साल का आखिरी दिन है...और मैं कोरा पन्ना लेकर लिखने बैठा हूं...बहुत सारी अपेक्षाओं के साथ...। मगर क्या लिखूं...। शब्दों का वो कौन सा चित्र बनाऊं, जिसे उकेरते ही दिल हल्का हो जाए...वो जो थकान पसरी है वो ताजगी में तब्दील हो जाए...। एक अनवरत थकान जो सब से है...जिंदगी ने तजुर्बों का जो थकान दिया है, उन्हें किस दीवार पर टांगूं....
किताबों की ज्ञानवर्धक बातें...एक अनवरत चलने वाला काम का सिलसिला, जिनसे उलझकर मैं दिनों....महीनों...सालों से व्यस्त हूं, उनका क्या करूं...?
दफ्तर में ढेरों टीवी टंगे हैं, जिनपर निगाह सालभर टिकी रहती हैं, जिनमें मैं चेहरे तलाशने की कोशिश करता हूं, लेकिन अब मैं इन दिवास्वप्न से भी बोर हो चुका हूं...। एक किताब पढ़ता हूं, तो दूसरे का ख्याल आ जाता है, एक फिल्म देखने बैंठता हूं, तो दूसरी दिमाग में घर कर जाता है और इन सबसे से भागने का दिल करता है, तो क्या इनके बारे में लिखूं...
थक हारकर कोरे कागज पर एक शब्द लिखता हूं, ऊबन...। इस शब्द को मैं देखे जा रहा हूं... और इसे देखने में एक सुकून का अहसास हो रहा है....फिर भी कुछ लिखा नहीं जा रहा है... पर ऊबन शब्द डेस्क से उठने नहीं देता...
यही सब तो रहने वाला है अगले साल भी...कई साल से यही सब तक रहा है...और इन्हीं सब के बीच उलझकर मैं इस दुनिया के सबसे बोरिंग इंसानों की फेहरिस्त में शामिल हो चुका हूं...
अपने अबोध और निर्दोष मन को पुचकारने के बाद मैं डेस्क से उठ जाऊंगा....इस सोच के साथ कि जीवन के थाह को पाना असंभव है...और प्रेम जीवन का सबसे सरल भाव है...जिसे मैं और करीब लाने की कोशिश करूंगा.....
सब खुश रहें......यही कामना है......
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