एक आदमी...दूसरे आदमी को मार क्यों देता है..। सारी वजहों को सोचने के बाद भी एक भी वजह मुझे समझ में नहीं आती। जबकि, उसे पता होता है...कि एक बार उसकी जान चली गई, तो फिर वो कभी जिंदा नहीं हो पाएगा..। कभी बोल, हंस...चल नहीं पाएगा। उसका अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा। जिसकी आपने हत्या कर दी है, उसका शव जब उसकी मां..बहन, पत्नी बेटी देखेगी..तो उसपर क्या बीतेगी। कुछ पल के गुस्से के लिए हम किसी से उसके जीने का हक क्यों छीन लेते हैं।
अभी दफ्तर पहुंचते ही पता चला...कि दिल्ली में एक कैब ड्राइवर की गोली मारकर हत्या कर दी गई। ये खबर देखते ही मन व्यथित हो गया। मैं अकसर कैब से यात्राएं करता रहता हूं। अकसर उनलोगों से बातचीत भी हो जाकी है। बिल्कुल हमारे जैसे होते हैं वो। सेम टू सेम। कुछ भी अलग नहीं। मैंने पाया है, कि वो मुझसे ज्यादा मेहनत करते हैं...दिन रात काम करते हैं। सबके अलग-अलग सपने होते हैं। और सबकी आंखों में मैं उनके परिवार को देखता हूं।
एक कैब ड्राइवर ने एक बार बातचीत के दौरान बताया था, कि सर महीने में करीब 25 हजार रुपया काम लेता हूं।गांव में घर बनवाना है। इसलिए थोड़ा और मेहनत अभी करना है। मैंने उसे हौसला देते हुए कहा... हो जाएगा... । अंत में देखिएगा...सब अच्छा होगा। हैप्पी एंडिंग। मैं अकसर...जब भी कोई अपनी समस्या मुझे बताता है, तो मैं कह देता हूं...चिंता मत कीजिए...देखिएया...सब अच्छा होगा। अंत में सब अच्छा होगा। पर क्या अंत में सब अच्छा हो जाता है ? ये सवाल कई बार मेरे मन में उठे हैं। पर '' अंत में सब अच्छा हो जाएगा '' वाले विश्वास से मैं हटना नहीं चाहता, इसलिए, मैंने इस सवाल पर कभी ध्यान नहीं दिया। कभी कभी मुझे लगता है, कि सिर्फ दिल रखने के लिए...या ढाढ़स बढ़ाने के लिए तो कहीं मैं नहीं बोल देता हूं...कि सब अच्छा हो जाएगा..। किसी फिल्म की कहानी का अंत तो मैं नहीं सोच लेता...कि फिल्मों के आखिरी में सब अच्छा ही होता है।
दिल्ली में जिस कैब वाले का मर्डर हुआ है, उसकी तस्वीर अभी देखी है। हट्टा-कट्टा जवान दिख रहा था। पर एक गोली ने उसे शव बना दिया।...हर दिन सैकड़ों हत्याएं होती हैं..। पर कोई इस तरफ सोचता तक नहीं । या किसी के सोचने से फर्क भी नहीं पड़ता। जैसे मेरे सोचने से फर्क नहीं पड़ता। लोग गुस्सैल होते जा रहे हैं।... हर आदमी दूसरे आदमी से ज्यादा गुस्सैल बनना चाहता है।...और गुस्से का अंजाम...कोई ना कोई शव होता है।.. किसी ना किसी का अस्तित्व मिटता है।
कान्हा...मुझे सब कुछ देना...गुस्सा और घमंड से दूर रखना।
अभी दफ्तर पहुंचते ही पता चला...कि दिल्ली में एक कैब ड्राइवर की गोली मारकर हत्या कर दी गई। ये खबर देखते ही मन व्यथित हो गया। मैं अकसर कैब से यात्राएं करता रहता हूं। अकसर उनलोगों से बातचीत भी हो जाकी है। बिल्कुल हमारे जैसे होते हैं वो। सेम टू सेम। कुछ भी अलग नहीं। मैंने पाया है, कि वो मुझसे ज्यादा मेहनत करते हैं...दिन रात काम करते हैं। सबके अलग-अलग सपने होते हैं। और सबकी आंखों में मैं उनके परिवार को देखता हूं।
एक कैब ड्राइवर ने एक बार बातचीत के दौरान बताया था, कि सर महीने में करीब 25 हजार रुपया काम लेता हूं।गांव में घर बनवाना है। इसलिए थोड़ा और मेहनत अभी करना है। मैंने उसे हौसला देते हुए कहा... हो जाएगा... । अंत में देखिएगा...सब अच्छा होगा। हैप्पी एंडिंग। मैं अकसर...जब भी कोई अपनी समस्या मुझे बताता है, तो मैं कह देता हूं...चिंता मत कीजिए...देखिएया...सब अच्छा होगा। अंत में सब अच्छा होगा। पर क्या अंत में सब अच्छा हो जाता है ? ये सवाल कई बार मेरे मन में उठे हैं। पर '' अंत में सब अच्छा हो जाएगा '' वाले विश्वास से मैं हटना नहीं चाहता, इसलिए, मैंने इस सवाल पर कभी ध्यान नहीं दिया। कभी कभी मुझे लगता है, कि सिर्फ दिल रखने के लिए...या ढाढ़स बढ़ाने के लिए तो कहीं मैं नहीं बोल देता हूं...कि सब अच्छा हो जाएगा..। किसी फिल्म की कहानी का अंत तो मैं नहीं सोच लेता...कि फिल्मों के आखिरी में सब अच्छा ही होता है।
दिल्ली में जिस कैब वाले का मर्डर हुआ है, उसकी तस्वीर अभी देखी है। हट्टा-कट्टा जवान दिख रहा था। पर एक गोली ने उसे शव बना दिया।...हर दिन सैकड़ों हत्याएं होती हैं..। पर कोई इस तरफ सोचता तक नहीं । या किसी के सोचने से फर्क भी नहीं पड़ता। जैसे मेरे सोचने से फर्क नहीं पड़ता। लोग गुस्सैल होते जा रहे हैं।... हर आदमी दूसरे आदमी से ज्यादा गुस्सैल बनना चाहता है।...और गुस्से का अंजाम...कोई ना कोई शव होता है।.. किसी ना किसी का अस्तित्व मिटता है।
कान्हा...मुझे सब कुछ देना...गुस्सा और घमंड से दूर रखना।
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