नहीं कोई कहानी नहीं है। ये असल में कहानी की कतरनें हैं....जो छूट रही हैं। इन कहानी की कतरनों से भी कहानियां बन रही हैं, जिसे सिर्फ वो दोनों ही सिर्फ सुन रहे हैं। दिल में एक टीस उठती है उसका क्या करना है, एक कोना है, जहां लौ सी जल जाती है उसे कैसे नोचना है, उसकी उपाय करने की कोशिश वो करती है, लेकिन एक उपाय करने जाती है, तो अपने ही जालों में उलझ कर रह जाती है...
आजकल लड़की को मूक संवाद करने की आदत हो गई है। इंतजार के अमावस में वो फंस सी गई है। वो लड़के को मिस कर रही थी, बेहद से भी बेहद...लेकिन वो ये बात कह भी नहीं सकती है। छाती से निकलती चीख गले में कहीं फंस जा रही है। वो गले लगना चाहती है...चूमना चाहती है, सीने से चिपकना चाहती है, वो ये बात लड़के के हाथों पर अपना सिर रखकर बताना चाहती है। लेकिन उसे तमाम तमन्नाएं कमरे के कोने में नोंच कर फेंक देनी पड़ रही है।
हम सब परिस्थिती नाम के डिब्बे में कैद कर लिए गये हैं। डिब्बे में एक छेद किया गया है, जिसके जरिए रोशनी की एक रेखा सी आती है। हम उसे रेखा के जरिए डिब्बे की कैद से बाहर निकल जाना चाहते है, छूट जाना चाहते हैं। लड़की भी डिब्बे में कैद है इस वक्त। डिब्बे के बाहर एक पहरेदार बैठा है। कड़क। मूंछों वाला। पैनी नजर जमाए। लड़की उसकी आंखों से ओझल होना चाहती है, लेकिन नहीं हो रही है। पहरेदार उस लड़की को कुछ देर के लिए डिब्बे से बाहर लड़की को निकालता है, और लड़की को वापस छटपटाने के बाद उस डिब्बे में फिर से कैद होना पड़ता है। ये बेहद अजीब परिस्थिति है।
क्या हम उस परिस्थिति नाम के डिब्बे को तोड़ सकते हैं? क्या हम पहरेदार को चकमा देकर भाग सकते हैं? क्या हम अपनी कमजोरी से पार पा सकते हैं। बहुत मुमकिन है पार पा लेना....बहुत मुमकिन है पहरेदार की नजरों से बचकर निकल जाना...लेकिन कहानी में सवाल पूछना और असल जिंदगी में उसपर यकीन करना....दोनों एक दूसरे से बेहद अलग होते हैं। ये कहानी भी अलग परिस्थिति की ही है।...लड़की को अभी डिब्ब में कैद रहना होगा। तड़पना होगा........और रोशनी की एक रेखा के सहारे जीवन का चित्र तैयार करना होगा।
क्या हम उस परिस्थिति नाम के डिब्बे को तोड़ सकते हैं? क्या हम पहरेदार को चकमा देकर भाग सकते हैं? क्या हम अपनी कमजोरी से पार पा सकते हैं। बहुत मुमकिन है पार पा लेना....बहुत मुमकिन है पहरेदार की नजरों से बचकर निकल जाना...लेकिन कहानी में सवाल पूछना और असल जिंदगी में उसपर यकीन करना....दोनों एक दूसरे से बेहद अलग होते हैं। ये कहानी भी अलग परिस्थिति की ही है।...लड़की को अभी डिब्ब में कैद रहना होगा। तड़पना होगा........और रोशनी की एक रेखा के सहारे जीवन का चित्र तैयार करना होगा।
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