Monday, 24 September 2018

बरसात और पश्चाताप

आज दफ्तर के लिए घर से निकला ही था कि बरसात शुरू हो गई। मैं भींगते हुए...जैसे तैसे करके दफ्तर पहुंचा। आधा से ज्यादा भींग चुका था। बारिश में भींगते वक्त मैं सोच रहा था, कोई आग तो बरस नहीं रही है, कि मैं जल जाऊंगा...बारिश ही है...थोड़ा बहुत भींग ही जाऊंगा ना।..कोई बात नहीं। ये सब सोचते हुए मुझे वो याद आ गई। एक बार हम घूम रहे थे...। एक जगह पानी पीते हुए उसने थोड़ा सा पानी मेरे ऊपर फेंक दिया। मैंने डपटते हुए कहा...ये क्या कर रही हो। देख नहीं रही हो...भींग जाएंगे। वो थोड़ी उदास हो गई। और फिर कभी उसने मेरे ऊपर पानी नहीं फेंका। वो जो एक बार तय कर लेती है, दोबारा कभी नहीं करती। मैंने फिर कई दफे उससे कहा... कि तुम मेरे ऊपर पानी फेंक सकती हो...मगर, उसने दोबारा ऐसा नहीं किया। तय किए हुए पर टिके रहना उसकी आदत है। जिसे मैं बहुत बाद में जान पाया।
बचपन में मैंने एक बार एक कहानी पढ़ी थी। कहानी का शीर्षक था बरसात। एक राजा सूरसेन पर दुश्मन देश आक्रमण कर देता है। उस दिन काफी तेज बरसात हो रही थी। बरसात के बीच का आक्रमण राजा सूरसेन की सेना सह ना सकी...और सूरसेन लड़ाई हार गया। सूरसेन को देश छोड़ना पड़ा...और वो जंगल में रहने लगा। काफी लंबे वक्त तक सूरसेन अपनी शक्ति को संगठित करता रहा...और फिर बरसात के एक दिन उसने अपना राज्य पाने के लिए फिर से हमला कर दिया। इस बार उसने लड़ाई जीत ली। बरसात से बर्बादी का जो सफर शुरू हुआ था, वो बरसात पर ही आकर खत्म हुआ। पता नहीं क्यों, मगर ये कहानी मैं कभी भूल नहीं पाया। ये कहानी मेरे जेहन में अकसर आ जाया करती है। शक्ति को संगठित करने से हम फिर जीत सकते हैं। पर अगर भरोसा ही टूट चुका हो...तो क्या कर सकते हैं। भरोसा हासिल करने की चीज होती है...। कोई हम पर आंख मूंद कर भरोसा कर लेता है...और हम उस भरोसे को तोड़ देते हैं। असल में कहानी इतनी भर नहीं होती है...कहानी इसके बाद शुरू होती है...कि हमारे पास बस कोसना रह जाता है। और हम खुद को जीवन भर कोसते रह जाते हैं। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। कोसना बचा रह गया मेरे पास...। यहां पर शक्ति को संगठित करने का विकल्प नहीं होता। हम बस हार जाते हैं। हारे हुए जीवन जीते रहते हैं। 

Thursday, 13 September 2018

सुराख

कुछ नहीं करोगे...तो भी जीवन तो बीतता ही है। तो कुछ करते क्यों नहीं ? जीवन तो तुम्हें अपने साथ लेकर ही जाएगा..और तुम ठहरने की दस्तकें भर देते रह जाओगे...। आओ ...की बीत चलें जीवन के साथ।

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वक्त की थैली में सुराख है
कभी शाम टपक जाती है
कभी सुबह गिर जाता है

प्रेम के साथ भी ऐसा ही कुछ होता है

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अभी-अभी देखा
एक ट्रक गुजर गया दरख्त से बंधे कुछ तारों को तोड़ते हुए
एक कारीगर फिर कर आया दुरूस्त सभी टूटे तारों को
मन भी कभी टूट जाता है..कभी जोड़ दिया जाता है
जाना, मन का मरम्मत कोई और नहीं करता
मन के पास खुद का अपना कारीगर होता है
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दफ्तर में कुर्सी पर देर तक बैठने के बाद
कुर्सी की पीठ पर झुककर करता हूं आंखे बंद
ठीक इस वक्त आंखों में लाल रंग का आसमान दिखा है
पीठ की अकड़ अकसर आंखें बंद करने से खत्म हो जाती हैं

पर बहुत सारी चीजें बची की बची रह जाती हैं

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हंसना भूल गया....

मोबाइल पर एक चुटकला पढ़ते ही उसके मुंह से हंसी निकल गई...। वो हंस पड़ा...। बगल में बैठी आंटी ने कहा.. आज सूरज किस तरफ निकला है..? आंटी के सवाल से वो चौंक गया...और हंसते हुए आंटी की तरफ देखकर पूछा... क्यों...क्या हो गया...।
नहीं, तुम हंसे हो ना...इसीलिए पूछ बैठा...कि सूरज किस तरफ से आज निकला है। इतने दिनों में आज पहली बार तुम्हें हंसते हुए देखा है।

--नहीं, नहीं...ऐसी कोई बात नहीं है।

आखिरी बार मैं कब हंसा था। कब खुश हुआ था आखिरी बार..। बहुत सोचने के बाद भी याद नहीं आ रहा था। मैंने खुश होना कब बंद कर दिया इसका सही-सही अनुमान लगाना अब बहुत मुश्किल हो गया था। हां, याद आया, कि जब मां पिछले साल आई थी, तो उसने कहा था...तुम हंसते क्यों नहीं हो। तुम्हारे उमर के लोगों को देखो... हमेशा हंसते खेलते रहते हैं। उन्हें कोई फिक्र नहीं होती...और तुम बात भी करते हो, तो सीरियस तरीके से...या फिर गुमसुम रहते हो। क्या बात है... ? मैंने कहा था...बात क्या होगी..। बस ऐसे ही। अब हमेशा हंसते ही रहें क्या... हर बात पर ?
--नहीं, फिर भी हंस सकते हो। पहले तो हर वक्त मसखरा करते रहते थे।

एक हंसने वाला आदमी कब अचानक से चुप हो जाता है, उसे पता तक नहीं चलता। मैं बिल्कुल ऐसा नहीं था...। ऐसा होना भी नहीं चाहता था। पर ये हो कैसे गया, का सवाल अब मेरे साथ है। एक अनजाना सा डर हर पल मेरे साथ रहता है, और उस डर को मैं आजतक जान नहीं पाया। ऐसा लगता है, कि कहीं कुछ गलत तो नहीं हो गया है मुझसे..। कहीं कुछ टूट तो नहीं गया है मुझसे..। मां अकसर कह दिया करती है, कलेजा पुष्ट रखो..। और मैं ऐसा कर नहीं पाया।

मैं ये बात किसी को बताना चाहता था...पर ऐसा हो नहीं पाया। मैंने चाहा, मुझे इसे कहीं दर्ज कर लेनी चाहिए... और मैं यहा हूं। वैसे देखा जाए तो मेरे पास दुखी होने की एक भी वजह नही हैं..। हर वजह मेरा खुद का पाला हुआ है।

कल शाम सबसे प्रिय दोस्त से घंटे भर बात हुई। उसे मैंने अपना सारा दुख सुना डाला। मेरी पूरी बात खत्म होने के बाद उसने पूछा...तुम इन बातों में से किस बात पर दुखी हो ? मैंने कहा...सभी बातों पर। उसने हंसते हुए कहा... कि इनमें से एक भी बात दुखी करने वाली नहीं है। मैं चुप ही रहा।



Sunday, 9 September 2018

आदमी कातिल क्यों हो जाता है

एक आदमी...दूसरे आदमी को मार क्यों देता है..। सारी वजहों को सोचने के बाद भी एक भी वजह मुझे समझ में नहीं आती। जबकि, उसे पता होता है...कि एक बार उसकी जान चली गई, तो फिर वो कभी जिंदा नहीं हो पाएगा..। कभी बोल, हंस...चल नहीं पाएगा। उसका अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। जिसकी आपने हत्या कर दी है, उसका शव जब उसकी मां..बहन, पत्नी बेटी देखेगी..तो उसपर क्या बीतेगी। कुछ पल के गुस्से के लिए हम किसी से उसके जीने का हक क्यों छीन लेते हैं।
अभी दफ्तर पहुंचते ही पता चला...कि दिल्ली में एक कैब ड्राइवर की गोली मारकर हत्या कर दी गई। ये खबर देखते ही मन व्यथित हो गया। मैं अकसर कैब से यात्राएं करता रहता हूं। अकसर उनलोगों से बातचीत भी हो जाकी है। बिल्कुल हमारे जैसे होते हैं वो। सेम टू सेम। कुछ भी अलग नहीं। मैंने पाया है, कि वो मुझसे ज्यादा मेहनत करते हैं...दिन रात काम करते हैं। सबके अलग-अलग सपने होते हैं। और सबकी आंखों में मैं उनके परिवार को देखता हूं।
एक कैब ड्राइवर ने एक बार बातचीत के दौरान बताया था, कि सर महीने में करीब 25 हजार रुपया काम लेता हूं।गांव में घर बनवाना है। इसलिए थोड़ा और मेहनत अभी करना है। मैंने उसे हौसला देते हुए कहा... हो जाएगा... । अंत में देखिएगा...सब अच्छा होगा। हैप्पी एंडिंग। मैं अकसर...जब भी कोई अपनी समस्या मुझे बताता है, तो मैं कह देता हूं...चिंता मत कीजिए...देखिएया...सब अच्छा होगा। अंत में सब अच्छा होगा। पर क्या अंत में सब अच्छा हो जाता है ? ये सवाल कई बार मेरे मन में उठे हैं। पर '' अंत में सब अच्छा हो जाएगा '' वाले विश्वास से मैं हटना नहीं चाहता, इसलिए, मैंने इस सवाल पर कभी ध्यान नहीं दिया। कभी कभी मुझे लगता है, कि सिर्फ दिल रखने के लिए...या ढाढ़स बढ़ाने के लिए तो कहीं मैं नहीं बोल देता हूं...कि सब अच्छा हो जाएगा..। किसी फिल्म की कहानी का अंत तो मैं नहीं सोच लेता...कि फिल्मों के आखिरी में सब अच्छा ही होता है।

दिल्ली में जिस कैब वाले का मर्डर हुआ है, उसकी तस्वीर अभी देखी है। हट्टा-कट्टा जवान दिख रहा था। पर एक गोली ने उसे शव बना दिया।...हर दिन सैकड़ों हत्याएं होती हैं..। पर कोई इस तरफ सोचता तक नहीं । या किसी के सोचने से फर्क भी नहीं पड़ता। जैसे मेरे सोचने से फर्क नहीं पड़ता। लोग गुस्सैल होते जा रहे हैं।... हर आदमी दूसरे आदमी से ज्यादा गुस्सैल बनना चाहता है।...और गुस्से का अंजाम...कोई ना कोई शव होता है।.. किसी ना किसी का अस्तित्व मिटता है।

कान्हा...मुझे सब कुछ देना...गुस्सा और घमंड से दूर रखना।

Friday, 7 September 2018

उबन

दिन भर काम करने के बाद थका हुआ...बोझिल सा...दफ्तर में काम करने वाले अलग-अलग चेहरों को देख रहा हूं..। कोई हंस रहा है...कोई चुुप बैठा है...कोई किसी और से बात कर रहा है...। पर, किसी के चेहरे पर सुकून नहीं दिख रहा है..। अभी मेरे मन में सवाल उठ रहा है..कि हम क्यों करते हैं काम..। किसे खुश रखने के लिए कामों के साथ गुत्थमगुत्थी करते रहते हैं...। और अंत में सबसे हार मान लेते हैं..। न्यूजरूम को हम मछली बाजार कहते हैं...। यहां हर वक्त शोर मचा रहता है..। हर किसी के पास डेडलाइन...और उस डेडलाइन के बीच सब उलझे से रहते हैं..। हमारी जिंदगी ऐसी ही हो चली है...। हम लोग दिनभर कांग्रेस-बीजेपी करते रहते हैं...पर अंत में थकन कंधों पर उतर आती है...।
आज दिन में जीवन मिला...। वो एक दुकान पर अनमना सा खड़ा था। हमारी इनदिनों आपस में बन नहीं रही है..। हमने सोचा, क्यों ना जीवन से सुलह कर लिया जाए..। मैं सर झुकाए उसके सामने खड़ा हो गया...। उसने मुझे देखा...पर कुछ बात नहीं की..। मैं काफी देर तक उसके पास खड़ा रहा...और फिर बात करने की पहल मैंने ही की..। मैंने उससे कहा...जीवन, कैसे हो.. ? उसने अनमने अंदाज में ही कहा...ठीक हूं। और फिर वहां से जाने लगा....मैंने कहा...मुझसे बात नहीं करोगे..। उसने ना में सिर हिलाया...और चला गया..। मैं भी वहां से दफ्तर आ गया...।
अभी थोड़ी सी भूख लग रही है...पर खाने को मन नहीं कर रहा है..। ऐसा नहीं है, कि मैं किसी बात से दुखी हूं... पर मन नहीं लग रहा है...। ऐसा अकसर होता है मेरे साथ।... यह उबन है...। जो इस वक्त मेरे साथ बैठा है।.. पता नहीं कब तक बैठा रहेगा...। 

Wednesday, 5 September 2018

जरा सुनिए तो....

मैंने कई दफे देखा है...कि ब्लॉग पर जो मैं लिखता हूं, उसे अमेरिका या जर्मनी के लोग पढ़ते हैं। मैं नहीं जानता, कि ये सच है या ब्लॉग ऑडिएंस में कुछ गलत दिखा जाता है..। पर मेरे इस ब्लॉग का पता कुछ ही लोगों को है, और मैं दावे के साथ कह सकता हूं, कि वो भी मेरे इस ब्लॉग को नहीं पढ़ते होंगे। पर pageview दिखाता है, कि ब्लॉग को हर दिन कुछ लोग पढ़ रहे हैं। अकसर जर्मनी और अमेरिका दिखाता है। अगर ये सच है, तो मैं उन दोस्तों से अनुरोध करूंगा..कि संशय मिटाएं..। अगर वो सही में पढ़ते हैं, तो jha.abhijat@gmail.com पर मुझे मेल जरूर करें।

मुरब्बा हो हो हो नहीं...ओ रब्बा हो हो हो...

आज अभी-अभी मैंने मुरब्बा खाया है। इसे दिल्ली और उत्तर प्रदेश में पेठा भी कहते हैं। आगरा से एक साथी ने मुरब्बा लाया था। मुरब्बा खाना मुझे बेहद पसंद रहा है। मुझे याद है, कि बचपन में बाबा अकसर मुरब्बा लाया करते थे। उन दिनों हिंदी फिल्म का एक गीत काफी चर्चित हुआ था।...'एक लड़की इधर से गुजरी है.. दिल जान जिगर से गुजरी है... गोरे-गोरे गालों वाली...काले-काले बालों वाली...मस्त-मस्त चालों वाली... मेरे दिल को दिवाना करके गई... हो रब्बा हो हो हो.. हो रब्बा हो हो हो..। पर मैं हो रब्बा का मानी नहीं समझता था। मुझे ये शब्द भी नहीं पता था। मैं बचपन में जोर-जोर से ये गीत गाता था...पर मेरे बोल निकलते थे... मुरब्बा हो हो हो.. मुरब्बा हो हो हो...
मेरे एक मामा की शादी थी। मैं बाराती के तौर पर जा रहा था। कार में मेरे कुछ बड़े भाई भी थे। हम सब मस्ती करते हुए जा रहे थे। तभी मैंने ये गाना गाया...और गाने लगा...मुरब्बा हो हो हो...मुरब्बा हो हो हो..। तब मेरे ममेरे भाई ने मुझसे कहा...कि मुरब्बा हो हो हो नहीं है, ओ रब्बा हो हो हो... है। मैं आश्चर्य से भर गया। कि इतने दिनों से मैं गलत गाये जा रहा था, पर किसी ने सही क्यों नहीं किया...। मुझे उस वक्त बहुत हंसी आने लगी। पर ये बात मैं आजतक भूल नहीं पाया।.. अकसर जब भी मैं मुरब्बा खाया करता हूं, मुझे वो गाना भी याद आ जाता है, और बाराती वाली बात भी।

हम अनजाने में कितनी गलतियां कर जाते हैं।...और जब कोई उन गलतियों के बारे में बताता है, तो हमें पता चलता है, कि हम कितनी बड़ी गलती कर रहे थे। कुछ गलतियों पर हम हंस देते हैं, और कुछ गलतियों पर हम प्रायश्चित कर लेते हैं। पर कुछ गलतियां ऐसी होती हैं, जिन्हें करने के बाद हम खुद से भी माफी नहीं मांग पाते हैं। और अंदर ही अंदर गिजगिचापन महसूसते रहते हैं।... पवित्र शब्द कितना दूर लगता है कभी-कभी... इस शब्द को लिखते वक्त ऊंगलियां तक कांप जाती हैं।

इन दिनों लोगों को लगता है, कि मैं उनकी बात बहुत ध्यान से सुन रहा हूं।.. पर होता ऐसा नहीं है। असल में मैंने किसी भी बात को बहुत ही ध्यान से सुनने की कला सीख ली है। पर मैं कोई भी बात ध्यान से नहीं सुनता। बस थोड़ा सा मेरा मुंह खुला रहता है...आंखों में ''ध्यान से सुन रहा हूं'' वाली फीलिंग्स रहती हैं...पर मन कहीं और एकांत के अरण्य में भटकता रहता है। किसी रेगिस्तान में उस वक्त मैं अकेला चलता हुआ पाया जाता हूं। रेत में पैर पूरी तरह से धंसे रहते हैं...सिर से पसीना टपकता रहता है पर मैं लगातार चलता रहता हूं। कई बार मैंने पाया, कि रेगिस्तान में मैं चलता नहीं हूं...बल्कि, भटकता रहता हूं, या फिर मैं भागता रहता हूं। किससे भागता हूं, ये आजतक नहीं जान पाया। उसने कहा...तुम बेहद डरपोक हो...हमेशा भाग जाते हो... तुममे स्थिति को संभालने का...डटकर डिसिजन लेने की क्षमता नहीं है...। मैं उसकी बात बहुत ध्यान से सुन रहा था...। तभी मुझे पता चला...कि रेगिस्तान में मैं भटक नहीं रहा हूं, असल में मैं रेगिस्तान की रेत पर भागने की कोशिश कर रहा हूं...पर मेरे पैर इतने धंसे हुए हैं, कि मैं भाग नहीं पा रहा हूं। बहुत देर बाद भी मैं उसी के सामने खड़ा था। वो बोली जा रही था...बोली जा रही थी।... कुछ देर बाद वो रोने लगी।... मैं उसके आंसुओं को देख रहा था.... मैंने हाथ बढ़ाकर आंसुओं को पोंछ दिए...फिर उसने मेरे कंधे पर अपना सिर टिका दिया।... बोली, तुम इतने डरपोक क्यों हो ? मैंने कुछ नहीं कहा...। कुछ देर तक वो कांधे पर सिर रखकर रोती  रही..। फिर मैंने थोड़ी सी चालाकी दिखाते हुए उसे एक कहानी सुना दी...। कृष्ण की कहानी..। उसे मैंने मोह क्या है वाली कहानी सुना दी... । वो अब ठीक हो चुकी थी। फिर कुछ देर में केक खाते हुए हंसने लगी...और मुझसे कहा... तुम बहुत अच्छे हो...। सबसे अच्छे..।
मैं सोचने लगा...कि इस थोड़े से वक्त में क्या बदला है...? क्या मैं रेगिस्तान से बाहर आ चुका हूं.. ? क्या मैंने भागना बंद कर दिया है...? नहीं, मैं वहीं का वहीं खड़ा था।... अब मुरब्बे का स्वाद मुंह से जा चुका है..। पानी पीने को मन कर रहा है... किसी पहाड़ पर जाने का मन कर रहा है.... बहुत कुछ मन कर रहा है... असल में मेरा मन पागल है...।


हम एक जादुगर हैं

जिसे हम नहीं जानते-पहचानते...उनसे बहुत सारी बातें कहने को मन कर रहा है। किसी अजनबी को हर हाल सुनाकर खाली हो जाने को मन चाहता है। पर कितनी उलझनों को बता पाऊंगा...कितनी चाहनाओं को मैं खोल पाऊंगा...और उससे हासिल क्या होगा...? बहुत सारे सवाल लिए इस वक्त बस मैं अक्षरों के कुछ चित्र बना लेना चाहता हूं।

हम सब सोचते हैं, कि हम एक जादुगर हैं
सांप और छुछुन्दर वाली स्थिति...। कुछ ऐसी ही स्थिति में घिरा हुआ हूं..। इतना घिर चुका हूं...कि मन बेशर्मों की तरह हंस रहा है...और अभी ये लिखते वक्त भी मुंह पर मुस्कान आ गई है।... मैं अपने साथ कितने लोगों को नचाता रहता हूं।..और फिर नाचने वालों के साथ खुद भी नाचता रहता हूं। हां, इस खेल का पक्का खिलाड़ी हूं मैं। कभी किसी को अकेला नहीं छोड़ा है.। हां, जब वो पूरी तरह नाचकर थक चुके होते हैं, तो फिर मुझे छोड़ जाते हैं...और मैं उन्हें रोकता भी नहीं हूं।

एक बार मैं खुद से बेहद महत्वपूर्ण बात कर रहा था। मैंने कहा...कि असल में हम सब सोचते हैं, कि हम एक बहुत बड़े जादूगर हैं, और हर वक्त हम कोई ना कोई जादू कर सकते हैं। इस भ्रम में जीते-जीते एक दिन ऐसा आता है, कि हम इस भ्रम के तिलिस्म में कहीं खो से जाते हैं। और फिर जीवन को जादू समझ लेते हैं। पर जीवन तो जादू होता नहीं है। हां, जीवन में चमत्कार होते रहते हैं। मैं उन चमत्कारों की बात नहीं करूंगा...। पर हां, मैं उन मुसीबतों की बात जरूर करूंगा, जिसे गाहे-बगाहे हम अपने लिए चुनते रहते हैं। या चुनकर चुपचाप पॉकेट में भरकर सड़क पर चलने लगते हैं। वो मुसीबत हर वक्त छुट्टे रुपयों की तरह खनकते रहते हैं, और हम उनसे खीझते रहते हैं। दुनिया की तमाम बड़ी से बड़ी मुसीबतों में से सबसे बड़ी मुसीबत है, किसी का साथ। जी हां...ये मैं पूरी होशो-हवास में कह रहा हूं। ..... छोड़िए...इससे ज्यादा मुझे कुछ नहीं कहना है।

आज क्या है...कुछ नहीं है...चलो एक और झूठ तुम्हेें बताता हूं।

आज कुछ नहीं है...। आज मैं ये बात क्यों कह रहा हूं, मुझे नहीं पता है। पर मैं आज सिर्फ झूठ बोलना चाहता हूं। मैं अकसर झूठ ही बोलता पाया जाता हूं। खुद से नहीं, औरों से। अपने आप से मैंने आज तक झूठ नहीं बोला है, लेकिन मेरी बातों को अकसर झूठ ही समझा गया है। जैसे, मैं तुम्हें खुश रखना चाहता हूं..। मैं उन्हें भी खुश रखना चाहता हूं, जो मेरे लिए विशेष हैं।
मेरे भाई ने मुझसे कहा... आप हर रिश्ते को खुश रख नहीं सकते...मगर, कोशिश कीजिए की हर जगह आप सही हों। सही होने का मतलब सच बोल देना होता है...भले ही कष्ट पहुंचे...। और आप किसी को कष्ट पहुंचाकर अपने को सही सलामत वहां से बाहर निकाल सकते हैं। ये रास्ता कितना सरल है..। और मैं इसे आजतक समझ क्यों नहीं पाया...?
कल मैंने अपने एक दोस्त से कहा...कि तुम्हें मेरी जिंदगी पर एक फिल्मकथा लिखनी चाहिए..। मैं बिल्कुल किसी फिल्म का मैटेरियल हूं। वो हंस पड़ा..। उसके साथ मैं भी।...ये बात मैं पहले भी एक बार कर चुका हूं। उसने मुझसे कहा...हर दो-तीन महीने तुम्हारी जिंदगी सही रहती है, फिर तुम उलझ जाते हो...। वो ठीक ही कह रहा था।
असल में मैं सारी परेशानियों को खुद दावत देता हुआ पाया जाता हूं। एक बार मैंने कहीं किसी पेज पर... ऑफिस की मीटिंग में बैठे-बैठे लिख दिया था...मेरे साथ-साथ एक कहानी भी चलती रहती है। असल में अगर मैं शांत हूं, तो फिर मुझे मन नहीं लगता। मैं जब तक अशांत रहता हूं, तभी तक शांत रह पाता हूं। ये एक तरह का सेल्फ डिस्ट्रक्शन मोड में चला जाना भी है। और इसे मैं अकसर जीता हूं। जीता क्या हूं, भोगता हूं।... एक बार और मैंने कहीं लिख दिया था...कि मैं अव्वल दर्जे का शैतान हूं... और बहुत बाद में इस बात को मैं समझ पाया...।

डूबने वाले ने डूबते साहिल को आवाज दी...

वो एक खिलौना भर है...टूट जाना उसकी नीयति है..। वो टूट ही जाएगा...। फिर क्यों हम करें उसकी उम्मीद...।  दूर एक धुंधला सा लैंप पोस्ट दिखता है।...