वो देर रात तक कुछ लिख रहा था. फिर बारिश होने की आवाजें सुनाई देने लगी. उसने लिखना बंद कर दिया, और खिड़की के पास आ गया. बारिश होते वक्त कोई शहर कितना अजीब लगने लगता है. वो खिड़की से स्ट्रीट लाइट देख रहा था. रास्ते पर पीला प्रकाश फैला हुआ था. ऐसा लग रहा था कि किसी पेंटर ने काले रंग के ऊपर बहुत सा उदास पीला रंग फेंक दिया हो. उदास पीला रंग सोचते ही अचानक उसे अपनी लिखी कहानी बेईमानी लगने लगी. वो प्रेम पर लिख रहा था, जबकि ठीक इस वक्त वो उदासी पर लिखना चाह रहा है. जो लड़की उसकी कहानी में खिलखिला रही थी, असल में उसे उदास होना चाहिए था. वो वापस कमरे में आ गया. कहानी के पांच पन्नों को उसने फाड़ दिया और रास्ते पर फैली पीली उदासी में उसने अपनी कहानी को प्रवाहित कर दिया.
प्रेम को किसी गुस्सैल साधू ने दिया है श्राप
या प्रेम है उस गुस्सैल के कमंडल से निकला पानी
जो गिरने के साथ ही इंसान को कर देता दुखी
ना ना, प्रेम एक अलग किस्म का हीरा है
जिसे पाते ही प्रेमी लगा लेते हैं होठों से
चुमती हैं प्रेमिकाएं
और हो जाते हैं निढ़ाल, अचेत, या जाती है जान
असल में प्रेम ना चूमने की चीज है, ना होठों से लगाने की
वो बस एक सजावट का सामान भर है
बारिश की बूंदों के बीच उसकी कहानी उदासी के पीले रंग में समा चुकी थी और वो आंख बंद किए नींद का इंतजार कर रहा था.
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