Thursday, 13 September 2018

सुराख

कुछ नहीं करोगे...तो भी जीवन तो बीतता ही है। तो कुछ करते क्यों नहीं ? जीवन तो तुम्हें अपने साथ लेकर ही जाएगा..और तुम ठहरने की दस्तकें भर देते रह जाओगे...। आओ ...की बीत चलें जीवन के साथ।

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वक्त की थैली में सुराख है
कभी शाम टपक जाती है
कभी सुबह गिर जाता है

प्रेम के साथ भी ऐसा ही कुछ होता है

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अभी-अभी देखा
एक ट्रक गुजर गया दरख्त से बंधे कुछ तारों को तोड़ते हुए
एक कारीगर फिर कर आया दुरूस्त सभी टूटे तारों को
मन भी कभी टूट जाता है..कभी जोड़ दिया जाता है
जाना, मन का मरम्मत कोई और नहीं करता
मन के पास खुद का अपना कारीगर होता है
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दफ्तर में कुर्सी पर देर तक बैठने के बाद
कुर्सी की पीठ पर झुककर करता हूं आंखे बंद
ठीक इस वक्त आंखों में लाल रंग का आसमान दिखा है
पीठ की अकड़ अकसर आंखें बंद करने से खत्म हो जाती हैं

पर बहुत सारी चीजें बची की बची रह जाती हैं

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वो एक खिलौना भर है...टूट जाना उसकी नीयति है..। वो टूट ही जाएगा...। फिर क्यों हम करें उसकी उम्मीद...।  दूर एक धुंधला सा लैंप पोस्ट दिखता है।...