Sunday, 21 January 2018

शिद्दत

पूरी शिद्दत के साथ सुबह हमने जो काम शुरू किया था, शाम होते होते वो एक गोलाकार में सिमटने लगता है. रात हो जाती है, और वापिस कमरे में बैठकर हम कहते हैं, दुनिया गोल है. रात होने तक हम इस गोलाकार का एक चक्कर लगा चुके होते हैं, और अंत में बिस्तर पर पड़ी सिलवटों को छूकर कहते हैं, लो फिर से हम उद्गम के पास आ गये. हम घूमते-घामते वहीं आ जाते हैं, जहां से हमने ये यात्रा शुरू की थी. दरअसल हम घूमते कम हैं, भटकते ज्यादा हैं. इस भटकने के खेल में हमारा शरीर कब सो जाता है, हमें पता नहीं चलता. पर भटकने के इस अंतराल में हमारा मन कुछ कहानियों का निर्माण कर बैठता है, और हमारे सपनों में उन कहानियों के किरदार हमें तमाशा दिखाना शुरू कर देते हैं.  

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