हमारी गलती ये होती है कि हर सुबह उठकर हम सुबह को चमत्कार मानना भूल जाते हैं. रात में जो सपना देखा था, उसे कुल्ला कर देते हैं, और फिर एक रेस में लग जाते हैं. जो काम हम करते हैं, या जो हमारा लक्ष्य होता है, उसमें तो हम रेस लगाते ही हैं, इसके विपरीत भी हम कभी कभार अनजाने में ही रेस लगा बैठते हैं.
सामने ई-रिक्शा खड़ी थी. चार लोग उसपर बैठे थे. एक सीट खाली था. मैं ई-रिक्शा पर बैठने के लिए आगे बढ़ रहा था, और दूसरी तरह से एक लड़की भी बैठने के लिए आ रही थी. अभी हमने एक दूसरे को नहीं देखा था, दोनों जल्दबाजी में थे. ई-रिक्शा बीच में खड़ी थी. कुछ 8/10 कदम जब बचे होंगे तो हमारी नजरें अचानक मिलीं. हमने सीट की तरफ देखा. हम जान गये थे, सीट बस एक है, और कोई एक ही बैठ सकता है. अब अचानक से एक रेस शुरू हो गई थी. दोनों के कदम थोड़ा तेज चलने लगे. दोनों एक साथ सीट के पास पहुंचे, पर कुछ सेकेंड्स से उसने मुझे हरा दिया. वो ई-रिक्शा पर बैठ चुकी थी. मैं मुस्कुराकर रह गया. फिर दूसरे रिक्शे पर बैठा.
अनजाने में ही सही मैं सुबह सुबह एक रेस हार चुका था.
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