कुछ कहूं या चुप ही रह जाऊं...जैसे विचारों के बहुत से हाथी, खरगोश और कबूतर मेरे मन में उछल कूद कर रहे हैं..। पर मन की हर बात मैं खारिज कर दे रहा हूं। वो दुआ क्यों मांगू जो सच हो जाए तो सुनामी के वेग में सब बह जाए। और यही ख्याल था, जब सपने वाली बात मैंने तुम्हें बताना सही नहीं समझा।
सपने में तुम बुला रहीं थीं....और मैं व्याकुल सा भागा जा रहा था आपसे मिलने। तभी रास्ते पर पड़े एक रोड़े से मैं टकरा गया। अंगूठे से खून निकलने लगा। मेरे मुंह से पतली चीख निकली और शोर में खो गई। मैंने हाथों से अंगूठा पकड़ लिया। खून रोकने की कोशिश करने लगा। पास से गुजर रहे एक आदमी ने मदद की। पर अब मैं भाग नहीं पा रहा था। मैं दौ़ड़ना चाह रहा था, पर पैरों ंमें ताकत नहीं बची थी। मुझे लग रहा था. मेरे पास वक्त बेहद कम हैं, इसलिए पूरा दम लगाकर मैं फिर से भागा। तभी रास्ता खत्म हो गया। सामने खाई थी। कोई पुल नहीं था। मैं सबको कोसने लगा। मुझे आपसे मिलने बहुत दूर जाना था। मैं वापस मुड़ा, कुछ कदम चला, तो वापस अपने घर के पास खड़ा था। तुमसे मिलने की मियाद खत्म हो चुकी थी। मैं जग चुका था।
सब कुछ बेहद अजीब लग रहा था मुझे। मैं इस सपने का रहस्य नहीं समझ पाया। हो सकता है, इसका कोई रहस्य ना भी हो, पर कुछ ना कुछ तो होता ही है। सब कुछ व्यर्थ तो हो नहीं सकता। सबकुछ हम यूं ही खारिज तो नहीं कर सकते। वो हुक का उठना भी उसमें शामिल है। मैं जानता हूं, ये बेवजह की बातें हैं...। पर बातें तो हैं...जिसे तुमसे कहने में मुझे अभी हर्ज नहीं लग रहा।
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