Wednesday, 16 August 2017

अधूरा पोस्ट--

मेरे पास दो चांद कभी ना रहा और ना ही दो दिल. ना तो दो रास्ता रहा और ना ही दो मन. मैं एक पत्ता बना रहा. जब तक शाख से जुड़ा था, डाल से लटका रहा. जब हवा में था, तो हवा के साथ उड़ता रहा और जब जमीन पर आया तो धूल में सना रहा. मैं कब कहां रहा, इसकी स्मृति और भविष्य कुछ भी नहीं.
जब डाल से निकला तो प्रेम में था. जब डाल से टूटा तो प्रेम में था. जब हवा के सानिध्य में आया तो प्रेम में था और जब जमीन पर आया तब भी प्रेम में था. बुहारकर धूल में मिला देने पर भी प्रेम में रहूंगा. ये मेरी अवस्थाएं हैं. इस वक्त जब एक शो के लिए स्क्रिप्ट लिख रहा हूं, तब मुझे अपनी लिखी एक अधूरी पोस्ट याद आ गई. लो अब सुनो आगे की बात...
स्त्री के परिधान पहनकर मैं रंगमंच पर खड़ा था
साड़ी, चूड़ी, बाली, कंगन से मुझे सजाया गया था
सामने कुछ दर्शक थे, और मेरा अभिनय जारी था
मैं एक शापित देवता की प्रेयसी की भूमिका में था
जिनका मिलन संभव ना था, उसे जाना था अपने लोक
देवता रो रहा था, दर्शकों की आंखों में सहानुभूती थी
पर मुझे अंत पता था, इसलिए मैं प्रेम में ही रहा
डायरेक्टर ने कहा था, तुम्हारा प्रेम आत्मा वाला है
इसलिए तुम खुश होकर देवता को विदा करो
मैंने खुश होकर देवता को विदा किया, वो मुक्त हो गया
फिर मैं पत्ता बन गया, डाल से गिरा, धूल में मिला, पर प्रेम में रहा...

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