Wednesday, 18 January 2017

सपने को बदल दिया

राइटर ने कहानी को बदल दिया था...जैसे भगवान के हाथों में शक्ति होती है, जीवन को बदल देने की..धरती, आकाश.. इंसान, जानवर...हर चीज को बदल देने की शक्ति... ठीक उसी तरह की शक्ति होती है राइटर के पास कहानी को बदल देने की, किसी भी बिंदु से, किसी भी पूर्णविराम से...
मैंने भी सपने वाली कहानी को नये मोड़ पर लाकर छोड़ दिया था.. अगर उस कहानी को नहीं लिखता, तो वो वैसा का वैसा रहता..जीवित..सजीव. लेकिन उसके सजीव होने पर मैं असमंजस में रहता.. और उधेड़बुन की वो स्थिति मेरे लिए ठीक नहीं होता..
आप चाहें तो इस कहानी को पढ़ना यहीं बंद कर सकते हैं. इस कहानी में मैं कह रहा हूं, कुछ नहीं है. और अगर आप फिर भी पढ़ रहे हैं, तो जिम्मेदारी आपकी है...
मैं बीमार था...और बहुत मुश्किल से मुझे नींद आई थी... मैं सपने में चला गया... सपने देखना मेरे लिए कोई नई बात नहीं है... सोते वक्त अकसर देखता हूं, और उठने के बाद सपने मेरे अंदर टीस बनकर जिंदा भी रहते हैं..
सपने में एक लड़की आई थी..उसे मैं जानता हूं...मुस्कुरा रही थी...मुस्कुराते हुए मेरे पास आई...और आहिस्ता कहा..."मैं तुम्हें पसंद करती हूं"... हां, ठीक यही वाक्य था, इसे मैं अभी भी स्पष्ट सुन रहा हूं.. उसके लबों पर मुस्कुराहट की रेखाएं थीं, और आंखों में शर्माहट और शरारत का मिश्रण घुला हुआ था...
मैं बदले में बस मुस्कुरा कर रह गया... और उससे कहा - चलो एक कप चाय पीकर आते हैं!
मैंने सपने को रोक दिया..उठकर बैठ गया.. इतना सजीव सपना मैंने सालों से नहीं देखा था... उठने के साथ ही मैं बेचैन हो गया... मैं उसे खोजने लगा..कमरे में..घर के बाहर..मुझे लग रहा था, अभी तो वो यहां थी, शायद मेरे उठने की आहट से शर्माकर बाहर चली गई...या कहीं और चली गई...
मैं काफी वक्त तक सपने के बारे में सोचता रहा...वो अभी भी सजीव था..बिल्कुल शाश्वत...मैं उससे बात करना चाहता था... मैंने अपने एक दोस्त के जरिए उस तक खबर भिजवा दिया, कि मैं उससे बात करना चाह रहा था...
अगले दिन मेरे पास उसका फोन आता है... वो पूछती है, क्या तुम मुझसे बात करना चाह रहे थे... मैंने थोड़ा हड़बड़ाते हुए कहा.. हां.. हां, कल बात करना चाह रहा था...
--क्या, बोलो
-- हां, नहीं कुछ खास नहीं..
-- हड़बड़ाओ नहीं.. बोलो क्या हुआ
-- एक्चवली कल मैंने एक सपना देखा था.. सपने में तुम थी..
-- अच्छा, फिर??
-- वो जरा डरावना सपना था, मैं बीच में ही उठ गया, और सोचा तुमसे बात कर लूं
-- अच्छा मेरे बारे में डरावना सपना था
-- हां, मैंने सपने को बीच में ही रोक दिया.. और थोड़ा डर गया था, तो सोचा तुमसे जरा बात कर लूं
कुछ पलों के लिए सन्नाटा रहता है...
-- ओके, बाय..टेक केयर

राइटर ने कहानी बदल दिया था...सुंदर सपने को डरावना बनाकर खत्म कर दिया था...

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