Wednesday, 5 September 2018

मुरब्बा हो हो हो नहीं...ओ रब्बा हो हो हो...

आज अभी-अभी मैंने मुरब्बा खाया है। इसे दिल्ली और उत्तर प्रदेश में पेठा भी कहते हैं। आगरा से एक साथी ने मुरब्बा लाया था। मुरब्बा खाना मुझे बेहद पसंद रहा है। मुझे याद है, कि बचपन में बाबा अकसर मुरब्बा लाया करते थे। उन दिनों हिंदी फिल्म का एक गीत काफी चर्चित हुआ था।...'एक लड़की इधर से गुजरी है.. दिल जान जिगर से गुजरी है... गोरे-गोरे गालों वाली...काले-काले बालों वाली...मस्त-मस्त चालों वाली... मेरे दिल को दिवाना करके गई... हो रब्बा हो हो हो.. हो रब्बा हो हो हो..। पर मैं हो रब्बा का मानी नहीं समझता था। मुझे ये शब्द भी नहीं पता था। मैं बचपन में जोर-जोर से ये गीत गाता था...पर मेरे बोल निकलते थे... मुरब्बा हो हो हो.. मुरब्बा हो हो हो...
मेरे एक मामा की शादी थी। मैं बाराती के तौर पर जा रहा था। कार में मेरे कुछ बड़े भाई भी थे। हम सब मस्ती करते हुए जा रहे थे। तभी मैंने ये गाना गाया...और गाने लगा...मुरब्बा हो हो हो...मुरब्बा हो हो हो..। तब मेरे ममेरे भाई ने मुझसे कहा...कि मुरब्बा हो हो हो नहीं है, ओ रब्बा हो हो हो... है। मैं आश्चर्य से भर गया। कि इतने दिनों से मैं गलत गाये जा रहा था, पर किसी ने सही क्यों नहीं किया...। मुझे उस वक्त बहुत हंसी आने लगी। पर ये बात मैं आजतक भूल नहीं पाया।.. अकसर जब भी मैं मुरब्बा खाया करता हूं, मुझे वो गाना भी याद आ जाता है, और बाराती वाली बात भी।

हम अनजाने में कितनी गलतियां कर जाते हैं।...और जब कोई उन गलतियों के बारे में बताता है, तो हमें पता चलता है, कि हम कितनी बड़ी गलती कर रहे थे। कुछ गलतियों पर हम हंस देते हैं, और कुछ गलतियों पर हम प्रायश्चित कर लेते हैं। पर कुछ गलतियां ऐसी होती हैं, जिन्हें करने के बाद हम खुद से भी माफी नहीं मांग पाते हैं। और अंदर ही अंदर गिजगिचापन महसूसते रहते हैं।... पवित्र शब्द कितना दूर लगता है कभी-कभी... इस शब्द को लिखते वक्त ऊंगलियां तक कांप जाती हैं।

इन दिनों लोगों को लगता है, कि मैं उनकी बात बहुत ध्यान से सुन रहा हूं।.. पर होता ऐसा नहीं है। असल में मैंने किसी भी बात को बहुत ही ध्यान से सुनने की कला सीख ली है। पर मैं कोई भी बात ध्यान से नहीं सुनता। बस थोड़ा सा मेरा मुंह खुला रहता है...आंखों में ''ध्यान से सुन रहा हूं'' वाली फीलिंग्स रहती हैं...पर मन कहीं और एकांत के अरण्य में भटकता रहता है। किसी रेगिस्तान में उस वक्त मैं अकेला चलता हुआ पाया जाता हूं। रेत में पैर पूरी तरह से धंसे रहते हैं...सिर से पसीना टपकता रहता है पर मैं लगातार चलता रहता हूं। कई बार मैंने पाया, कि रेगिस्तान में मैं चलता नहीं हूं...बल्कि, भटकता रहता हूं, या फिर मैं भागता रहता हूं। किससे भागता हूं, ये आजतक नहीं जान पाया। उसने कहा...तुम बेहद डरपोक हो...हमेशा भाग जाते हो... तुममे स्थिति को संभालने का...डटकर डिसिजन लेने की क्षमता नहीं है...। मैं उसकी बात बहुत ध्यान से सुन रहा था...। तभी मुझे पता चला...कि रेगिस्तान में मैं भटक नहीं रहा हूं, असल में मैं रेगिस्तान की रेत पर भागने की कोशिश कर रहा हूं...पर मेरे पैर इतने धंसे हुए हैं, कि मैं भाग नहीं पा रहा हूं। बहुत देर बाद भी मैं उसी के सामने खड़ा था। वो बोली जा रही था...बोली जा रही थी।... कुछ देर बाद वो रोने लगी।... मैं उसके आंसुओं को देख रहा था.... मैंने हाथ बढ़ाकर आंसुओं को पोंछ दिए...फिर उसने मेरे कंधे पर अपना सिर टिका दिया।... बोली, तुम इतने डरपोक क्यों हो ? मैंने कुछ नहीं कहा...। कुछ देर तक वो कांधे पर सिर रखकर रोती  रही..। फिर मैंने थोड़ी सी चालाकी दिखाते हुए उसे एक कहानी सुना दी...। कृष्ण की कहानी..। उसे मैंने मोह क्या है वाली कहानी सुना दी... । वो अब ठीक हो चुकी थी। फिर कुछ देर में केक खाते हुए हंसने लगी...और मुझसे कहा... तुम बहुत अच्छे हो...। सबसे अच्छे..।
मैं सोचने लगा...कि इस थोड़े से वक्त में क्या बदला है...? क्या मैं रेगिस्तान से बाहर आ चुका हूं.. ? क्या मैंने भागना बंद कर दिया है...? नहीं, मैं वहीं का वहीं खड़ा था।... अब मुरब्बे का स्वाद मुंह से जा चुका है..। पानी पीने को मन कर रहा है... किसी पहाड़ पर जाने का मन कर रहा है.... बहुत कुछ मन कर रहा है... असल में मेरा मन पागल है...।


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