Saturday, 20 January 2018

डाकू खड़गसिंह एक अच्छा इंसान है।


मुझे लगता है, कि मेरे पास दो मन है..। और दोनों आपस में बातें करते रहते हैं।.. उनकी बातें अकसर मैं नहीं जान पाता हूं। पर, फुसफुसाहट मैं सुनता रहता हूं। मुझे लगता है, कि वो बात करते वक्त गुप्त शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, या फिर ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं, जिसे मैं नहीं समझ सकूं। हां, मेरे दोनों मन इतना रहम जरूर मुझपर करते हैं, कि जब वो दोनों आपसे में बातें करना खत्म कर लेते हैं, तो उसका निचोर मुझे बता देतें हैं।..या फिर मैं ये कह सकता हूं, कि मुझे समझा देते हैं।.. दोनों मनों के बीच का संवाद लगातार चलता रहता है। और मैं इस बात से अकसर हैरान रह जाता हूं, कि मेरे पढ़े के मुताबिक, मेरे शरीर में एक मन, एक आत्मा और एक दिल होना चाहिए।...मगर, मैं साफ महसूस कर पाता हूं, कि आत्मा चुप है, दिल शांत है...मगर दोनों मन...प्रिय दोस्तों की तरह ही आपस में बातें कर रहे हैं..।

काफी दिनों की मेहनत के बाद आखिरकार वो पल आ ही गया, जब मैंने मनों के बीच की भाषा को समझना सीख गया। और फिर एक दिन फुर्सत निकालकर मैं उनकी बातों को सुनने के लिए किसी चुगलखोर की तरह बैठ गया।
मन 1- मुझे काफी दिनों से जलेबी खाने का मन कर रहा है। सोच रहा हूं, किसी दिन जब चैन से बैठूंगा, तो ढाई सौ ग्राम जलेबी खरीदकर दुकान से लाऊंगा, और फिर बैठकर अकेले पूरा खा जाऊंगा।
मन 2- पर उतना जलेबी तुम अकेले कैसे खा पाआगे।
मन 1- हां, जानता हूं, उतना जलेगी अकेले नहीं खा पाऊंगा, मगर खाने के बाद दोने में जो जलेबी बचेगी, उसे देखकर अहसास होगा, कि अभी मैं फुर्सत में हूं, और अभी अभी मैंने ढेर सारी जलेबी खत्म की है।
मन 2- हां, ये तो है।
मन 1- और तुम क्या सोचते रहते हो ? बहुत देर से गुमशुम चुप उदास बैठे हो ?
मन 2- नहीं, मैं उदास नहीं बैठा हूं...सोच रहा हूं, कि कोई ऐसा होता, जिससे मैं अपनी सारी फरमाईशें सुनाता...और वो मेरी हर फरमाईशें पूरी कर देता ?
मन 1- क्या फरमाईशें हैं तुम्हारी ?
मन 2- कुछ नहीं...बस जैसे मैं तुम्हें जलेबी लाने के लिए कहता, और तुम फौरन बाजार से जलेबी ले आते...

पहला मन हंस पड़ता है। उसे देख दूसरा मन मुस्कुरा उठता है। दोनों एक दूसरे का हाथ थाम लेते हैं। काफी देर तक यूं ही बैठे रहते हैं। मैं उनकी बात चुपचाप सुनता रहता हूं। 


सच तो ये है कि...मैं जोर से चिल्लाना चाहता हूं। चीजों को तोड़ डालना चाहता हूं। हर सामान...जो भी मेरे आसपास है...सारी चीजों को बुकनी-बुकनी कर डालना चाहता हूं। जो भी हाथ लगे..। और फिर घंटों बैठकर टूटे-बिखड़े पड़े सामानों को देखना चाहता हूं। फिर उन्हें छूकर जोड़ देने के बारे में सोचूं। और जब उन्हें किसी तरह से जोड़ ना पाऊं, तो उन्हें बुहारकर घर के किसी कोने में जमा कर दूं। मैं असल में अपनी यादों के साथ कुछ ऐसा ही करता हूं। दूसरा मन शून्य की तरफ देखते हुए अपनी बात कहे जा रहा था...और पहला मन उसकी बात सुनता जा रहा था। दूसरे मन की आंखे एकदम से स्थिर हो चुकी थीं। चेहरा दायीं तरफ मुड़ा हुआ था।
मैं, उन दोनों को चुपचाप छिपकर बस निहार रहा था। चारों तरफ खामोशी सी फैली हुई थी। हवा भी शोर नहीं मचा रही थी। दूसरा मन हल्का-हल्का सांस लेते हुए फिर बोल पड़ा...असल में हमें चिल्लाकर कह देनी चाहिए, सब ठीक है। सब शांत है। लेकिन हम ऐसा नहीं करते हैं। मैंने ऐसा करने की एक बार कोशिश की थी, पर कर नहीं पाया था। मैंने देखा था, कि एक आदमी...मेट्रो में पहले तो कुछ-कुछ धीरे-धीरे बोल रहा था, फिर अचानक जोर से चिल्ला पड़ा। मेट्रो में तमाम लोग उसकी तरफ देखने लगे। वो फिर शांत हो गया। कुछ पल उसे देखने के बाद लोग अपनी-अपनी में मशगूल हो गये। कुछ अभी भी हंस रहे थे। कुछ उसके बारे में पता नहीं क्या बातें करने लगे। उस आदमी को देखने के बाद मैंने चिल्लाने का प्लान त्याग दिया था। 
असल में पता नहीं मैं क्या चाहता हूं। मैं चाहता हूं, तुम मुझे गले से लगा लो। कुछ देर यूं ही गले से लगाकर रखो। फिर हम सो जाएंगे। चैन से। और मुझे भी नींद आ जाएगी। 

मैं वहां से निकल गया, दोनों मन को आपस में बातें करता हुआ छोड़कर। मैं किसी धुंध में खो जाना चाहता था। मैं पहाड़ों की तरफ निकल गया। खाईयों को देखने लगा। अनंत तक गहराईयों के बीच अनंत चोटियां...और चोटियों के बीच तरह-तरह के पेड़ पहाड़ों में जड़ जमाए खड़े थे। उनके बीच धुंध का डेरा था। कई छोटे फूल धुंध में खोए थे, ठीक उसी तरह जैसे मैं पहाड़ों के बीच खोया हुआ हूं। मुझे कहां जाना है, कहां ठहरना है, कहां से वापस आ जाना है, मुझे पता नहीं है। मैं पीपल, इमली छोड़कर बरगद की छाया तलाश रहा हूं। एक बरगद का पेड़ मेरे गांव के स्कूल में था। हम वहीं पढ़ते थे। मास्साब, हमें बरगद के घने साये में पढ़ाते थे। मुझे शुरू से कहानियां पढ़ने में अच्छा लगता था। मैं कहानियों में खो जाया करता था। मुझे याद है, बरगद के नीचे मास्साब हमें हिंदी पढ़ा रहे थे। फिर उन्होंने मुझे हिंदी किताब की किसी भी एक कहानी का संक्षिप्त विवरण सुनाने को कहा था। मैं क्लास में खड़ा हो गया और किताब की एक कहानी सुनाने लगा। बाबा भारती और उनके प्यारे घोड़े की कहानी। कहानी का नाम 'हार की जीत' था। मैंने शुरू किया... मां को अपने बेटे और किसान को अपनी लहलहाती फसल देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। कहानी में बाबा भारती का घोड़ा खड़गसिंह नाम का एक डाकू धोखे से चुरा लेता है। बाबा भारती काफी दुखी हो जाते हैं। लेकिन, फिर डाकू खड़गसिंह के अंदर का इंसान जाग उठता है, और वो बाबा भारती को उनका प्यारा घोड़ा वापस कर देता है। मैंने पूरी की पूरी कहानी वैसे का वैसा सुना दिया। मास्साब खुश हो गये। उन्होंने मुझे कहा...तुम एक दिन काफी अच्छा लिखोगे। मैं उस दिन काफी खुश हो गया था। पूरे क्लास में हर किसी के चेहरे की तरफ देख रहा था। सब मुझे देख रहे थे। मुझे वो घटना अब तक याद है। पर मुझे अब लगता है, कि मेरे पास भी एक घोड़ा था...जिसे किसी डाकू खड़गसिंह ने चुरा लिया। धोखे से...और मैं अपने प्यारे घोड़े के खोने से काफी दुखी हूं। लंबे अर्से हो चुके हैं, मेरे प्यारे घोड़े को मुझसे दूर गये हुए...पर डाकू खड़गसिंह अब तक मेरा घोड़ा लेकर नहीं आया है। उसके अंदर का इंसान अब तक नहीं जगा है। मैं हर दिन एक बार अपने कमरे को अच्छे से देखता हूं, कमरे में घोड़े के हिनहिनाने की आवाज तलाशता हूं...और हर दिन मायूस हो जाता हूं। और फिर मुझे स्कूल का वो बरगद पेड़ और मास्साब की शाबाशी याद आने लगती है। बचपन में मां कहती थी, मास्साब जान लेते हैं, कि उनका कौन सा छात्र पढ़ने वाला है, और कौन सा छात्र आगे जाकर क्या बनने वाला है। मास्साब ने मुझे एक अच्छा रायटर होना बताया था...पर मैं अब तक नहीं बन पाया। पता नहीं, मैं कब तक जिंदा रहूंगा ? पता नहीं, मैं इस धुंध में कब खो जाऊंगा ? पता नहीं, मास्साब का कहा हुआ सच होगा या नहीं...? मैं एक बार फिर से स्कूल जाना चाहता था। मुझे लगता था, कि शायद उस बरगद के नीचे मेरा वो घोड़ा डाकू खड़गसिंह बांधकर चला गया होगा...। पर बाद में मुझे पता चला...कि स्कूल में बरगद का वो पेड़ अब नहीं रहा। लोग बताते हैं, स्कूल में नया बिल्डिंग बनना था, इसलिए उसे काट दिया गया। मैं समझ गया...कि डाकू खड़गसिंह मेरा घोड़ा लेकर आया होगा, मगर बरगद का पेड़ उसे मिला नहीं होगा, इसलिए वो घोड़ा छोड़कर कहीं और चला गया। मेरा घोड़ा अब इस दुनिया में खो चुका है।..कहीं, भटक चुका है। जरूरत ने बरगद के पेड़ को काट दिया। जरूरतें एक अच्छी किस्म की आड़ी या कुल्हाड़ी होती हैं। वो कभी भावनाओं को काट देती हैं, तो कभी आपकी इच्छाओं को..। डाकू खड़गसिंह अब भी एक अच्छा इंसान है, मगर उसे बरगद का पेड़ ही नहीं मिला, जहां वो मेरे घोड़े को बांधकर जाता।


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