Sunday, 26 February 2017

रचना और मेरा गुस्सा

मैं हंस रहा था. मैं खुश था. मैं बातचीत कर रहा था. मुझे भूख लग रही थी और काम खत्म करने के साथ ही मैं खाना खाने के लिए कैंटीन चल गया। लेकिन कैंटीन में बने खाने को देखते ही मैं बुरी तरह अंदर ही अंदर झल्ला उठा। आलू की अजीबोगरीब सब्जी, काली दाल, और अजीब तरह के दिख रहे पनीर को देखकर मैंने खाने की इच्छा का त्याग कर दिया। दफ्तर से बाहर निकलकर एक प्याली चाय पी, मगर चाय भी ठीक से नहीं पी पा रहा था। पहले मैं गुस्से से भरा था, फिर निराशा से भर गया। अचानक कुछ ही पलों में हर चीज में मुझे निराशा दिखाई देने लगी। मुझे अपने लिखने से निराशा होने लगी है। काम से मन उचट गया और अब मैं बेहद अकेला रहना चाहता हूं, मगर दफ्तर में शोर पसरा हुआ है और ये शोर मुझे चीरने लगी है। मैं हर चीज को तोड़ देना चाहता हूं, फोड़ देना चाहता हूं और इतने सारे मूड स्विंग्स के बीच मैंने लिखना शुरू कर दिया है।

लिखना मुझे अच्छा लगता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कैसे लिखता हूं, क्या लिखता हूं , मेरे पास अकसर लिखने को कुछ होता भी नहीं है और उन पलों में मैं खोया रहता हूं, लिखने के लिए कुछ तलाशता रहता हूं। दोस्तों के साथ होते हुए भी मैं खुद को अकेला कर लेता हूं। मुझे लगता है, शायद अकेलेपन की स्थिति में मैं कोई कहानी लिख दूं, कोई कविता गढ़ दूं, कोई लेख लिख दूं, या कोई शायरी ही मेरे दिमाग में आ जाए...लेकिन अकसर ऐसा नहीं होता...खामोशी का अंधेरा विराना ही रहता है और मैं खोया हुआ बोलता हूं, खाता हूं, पीता हूं...। लिखना मुझे क्यों सुकून देता है इसे मैं समझने की कोशिश करता हूं, लेकिन आज तक समझ नहीं पाया। लिखने से मुझे क्या हासिल होता है, पता नहीं। फिर मैं कुछ लिखना क्यों चाहता हूं।

अभी अचानक लिखने के दौरान मुझे लगा, कि क्या रचना करने से मुझे खुशी होती मिलती है। क्या कुछ रचकर मैं अपने अंदर पसरे खालीपन को भर लेता हूं। रचना...अचानक ये शब्द मुझे अच्छा लगने लगा है। मैं चारों तरफ एक बार नजर घुमाता हूं, और फिर इस शब्द को देखने लगता हूं। मैं महसूस कर रहा हूं, कि अंदर से मुझे कुछ अच्छा लगने लगा है, हालांकि मेरा मुंह अभी जोे देख ले वो यही कहेगा, कि इसका चेहरा शुतुरमुर्ग की तरह क्यों है ? और मुझे खुद ऐसा लगा रहा है, कि मेरा चेहरा इस वक्त बेहद खराब लग रहा है। मगर, खामोशी की चादर पर पड़ी सिलवटें अब साफ दिखने लगी है। मेरा गुस्सा बेहद कम हो चुका है। ये जो अभी मैं लिख रहा हूं, ये मेरे शब्द हैं, ये मेरी रचना है। घर जाने के बाद अपनी इस रचना के साथ मैं खाना बना सकता हूं, मुस्कुराते हुए खा सकता हूं। इसे अपने सीने से लगाए आज की रात सो सकता हूं।

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