Monday, 21 May 2018

कज़ान

देर रात सपने में तुम थी...और मैं तुम्हें कज़ान नाम से पुकार रहा था। तुम्हें इस नाम के मानी नहीं पता थे, पर तुम्हें अच्छा लग रहा था। तुमने मुझसे पूछा, क्या होता है इस नाम का मतलब। मैंने तुम्हें इस नाम के मानी नहीं बताया। और तुम मुझे मुक्का मारने लगी। तुम थोड़ी चिढ़ रही थी और मुझे तुम्हारा यूं चिढ़ना अच्छा लग रहा था...

मैं चाह रहा था, कभी चुुपके से तुम्हारे कान में ये नाम कहूं। मैं कहूं, सुनो, मैंने तुम्हारा नाम कज़ान रखा है। पर इस नाम के मानी नहीं बताऊं।....पर ऐसा हो नहीं पाया। ये नाम जितना दूर रहा मुझसे, उतना ही दूर तुम मुझसे रही।

दोपहर का वक्त है। मैं अकसर पराठे वाले को फोन पर 2 पराठे ऑर्डर कर दिया करता था। कहता था, भैया मैं ठीक एक बजे आऊंगा, आप पराठे तैयार रखना। मुझे इंतजार करना अच्छा नहीं लगता बाहर...इसलिए मैं तय वक्त पर जाकर उससे पराठे ले आता था। एक बार ऑर्डर देने के बाद मैं पराठे लेने नहीं गया। आज जब फोन किया, तो उसने कहा...सर, पक्का आओगे ना ? मैंने हंसते हुए कहा...हां भैया, पक्का आऊंगा पराठे लेने। वो मान गया था। लेकिन, मैं सोच में पड़ गया। कितनी पतली होती है विश्वास की रेखा...। कितनी जल्दी टूट जाती है विश्वास की रेखा...। बस एक दिन नहीं गया पराठे लेने, तो पराठे वाला का यकीन टूट गया....और मैंने तो तुम्हारा यकीन पूरी तरह से तोड़ चुका था।.... फिर भी तुम्हें मेरे ऊपर यकीन था। खुद को कितना धिक्कारूं... कितना कोसूं...कितना खुद को खरी-खोटी सुनाऊं....जो कहीं दो पलों के लिए चैन मिल जाए। माफ करने वाला माफ कर देता है...पर जिसे माफ कर दिया गया होता है, वो जलता रहता है... जलता रहता है... जलता रहता है। मेरा जलने का वक्त है...

साथी ये जलना कबूल
ये पिघलना कबूल...
इस तरह जगना...फिर उठना कबूल
ये सजा...ये शाप...वो दुआ कबूल
साथी कैसे कहूं...तू मुझे कबूल .....?

कज़ान....साथी मैंने आज के सपने में तुम्हारा ये नाम रखा है।

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