Wednesday, 27 December 2017

शुभसंकेत

उसका बार-बार सपनों में आ जाना एक सितम ही है। दोपहर में बेवक्त सोना...मतलब सपनों में उसे बुलाने का न्योता है। वो फिर से लाल स्कॉर्फ लगाए सपनों में थी। दूर से मुस्कुराकर मुझे देखती हुई। मैं बस उसे देख रहा था। वो मुस्कुराकर पहाड़ की एक चोटी पर बैठ गई। मैं उसके पास...उसके बगल में बैठना चाहता था। पर मैं उसका नाम नहीं जानता था। इसलिए सोचा, इसे कोई नाम नहीं दूंगा। हां, बस ये होने लगा...कि जब-जब वो सपनों में आती थी, मुझे एक नई कहानी मिल जाती थी। लिहाजा, मैंने उसका नाम 'शुभसंकेत' रख दिया। मैं अब उसके पास...उसके बगल में बैठा था। मैंने सोचा...काश, इसका लाल स्कॉर्फ मेरे गालों को छू जाए, तो क्या होगा ? अगर मैं इसका नाम जान जाऊं, तो क्या होगा ? अगर, मैंने इसे साफ-साफ कह दिया...कि तुम आती हो, तो एक टीस उठने लगती है, तो क्या होगा ? मैंने उसे कहा- सुनो....तुम बहुत सुंदर हो....सबसे सुंदर । और तुम मुझे प्रिय भी हो। मेरा इतना कहते ही...वो वहां से उठ गई। वो डर चुकी थी।..वो वहां से भागने लगी...। मैंने कहा...रूको... सुनो...ठहरो...। भागो मत...।....मैं तुम्हारे बारे में बात करना चाहता हूं। सपनों के बारे में बात करना चाहता हूं। हमारे बारे में बात करना चाहता हूं। पर वो नहीं रूकी।...
मैंने देखा...वो एक चिड़िया बन गई है।...और पहाड़ की चोटियों के बीच उड़ रही है।...उसकी चोंच लाल स्कॉर्फ जैसे थे...और उसके ऊपर एक लाल मुकुट लगा हुआ था।...लंबी पूंछ वाली वो चिड़िया उड़कर पहाड़ की चोटियों में कहीं गायब हो चुकी थी।...अचानक, मेरा पैर एक पहाड़ की चोटी से पिसल गया...। मैं पहाड़ से गिरने लगा...। मुझे लगा...अब मेरा अंत नजदीक है।...मैं गिरते-गिरते धम्म से बिछावन पर गिरा।... अलार्म जोर-जोर से बज रहा था। और मैं सपने से जग चुका था।....

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वो एक खिलौना भर है...टूट जाना उसकी नीयति है..। वो टूट ही जाएगा...। फिर क्यों हम करें उसकी उम्मीद...।  दूर एक धुंधला सा लैंप पोस्ट दिखता है।...