Wednesday, 5 September 2018

हम एक जादुगर हैं

जिसे हम नहीं जानते-पहचानते...उनसे बहुत सारी बातें कहने को मन कर रहा है। किसी अजनबी को हर हाल सुनाकर खाली हो जाने को मन चाहता है। पर कितनी उलझनों को बता पाऊंगा...कितनी चाहनाओं को मैं खोल पाऊंगा...और उससे हासिल क्या होगा...? बहुत सारे सवाल लिए इस वक्त बस मैं अक्षरों के कुछ चित्र बना लेना चाहता हूं।

हम सब सोचते हैं, कि हम एक जादुगर हैं
सांप और छुछुन्दर वाली स्थिति...। कुछ ऐसी ही स्थिति में घिरा हुआ हूं..। इतना घिर चुका हूं...कि मन बेशर्मों की तरह हंस रहा है...और अभी ये लिखते वक्त भी मुंह पर मुस्कान आ गई है।... मैं अपने साथ कितने लोगों को नचाता रहता हूं।..और फिर नाचने वालों के साथ खुद भी नाचता रहता हूं। हां, इस खेल का पक्का खिलाड़ी हूं मैं। कभी किसी को अकेला नहीं छोड़ा है.। हां, जब वो पूरी तरह नाचकर थक चुके होते हैं, तो फिर मुझे छोड़ जाते हैं...और मैं उन्हें रोकता भी नहीं हूं।

एक बार मैं खुद से बेहद महत्वपूर्ण बात कर रहा था। मैंने कहा...कि असल में हम सब सोचते हैं, कि हम एक बहुत बड़े जादूगर हैं, और हर वक्त हम कोई ना कोई जादू कर सकते हैं। इस भ्रम में जीते-जीते एक दिन ऐसा आता है, कि हम इस भ्रम के तिलिस्म में कहीं खो से जाते हैं। और फिर जीवन को जादू समझ लेते हैं। पर जीवन तो जादू होता नहीं है। हां, जीवन में चमत्कार होते रहते हैं। मैं उन चमत्कारों की बात नहीं करूंगा...। पर हां, मैं उन मुसीबतों की बात जरूर करूंगा, जिसे गाहे-बगाहे हम अपने लिए चुनते रहते हैं। या चुनकर चुपचाप पॉकेट में भरकर सड़क पर चलने लगते हैं। वो मुसीबत हर वक्त छुट्टे रुपयों की तरह खनकते रहते हैं, और हम उनसे खीझते रहते हैं। दुनिया की तमाम बड़ी से बड़ी मुसीबतों में से सबसे बड़ी मुसीबत है, किसी का साथ। जी हां...ये मैं पूरी होशो-हवास में कह रहा हूं। ..... छोड़िए...इससे ज्यादा मुझे कुछ नहीं कहना है।

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