आज दफ्तर के लिए घर से निकला ही था कि बरसात शुरू हो गई। मैं भींगते हुए...जैसे तैसे करके दफ्तर पहुंचा। आधा से ज्यादा भींग चुका था। बारिश में भींगते वक्त मैं सोच रहा था, कोई आग तो बरस नहीं रही है, कि मैं जल जाऊंगा...बारिश ही है...थोड़ा बहुत भींग ही जाऊंगा ना।..कोई बात नहीं। ये सब सोचते हुए मुझे वो याद आ गई। एक बार हम घूम रहे थे...। एक जगह पानी पीते हुए उसने थोड़ा सा पानी मेरे ऊपर फेंक दिया। मैंने डपटते हुए कहा...ये क्या कर रही हो। देख नहीं रही हो...भींग जाएंगे। वो थोड़ी उदास हो गई। और फिर कभी उसने मेरे ऊपर पानी नहीं फेंका। वो जो एक बार तय कर लेती है, दोबारा कभी नहीं करती। मैंने फिर कई दफे उससे कहा... कि तुम मेरे ऊपर पानी फेंक सकती हो...मगर, उसने दोबारा ऐसा नहीं किया। तय किए हुए पर टिके रहना उसकी आदत है। जिसे मैं बहुत बाद में जान पाया।
बचपन में मैंने एक बार एक कहानी पढ़ी थी। कहानी का शीर्षक था बरसात। एक राजा सूरसेन पर दुश्मन देश आक्रमण कर देता है। उस दिन काफी तेज बरसात हो रही थी। बरसात के बीच का आक्रमण राजा सूरसेन की सेना सह ना सकी...और सूरसेन लड़ाई हार गया। सूरसेन को देश छोड़ना पड़ा...और वो जंगल में रहने लगा। काफी लंबे वक्त तक सूरसेन अपनी शक्ति को संगठित करता रहा...और फिर बरसात के एक दिन उसने अपना राज्य पाने के लिए फिर से हमला कर दिया। इस बार उसने लड़ाई जीत ली। बरसात से बर्बादी का जो सफर शुरू हुआ था, वो बरसात पर ही आकर खत्म हुआ। पता नहीं क्यों, मगर ये कहानी मैं कभी भूल नहीं पाया। ये कहानी मेरे जेहन में अकसर आ जाया करती है। शक्ति को संगठित करने से हम फिर जीत सकते हैं। पर अगर भरोसा ही टूट चुका हो...तो क्या कर सकते हैं। भरोसा हासिल करने की चीज होती है...। कोई हम पर आंख मूंद कर भरोसा कर लेता है...और हम उस भरोसे को तोड़ देते हैं। असल में कहानी इतनी भर नहीं होती है...कहानी इसके बाद शुरू होती है...कि हमारे पास बस कोसना रह जाता है। और हम खुद को जीवन भर कोसते रह जाते हैं। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। कोसना बचा रह गया मेरे पास...। यहां पर शक्ति को संगठित करने का विकल्प नहीं होता। हम बस हार जाते हैं। हारे हुए जीवन जीते रहते हैं।
बचपन में मैंने एक बार एक कहानी पढ़ी थी। कहानी का शीर्षक था बरसात। एक राजा सूरसेन पर दुश्मन देश आक्रमण कर देता है। उस दिन काफी तेज बरसात हो रही थी। बरसात के बीच का आक्रमण राजा सूरसेन की सेना सह ना सकी...और सूरसेन लड़ाई हार गया। सूरसेन को देश छोड़ना पड़ा...और वो जंगल में रहने लगा। काफी लंबे वक्त तक सूरसेन अपनी शक्ति को संगठित करता रहा...और फिर बरसात के एक दिन उसने अपना राज्य पाने के लिए फिर से हमला कर दिया। इस बार उसने लड़ाई जीत ली। बरसात से बर्बादी का जो सफर शुरू हुआ था, वो बरसात पर ही आकर खत्म हुआ। पता नहीं क्यों, मगर ये कहानी मैं कभी भूल नहीं पाया। ये कहानी मेरे जेहन में अकसर आ जाया करती है। शक्ति को संगठित करने से हम फिर जीत सकते हैं। पर अगर भरोसा ही टूट चुका हो...तो क्या कर सकते हैं। भरोसा हासिल करने की चीज होती है...। कोई हम पर आंख मूंद कर भरोसा कर लेता है...और हम उस भरोसे को तोड़ देते हैं। असल में कहानी इतनी भर नहीं होती है...कहानी इसके बाद शुरू होती है...कि हमारे पास बस कोसना रह जाता है। और हम खुद को जीवन भर कोसते रह जाते हैं। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। कोसना बचा रह गया मेरे पास...। यहां पर शक्ति को संगठित करने का विकल्प नहीं होता। हम बस हार जाते हैं। हारे हुए जीवन जीते रहते हैं।

