Saturday, 28 January 2017

पटना जंक्शन

नींद का एक झोंका आया.. पता नहीं कितनी देर मैं सोया था... फिर आँखे काफी समय तक खुली ही थी...इन बहुत सारे ऐसे बीते दिनों में, मुझे कितने दिन याद हैं ???... अगर इसमें सिर्फ जिए हुए को हिसाब रखूं..तो एक दिन ऐसा था, जिसे भूलना शायद संभव नहीं.
वो दिसंबर के ही दिन थे...कोलकाता से ट्रेन खुलने के साथ ही काफी लेट हो चुकी थी. मेरे साथ दो और मित्र थे. सभी को पटना आना था. ट्रेन सुबह करीब 4 बजे पटना जंक्शन पर पहुंची थी. सर्दी अपने चरम पर..फिर भी कॉलेज में पढ़ने वाले 3 लड़कों का प्लेटफॉर्म पर रात गुजारना मुश्किल होता है. सभी मस्ती के मुड में प्लेटफॉर्म से बाहर आ गये. गहरा सन्नाटा सब तरफ. कुछ गाएं भटक रहीं थीं. कुछ कुत्ते ठिठुर रहे थे. कहीं पुआल से धुंआ निकल रहा था, शायद देर रात तक किसी ने सर्दी से मुकाबला किया था. 
कुछ दूर एक चाय की दुकान थी. तीन लोग वहां बैठे चाय पी रहे थे. और बिहार के किसी आम चाय दुकान की तरह ही वो कभी भीषण ठंड पर तो कभी राजनीति पर चर्चा कर रहे थे. गर्मी के लिए वहां लकड़ियों से एक अलाव भी जलाया हुआ था...आग सेंकते उनकी बात खामोश रात को कभी कभी बेध सी जा रही थी....
सर्दी की रात में अगर चाय मिल जाए तो कहना ही क्या...मैं अपने दोस्तों के साथ पहुंच गया चाय पीने. सभी ने एक एक कप चाय ली. और अलाव के सामने हम सभी ने भी अपने अपने लिए बैठने का इंतजाम कर लिया...किसी घुसपैठिये की तरह हम सभी भी उनकी बात वाली राजनीति के चर्चे में शामिल हो गये..और उन्हें भी गप्प बढाने और भोर होने तक के लिए साथी मिल चुके थे...
थोड़ी सी चाय ही हमने खत्म की थी, कि दो किन्नर वहां पहुंच गई..और मेरे दोस्तों से पैसा मांगने लगी.. उनकी उम्र ज्यादा नहीं थी. दोनों ने लड़कियों जैसे कपड़े पहन रखे थे लिहाजा मैं उन्हें ((थी)) ही कह रहा हूं...मेरे एक दोस्त ने अपने पर्स से 10 का नोट निकालकर एक किन्नर के हाथों में रख दिया..मैं चाय पीने में मशगूल था.. कि अचानक..
एक किन्नर बेहद गौर से मुझे देखने लगी...वो अपनी निगाह मुझसे हटा ही नहीं रही थी... मुझे लगा वो अपनी निगाह तुरंत हटा लेगी पर नहीं...पर वो मुझे देखती रही, मैं अपनी निगाह बार बार हटा रहा था, मगर उसकी निगाहों से जो आकर्षण की बारिश होने लगी थी उसे बर्दाश्त करने की हिम्मत मेरे अंदर नहीं थी. 
कुछ 5/7 मिनट देखने के बाद उसने कहा..कि क्या मैं तुम्हें छू सकती हूं....मैं अचानक ऊभरे सवाल के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था. धुंध भरी सुबह में मुझे लगा कि सर्दी अचानक और बढ़ गई है. मैं तुम्हें छू लूं....मैं सकपका गया था. उसकी आंखों में एक अजीब तृष्णा थी.
ये ख्वाहिश कोई बड़ी या बुरी नहीं थी, मगर एक किन्नर की ये ख्वाहिश मुझे अटपटा लगा... मैं चौंक गया था, और मुंह से निकला क्या..?? आंखों में प्रश्नवाचक चिन्ह ऊभर आये थे. भौंहें भी सवाल पूछने लगे थे..कि वो फिर बोल पड़ी-- क्या मैं तुम्हें छू सकती हूं.. मैंने कहा क्यों...?? तो वो बोली, तुम अच्छे लग रहे हो मुझे... मैं अगर लड़की रहती, तो तुमसे शादी कर लेती...
कितना दुखद था यह वाक़्य... कितना छोटा था यह संबंध.. कितनी सरल थी वह। हमारे पास कहने के लिए कुछ नहीं था। क्या कह सकते थे? हम दोनों अलग थे... एक दूसरे की कहानी तक नहीं पता थीं..। संबंध में सिर्फ भाव थे... 
मैं अवाक था..सर्दी और ज्यादा लगने लगी थी मुझे..मेरे दोस्त हंसने लगे थे..चाय वाला किन्नर को जाने के लिए कह रहा था..मगर वो किन्नर सिर्फ एक बार छूने की जिद करने लगी थी.. मैंने उसे छूने देने से इनकार कर दिया... मेरे इनकार से वो उदास हो गई.. चेहरे पर उसके एक व्यथा ऊपर आई थी...जिसे मैं महसूस कर रहा था..समय ने शोर करना भी बंद कर दिया था....
एक किन्नर को मैं हमेशा सबसे पैसे लेते देखा था..जोर से, जबरदस्ती से...गाली देते...लड़ते हुए...झगड़ते हुए...लेकिन इसने पूरे परसेप्शन को ही बदल कर रख दिया. समझ में आया, एक दिल नाम की चीज है, हर किसी के हृदय में धड़कता है, भले लिंग कुछ भी हो, या कुछ नहीं भी हो. उसके इस भाव को पहचानते हुए भी मैं पहचानने से इनकार कर रहा था. सब जज्बात थे उसके पास..मगर वो अपूर्ण थी. उसे कुदरत ने संपूर्ण नहीं किया था. और वो इस बात ये जान रही थी. जब उसे छूने देने की इजाजत मेरी तरफ से नहीं मिली..तो कुछ वक्त वो आसमान में पसरे धुंध को निहारती रही. भावहीन, शून्य में. और फिर उसने अपनी पूर्ण नजर मेरे ऊपर रख दी. गहरी नजर समुद्र सा पूर्ण..अस्तित्व से भरा हुआ. अब उसने एक नया निवेदन किया.
बोली ठीक है मैं तुम्हें तुम्हारे इजाजत के बगैर नहीं छुऊंगी, लेकिन मेरी एक बात माननी होगी. मैंने कहा क्या. वो बोली, तुम्हारे चाय के पैसे मैं दूंगी. मैं अब इनकार नहीं कर सका. वो अपने पूर्ण होने के लिए कुछ करना चाहती थी, अपने लिए कुछ करना चाहती थी, शायद अपने प्यार में कुछ करना चाहती थी.
प्रार्थना की सी शांति छा गई थी वहां..उसके चेहरे से लग रहा था, कि शायद उसने अपने आप को कभी इतना अकेला नहीं देखा होगा. उसकी गुजारिश में समर्पण शामिल था...इनकार उसके भाव का तिरस्कार होता...  पैसे देने के बाद एक भरपूर नजरों में उसने मुझे समेट लिया..और बिना पलटे कहीं अंधेरे में गुम हो गई...
सुबह की पौ फट रही थी...और एक कहानी का अंत हो रहा था.

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