आज दिन भर की खामोशी के बाद देर रात मुझे पता चला...कि मैं बहुत दिनों बात तुम्हारे पास लौटा हूं। मुझे लगा, कि मुझे इस बात को लिख लेना चाहिए। और मैं लिखने बैठ चुका हूं। उस आदमी से बैर सा होने लगा है, जो हर वक्त लिखना ..... बस लिखना चाहता था। मैंने कई बार सोचा...कि किसी तरह उसे मना लूं... किसी तरह उससे सुलह कर लूं...पर ऐसा हो नहीं पाया। लंबे अर्से के बाद कुछ लिखने बैठा हूं। नशे में हूं। बताने की जरूरत नहीं...कि पश्चाताप कर रहा हूं। ऐसा लग रहा है, कि रेगिस्तान में भटक रहा हूं...पानी की तलाश में हूं....या फिर कीकर का कांटा पैरों में चुभा हुआ है...और मैं मुंह बंद अंदर ही अंदर चिल्ला रहा हूं।
जो मैंने किया हुआ है...उसे मैंने गुनाह नाम दिया हुआ है।...और मैं हर वक्त उसके साथ रहता हूं। माफी की आकांक्षा भी नहीं है...पर कुछ ऐसा है...जो अंदर फंसा हुआ है...जो निकल जाए, तो मैं राहत की सांस लूं। मैं कितना खुश हो जाया करता था, तुम्हारी हंसी देखकर...तुम्हारी आंखों की मिलमिलाहट देखकर...पर अब मेरे पास बचा क्या है।.. तुमने अपना एक अंग मुझे समझ लिया था, ये मुझे तब पता चला, जब मैं गलतियां कर चुका था...मैं बहुत गुस्सा हुआ...कि तुम्हें पहले बताना चाहिए था...लेकिन वो तो मुझे खुद समझ लेना चाहिए था....तुमसे सुनने की अभिलाशा बेकार की बात हुई ना। ओह......
मुंह से पतली सी आह निकलती है...और रात के सन्नाटे में गुम हो जाती है। किससे कहूं, अपनी बेवफाई के किस्से... कहा रो लूं...कहां बहा लूं इन बहते हुआ आंसुओं को....कि इसका कतरा नहीं देख पाए कोई....कि नहीं उठा पाए कोई सवाल...ना मैं दे पाऊं जवाब...जबकि, मैं जानता हूं...तुमने मुझे माफ कर दिया है।... शायद मेरा दिल रखने के लिए ही....शायद, मुझसे प्रेम करने के लिए वास्ते ही....और मैंने क्या किया..........
इन दिनों मैं खूब सपने देखता हूं...हर सपने के बाद बहुत डर जाता हूं...डर इतना...कि सोते हुए मुंह से डर भरी आवाज निकलती है...और उठ जाता हूं..। कुछ देर खुद को आईने में देखता रहता हूं। आईने में उस निरीह इंसान को देखता हूं..जिसने कहा था...सुनो...तुम आंखे मिलमिलाती हो, तो बहुत अच्छी लगती हो...प्लीज एक बार और आंखे मिलमिलाओ ना...और तुम खुश होकर मेरी बातें मान लिया करती थीं। कहां से लाऊं इतनी मासूमियत.. कहां से लाऊं वो वाला प्यार...कहां से लाऊं तुम्हारे वो वाले जज्बात...वो निश्छल हंसी...लो निस्वार्थ प्रेम.... आह....
जो चोट खाता है, उसका दर्द सब देखते हैं...और जो चोट देता है, वो खामोश मौत मरते रहता है...मरते रहता है.. मरते रहता है।.....
जो मैंने किया हुआ है...उसे मैंने गुनाह नाम दिया हुआ है।...और मैं हर वक्त उसके साथ रहता हूं। माफी की आकांक्षा भी नहीं है...पर कुछ ऐसा है...जो अंदर फंसा हुआ है...जो निकल जाए, तो मैं राहत की सांस लूं। मैं कितना खुश हो जाया करता था, तुम्हारी हंसी देखकर...तुम्हारी आंखों की मिलमिलाहट देखकर...पर अब मेरे पास बचा क्या है।.. तुमने अपना एक अंग मुझे समझ लिया था, ये मुझे तब पता चला, जब मैं गलतियां कर चुका था...मैं बहुत गुस्सा हुआ...कि तुम्हें पहले बताना चाहिए था...लेकिन वो तो मुझे खुद समझ लेना चाहिए था....तुमसे सुनने की अभिलाशा बेकार की बात हुई ना। ओह......
मुंह से पतली सी आह निकलती है...और रात के सन्नाटे में गुम हो जाती है। किससे कहूं, अपनी बेवफाई के किस्से... कहा रो लूं...कहां बहा लूं इन बहते हुआ आंसुओं को....कि इसका कतरा नहीं देख पाए कोई....कि नहीं उठा पाए कोई सवाल...ना मैं दे पाऊं जवाब...जबकि, मैं जानता हूं...तुमने मुझे माफ कर दिया है।... शायद मेरा दिल रखने के लिए ही....शायद, मुझसे प्रेम करने के लिए वास्ते ही....और मैंने क्या किया..........
इन दिनों मैं खूब सपने देखता हूं...हर सपने के बाद बहुत डर जाता हूं...डर इतना...कि सोते हुए मुंह से डर भरी आवाज निकलती है...और उठ जाता हूं..। कुछ देर खुद को आईने में देखता रहता हूं। आईने में उस निरीह इंसान को देखता हूं..जिसने कहा था...सुनो...तुम आंखे मिलमिलाती हो, तो बहुत अच्छी लगती हो...प्लीज एक बार और आंखे मिलमिलाओ ना...और तुम खुश होकर मेरी बातें मान लिया करती थीं। कहां से लाऊं इतनी मासूमियत.. कहां से लाऊं वो वाला प्यार...कहां से लाऊं तुम्हारे वो वाले जज्बात...वो निश्छल हंसी...लो निस्वार्थ प्रेम.... आह....
जो चोट खाता है, उसका दर्द सब देखते हैं...और जो चोट देता है, वो खामोश मौत मरते रहता है...मरते रहता है.. मरते रहता है।.....
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