कॉन से जुड़े भक्त होते हैं। बात करते हैं, और फिर साथ इस्कॉन चलने को कहते हैं। मैं सभी का आग्रह स्वीकार कर लेता हूं, मगर अभी तक व्यस्तता की वजह से जा नहीं पाया। एक दिन मेट्रो में हरि जी मिले। पहली बार मुलाकात हुई। उनके माथे पर तिलक नहीं था, पर हाथ में माला थी। हरे कृष्णा किया। इस्कॉन से जुड़े हुए भक्त थे। हरि जी से मुलाकात कर काफी अच्छा लगा। फिर ऑफिस में नारायण मिले। अभी नये नये इंटर्न आए हैं हमारे यहां। वो भी इस्कॉन से हैं। हालांकि, ऑफिस जाने वाले ज्यादातर लोग तिलक नहीं लगाते हैं। कहते हैं, लोग हंसेंगे। पर मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ। अभी तक दफ्तर में मिलने वाले एक भी साथी से मुझे लाज नहीं लगी है...ना ही वो हंसे हैं मुझपर। कई साथी तो मेरे इस नये रूप को विस्तार से जानने को इच्छुक थे। हमने यथा संभव आध्यात्म के बारे में उनसे चर्चा भी की। कई साथी दफ्तर में ऐसे भी मिले, जो मेरी ही तरह हैं, मगर अभी तक अपना स्वरूप छुपाए हुए हैं।
काफी अच्छा लग रहा है। ये आनंद का अनुभव है, कि दो प्यारी प्यारी बच्चियां राधे-राधे कहती हुई मेरे पास आईं। जीवन में अजनबी कुछ नहीं होता...सब अपने होते हैं...बस हम उनके स्वरूप से अनभिज्ञ हो
ते हैं।
खैर..मेट्रो में मैं बैठा था...कि दो बच्चियां पास आईं। आते ही कहा...भैया राधे-राधे।... मैं मुस्कुरा उठा। जवाब में कहा...राधे-राधे। फिर वो चली गईं। काफी देर तक मुस्कान मेरे मुंह पर तैरती रही। इन दिनों अकसर ऐसा मेरे साथ होने लगा है। कई अजनबी मुझे टोक चुके हैं। ज्यादातर इस्कॉन से जुड़े भक्त होते हैं। बात करते हैं, और फिर साथ इस्कॉन चलने को कहते हैं। मैं सभी का आग्रह स्वीकार कर लेता हूं, मगर अभी तक व्यस्तता की वजह से जा नहीं पाया। एक दिन मेट्रो में हरि जी मिले। पहली बार मुलाकात हुई। उनके माथे पर तिलक नहीं था, पर हाथ में माला थी। हरे कृष्णा किया। इस्कॉन से जुड़े हुए भक्त थे। हरि जी से मुलाकात कर काफी अच्छा लगा। फिर ऑफिस में नारायण मिले। अभी नये नये इंटर्न आए हैं हमारे यहां। वो भी इस्कॉन से हैं। हालांकि, ऑफिस जाने वाले ज्यादातर लोग तिलक नहीं लगाते हैं। कहते हैं, लोग हंसेंगे। पर मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ। अभी तक दफ्तर में मिलने वाले एक भी साथी से मुझे लाज नहीं लगी है...ना ही वो हंसे हैं मुझपर। कई साथी तो मेरे इस नये रूप को विस्तार से जानने को इच्छुक थे। हमने यथा संभव आध्यात्म के बारे में उनसे चर्चा भी की। कई साथी दफ्तर में ऐसे भी मिले, जो मेरी ही तरह हैं, मगर अभी तक अपना स्वरूप छुपाए हुए हैं।
काफी अच्छा लग रहा है। ये आनंद का अनुभव है, कि दो प्यारी प्यारी बच्चियां राधे-राधे कहती हुई मेरे पास आईं। जीवन में अजनबी कुछ नहीं होता...सब अपने होते हैं...बस हम उनके स्वरूप से अनभिज्ञ हो
ते हैं।
