Monday, 22 January 2018

अनजान आदमी

मैं एक आदमी को जानता हूं, जो दिन में कई दफे कमरे का दरवाजा खोलकर बाहर आता है।...और फिर कमरे में वापिस दाखिल हो जाता है। उसे लगता है, कमरे के उस पार कुछ है, जिसकी आहट वो सुनता रहता है। हर आहट पर वो चौंक जाता है...मगर, किसी को उस पार नहीं पाकर वापस दरबे में सिमट जाता है। अगर उसकी कहानी बस इतनी भर रहती तो अच्छा होता...पर उसकी कहानी उस कमरे के आयताकार जगह में खत्म नहीं होती। उसे कभी-कभी लगता है, कि वो असंभव से बिखराव को एक धागे में पिरोने की कोशिश कर रहा है। उसके बाल काफी बड़े-बड़े हो चुके हैं। दाढ़ी पर सफेदी छाने लगी है। चेहरा धुंधला दिखने लगा है। लोगों से घिरा रहने पर भी अकेलेपन का शिकार रहता है। मैंने कई दफे उससे संवाद करने की कोशिश की...पर हर बार असफल रहा।    

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डूबने वाले ने डूबते साहिल को आवाज दी...

वो एक खिलौना भर है...टूट जाना उसकी नीयति है..। वो टूट ही जाएगा...। फिर क्यों हम करें उसकी उम्मीद...।  दूर एक धुंधला सा लैंप पोस्ट दिखता है।...