Saturday, 27 May 2017

बेचैनी

कभी-कभी स्क्रिप्ट लिखते वक्त दिमाग में कुछ नहीं आता है, कि कैसे शुरूआत करें या कैसे आगे बढ़ा जाए. तब ऐसा लगता है, जैसे कोई भंवरा दिमाग के अंदर बंद हो गया हो, और बाहर निकलने के लिए बार-बार उड़ता हो, लेकिन दिमाग की जाली से टकराकर गिर जाता हो।...इस समय अंदर की बेचैनी और उथलपुथल से पार पाने के लिए मन हो रहा है, कि किसी रिंच या किसी औजार से दिमाग के दरवाजे को खोल दिया जाए, और भंवरे को मुक्त कर बेचैनी से निजात पाई जाए।...

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