वो मुझे कबूतर की तरह लगने लगी। कुछ नखरे ही थे उसके ऐसे। गर्दन स्थिर ही नहीं रहता। कभी इधर मुड़ के देखना...कभी उधर। आंखों में मानो करंट दौड़ती रहती है।
-क्या मैं तुम्हें कबूतर कहूं ?
- कबूतर...? हीहीही...कबूतर क्यों ? मैं कबूतर जैसी लगती हूं क्या ?
- हां, बिल्कुल कबूतर जैसी ही। बस मुंडेर पर नहीं बैठती।
- अच्छा....तो तुम मुझे कबूतर कहोगे
- नहीं, मैं तुम्हें खरगोश कहूंगा
- खरगोश क्यों ?
- क्योंकि...खरगोश पहाड़ो में रहते हैं। और पहाड़ मुझे बेहद पसंद हैं।
- अच्छा, तो मैं जा रही हूं।
- कहां ?
- पहाड़ों में
- क्यों ?
- पहाड़ पर चढ़कर मैं चिल्लाना चाहती हूं। जोर-जोर से। खुद को पुकारना चाहती हूं। मुझे लगता है, मैं पहाड़ों में कहीं खो गई हूं। शायद किसी चोटी पर मौजूद देवदार के पीछे।
- मैंने थोड़ा सा मुस्कुरा दिया। फिर कहा- सुनो, पिछले साल उस देवदार के पीछे मैं खुद को छोड़कर आया था। वहां चोटी से पानी की एक धारा बहती है। वहां मैं काफी देर तक बैठा रहा था। फिर पानी गायब हो गया। और खड़ा देवदार सूख गया। मैं देवदार से गले लगकर काफी देर तक रोता रहा। फिर खुद को देवदार की जगह छोड़ दिया। अब वहां देवदार नहीं है।
वो पहाड़ों की तरफ बढ़ गई। मैंने कहा, रूको...ठहरो...। सुनो।
पर वो नहीं रूकी। पहाड़ों में चली गई। मैं वहीं खड़ा रह गया।
मेरा सपना टूट गया था। सुबह के पांच बज रहे थे। मैं कमरे से निकलकर खिड़की के पास आ गया। आसमान में बादल छाए हुए थे। मैं बारिश होने का इंतजार करने लगा।
-क्या मैं तुम्हें कबूतर कहूं ?
- कबूतर...? हीहीही...कबूतर क्यों ? मैं कबूतर जैसी लगती हूं क्या ?
- हां, बिल्कुल कबूतर जैसी ही। बस मुंडेर पर नहीं बैठती।
- अच्छा....तो तुम मुझे कबूतर कहोगे
- नहीं, मैं तुम्हें खरगोश कहूंगा
- खरगोश क्यों ?
- क्योंकि...खरगोश पहाड़ो में रहते हैं। और पहाड़ मुझे बेहद पसंद हैं।
- अच्छा, तो मैं जा रही हूं।
- कहां ?
- पहाड़ों में
- क्यों ?
- पहाड़ पर चढ़कर मैं चिल्लाना चाहती हूं। जोर-जोर से। खुद को पुकारना चाहती हूं। मुझे लगता है, मैं पहाड़ों में कहीं खो गई हूं। शायद किसी चोटी पर मौजूद देवदार के पीछे।
- मैंने थोड़ा सा मुस्कुरा दिया। फिर कहा- सुनो, पिछले साल उस देवदार के पीछे मैं खुद को छोड़कर आया था। वहां चोटी से पानी की एक धारा बहती है। वहां मैं काफी देर तक बैठा रहा था। फिर पानी गायब हो गया। और खड़ा देवदार सूख गया। मैं देवदार से गले लगकर काफी देर तक रोता रहा। फिर खुद को देवदार की जगह छोड़ दिया। अब वहां देवदार नहीं है।
वो पहाड़ों की तरफ बढ़ गई। मैंने कहा, रूको...ठहरो...। सुनो।
पर वो नहीं रूकी। पहाड़ों में चली गई। मैं वहीं खड़ा रह गया।
मेरा सपना टूट गया था। सुबह के पांच बज रहे थे। मैं कमरे से निकलकर खिड़की के पास आ गया। आसमान में बादल छाए हुए थे। मैं बारिश होने का इंतजार करने लगा।
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