Sunday, 5 March 2017

बीमार जैसा कुछ

मैं जब बीमार नहीं होता हूं, तब सोचता हूं कि बीमार आदमी असहाय नहीं होते, वो असहाय होने का सिर्फ अभिनय करते रहते हैं. अभी मैं बीमार हूं, हालांकि, मैं दिनचर्या के तमाम काम कर रहा हूं, दफ्तर भी जा रहा हूं, लेकिन 'असहाय होने का अभिनय' अब इस बात पर मुझे हंसी आने लगी है. दवा खाकर काम करना भी आसान नहीं होता.
इस वक्त मैं एक कहानी लिख रहा था. नेहा नाम की लड़की की कहानी, जो समुंदर हो जाना चाहती है. हर एक जज्बात को अपने दायरे में समेटकर रखना चाहती है. लेकिन मुझे उसका दरिया होना ज्यादा पसंद है. उसका बहना ज्यादा पसंद है. इसलिए मैंने कहानी को अधूरा छोड़ दिया है. मैं किरदार की मर्जी से कहानी नहीं लिख सकता.
पिछले हफ्ते मेरा साथी ((कबूतर)) वापस मेरे पास आ गया. उसे देखकर मुझे बहुत खुशी हुई. लेकिन वो घायल था. शायद किसी ने उसे पत्थर से निशाना बनाया था. मैंने उसे बचाने की कोशिश की, लेकिन नहीं बचा पाया. मैं बहुत निराश हो गया. वो जाते वक्त किसी नये साथी के पास जाने की बात कहकर गया था, लेकिन आखिरी वक्त मेरे पास लौट आया, इस बात की संतुष्टि है मुझे.
वो मायाजाल से मुक्त हो चुका है. अब मैं चाय बनाऊंगा. और अपने कहानी के किरदार से फिर बात करूंगा, शायद अब वो दरिया बनकर रहने को राजी हो जाए...

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