Monday, 29 January 2018

जाड़े की धूप एक उपहार है।

उसे मैंने पहली बार धूप में खड़ा देखा था। किसी का इंतजार करते शायद। धूप की गर्मी से आंखे थोड़ी सिकुड़ी हुई लग रही थी मगर भिगी हवा की अपनी अदा होती है। ये जनवरी का आखिरी हफ्ता है। सर्दी अपने अवसान पर है। मैं भी धूप के कोने में कहीं खड़ा हुआ था, कि उसे देख लिया। हल्की हवा की सबसे खास बात ये होती है, कि इसमें आपके बाल थोड़ लहराते रहते हैं, जिन्हें संभालना अच्छा लगता है। उसे भी शायद अच्छा लग रहा होगा। मैं चाय पी रहा था। उसने अपने हैंडबैक से सिगरेट का एक डिब्बा निकाला। और फिर एक लाइटर। फिर वो सिगरेट पीने लगी। किसी का इंतजार करते वक्त सिगरेट पीते हुए अच्छा वक्त कटता है, ऐसा मैंने सुना था। आज देख रहा था। तभी एक और लड़की उसके पास आई। उसके हाथों में भी सिगरेट सुलग रही थी। दोनों गलें मिलीं। फिर सिगरेट का कश खींचा। मुझे अब धूप थोड़ी चुभने लगी थी, इसलिए मैं वापस दफ्तर आ गया। दफ्तर में शोरगुल मचा हुआ था। न्यूजरूम ऐसा ही होता है। गहमागहमी मची रहती है। हमें उस शोर की आदत होती है। और एक वक्त ऐसा आता है, कि हम उस शोर में शांति तलाशने का हूनर जान लेते हैं। मुझे लगा, कि इन बातों को लिख लेनी चाहिए। 

अकसर हम छोटी-छोटी बातों को...कहे गये कुछ जज्बातों को दर्ज करना भूल जाते हैं। मुझे याद है, मैं उस वक्त तीसरी कक्षा में था। मेरे पापा ही मुझे गणित पढ़ाया करते थे। इसलिए मैं गणित में काफी अच्छा था। मैं गणित के वही बने बनाये सवालों को बनाते बनाते ऊब चुका था। इसलिए एक शाम पढ़ते वक्त पापा से कहा, मुझे गणित में कुछ नया सीखना है। वही पुराने सवाल अब नहीं बनाना है। मैं बोर हो चुका हूं। पापा मुस्कुराने लगे। फिर बोले...ठीक है, आज औसत सिखाता हूं। मैंने पहली बार औसत का नाम सुना था। मैं खुश हो गया। पापा ने मुझे औसत बनाना सिखा दिया। चंद सवाल बनाने के तरीके जान लेने के बाद पापा वहां से चले गये। और मैं खुद से सवाल बनाने लगा। मुझे अब भी याद है, मैंने पूरा का पूरा चैप्टर खुद ही बना डाला। मुझे औसत बनाना काफी अच्छा लग रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था, कि इन सवालों को मैं पहले से ही बनाना जानता था, बस तरीका भूल गया था। पापा ने बस वो तरीका बता दिया है। मुझे वो बात अब तक याद है, जबकि उस वक्त मैं शायद 7 या 8 साल का रहा होऊंगा। हालांकि, पापा अब साथ नहीं होते। दूर रहते हैं। लेकिन, जब भी किसी मुश्किल में फंसता हूं, तो मुझे गणित का वो चैप्टर...औसत याद आ जाता है। मुझे लगता है, इस सवाल को हल करना मुझे आता है, बस मैं इस वक्त उसका तरीका नहीं जानता। फिर मैं तरीका खोजने लगता हूं। एक वक्त फिर ऐसा आता है, जब तरीका भी मिल जाता है, और परेशानी खत्म हो जाती है। तो क्या, हमारी जिंदगी में ऐसा होता है, कि परेशानी आने से पहले हमारे पास उसे सॉल्व करने का तरीका आ जाता है, बस हमें उसे थोड़ी सी मेहनत से खोजना भर होता है ? मुझे लगता है, कि मेरे इस सवाल का जवाब शायद हां मे हैं।

ऊपर मैंने जिस लड़की को धूप में सिगरेट पीते हुए देखने का जिक्र किया है, वो सरासर झूठ है। मैं न्यूजरूम में ही काफी अर्से से बैठा हुआ हूं। मैंने किसी को सिगरेट पीते हुए नहीं देखा। मुझे लगा था, कि मुझे बाहर जाना चाहिए। और मैंने अपने अक्स को बाहर चाय पीने के लिए भेज दिया। और मेरे अक्स ने किसी लड़की को सिगरेट पीते हुए की कल्पना की। जिसे मैंने अपने इस ब्लॉग में दर्ज कर लिया। हां, मगर जिंदगी औसत की तरह है, इस बात पर मैं अब तक कायम हूं।




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वो एक खिलौना भर है...टूट जाना उसकी नीयति है..। वो टूट ही जाएगा...। फिर क्यों हम करें उसकी उम्मीद...।  दूर एक धुंधला सा लैंप पोस्ट दिखता है।...