तुम्हारा प्रेम तलाशने के लिए मैंने तुम्हारा खत फिर से पढ़ना शुरू किया... पांच खत मैंने कुल पच्चीस बार पढ़ डाले... और हर खत पढ़ने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि अगर प्रेम तलाशना हो तो पीड़ा को पहले तलाशो... दरअसल प्रेम का अस्तित्व ही मेरी नजर में पीड़ा पर निर्भर करता है...
मैंने भगवान कृष्ण का रासलीला पढ़ा है... उसमें गोपियां कृष्ण के असीम प्रेम में होती हैं... मुझसे वर्णण करना मुमकिन नहीं है... मैं वर्णण भी नहीं कर रहा.. सिर्फ महसूसने की कोशिश कर रहा हूं.. कृष्ण के लिए विरहिन बनी गोपियां.. एक आलिंगन के लिए पीड़ा से तड़पती गोपियां...कृष्ण को बांसुरी बजाते देख बांस के भाग्य से जलन करती गोपियां.. सब पीड़ा ही तो है..प्रेम की पीड़ा, प्रेम में पीड़ा.... प्रेम अगर पराकाष्ठा से ऊपर जाने लगे तो वो भी पीड़ा का ही कारण है... गोपियों के साथ भी तो यही हो रहा था.. जलन भी तो प्रेम का एक कारक है...
तुम्हारे खतों को मैं बहुत देर से देख रहा हूं.. इनसे एक रिश्ता तो बहुत पहले कायम हो चुका था मगर अब इनसे अकसर मूक संवाद की आदत सी हो गई है...हल्का पीलापन, अपने लौ के दायरे में मुझे समेटे हुआ है...इसके सीने में अगणित शब्द हैं, और उनसे जिस तरह का रिश्ता है, उसे सिर्फ हम दोनों ही महसूस करते हैं...
मैंने तुम्हारे खत को मोड़कर वापस रख दिया है...उसे वापस रखते वक्त हम दोनों के मुंह से एक आह सी निकली है.. खत पढ़ने से पीड़ा कम होती है, या पीड़ा को रिक्त स्थान मिल जाता है मैं नहीं जान पाता हूं.
कमरे में भिनी भिनी खूशबू पसरी पड़ी है...और मैं आंखे बंद किए फिर से अकेला हो जाता हूं....
मैंने भगवान कृष्ण का रासलीला पढ़ा है... उसमें गोपियां कृष्ण के असीम प्रेम में होती हैं... मुझसे वर्णण करना मुमकिन नहीं है... मैं वर्णण भी नहीं कर रहा.. सिर्फ महसूसने की कोशिश कर रहा हूं.. कृष्ण के लिए विरहिन बनी गोपियां.. एक आलिंगन के लिए पीड़ा से तड़पती गोपियां...कृष्ण को बांसुरी बजाते देख बांस के भाग्य से जलन करती गोपियां.. सब पीड़ा ही तो है..प्रेम की पीड़ा, प्रेम में पीड़ा.... प्रेम अगर पराकाष्ठा से ऊपर जाने लगे तो वो भी पीड़ा का ही कारण है... गोपियों के साथ भी तो यही हो रहा था.. जलन भी तो प्रेम का एक कारक है...
तुम्हारे खतों को मैं बहुत देर से देख रहा हूं.. इनसे एक रिश्ता तो बहुत पहले कायम हो चुका था मगर अब इनसे अकसर मूक संवाद की आदत सी हो गई है...हल्का पीलापन, अपने लौ के दायरे में मुझे समेटे हुआ है...इसके सीने में अगणित शब्द हैं, और उनसे जिस तरह का रिश्ता है, उसे सिर्फ हम दोनों ही महसूस करते हैं...
मैंने तुम्हारे खत को मोड़कर वापस रख दिया है...उसे वापस रखते वक्त हम दोनों के मुंह से एक आह सी निकली है.. खत पढ़ने से पीड़ा कम होती है, या पीड़ा को रिक्त स्थान मिल जाता है मैं नहीं जान पाता हूं.
कमरे में भिनी भिनी खूशबू पसरी पड़ी है...और मैं आंखे बंद किए फिर से अकेला हो जाता हूं....
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