पंखे की शोर सन्नाटे को भेद रही थी और करवटों के बीच गोपी बोल पड़ी- सम्मोहन देसी शराब की तरह होता है क्या?
- नहीं, सम्मोहन इत्र है, कुछ देर की खुशबू फिर महक की जगह गंध रह जाता है.
- हूं, लेकिन एक दफे भांग खाने के बाद मैं सिर्फ हंस रही थी. फिर पता नहीं चला कि कैसे किसी की हथेली पर मैं सिर रखके सो गई थी, दो ऊंगलियों को मैंने अपनी ऊंगलियों से पकड़ रखा था.
- ये क्या सवाल है ? सम्मोहन, देसी शराब, इत्र, भांग.. इनकी आदत व्यसन कहलाती है. और व्यसन बुरी चीज है. इन चीजों से भला सम्मोहन का क्या तालमेल? तुम्हारी ऊंगलियों से जरूर कोई धागा उलझ गया होगा.
- हूं, शायद...तो सम्मोहन फिर एक धागा है. जिसके दोनों सिरे हमारी ऊंगलियों से ही उलझे रहते हैं. फिर हम उन्हें निर्ममता से तोड़ कर किसी कचरे के पात्र में या किसी खाली स्थान पर फेंक देते हैं.
-- शायद तुम ठीक कह रही हो, सम्मोहन एक धागा ही है.
-- हूं, फिर इसका मतलब मौत सिर्फ सजीवों को ही नहीं आती है. मरना निर्जीवों को भी पड़ता है.
- नहीं, सम्मोहन इत्र है, कुछ देर की खुशबू फिर महक की जगह गंध रह जाता है.
- हूं, लेकिन एक दफे भांग खाने के बाद मैं सिर्फ हंस रही थी. फिर पता नहीं चला कि कैसे किसी की हथेली पर मैं सिर रखके सो गई थी, दो ऊंगलियों को मैंने अपनी ऊंगलियों से पकड़ रखा था.
- ये क्या सवाल है ? सम्मोहन, देसी शराब, इत्र, भांग.. इनकी आदत व्यसन कहलाती है. और व्यसन बुरी चीज है. इन चीजों से भला सम्मोहन का क्या तालमेल? तुम्हारी ऊंगलियों से जरूर कोई धागा उलझ गया होगा.
- हूं, शायद...तो सम्मोहन फिर एक धागा है. जिसके दोनों सिरे हमारी ऊंगलियों से ही उलझे रहते हैं. फिर हम उन्हें निर्ममता से तोड़ कर किसी कचरे के पात्र में या किसी खाली स्थान पर फेंक देते हैं.
-- शायद तुम ठीक कह रही हो, सम्मोहन एक धागा ही है.
-- हूं, फिर इसका मतलब मौत सिर्फ सजीवों को ही नहीं आती है. मरना निर्जीवों को भी पड़ता है.
पंखे की शोर अब भी सन्नाटे को भेद रही थी पर करवटों पर अब किसी ने भारी पत्थर रख दिया था.
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