Wednesday, 5 December 2018

डूबने वाले ने डूबते साहिल को आवाज दी...

वो एक खिलौना भर है...टूट जाना उसकी नीयति है..। वो टूट ही जाएगा...। फिर क्यों हम करें उसकी उम्मीद...। 
दूर एक धुंधला सा लैंप पोस्ट दिखता है।...उस जगह जाकर हमें बिछड़ जाना है।...लैंप पोस्ट मुझे किसी ड्रैकुला सरीखा दिखता है..। उस पीली सी धुंधली रोशनी देखकर डरता रहता हूं।... क्या मैं उस निश्चित बिंदु पर उसे त्याग दूंगा।... क्या कहूंगा उस वक्त मैं उसे...? इस वक्त मुझे भगवान राम याद आ रहे हैं।...उन्होंने सीता को त्याग दिया था..। लक्ष्मण को त्याग दिया था...। अचानक.....
त्याग देना सबसे कठोर शब्द लग रहा है मुझे।
अचानक एक खरगोश दिखता है। चंचल सा खरगोश...डरा हुआ..। बिल्कुल मेरे मन जैसा...। खरगोश कठोर नहीं होता है। इसलिए ये मुझे सबसे ज्यादा प्रिय है। मुझे हाथी भी बहुत प्रिय है, क्योंकि मैं हाथी जितना कठोर होना चाहता हूं।...मुझे कबूतर इसलिए अच्छे लगते हैं, क्योंकि, एक दफे मैंने उसे अपनी कहानी सुनाई थी।...और फिर उसने मुझे कहा था...मुझे तुम्हारे जैसा इंसान बनना है। फिर उसने मुझे त्याग दिया था..। वापस नहीं आया...।
मैं कभी-कभी सोचता हूं...भगवान को आधा इंसान होना चाहिए था।... कम से कम उन्हें दिखना चाहिए था...। हालांकि, फिर भी मैं उनसे सवाल नहीं पूछता...मगर, मैं उनकी बेबसी देखकर मुस्कुराने का मौका नहीं चूकता।...और मैं चाहता...कि जब मैं उनकी बेबसी पर मुस्कुराता...तो वो मुझे देखते..। मुझपर कोफ्त करते...। फिर मैं जोर-जोर से हंसता...। राम की बेबसी पर मैं खामोश हो जाता हूं। मैं रोने लगता हूं, जब देखता हूं, कि सीता रथ में बैठकर जंगल जा रही हैं। मैं रोने लगता हूं, लक्ष्मण को देखकर जब उन्हें राम कहते हैं...जाओ मैंने तुम्हें त्याग दिया है।...
कितनी उदास कहानी मैं लिख रहा हूं।... पर इससे ज्यादा खूबसूरत और क्या होगा ? डूबते साहिल को आवाज देकर कहता हूं....हाथ बढ़ाकर संभाल लो मुझे।...

Saturday, 27 October 2018

बहकी हुई बातें... बहके हुए हम... । तुम याद आए.....

वो जमीन से हजारों फीट की ऊंचाई पर था...। आकाश में टिमटिमाते हुए तारों को देख रहा था..। जमीन पर भी हजारों दिए तारों की तरह ही दिखाई दे रहा था।... कितना अजीब सा अहसास था ये...। ये कोई पहली मर्तबा नहीं था...जब वो हवाई जहाज में सफर कर रहा था...मगर, अभी उसे ख्याल आ रहा था...कि अगर अभी प्लेन क्रेश कर जाए...तो क्या होगा ? सब मर जाएंगे...। आकाश में ही सब जल जाएंगे..। एक पल में सौ से ज्यादा लोग मर जाएंगे...।

उसकी आंखों में आंसू थे..। वो एक ऊंगली से आंखों के आसुंओं को पोंछ रहा था...। नहीं, वो डरा बिल्कुल भी नहीं था....मगर, कुछ था...जो आंखों में नमी बनकर उतर रहा था...। पानी का एक कतरा...। दो बूंदे...। भींगी सी...। वो भागना चाहता था...। वो भाग जाना चाहता था..।। किससे...  पता नहीं...। कहां... पता नहीं...। कितनी दूर पता नहीं...। मगर, अभी इस वक्त वो भाग जाना चाहता था...। कहीं दूर....सबसे दूर..। जहां, सिर्फ अकेलापन हो...। सिर्फ अकेलापन...।

क्या बचता है एक बार मर जाने के बाद..। क्या है इज्जत....। क्या है प्रतिष्ठा...। क्या है शान...। क्या होता है अपमान...। कौन करता है अपमान...? हजार सवाल... हजार जवाब...। पर किसे बताए...कौन सुने... । सुनकर कोई क्या करे...। एयर होस्टेस से उसने कहा....एक ग्लास पानी चाहिए...। जी सर, अभी लाती हूं...।


एक बार मर जाने के बाद कौन देखता है, कि उसने अपनी जिंदगी में क्या किया है...। क्या खोया है, क्या पाया है...। उसकी आंखों के सामने मां थी...पापा थे...बहन, भाई....और वो रिश्ता...जिसे वो कभी खोना नहीं चाहता था...। लेकिन, किसे बताए वो इतनी सारी बातें...। बिना बताए कोई सबकुछ क्यों नहीं समझ लेता है...? 

Monday, 24 September 2018

बरसात और पश्चाताप

आज दफ्तर के लिए घर से निकला ही था कि बरसात शुरू हो गई। मैं भींगते हुए...जैसे तैसे करके दफ्तर पहुंचा। आधा से ज्यादा भींग चुका था। बारिश में भींगते वक्त मैं सोच रहा था, कोई आग तो बरस नहीं रही है, कि मैं जल जाऊंगा...बारिश ही है...थोड़ा बहुत भींग ही जाऊंगा ना।..कोई बात नहीं। ये सब सोचते हुए मुझे वो याद आ गई। एक बार हम घूम रहे थे...। एक जगह पानी पीते हुए उसने थोड़ा सा पानी मेरे ऊपर फेंक दिया। मैंने डपटते हुए कहा...ये क्या कर रही हो। देख नहीं रही हो...भींग जाएंगे। वो थोड़ी उदास हो गई। और फिर कभी उसने मेरे ऊपर पानी नहीं फेंका। वो जो एक बार तय कर लेती है, दोबारा कभी नहीं करती। मैंने फिर कई दफे उससे कहा... कि तुम मेरे ऊपर पानी फेंक सकती हो...मगर, उसने दोबारा ऐसा नहीं किया। तय किए हुए पर टिके रहना उसकी आदत है। जिसे मैं बहुत बाद में जान पाया।
बचपन में मैंने एक बार एक कहानी पढ़ी थी। कहानी का शीर्षक था बरसात। एक राजा सूरसेन पर दुश्मन देश आक्रमण कर देता है। उस दिन काफी तेज बरसात हो रही थी। बरसात के बीच का आक्रमण राजा सूरसेन की सेना सह ना सकी...और सूरसेन लड़ाई हार गया। सूरसेन को देश छोड़ना पड़ा...और वो जंगल में रहने लगा। काफी लंबे वक्त तक सूरसेन अपनी शक्ति को संगठित करता रहा...और फिर बरसात के एक दिन उसने अपना राज्य पाने के लिए फिर से हमला कर दिया। इस बार उसने लड़ाई जीत ली। बरसात से बर्बादी का जो सफर शुरू हुआ था, वो बरसात पर ही आकर खत्म हुआ। पता नहीं क्यों, मगर ये कहानी मैं कभी भूल नहीं पाया। ये कहानी मेरे जेहन में अकसर आ जाया करती है। शक्ति को संगठित करने से हम फिर जीत सकते हैं। पर अगर भरोसा ही टूट चुका हो...तो क्या कर सकते हैं। भरोसा हासिल करने की चीज होती है...। कोई हम पर आंख मूंद कर भरोसा कर लेता है...और हम उस भरोसे को तोड़ देते हैं। असल में कहानी इतनी भर नहीं होती है...कहानी इसके बाद शुरू होती है...कि हमारे पास बस कोसना रह जाता है। और हम खुद को जीवन भर कोसते रह जाते हैं। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। कोसना बचा रह गया मेरे पास...। यहां पर शक्ति को संगठित करने का विकल्प नहीं होता। हम बस हार जाते हैं। हारे हुए जीवन जीते रहते हैं। 

Thursday, 13 September 2018

सुराख

कुछ नहीं करोगे...तो भी जीवन तो बीतता ही है। तो कुछ करते क्यों नहीं ? जीवन तो तुम्हें अपने साथ लेकर ही जाएगा..और तुम ठहरने की दस्तकें भर देते रह जाओगे...। आओ ...की बीत चलें जीवन के साथ।

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वक्त की थैली में सुराख है
कभी शाम टपक जाती है
कभी सुबह गिर जाता है

प्रेम के साथ भी ऐसा ही कुछ होता है

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अभी-अभी देखा
एक ट्रक गुजर गया दरख्त से बंधे कुछ तारों को तोड़ते हुए
एक कारीगर फिर कर आया दुरूस्त सभी टूटे तारों को
मन भी कभी टूट जाता है..कभी जोड़ दिया जाता है
जाना, मन का मरम्मत कोई और नहीं करता
मन के पास खुद का अपना कारीगर होता है
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दफ्तर में कुर्सी पर देर तक बैठने के बाद
कुर्सी की पीठ पर झुककर करता हूं आंखे बंद
ठीक इस वक्त आंखों में लाल रंग का आसमान दिखा है
पीठ की अकड़ अकसर आंखें बंद करने से खत्म हो जाती हैं

पर बहुत सारी चीजें बची की बची रह जाती हैं

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हंसना भूल गया....

मोबाइल पर एक चुटकला पढ़ते ही उसके मुंह से हंसी निकल गई...। वो हंस पड़ा...। बगल में बैठी आंटी ने कहा.. आज सूरज किस तरफ निकला है..? आंटी के सवाल से वो चौंक गया...और हंसते हुए आंटी की तरफ देखकर पूछा... क्यों...क्या हो गया...।
नहीं, तुम हंसे हो ना...इसीलिए पूछ बैठा...कि सूरज किस तरफ से आज निकला है। इतने दिनों में आज पहली बार तुम्हें हंसते हुए देखा है।

--नहीं, नहीं...ऐसी कोई बात नहीं है।

आखिरी बार मैं कब हंसा था। कब खुश हुआ था आखिरी बार..। बहुत सोचने के बाद भी याद नहीं आ रहा था। मैंने खुश होना कब बंद कर दिया इसका सही-सही अनुमान लगाना अब बहुत मुश्किल हो गया था। हां, याद आया, कि जब मां पिछले साल आई थी, तो उसने कहा था...तुम हंसते क्यों नहीं हो। तुम्हारे उमर के लोगों को देखो... हमेशा हंसते खेलते रहते हैं। उन्हें कोई फिक्र नहीं होती...और तुम बात भी करते हो, तो सीरियस तरीके से...या फिर गुमसुम रहते हो। क्या बात है... ? मैंने कहा था...बात क्या होगी..। बस ऐसे ही। अब हमेशा हंसते ही रहें क्या... हर बात पर ?
--नहीं, फिर भी हंस सकते हो। पहले तो हर वक्त मसखरा करते रहते थे।

एक हंसने वाला आदमी कब अचानक से चुप हो जाता है, उसे पता तक नहीं चलता। मैं बिल्कुल ऐसा नहीं था...। ऐसा होना भी नहीं चाहता था। पर ये हो कैसे गया, का सवाल अब मेरे साथ है। एक अनजाना सा डर हर पल मेरे साथ रहता है, और उस डर को मैं आजतक जान नहीं पाया। ऐसा लगता है, कि कहीं कुछ गलत तो नहीं हो गया है मुझसे..। कहीं कुछ टूट तो नहीं गया है मुझसे..। मां अकसर कह दिया करती है, कलेजा पुष्ट रखो..। और मैं ऐसा कर नहीं पाया।

मैं ये बात किसी को बताना चाहता था...पर ऐसा हो नहीं पाया। मैंने चाहा, मुझे इसे कहीं दर्ज कर लेनी चाहिए... और मैं यहा हूं। वैसे देखा जाए तो मेरे पास दुखी होने की एक भी वजह नही हैं..। हर वजह मेरा खुद का पाला हुआ है।

कल शाम सबसे प्रिय दोस्त से घंटे भर बात हुई। उसे मैंने अपना सारा दुख सुना डाला। मेरी पूरी बात खत्म होने के बाद उसने पूछा...तुम इन बातों में से किस बात पर दुखी हो ? मैंने कहा...सभी बातों पर। उसने हंसते हुए कहा... कि इनमें से एक भी बात दुखी करने वाली नहीं है। मैं चुप ही रहा।



Sunday, 9 September 2018

आदमी कातिल क्यों हो जाता है

एक आदमी...दूसरे आदमी को मार क्यों देता है..। सारी वजहों को सोचने के बाद भी एक भी वजह मुझे समझ में नहीं आती। जबकि, उसे पता होता है...कि एक बार उसकी जान चली गई, तो फिर वो कभी जिंदा नहीं हो पाएगा..। कभी बोल, हंस...चल नहीं पाएगा। उसका अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। जिसकी आपने हत्या कर दी है, उसका शव जब उसकी मां..बहन, पत्नी बेटी देखेगी..तो उसपर क्या बीतेगी। कुछ पल के गुस्से के लिए हम किसी से उसके जीने का हक क्यों छीन लेते हैं।
अभी दफ्तर पहुंचते ही पता चला...कि दिल्ली में एक कैब ड्राइवर की गोली मारकर हत्या कर दी गई। ये खबर देखते ही मन व्यथित हो गया। मैं अकसर कैब से यात्राएं करता रहता हूं। अकसर उनलोगों से बातचीत भी हो जाकी है। बिल्कुल हमारे जैसे होते हैं वो। सेम टू सेम। कुछ भी अलग नहीं। मैंने पाया है, कि वो मुझसे ज्यादा मेहनत करते हैं...दिन रात काम करते हैं। सबके अलग-अलग सपने होते हैं। और सबकी आंखों में मैं उनके परिवार को देखता हूं।
एक कैब ड्राइवर ने एक बार बातचीत के दौरान बताया था, कि सर महीने में करीब 25 हजार रुपया काम लेता हूं।गांव में घर बनवाना है। इसलिए थोड़ा और मेहनत अभी करना है। मैंने उसे हौसला देते हुए कहा... हो जाएगा... । अंत में देखिएगा...सब अच्छा होगा। हैप्पी एंडिंग। मैं अकसर...जब भी कोई अपनी समस्या मुझे बताता है, तो मैं कह देता हूं...चिंता मत कीजिए...देखिएया...सब अच्छा होगा। अंत में सब अच्छा होगा। पर क्या अंत में सब अच्छा हो जाता है ? ये सवाल कई बार मेरे मन में उठे हैं। पर '' अंत में सब अच्छा हो जाएगा '' वाले विश्वास से मैं हटना नहीं चाहता, इसलिए, मैंने इस सवाल पर कभी ध्यान नहीं दिया। कभी कभी मुझे लगता है, कि सिर्फ दिल रखने के लिए...या ढाढ़स बढ़ाने के लिए तो कहीं मैं नहीं बोल देता हूं...कि सब अच्छा हो जाएगा..। किसी फिल्म की कहानी का अंत तो मैं नहीं सोच लेता...कि फिल्मों के आखिरी में सब अच्छा ही होता है।

दिल्ली में जिस कैब वाले का मर्डर हुआ है, उसकी तस्वीर अभी देखी है। हट्टा-कट्टा जवान दिख रहा था। पर एक गोली ने उसे शव बना दिया।...हर दिन सैकड़ों हत्याएं होती हैं..। पर कोई इस तरफ सोचता तक नहीं । या किसी के सोचने से फर्क भी नहीं पड़ता। जैसे मेरे सोचने से फर्क नहीं पड़ता। लोग गुस्सैल होते जा रहे हैं।... हर आदमी दूसरे आदमी से ज्यादा गुस्सैल बनना चाहता है।...और गुस्से का अंजाम...कोई ना कोई शव होता है।.. किसी ना किसी का अस्तित्व मिटता है।

कान्हा...मुझे सब कुछ देना...गुस्सा और घमंड से दूर रखना।

Friday, 7 September 2018

उबन

दिन भर काम करने के बाद थका हुआ...बोझिल सा...दफ्तर में काम करने वाले अलग-अलग चेहरों को देख रहा हूं..। कोई हंस रहा है...कोई चुुप बैठा है...कोई किसी और से बात कर रहा है...। पर, किसी के चेहरे पर सुकून नहीं दिख रहा है..। अभी मेरे मन में सवाल उठ रहा है..कि हम क्यों करते हैं काम..। किसे खुश रखने के लिए कामों के साथ गुत्थमगुत्थी करते रहते हैं...। और अंत में सबसे हार मान लेते हैं..। न्यूजरूम को हम मछली बाजार कहते हैं...। यहां हर वक्त शोर मचा रहता है..। हर किसी के पास डेडलाइन...और उस डेडलाइन के बीच सब उलझे से रहते हैं..। हमारी जिंदगी ऐसी ही हो चली है...। हम लोग दिनभर कांग्रेस-बीजेपी करते रहते हैं...पर अंत में थकन कंधों पर उतर आती है...।
आज दिन में जीवन मिला...। वो एक दुकान पर अनमना सा खड़ा था। हमारी इनदिनों आपस में बन नहीं रही है..। हमने सोचा, क्यों ना जीवन से सुलह कर लिया जाए..। मैं सर झुकाए उसके सामने खड़ा हो गया...। उसने मुझे देखा...पर कुछ बात नहीं की..। मैं काफी देर तक उसके पास खड़ा रहा...और फिर बात करने की पहल मैंने ही की..। मैंने उससे कहा...जीवन, कैसे हो.. ? उसने अनमने अंदाज में ही कहा...ठीक हूं। और फिर वहां से जाने लगा....मैंने कहा...मुझसे बात नहीं करोगे..। उसने ना में सिर हिलाया...और चला गया..। मैं भी वहां से दफ्तर आ गया...।
अभी थोड़ी सी भूख लग रही है...पर खाने को मन नहीं कर रहा है..। ऐसा नहीं है, कि मैं किसी बात से दुखी हूं... पर मन नहीं लग रहा है...। ऐसा अकसर होता है मेरे साथ।... यह उबन है...। जो इस वक्त मेरे साथ बैठा है।.. पता नहीं कब तक बैठा रहेगा...। 

डूबने वाले ने डूबते साहिल को आवाज दी...

वो एक खिलौना भर है...टूट जाना उसकी नीयति है..। वो टूट ही जाएगा...। फिर क्यों हम करें उसकी उम्मीद...।  दूर एक धुंधला सा लैंप पोस्ट दिखता है।...