Monday, 27 March 2017

मैं चिल्लाना चाहता हूं...

सुबह जब दफ्तर के लिये निकलता हूं, तो लोग कितने हरे भरे दिखते हैं. सब बने ठने रहते हैं. हर किसी के चेहरे पर ताजगी, एनर्जी.. हर चेहरे पर वो वाली बात होती है..| वहीं लौटते वक्त हर चेहरा मुरझाया सा दिखता है. हरारत, थकन और नीची झुकी गर्दनें..
मेट्रो में हर तरह के चेहरे दिखते हैं और हर चेहरे की अलग अलग कहानी होती है. कोई मोबाइल में झांकता दिखता है, तो कोई अपनी आंखे बंद किए घर पहुंचने के इंतजार में रहता है. मैं भी इन्हीं चेहरों में एक चेहरा बना रहता हूं. मेट्रो के अंदर एक मां दिखती है अपने बेटे के साथ. वो अपने बेटे को कहती है, मन लगाकर पढ़ोगे तो बड़ा आदमी बनोगे. हिंदुस्तान में करीब हर मां अपने बच्चों को यही कहती है. मैं उस मां की बात सुनकर मुस्कुरा देता हूं.. वो बच्चा भी मेरी तरह ही मुस्कुरा रहा होता है. पहले मैं बड़ा आदमी मतलब लंबा आदमी समझता था. मैं बड़ा आदमी बनने का मतलब आज तक नहीं जान पाया हूं. बड़ा आदमी बनकर मैं क्या करूंगा ? बड़ा आदमी कैसे बना जाता है, समझ नहीं पाता हूं. पैसा कमाने में मुझे कुछ खास दिलचस्पी है नहीं. क्यों नहीं है, कभी जानने की कोशिश नहीं की.
मेट्रो के अंदर हर शाम एक चुप्पी पसरी रहती है... और उस चुप्पी में सब खोए रहते हैं. किसी के पास बोलने के लिए कुछ नहीं होता. हर शाम मुझे वो चुप्पी अखड़ने लगती है. मैं उस सन्नाटे को चिल्लाकर भेद देना चाहता हूं. मैं चिल्लाकर कहना चाहता हूं, भाईयों तुम लोग चुप क्यों हो? तुम्हें ये खामोशी इतनी प्यारी क्यों लगने लगी है. आओ, और मेरे साथ तुम लेग भी चिल्लाओ...! लेकिन ना तो मैंने कभी चिल्लाने की कोशिश की और ना ही उस चुप्पी को भेदा जा सका है.

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