Thursday, 13 September 2018

हंसना भूल गया....

मोबाइल पर एक चुटकला पढ़ते ही उसके मुंह से हंसी निकल गई...। वो हंस पड़ा...। बगल में बैठी आंटी ने कहा.. आज सूरज किस तरफ निकला है..? आंटी के सवाल से वो चौंक गया...और हंसते हुए आंटी की तरफ देखकर पूछा... क्यों...क्या हो गया...।
नहीं, तुम हंसे हो ना...इसीलिए पूछ बैठा...कि सूरज किस तरफ से आज निकला है। इतने दिनों में आज पहली बार तुम्हें हंसते हुए देखा है।

--नहीं, नहीं...ऐसी कोई बात नहीं है।

आखिरी बार मैं कब हंसा था। कब खुश हुआ था आखिरी बार..। बहुत सोचने के बाद भी याद नहीं आ रहा था। मैंने खुश होना कब बंद कर दिया इसका सही-सही अनुमान लगाना अब बहुत मुश्किल हो गया था। हां, याद आया, कि जब मां पिछले साल आई थी, तो उसने कहा था...तुम हंसते क्यों नहीं हो। तुम्हारे उमर के लोगों को देखो... हमेशा हंसते खेलते रहते हैं। उन्हें कोई फिक्र नहीं होती...और तुम बात भी करते हो, तो सीरियस तरीके से...या फिर गुमसुम रहते हो। क्या बात है... ? मैंने कहा था...बात क्या होगी..। बस ऐसे ही। अब हमेशा हंसते ही रहें क्या... हर बात पर ?
--नहीं, फिर भी हंस सकते हो। पहले तो हर वक्त मसखरा करते रहते थे।

एक हंसने वाला आदमी कब अचानक से चुप हो जाता है, उसे पता तक नहीं चलता। मैं बिल्कुल ऐसा नहीं था...। ऐसा होना भी नहीं चाहता था। पर ये हो कैसे गया, का सवाल अब मेरे साथ है। एक अनजाना सा डर हर पल मेरे साथ रहता है, और उस डर को मैं आजतक जान नहीं पाया। ऐसा लगता है, कि कहीं कुछ गलत तो नहीं हो गया है मुझसे..। कहीं कुछ टूट तो नहीं गया है मुझसे..। मां अकसर कह दिया करती है, कलेजा पुष्ट रखो..। और मैं ऐसा कर नहीं पाया।

मैं ये बात किसी को बताना चाहता था...पर ऐसा हो नहीं पाया। मैंने चाहा, मुझे इसे कहीं दर्ज कर लेनी चाहिए... और मैं यहा हूं। वैसे देखा जाए तो मेरे पास दुखी होने की एक भी वजह नही हैं..। हर वजह मेरा खुद का पाला हुआ है।

कल शाम सबसे प्रिय दोस्त से घंटे भर बात हुई। उसे मैंने अपना सारा दुख सुना डाला। मेरी पूरी बात खत्म होने के बाद उसने पूछा...तुम इन बातों में से किस बात पर दुखी हो ? मैंने कहा...सभी बातों पर। उसने हंसते हुए कहा... कि इनमें से एक भी बात दुखी करने वाली नहीं है। मैं चुप ही रहा।



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