Sunday, 28 January 2018

आलस

आलस से भरा हुआ हूं। गालिब के जूतों की तरह मन चर्र-मर्र कर रहा है। आज आवश्यकता से ज्यादा खाना खा लिया था तो आलस उसी हिसाब से है। ऐसे समय में चाय पीने की तीव्र इच्छा होने लगी, सो चाय भी पी आया। बाहर थोड़ी धूप में चाय पीना सुकून लग रहा था। आस पास कुछ कुत्ते सो रहे थे। हवा भी शांत थी। ठंड के महीने में थोड़ी धूप और हाथों में चाय...बस नींद की कमी थी। मुझे यकीन है, अगर मैं इस वक्त बिस्तर पर चला जाऊं, तो यकीनन नींद से सुलह हो जाए। और मैं गहरी नींद में सो जाऊं। दिल से कहूं, तो अभी मुझे किसी अजनबी से बात करने का मन हो रहा है। किसी अजनबी को जानने का मन हो रहा है। किसी अनजान विषय पर देर तक संवाद करने का मन कर रहा है।
जब आप किसी के बारे में कुछ नहीं जानते तो अच्छा होता है। ये बोतल में बंद शराब देखने जैसा अनुभव होता है। कभी थोड़ा पीने को जी करता है, फिर कड़वाहट के डर से उससे दूर ही रहने का मन करता है। अभी-अभी एक परिचित का फोन आया..। कुछ देर बातें करने के बाद मन ऊबने लगा...सो, किसी और से भी बात करने का ख्याल त्याग दिया। सामने टीवी स्क्रीन पर तरह तरह के चेहरे ऊभर रहे हैं...एक नजर उन्हें भी देख लेता हूं। बाबा रामदेव, पीएम मोदी, शशि थरूर दिख रहे हैं। फिर यूपी में हुए दंगे की तस्वीरें देखता हूं तो मन कोफ्त से भर जाता है। और फिर कुछ लिखने की इच्छा भी चली जाती है।




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वो एक खिलौना भर है...टूट जाना उसकी नीयति है..। वो टूट ही जाएगा...। फिर क्यों हम करें उसकी उम्मीद...।  दूर एक धुंधला सा लैंप पोस्ट दिखता है।...