Wednesday, 18 January 2017

खोया-पाया

एक परिचित को तांबे के थर्मस में पानी पीते देखा...मैं थर्मस को ध्यान से देख रहा था...तभी उनकी नजर मुझपर पड़ गई। मैंने मुस्कुरा दिया।...वो भी मुस्कुराईं और पानी पीना खत्म करते हुए कहा---

''तांबे के बर्तन में पानी पीना सेहत के लिए अच्छा होता है, ऐसा थर्मस आप भी ले लीजिए और हर वक्त पास रखा कीजिए''

मुझे ये बाद पता थी। लेकिन मैं अपने साथ ज्यादा चीजें नहीं रखता। मुझे खो देने की आदत है। अकसर अपना सामन कहीं ना कहीं खो देता हूं। कई बार मेट्रो के अंदर तो दो दफे ऑटो में अपना बैग खो चुका हूं। कई किताबें भी अब अपने पास नहीं देखता। ईयरफोन, रुपये-पैसे....बहुत कुछ खो देता हूं मैं। संभाल कर रखना मेरी आदत नहीं है। ....खो देने की आदत मुझे कब लगी इसका पता मुझे तब पहली बार चला, जब सालों पहले दिल्ली आया, और जेब के सारे पैसे रूमाल निकालते वक्त कहीं खो बैठा... अभी कुछ दिन पहले ही मैंने अपने साथी को खोया है। इसलिए तांबे का थर्मस साथ रखने वाली बात मैंने मन में ही खारिज कर दिया है।

मैं अपनी बेहद निजी चीजें महफूज रखने के लिए एक काले रंग के बैग में रखता हूं। याद से संभालकर। वो बैग घर में ही पड़ा रहता है। उस बैग को खोले मुझे महीनों हो जाते हैं।...मैं चाय पी रहा हूं, बेहद फीकी है। शायद पत्ती कम है, और चाय सही से उबली भी नहीं है। शायद चाय बनाने की इच्छा अब खत्म होने लगी है। चाय बनाने से और पीने से एक तरह का संबंध रहा है मेरा। और हर संबंध एक छोर पर आकर आत्महत्या की जगह खोज रहा होता है। आत्महत्या करे या ना करे की ऊहापोह में वो संबंध जिंदा रहता है। किसी भी तरह का निर्णय उस संबंध की हत्या करना है। कहीं चाय और हमारे बीच का संबंध भी तो आत्महत्या नहीं कर रहा है। एक खामोश चुप्पी ने मुझे जकड़ लिया है। 

मैं आज अपने बैग को खोलकर देखना चाहता था। उसमें रखे आत्मीय सामानों को छूना चाहता था। मैंने बैग खोला और अंदर झांककर देखा...खूशबू आ रही थी अंदर से। पुराना पेन...दो डायरी... कलाई से बांधने वाला एक रिंग...खराब हो चुके मोबाइल फोन...के साथ दो अलबम निकले। सालों के रिश्ते की महक कमरे में फैल चुकी थी। वो महक मेरा दम घोंटने लगी। सांसे फूलने लगी मेरी। मैंने तुरंत अपने कमरे का दरवाजा खोल दिया। मैं उसे नहीं देखना चाहता था। मुझे डर लग रहा था एलबम को खोलने से। फिर भी हिम्मत करते हुए एलबम को खोला। बीच में सहेजकर रखी तस्वीर मेरे सामने थी। उसकी तस्वीर देखने की हिम्मत नहीं हो रही थी मुझे। मेरी पेशानी पर पसीने आ चुके थे। मैंने फौरन एलबम को बंद कर बैग में रख दिया। मेरी आंखों में अजीब सी जलन हो रही थी। जिसकी वजह से मेरी आंखों से लगातार पानी आ गिरने लगा था। मैंने उसे भी खो दिया था। काफी तेजी से लगा चोट धीरे-धीरे असर करता है। मेरे साथ भी यही हो रहा था। चोट बहुत तेज लगी थी। शुरू में तो सिर्फ निशान दिख रहे थे चोट लगने के...शायद असर अब हो रहा था। 
मैंने अपने झूठे सपनों में उसे कुछ सालों तक फंसाए रखा था शायद... बस... या शायद वह मेरे झूठे सपनों के बारे में जान गई थी, इसीलिए मैंने उसे खो दिया है। 

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