थोड़ी धूप निकल आई थी। और मैं कुर्सी लेकर छत पर धूप सेंकने पहुंच गया। एक लंबे अर्से के बाद छत पर यूं धूप में बैठना कुछ अच्छा लग रहा था। सामने की छत पर दो महिलाएं बातें करने में मशगूल थीं और साथ में दो छोटे-छोटे बच्चे किताबें खोलकर पढ़ रहे थे। पढ़ कम रहे थे, झूल ज्यादा रहे थे। बिल्कुल मेरी तरह। मुझे याद है, जब मैं बचपन में पढ़ता था, तो हिंदी की कोई कविता पढ़ते वक्त कुछ इसी तरह से मशगूल हो जाया करता था। ज्यादातर कविताएं मुझे याद रहती थीं, इसलिए किताब देखे बगैर ...आंख मूंदकर मैं जोर-जोर से कविताएं पढ़ता रहता था। मेरी आवाज छत से होते हुए कई घरों तक पहुंचती रहती थीं। मां को लगता था, कि मैं पढ़ाई में मशगूल हूं। जब कभी गणित बनाने बैठता, तो चप्पलें खाकर पढ़ाई खत्म होती थीं। हर बच्चे बचपन में एक जैसे ही होते हैं। वो बच्चा भी झूल झूलकर पढ़ रहा था। मेरे सामने छत के मूंडेर पर एक कबूतर आ बैठा है। पंख फड़फड़ाता हुआ। मैं मुस्कुराते हुए कबूतर देखने लगा। कबूतरों की सबसे खास बात ये होती है, कि उनका गर्दन स्थिर नहीं रहता। हर वक्त गर्दन में एक हलचल मचा रहता है, बिल्कुल मेरे मन की तरह । इधर से ऊधर भटकता हुआ। कबूतर का गर्दन या मेरा मन...बात बराबर।
कबूतर को सामने देख मुझे मेरे साथी की याद आ गई। और मैं नीचे चाय बनाने आ गया। अकसर चाय बनाते वक्त मेरा साथी मेरा साथ मौजूद रहता था। हम अकसर बातें करते थे। लेकिन, अब वो नहीं है। कबूतरों का सिर्फ गर्दन ही नहीं, मन भी बहुत चंचल होता है। एक जगह नहीं ठहरते। मेरा साथी भी नहीं ठहरा। चाय उबल रही थी...। चाय बनाते वक्त अकसर मैं सपने देखना शुरू कर देता हूं। हम जैसे लोगों के लिए सपने कितने मायने रखते हैं। सपना देखते वक्त हम बेहद खामोश होते हैं। और धीरे-धीरे हमारे लिए हर एकांत कम एकांत लगने लगता है। भीड़ भी हमारे लिए अकेलापन बन जाता है। और सपना खत्म होते होते हमारे चेहरे पर एक मुस्कान तैरने लगती है। हम हौले से मुस्कुरा देते हैं। मैं कभी-कभी दफ्तर जाते वक्त मेट्रो में भी मुस्कुरा देता हूं। सच कहूं तो मुझे मुस्कुराना अच्छा लगता है। और दूसरा सच ये है...कि हमारे जैसे लोग सपनों की बदौलत ही जिंदा रहते हैं। जिस दिन हमारा ये सपना खत्म हो जाएगा, हम खत्म हो जाएंगे। सपनों ने हमें जिंदा रखे हुआ है। सपनों के बारे में एक खास बात बताऊं ? हम जब भी सपने देखते हैं, हम आसमान की तरफ देखने लगते हैं। आसमाने में उस वक्त क्या होता है, वो हमें पता नहीं चलता । हमारी आंखों के सामने बादलों का धुंध होता है। और हम उस धुंध में कुछ तलाशने की कोशिश करते रहते हैं। सच में...सपने देखते वक्त हम कबूतर बन जाते हैं, और बादलों के बीच से दाने चुगते रहते हैं। और जब बादलों का धुंध छंट जाता है, तो हम मुस्कुरा देते हैं।
तो क्या मैं ऊड़ जाऊं।...थोड़े कच्चे पंख हैं...और कबूतर वाले मन हैं, जो...बांह पसारे उड़ने की इजाजत मांग रहा है। तो क्या मैं ऊड़ जाऊं... ?
कबूतर को सामने देख मुझे मेरे साथी की याद आ गई। और मैं नीचे चाय बनाने आ गया। अकसर चाय बनाते वक्त मेरा साथी मेरा साथ मौजूद रहता था। हम अकसर बातें करते थे। लेकिन, अब वो नहीं है। कबूतरों का सिर्फ गर्दन ही नहीं, मन भी बहुत चंचल होता है। एक जगह नहीं ठहरते। मेरा साथी भी नहीं ठहरा। चाय उबल रही थी...। चाय बनाते वक्त अकसर मैं सपने देखना शुरू कर देता हूं। हम जैसे लोगों के लिए सपने कितने मायने रखते हैं। सपना देखते वक्त हम बेहद खामोश होते हैं। और धीरे-धीरे हमारे लिए हर एकांत कम एकांत लगने लगता है। भीड़ भी हमारे लिए अकेलापन बन जाता है। और सपना खत्म होते होते हमारे चेहरे पर एक मुस्कान तैरने लगती है। हम हौले से मुस्कुरा देते हैं। मैं कभी-कभी दफ्तर जाते वक्त मेट्रो में भी मुस्कुरा देता हूं। सच कहूं तो मुझे मुस्कुराना अच्छा लगता है। और दूसरा सच ये है...कि हमारे जैसे लोग सपनों की बदौलत ही जिंदा रहते हैं। जिस दिन हमारा ये सपना खत्म हो जाएगा, हम खत्म हो जाएंगे। सपनों ने हमें जिंदा रखे हुआ है। सपनों के बारे में एक खास बात बताऊं ? हम जब भी सपने देखते हैं, हम आसमान की तरफ देखने लगते हैं। आसमाने में उस वक्त क्या होता है, वो हमें पता नहीं चलता । हमारी आंखों के सामने बादलों का धुंध होता है। और हम उस धुंध में कुछ तलाशने की कोशिश करते रहते हैं। सच में...सपने देखते वक्त हम कबूतर बन जाते हैं, और बादलों के बीच से दाने चुगते रहते हैं। और जब बादलों का धुंध छंट जाता है, तो हम मुस्कुरा देते हैं।
तो क्या मैं ऊड़ जाऊं।...थोड़े कच्चे पंख हैं...और कबूतर वाले मन हैं, जो...बांह पसारे उड़ने की इजाजत मांग रहा है। तो क्या मैं ऊड़ जाऊं... ?
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