Thursday, 1 February 2018

मंदिर में बहुत पुराने पेड़ की डाली पर मन्नत का धागा बांधा...एक दुआ की ख्वाहिश लिए...पर किसी डाली से अनगिणत बंधे धागों में से किसी धागे को उतरते नहीं देखा ..। दुआ कबूल नहीं हुई। मैंने देखा बहुत सारे धागे उस डाल से उतरने के इंतजार में थे...पर ये कैसा इंतजार था ? मैंने शिवजी के मंदिर में दरख्वास्त लगाई....शिवजी के वाहन नंदी के कान में मन की निजी बात कही... पर मन चमत्कार की आस में बैठा रहा, और हर मियाद पूरी होती रही। एक वक्त आता है, जब हम कहते हैं, दुनिया की सुराही से खट्टा पानी ही बहता है। 

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डूबने वाले ने डूबते साहिल को आवाज दी...

वो एक खिलौना भर है...टूट जाना उसकी नीयति है..। वो टूट ही जाएगा...। फिर क्यों हम करें उसकी उम्मीद...।  दूर एक धुंधला सा लैंप पोस्ट दिखता है।...