Monday, 28 May 2018

बेवक्त की बातें

हम अकसर करते रहते हैं, बेवक्त की बातें..। जोड़ते रहते हैं, कुछ शब्दों के समूह को...देखते रहते हैं, कुछ चित्र... निकालते रहते हैं, उन चित्रों से मतलब...करते रहते हैं, उन मतलबों से संवाद...और इन सबके बीच...बीतते रहते हैं हम..। वो बीतना किस बात के लिए...। मैंने सोचा कई दफे...पर कुछ समझ नहीं आया।....

हम कोई तस्वीर देखकर यूं मोहित क्यों हो जाते हैं।... हमारी चाहना क्यों जग जाती है, कि काश उस चित्र को हम बनाएं।...करें एक बार फिर से उस चित्र का निर्माण अपनी कूंचियों से।

हतप्रभ...विस्मित...

मैंने ऐसा महसूस किया है...कि जिस चित्र को मैंने देखा है...कुछ अर्से बाद वो चित्र सजीव होकर मेरे सामने आ जाती हैं..। और मैं विस्मित हो जाता हूं। उस चित्र से एक तरह का संवाद शुरू हो जाता है।

नहीं...अब मैं किसी भी चित्र के साथ कोई संवाद नहीं करूंगा। किसी भी चित्र को जानने की...उसे समझने की कोई कोशिश नहीं करूंगा। प्रण...हां, इसे मैं अपना प्रण ही मान रहा हूं। जब किसी चित्र की मानी हम समझ जाते हैं, तो एक गहरी सांस लेते हैं। फिर उसे चित्र को हम गंदला कर देते हैं। मैंने कई चित्रों को जिज्ञासा से देखा... उसे जानने की कोशिश की...और इस प्रक्रिया के खत्म होते होते...मैंने देखा...वो चित्र गंदला हो चुका है।

बाहर बहुत धूप है। गर्म हवा बह रही है। मैं अंदर घर में बैठा हुआ हूं...चित्र को मैं सामने देख सकता हूं। उसमें एक अलग किस्म का आकर्षण मैं महसूस कर रहा हूं।

मैंने उस चित्र को ढंक दिया है। नहीं, मुझे नहीं देखना कोई और चित्र। नहीं करना निर्माण...किसी और चित्र का। 

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