गुनगुनी सी रात की ये बात है
जब चिराग़ ने खोली थी अपनी लाल मद्धम सी आंखे
उस वक्त मैं शब्दों को प्रेम करना सिखा रहा था
तभी फिसल कर गिरी थी सिरहाने में तुम्हारी आवाज
और मैंने डिब्बे में भर कर तुम्हारी आवाज को रख लिया था
अक़सर गाहे बगाहे मैं डिब्बे से निकालकर
तुम्हारी आवाज की छोटी सी डली चख लिया करता था
आज फिर गुनगुनी सी शाम थी
और मुझे तलब लगी थी तुम्हारी आवाज चखने की
मैेने आलमारी से डिब्बा निकाला, उसे खोला
मगर वो खाली मिला...
..............................................
हर चीज की एक मियाद होती है, हर चीज खत्म हो जाता है
तुम्हारी आवाज भी खत्म हो गई
लेकिन ये तलब है, और मैंने देखा है अक़सर
तलब हो या व्यसन...
बढ़ता जाता है, बढ़ता जाता है, बढ़ता जाता है...
जब चिराग़ ने खोली थी अपनी लाल मद्धम सी आंखे
उस वक्त मैं शब्दों को प्रेम करना सिखा रहा था
तभी फिसल कर गिरी थी सिरहाने में तुम्हारी आवाज
और मैंने डिब्बे में भर कर तुम्हारी आवाज को रख लिया था
अक़सर गाहे बगाहे मैं डिब्बे से निकालकर
तुम्हारी आवाज की छोटी सी डली चख लिया करता था
आज फिर गुनगुनी सी शाम थी
और मुझे तलब लगी थी तुम्हारी आवाज चखने की
मैेने आलमारी से डिब्बा निकाला, उसे खोला
मगर वो खाली मिला...
..............................................
हर चीज की एक मियाद होती है, हर चीज खत्म हो जाता है
तुम्हारी आवाज भी खत्म हो गई
लेकिन ये तलब है, और मैंने देखा है अक़सर
तलब हो या व्यसन...
बढ़ता जाता है, बढ़ता जाता है, बढ़ता जाता है...
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